-हिमकर श्याम
झारखंड की धरती अपनी प्राकृतिक संपदा, जीवंत आदिवासी संस्कृति और साहसिक जनआंदोलनों के लिए पहचानी जाती है। इसी धरती पर यहां की पत्रकारिता ने केवल समाचार प्रस्तुत करने का काम नहीं किया, सामाजिक चेतना को जगाने, जागरूकता फैलाने और जन-अधिकारों की रक्षा के लिए साहसपूर्वक संघर्ष करने का मार्ग अपनाया। शुरुआती प्रकाशनों से लेकर आज के डिजिटल युग तक, झारखंड की पत्रकारिता की यह यात्रा साहस, प्रतिबद्धता और समाज के प्रति संवेदनशीलता की मिसाल है। इस यात्रा-कथा के माध्यम से हम झारखंड की पत्रकारिता के इतिहास, उसके विकास और समाज में उसकी भूमिका पर एक व्यापक दृष्टि डालेंगे।
मिशनरियों ने रखी थी नींव
झारखंड में पत्रकारिता की नींव ईसाई मिशनरियों ने रखी थी। सर्वप्रथम वर्ष 1872 में जर्मन मिशनरियों ने रांची से एक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया, उसका नाम था 'घर-बन्धु'। यह धार्मिक पत्रिका थी, जिसका प्रकाशन आज भी हो रहा है। मिशनरियों ने वर्ष 1920 में 'निष्कलंका' नाम से एक और पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। इन पत्रिकाओं में बाइबल के संदेशों के अलावा स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय खबरें भी प्रकाशित होती थीं।
वर्ष 1889 में आर्य समाज की स्थापना की गई, जिसके उपरांत साप्ताहिक पत्रिका ‘आर्यावर्त’ छपना शुरू हुआ। इसके संपादक थे बाल कृष्ण सहाय। यह आर्य समाज का मुखपत्र था। इसमें देश-विदेश की खबरें हुआ करती थीं। इसी तरह वर्ष 1918 में सुकुमार हलधर के संपादन में 'सोशल जर्नल' का प्रकाशन शुरू हुआ। वर्ष 1921 में मानव शास्त्री शरत चंद्र राय ने चर्च रोड रांची से 'मैन इन इंडिया' नामक एक प्रसिद्ध जर्नल का प्रकाशन एवं संपादन शुरू किया। आगे चलकर इसका संपादन निर्मल कुमार बोस के द्वारा किया गया।
वर्ष 1924 में मामराज शर्मा ने रांची से 'छोटानागपुर' पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ किया। वर्ष 1932 में छोटानागपुर उन्नत समाज ने एक पत्रिका निकाली, जिसका नाम था 'आदिवासी'। राय साहब बंदी उरांव और जूलियस तिग्गा इस पत्रिका के संयुक्त संपादक थे। मुंडारी, कुड़ुख, हो आदि लगभग सभी जनजातीय भाषाओं में रचनाएं छपती थीं। जूलियस को इसी पत्रिका में छपी एक कविता के कारण जेल जाना पड़ा था। वह संभवत: झारखंड के पहले पत्रकार होंगे, जिन्हें जेल की यातना मिली।
आंदोलन और संघर्ष का दौर
झारखंड अलग राज्य आंदोलन के समय पत्रकारिता ने निर्णायक भूमिका निभाई। क्षेत्रीय अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं ने आदिवासी अस्मिता, जल-जंगल-जमीन और रोजगार जैसे संवेदनशील मुद्दों को लगातार और प्रमुखता से उठाया। पत्रकारों ने दबाव और चुनौतियों के बावजूद जनहित के मुद्दों को प्राथमिकता दी। यह दौर पत्रकारिता के साहस और प्रतिबद्धता का प्रतीक रहा। 