◆ विलियम जोसेफ विल्किंस (1843-1902)
भारत में मिशनरी गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा धर्म प्रचार कार्य, यानी वयस्कों को उपदेश देना, स्कूलों और कॉलेजों में अध्यापन करना है। अधिकांश मिशनरी संस्थाओं के अपने संस्थान हैं, जो लड़कों और युवाओं को ईसाई शिक्षा देने के उद्देश्य से खोले गए हैं, और यह शिक्षा लगभग पूरी तरह से अंग्रेजी में दी जाती है। देश के अधिकांश हिस्सों में अंग्रेजी पढ़ने और विश्वविद्यालय परीक्षाओं में बैठने की प्रबल इच्छा है, क्योंकि अंग्रेजी बोलने वाले मूल निवासियों को उच्च सामाजिक स्थिति और अधिक वेतन प्राप्त होता है। कई गरीब लोग और निचली जाति के लोग अपने बेटों को अच्छी शिक्षा दिलाने और उन्हें अपने से बेहतर जीवन की शुरुआत दिलाने के लिए जीवन की लगभग सभी आवश्यक वस्तुओं का त्याग कर देते हैं।
सरकारी विद्यालयों और महाविद्यालयों में उच्च कोटि की शिक्षा प्राप्त की जा सकती है तो फिर धर्म प्रचारक अपना समय इस कार्य में क्यों लगाते हैं? इस प्रश्न का उत्तर इस तथ्य में निहित है कि भारत में मनुष्य के बीच विद्यमान सबसे प्राचीन धार्मिक प्रणालियों में से एक है और यह धर्म लोगों की आस्था और भक्ति को दृढ़ता से थामे हुए है क्योंकि इसमें कुछ सबसे प्राचीन धार्मिक साहित्य मौजूद है। जैसा कि हमारे मिशनरियों ने मसीह को उद्धारकर्ता के रूप में प्रचारित किया, तो लोगों ने पूछा, ‘यीशु कब प्रकट हुए?’ जब उन्हें बताया गया कि उनका जन्म लगभग अठारह सौ साल पहले बेथलहम में हुआ था, तो उन्होंने जवाब दिया, ‘आपका धर्म यह बीते कल की बात है। हमारी किताबें लाखों साल पहले लिखी गई थीं, और हमारा धर्म, अपनी उम्र के कारण, हाल ही में घोषित किसी भी प्रणाली से कहीं बेहतर प्रणाली होनी चाहिए।’
हिंदुओं के पवित्र ग्रंथों में असीमित ज्ञान था और लगभग चालीस वर्ष पहले, कुछ सबसे सक्षम मिशनरियों ने सोचा कि यदि इन ग्रंथों की दैवीय उत्पत्ति में विश्वास को नष्ट किया जा सके, तो वे यह आशा कर सकते हैं कि लोग ईसाई धर्म के संबंध में उनके कथनों को निष्पक्ष मन से सुनेंगे। भारत का मन घने जंगल से आच्छादित भूमि के समान था, इस जंगल को काटना आवश्यक था ताकि मिट्टी में ईसाई धर्म के अच्छे बीज बोए जा सकें। भारत का मन इस भ्रम में डूबा हुआ था। प्रकाश का प्रवेश आवश्यक था ताकि वे ‘ईसा मसीह के अथाह खजाने’ को देख और सराह सकें।
इसी उद्देश्य से ईसाई विद्यालय खोले गए, आंशिक रूप से सरकारी विद्यालयों की तुलना में कम शुल्क के कारण, और आंशिक रूप से इस तथ्य के कारण कि मिशनरी आमतौर पर अपने विद्यार्थियों के प्रति अधिक दयालु होते हैं और उनके कल्याण में गहरी व्यक्तिगत रुचि रखते हैं, हिंदू पिता अपने बेटों को भेजते हैं, भले ही वे भली-भांति जानते हों कि मिशनरी का शिक्षण उद्देश्य अपने सभी विद्यार्थियों को मसीह को जानने और उनसे प्रेम करने के लिए प्रेरित करना है। कभी-कभी यह भय और झिझक के साथ किया जाता है, विशेषकर जब विद्यार्थियों में ईसाई धर्म में धर्मांतरण हुआ हो। मैंने ऐसे माता-पिता के बारे में सुना है जो हिंदू मंदिर जाकर यह मन्नत मांगते हैं कि यदि देवी उनके विद्यार्थी के विश्वास को विद्यालय या महाविद्यालय की पढ़ाई पूरी होने तक दृढ़ बनाए रखेंगी तो वे एक निश्चित राशि चढ़ाएंगे।
