नवेंदु उन्मेष
डा.राजेंद्र प्रसाद भले ही देश के राष्ट्रपति थे लेकिन उनका जूता रांची में बनाया जाता था। जब तक वे राष्ट्रपति रहे तब तक रांची में बने जूते उन्हें भेजा जाता था। उस जूता को लेने के लिए साल में एक बार डा.राजेंद्र प्रसाद के सुपुत्र व सांसद मृत्युंजय प्रसाद रांची आया करते थे। यह सिलसिला उनके राष्ट्रपति भवन छोड़ने के बाद भी बना रहा।डा.राजेंद्र प्रसाद का जूता कचहरी रोड, जयपाल सिंह स्टेडियम के सामने स्थित चर्मोद्योग में बनाया जाता था। उस चर्म उद्योग के मालिक कांग्रेस नेता तथा व्यवसायी श्याम किशोर साहु हुआ करते थे। वर्तमान में शहीद चैक के कोने पर स्थित प्रताप स्टोर की गगनचुंबी इमारत उन्हीं के परिवार की है। उस जूते को हजारीबाग के एक कायस्थ सज्जन बनाया करते थे जो कानपुर से जूते की नई तकनीक सीखकर रांची आये थे।
सरसों के तेल में महीनों तैयार होता था चमड़ा
राजेंद्र प्रसाद के जूते की खासियत यह थी कि उसे बनाने के पहले श्याम किशोर साहु के शहीद चैक स्थित कोल्हू से या रातू रोड स्थित कोल्हू से सरसों का तेल मंगाया जाता था और कई माह तक उस तेल में चमड़े को डालकर रखा जाता था। इसके बाद उनके लिए जूता बनाया जाता था। साहू राष्ट्रपति के लिए बनाए गए जूते के लिए कोई पैसा नहीं लेते थे। हालांकि मृत्युंजय प्रसाद ने कई बार उनसे पैसा लेने का अनुरोध भी किया था। मृत्युंजय प्रसाद जब भी चर्मोद्योग से जूते लेने के लिए आते थे तो उन्हें कई जोड़ी जूते डा.प्रसाद के लिए थमा दिया जाता था।
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान चर्मोद्योग पहुंचे थे राजेंद्र प्रसाद
बताया जाता है कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एक बार डा.राजेंद्र प्रसाद ने श्याम किशोर साहू के अनुरोध पर चर्मोद्योग के कार्यों का निरीक्षण किया था। उस वक्त उन्होंने चर्मोद्योग के कार्यो की बहुत सराहना की थी। इसके बाद उन्होंने श्री साहू से उनके लिए एक जूता बनाने का अनुरोध किया था जो उन्हें बहुत पसंद आया था। इसके बाद यह सिलसिला चल पड़ा और राजेंद्र बाबू जब तक राष्ट्रपति रहे उसी चर्मोद्योग में निर्मित जूते पहनते रहे। हालांकि डा.राजेंद्र प्रसाद के निजी सचिव रहे बाल्मीकि चौधरी ने अपनी किताब में लिखा है कि वे एक सादगी पसंद व्यक्ति थे। एक बार राष्ट्रपति भवन में गणतंत्र दिवस के दिन उनकी बड़ी बहन का निधन हो गया। उस दिन राजेंद्र बाबू को राजपथ पर गणतंत्र दिवस समारोह में शामिल भी होना था। सुबह वे राष्ट्रपति भवन से एक ट्रक पर सवार होकर बहन के शव को लेकर श्मशान घाट के लिए निकले और अंतिम संस्कार करने के बाद सुबह ग्यारह बजे राजपथ पर आयोजित गणतंत्र दिवस समारोह में ऐसे भाग लिया जैसे उनके घर पर कुछ हुआ ही नहीं हो। इसकी भनक प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू तक को नहीं लगी।
गणतंत्र दिवस समारोह के दिनभर चले कार्यक्रमों के बाद जब राजेंद्र बाबू शाम को राष्ट्रपति भवन पहुंचे तो राष्ट्रपति भवन बिजली की रंगबिरंगी लाइट से जगमगा रहा था। उसे देखकर ऐसा नहीं लग रहा था कि राष्ट्रपति भवन में कोई शोक का माहौल हो। चौधरी ने आगे लिखा है कि राजेंद्र बाबू का उस दिन ऐसा मानना था कि शोक राजेंद्र प्रसाद के घर में हुआ है न कि राष्ट्रपति भवन में। मुझे अपना काम करना चाहिए और राष्ट्रपति भवन को राष्ट्र का काम करना चाहिए।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। कवि उन्मनजी के पुत्र हैं।
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