1912 में पहली बार 'घर बंधु' में झारखंड के निर्माण की मांग करने वालों की खबर प्रकाशित हुई। वर्ष 1938 में गुमला से 'झारखंड' नामक पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ। इसमें झारखंड आंदोलन से जुड़ी खबरें प्रमुखता से प्रकाशित होती थीं। इसके संपादक थे बड़ाईक ईश्वरी प्रसाद सिंह। जयपाल सिंह ने 1940 में जमशेदपुर से हिन्दी, अंग्रेजी और मुंडारी में ‘आदिवासी सकम’ पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। इसके बाद साप्ताहिक पत्रिका ‘अबुआ झारखंड’ निकालना आरंभ हुआ, जिसका पहला अंक 14 सितंबर 1947 को रांची से प्रकाशित हुआ। इस पत्रिका में झारखंड आंदोलन और आदिवासी महासभा की गतिविधियों से जुड़ी खबरें प्रकाशित होती थीं। इसका संपादन और प्रकाशन इग्नेस बेक द्वारा किया जाता था। इग्नेस बेक के संपादन में एक और पत्रिका ‘झारखंड न्यूज’ का भी प्रकाशन शुरू हुआ, जो हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में प्रकाशित होती थी।
‘आदिवासी’ पत्रिका के बंद होने के बाद, वर्ष 1947 में बिहार सरकार के जनसंपर्क विभाग ने इसी नाम से एक मासिक पत्रिका शुरू की। बाद में यह साप्ताहिक में बदल गई। इसका प्रकाशन केंद्र रांची था और संपादक के रूप में राधाकृष्ण को नियुक्त किया गया। राधाकृष्ण इस पत्रिका के संपादक 1970 तक रहे। यह पत्रिका आज भी प्रकाशित होती है। झारखंड राज्य के गठन के बाद इसका प्रकाशन सूचना एवं जन संपर्क विभाग, झारखंड द्वारा किया जाने लगा।
अंग्रेजी दैनिक ‘स्टेट्समैंन’ के विशेष संवाददाता हेरम्य मिश्र ने रांची के हिंदपीढ़ी मोहल्ले में स्वर्णरेखा प्रेस की स्थापना की। वर्ष 1945 में उन्होंने ‘उल्टी गंगा’ नामक साप्ताहिक अखबार का प्रकाशन शुरू किया। इसके बाद उन्होंने ‘स्वर्णरेखा’ नामक एक और साप्ताहिक अखबार का प्रकाशन आरंभ किया। वर्ष 1947 में धनबाद से ‘आवाज’ साप्ताहिक के रूप में प्रकाशित हुआ, जो 1975 में दैनिक अखबार बन गया। इसके संस्थापक- संपादक ब्रह्मदेव सिंह शर्मा थे। सन् 1950 में गंगा प्रसाद कौशल ने ‘मजदूर आवाज’ साप्ताहिक निकाला, जिसका बाद में नाम बदलकर ‘आजाद मजदूर’ कर दिया गया।
झारखंड का पहला हिन्दी दैनिक अखबार ‘राष्ट्रीय भाषा’ था, जो 1948-49 में रांची से प्रकाशित हुआ। इसे देवी प्रसाद मित्रा द्वारा निकाला गया। उन्होंने लालपुर थाने के निकट उमा प्रेस की स्थापना की और हिन्दी में पहला दैनिक अखबार प्रकाशित किया। इसके संपादक बटुकदेव शर्मा थे।
इस दौरान अनेक पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू हुआ, कई अखबार निकले और बंद हो गए। इनमें मुख्य रूप से राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों की खबरों को प्रमुखता दी जाती थी।
वर्ष 1963 में ‘रांची एक्सप्रेस’ का प्रकाशन शुरू हुआ। आरंभ में यह साप्ताहिक अखबार था, लेकिन 1976 में आपातकाल के समय इसे दैनिक में बदल दिया गया। आपातकाल के विरोध में इस अखबार ने अपना संपादकीय पृष्ठ खाली रखा। इसके संस्थापक संपादक बलबीर दत्त थे। अप्रैल 2016 में अखबार का प्रबंधन सुधांशु रंजन के हाथों में आ गया। 1978 में रांची एक्सप्रेस प्रकाशन समूह ने ‘जय मातृभूमि’ साप्ताहिक और अंग्रेजी साप्ताहिक ‘रांची हेराल्ड’ का भी प्रकाशन शुरू किया। 1983 में इसी समूह ने टीवी आधारित कार्यक्रमों के लिए ‘युगश्री’ नामक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया। इसी समय एक और अखबार, ‘रांची टाइम्स’, का प्रकाशन शुरू हुआ। इसके पहले प्रकाशक शैलेंद्र भारद्वाज थे, बाद में दिलीप कुमार दाराद इसके संपादक-प्रकाशक बने।