एक मिशनरी संस्था के रूप में, इस शैक्षिक कार्य के महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकता, क्योंकि आम तौर पर छात्रा अपने पूर्वजों के धर्म में अपना वास्तविक विश्वास खो देते हैं। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है, जब हम याद करते हैं कि हिंदू धर्मग्रंथों में वर्णित बातें दर्शन, खगोल विज्ञान, ज्योतिष, चिकित्सा, गणित, इतिहास आदि लगभग हर विषय पर ये ग्रंथ बहुत ही उच्च कोटि के सिद्धांत प्रस्तुत करते हैं और चूंकि इनमें से कई ग्रंथ हजारों वर्ष पूर्व लिखे गए थे, इसलिए इनकी शिक्षा आधुनिक वैज्ञानिक शोधों के परिणामों से मेल नहीं खाती। उदाहरण के लिए, ये पुस्तकें सिखाती हैं कि संसार एक समतल, त्रिभुजाकार मैदान है। यह एक सांप की पीठ पर टिका है, और सांप एक कछुए की पीठ पर खड़ा है, इसलिए जब कछुआ थोड़ा आराम करने के लिए अपना एक पैर उठाता है, तो भूकंप आता है। सूर्य और चंद्रमा का ग्रहण राहु नामक एक राक्षस द्वारा उन्हें निगलने के प्रयास का परिणाम है। इसलिए जब भी ग्रहण होता है, हिंदू नगरों में अत्यधिक उत्साह और शोरगुल होता है। लोग चीखते-चिल्लाते हैं, पैराफिन तेल के डिब्बे पीटते हैं, और राक्षस को डराने के लिए शोर मचाने वाली हर चीज का इस्तेमाल करते हैं। इन सबके समान ही अन्य कहानियां भी हैं जिन्हें देवताओं की प्रेरणा से बताया जाता है। जब हिंदू युवक भौतिक भूगोल का अध्ययन करते हैं, तो वे अपनी पुस्तकों में व्याप्त त्राुटियों को देखते हैं, और स्वाभाविक रूप से उनके दैवीय उत्पत्ति में उनका विश्वास नष्ट हो जाता है। लेकिन कई मामलों में, यद्यपि उनकी पुरानी पुस्तकों में विश्वास समाप्त हो गया है, फिर भी वे अपने घरों में स्थापित मूर्तियों की पूजा करना जारी रखते हैं, ताकि उन्हें जाति से बहिष्कृत न किया जाए और कष्ट न सहना पड़े।
मिशन विद्यालयों में अच्छी अंग्रेजी शिक्षा दी जाती है, और उनमें पढ़े हुए लड़के विश्वविद्यालय परीक्षाओं में बैठते हैं, लेकिन इसके अतिरिक्त प्रतिदिन लगभग एक घंटा बाइबिल या ईसाई धर्म की दैवीय उत्पत्ति के प्रमाण प्रस्तुत करने वाली पुस्तकों के अध्ययन के लिए दिया जाता है। ईसा मसीह का अद्वितीय उदाहरण, उनकी मौखिक शिक्षाओं के साथ पूर्ण सामंजस्य में, हिंदू को बहुत प्रभावित करता है।
वह अपने धार्मिक ग्रंथों में बिखरे हुए सुंदर नैतिक उपदेश पा सकता है, जो कभी-कभी बहुत स्पष्ट रूप से सिखाए गए होते हैं, लेकिन जब वह देखता है कि उन्हीं ग्रंथों में उसके देवी-देवताओं का वर्णन उनके द्वारा सिखाए गए शब्दों के ठीक विपरीत किया गया है, तो ये सत्य उसके जीवन पर अधिक प्रभाव नहीं डाल पाते। मैंने अक्सर लोगों को यह कहते सुना है, ‘पहाड़ी उपदेश पढ़ते समय मुझे यह अहसास हुआ कि ईश्वर धर्मी और पवित्रा है और यह भी कि जो भी उसकी उपस्थिति में खड़ा होता है, वह भी धर्मी होता है। पवित्राता के लिए हम किसके पास जाएं? हमारे देवता तो हमसे भी बदतर हैं। यदि वे स्वयं को पवित्रा नहीं रख सकते, तो वे हमें कैसे पवित्रा कर सकते हैं?’ लोगों में एक प्रचलित कहावत है, जिसे मैंने अक्सर उन्हें कहते सुना है, जो उनके धर्म की घोर निंदा करती हैः ‘देवताओं की शिक्षा सुनने योग्य तो है, लेकिन उनका उदाहरण अनुकरण करने योग्य नहीं है।’ लेकिन वे यीशु के जीवन की श्रेष्ठता को पूरी तरह स्वीकार करते हैं। उन्होंने अपने शब्दों से सही बात सिखाई, और जैसा उन्होंने सिखाया वैसा ही जीवन जिया। अधिकांश शिक्षित पुरुषों का यीशु मसीह के प्रति गहरा सम्मान का भाव है। इसका बहुत बड़ा श्रेय उनके महानतम आधुनिक शिक्षकों में से एक, बाबू केशब चंद्र सेन के उदाहरण और उपदेशों को जाता है, जिनका निधन कुछ ही वर्ष पहले हुआ था।