रांची से प्रकाशित पहला अंग्रेजी साप्ताहिक 'सेंटिनल' था। वर्ष 1964 में फतेउल्लाह रोड स्थित अपने आवास से बन्नू बाबू वकील ने इसका प्रकाशन शुरू किया था। इसी तरह डीपी दासगुप्ता रांची से 'संडे प्रेस' नामक अंग्रेजी साप्ताहिक निकालते थे। वह 'डेली प्रेस' नामक अंग्रेजी दैनिक भी निकाला करते थे।
रांची के पहले उर्दू अख़बार का नाम था छोटानागपुर मेल। समरुल हक़ इसके प्रकाशक-संपादक थे। 15 अगस्त 1967 को 'छोटानागपुर मेल' की शुरुआत हुई। कीमत रखी गई 20 पैसे। यह अखबार 1977 तक छपता रहा। वर्ष 1971 में एनई होरो ने ‘झारखंड टाइम्स’ शुरू किया, वहीं 1974 में भुवनेश्वर अनुज ने ‘छोटानागपुर संदेश’ निकाला। वर्ष 1980 में जमशेदपुर से 'उदित वाणी' का प्रकाशन शुरू हुआ। इसी दौरान जमशेदपुर से अंग्रेजी दैनिक 'टेलीग्राफ' का प्रकाशन होता रहा। 1980 के आसपास आरिफ गद्दी ने जमशेदपुर से ही 'लौहकुंज' साप्ताहिक अखबार निकाला। इस तरह, 1967 से लेकर 1980 तक झारखंड के मीडिया परिदृश्य में महत्वपूर्ण उन्नति हुई और हिंदी, उर्दू तथा अंग्रेज़ी के अखबारों ने क्षेत्र में सूचना और विचारों का आदान-प्रदान सुनिश्चित किया।
वर्ष 1984 में ‘आज’ और ‘प्रभात खबर’ का प्रकाशन शुरू हुआ। झारखंड के कांग्रेस के विधायक ज्ञानरंजन, जो अलग अलग राज्य के प्रबल समर्थक थे, ने ‘प्रभात खबर’ की स्थापना की। इसका पहला अंक 14 अगस्त 1984 को प्रकाशित हुआ। इसके प्रथम संपादक एस.एन. विनोद थे। उनके बाद सुनील श्रीवास्तव संपादक बने। सुनील श्रीवास्तव के जाने के बाद कुछ समय के लिए दिलीप दाराद ने संपादक का दायित्व संभाला। बाद में यह अखबार आर्थिक कठिनाइयों के कारण लगभग बंद होने की स्थिति में पहुंच गया, लेकिन 1989 में प्रबंधन परिवर्तन हुआ और उषा मार्टिन समूह ने इसकी जिम्मेदारी संभाली। इसके बाद हरिवंश प्रधान संपादक के रूप में जुड़े और अखबार को नई दिशा मिली।
रांची से 1991 में साप्ताहिक समाचार पत्र के रूप में ‘देशप्राण’ का प्रकाशन शुरू हुआ, जो 1992 में दैनिक बन गया। इसके संस्थापक निदेशक और प्रधान संपादक बलबीर दत्त हैं। इसी दौर में ‘अपनी रांची’, ‘वनांचल प्रहरी’, ‘छोटानागपुर न्यूज’, ‘रांची मेल’ और ‘झारखंड दर्शन’ जैसे कई अन्य पत्र-पत्रिकाओं का भी प्रकाशन हुआ।
14 अक्टूबर 1994 को पलामू जिले से ‘राष्ट्रीय नवीन मेल’ की शुरुआत हुई। वर्ष 1997 में जमशेदपुर से ‘चमकता आईना’ अखबार आरंभ किया गया, जिसके संस्थापक संपादक ब्रह्मदेव सिंह शर्मा थे। 26 अगस्त 1999 को ‘झारखंड जागरण’ का प्रकाशन शुरू हुआ।
झारखंड राज्य के गठन से पूर्व संयुक्त बिहार में पत्रकारिता का मुख्य केंद्र पटना था, जिसके कारण इस क्षेत्र के पत्रकारों और पत्र-पत्रिकाओं को अपेक्षाकृत कम महत्व मिलता था। झारखंड आंदोलन के समय स्थानीय पत्र-पत्रिकाएँ जनचेतना के सशक्त माध्यम के रूप में उभरीं। संसाधनों की कमी और सीमित तकनीकी सुविधाओं के बावजूद पत्रकारों ने साहस, प्रतिबद्धता और निष्पक्षता के साथ अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन किया। इन पत्र-पत्रिकाओं ने जनचेतना का विस्तार किया, क्षेत्रीय मुद्दों को मुखरता से प्रस्तुत किया और पृथक राज्य की मांग को ठोस आधार प्रदान किया।
राज्य गठन के बाद का परिदृश्य
लंबे संघर्ष, राजनीतिक प्रयासों और जनसमर्थन के बाद 15 नवंबर 2000 को झारखण्ड राज्य का गठन हुआ। राज्य निर्माण के साथ सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक बदलावों की प्रक्रिया तेज हुई, जिसका सीधा प्रभाव पत्रकारिता पर भी पड़ा। पत्रकारिता के सामने संभावनाओं का नया द्वार खुला, पर चुनौतियाँ भी कम नहीं थीं। राजनीतिक अस्थिरता, विकास, खनन, विस्थापन, भ्रष्टाचार तथा नक्सलवाद जैसे मुद्दे सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में आ गए। स्थानीय समाचार चैनलों और एफएम रेडियो ने ग्रामीण क्षेत्रों तक अपनी पहुँच सुदृढ़ की, जबकि खोजी पत्रकारिता ने विभिन्न घोटालों एवं प्रशासनिक कमियों को उजागर कर लोकतांत्रिक जवाबदेही को मजबूत किया। पत्रकारों और पत्र-पत्रिकाओं को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने लगी।
इसी वर्ष रांची से 'दैनिक हिंदुस्तान' का प्रकाशन शुरू हुआ। हरिनारायण सिंह स्थानीय संपादक बनाये गये। हिन्दुस्तान के साथ 'हिन्दुस्तान टाइम्स' भी आया। इसके बाद कई बड़े मीडिया घरानों ने झारखंड का रुख किया।
राजधानी सहित राज्य के तीन प्रमुख शहरों में एक ही दिन 'दैनिक जागरण' का प्रकाशन कई मायनों में अभूतपूर्व साबित हुआ। पत्रकारिता के इतिहास में अपनी तरह की यह पहली घटना थी। 12 फरवरी 2003 को रांची, जमशेदपुर और धनबाद यूनिटों का एक साथ शुभारंभ हुआ, और अगले दिन, 13 फरवरी को दैनिक जागरण सीधे पाठकों तक पहुँचा। जागरण प्रकाशन लिमिटेड के अखबार आई‑नेक्स्ट का रांची में प्रकाशन 27 जून 2008 को शुरू हुआ। इसका प्रकाशन शहरी पाठकों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था। इसमें समाचार के साथ रोचक तथा जीवन‑शैली से संबंधित सामग्री दी जाती है।
22 अगस्त 2010 को 'दैनिक भास्कर' ने झारखंड में कदम रखा और रांची से अपना पहला संस्करण प्रकाशित किया। इसके बाद, 12 दिसंबर 2010 को जमशेदपुर संस्करण और 17 अप्रैल 2011 को धनबाद संस्करण का शुभारंभ हुआ। इस दौरान 'सन्मार्ग', 'खबर मंत्र', 'आजाद सिपाही', 'राष्ट्रीय सागर', 'शुभम संदेश' और अंग्रेजी अखबार 'पायोनियर' के अलावा कई उर्दू एवं बांग्ला अखबारों का प्रकाशन भी रांची से होने लगा।
शुरुआत में झारखंड की पत्रकारिता को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। समय के साथ इसके स्वरूप और तेवर में बदलाव आया। बाजारवाद और कॉर्पोरेट संस्कृति के प्रभाव ने पृष्ठ सज्जा, रंग-विन्यास और विज्ञापन को मजबूत किया, जबकि विभिन्न संस्करणों के होने से अखबार पूरी तरह से स्थानीय बन गए।
डिजिटल युग और नई चुनौतियाँ
इंटरनेट और सोशल मीडिया के आगमन ने झारखंड की पत्रकारिता को एक नई दिशा दी है। ऑनलाइन पोर्टल, यूट्यूब चैनल और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म तेजी से उभरते गए हैं, जिससे खबरें अब तत्काल प्रसारित होने लगी हैं। आम नागरिक भी अब ‘सिटीजन जर्नलिस्ट’ की भूमिका निभा रहे हैं और खबरों के स्रोत बन रहे हैं। हालाँकि इस बदलाव ने पत्रकारिता को नई दिशा दी है, लेकिन फेक न्यूज़, टीआरपी की होड़ और व्यावसायिक दबाव जैसी चुनौतियाँ भी बढ़ गई हैं। ऐसे में पत्रकारिता में प्रमाणिकता बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।

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