ये मिशन संस्थान एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं। कुछ में केवल विश्वविद्यालय के प्रवेश या मैट्रिकुलेशन स्तर तक की कक्षाएं हैं अन्य में बी.ए. डिग्री की तैयारी कराने वाली कक्षाएं हैं। कुछ में लगभग अस्सी या नब्बे छात्रा हैं कुछ में एक हजार से अधिक हैं। लेकिन उनके परिणामों को देखते हुए, मुझे लगता है कि इन्हें स्थापित करने का विचार अत्यंत बुद्धिमानीपूर्ण था, और इस समय वे अच्छाई के लिए एक अपार शक्ति हैं। सरकारी संस्थानों में धार्मिक मामलों में पूर्णतया तटस्थता बरती जाती है। उनकी कक्षाओं में बाइबल नहीं पढ़ाई जाती और न ही वहां कोई धार्मिक शिक्षा दी जाती है। वास्तव में, मैंने कुछ ऐसे प्रोफेसरों के बारे में सुना है जो धार्मिक मामलों में तटस्थ होने का दावा तो करते हैं, लेकिन वास्तव में नास्तिकता का प्रचार करते हैं परंतु यह सरकार की भावना के बिलकुल विपरीत है। हालांकि, जो लोग इन धर्मविहीन विद्यालयों को छोड़ते हैं, वे वैसे नहीं रहते जैसे वे उनमें प्रवेश करते हैं, उनकी पढ़ाई ने आम तौर पर पुरानी हिंदू व्यवस्था में उनके विश्वास को चकनाचूर कर दिया होता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत में धार्मिक आस्था और प्रथाओं की पुरानी व्यवस्था को नष्ट करने के लिए अपार शक्तियां कार्यरत हैं।
इन मिशन स्कूलों द्वारा सुसमाचार प्रचार के हमारे कार्य में दी जाने वाली सहायता अत्यंत महत्वपूर्ण है। जो युवक वर्षों से प्रतिदिन बाइबल और अन्य ईसाई पुस्तकें पढ़ते हैं और ईसाई शिक्षकों के साथ घनिष्ठ संपर्क में रहते हैं, वे ईसाई सत्य का गहन ज्ञान रखते हैं और आम लोगों में व्याप्त पूर्वाग्रहों से मुक्त हो जाते हैं। मैंने अक्सर इन युवकों को गांवों में अपने पुराने मित्रों के बीच यह कहते सुना है कि मिशनरियों की कही हर बात सत्य है। ईसाई धर्म हिंदू धर्म से कहीं श्रेष्ठ है। परंतु उनमें से अपेक्षाकृत कम ही बपतिस्मा लेते हैं। इसका कारण यह नहीं है कि वे यीशु में विश्वास नहीं करते और उनसे प्रेम भी नहीं करतेकृबल्कि जब वे यह कदम उठाते हैं तो उन्हें अपना घर, माता-पिता और अपने सभी प्रियतम को त्यागना पड़ता है। यदि ऐसा न होता तो इस कार्य से ईसाई धर्म अपनाने वालों की संख्या में बहुत अधिक वृद्धि होती।
लेकिन यद्यपि इन संस्थानों में अपेक्षाकृत कम छात्रा खुले तौर पर ईसाई धर्म को अपनाते हैं और ईसाई चर्च से जुड़ने वाले लोगों में से, हमारे स्थानीय चर्च के कुछ सर्वश्रेष्ठ सदस्य इसी वर्ग से आते हैं। हमारे अधिकांश बंगाली पादरी और प्रचारक या तो विद्यालय में रहते हुए ईसाई बन गए, या उस समय प्राप्त शिक्षा ने, पवित्रा आत्मा द्वारा प्रेरित होकर, उन्हें बाद के वर्षों में, यहां तक कि सभी सांसारिक सुख-सुविधाओं का त्याग करके भी, मसीह के अनुयायियों के साथ जुड़ने के लिए प्रेरित किया, और मूसा की तरह, उन्होंने पाप के सुखों का आनंद लेने के बजाय उनके साथ कष्ट सहना बेहतर समझा और मैं यह कह सकता हूं कि उस युवक के हृदय में चल रहे संघर्ष को देखना अत्यंत पीड़ादायक अनुभव है जिसने आपका प्रेम जीता है, क्योंकि कर्तव्य उसे एक ओर खींचता है, और माता-पिता के प्रति स्वाभाविक स्नेह दूसरी ओर और इसके अलावा, किसी व्यक्ति को ‘सही मार्ग अपनाने’ के लिए प्रेरित करना अत्यंत कठिन कर्तव्य है, जब आपकी सलाह का पालन करने से निश्चित रूप से घर और सभी पुराने संबंधों से आंशिक, या पूर्ण रूप से, अलगाव हो जाएगा। आज भारत में, जैसा कि अधिकांश देशों में होता है जब पहली बार ईसाई धर्म का प्रचार किया जाता है, यीशु के शब्दों का अर्थ, ‘मैं शांति भेजने नहीं बल्कि तलवार भेजने आया हूं,’ 1 उस तरह से साकार होता है जैसा कि नाममात्रा के ईसाई देश में शायद ही कभी हो पाता है।
रविवार की सुबह धर्मग्रंथों की कक्षाएं आयोजित की जाती हैं, जिनमें से अधिकांश सदस्य विद्यालय से आते हैं। यह तथ्य स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि वे शिक्षा में रुचि रखते हैं और उस परमेश्वर के बारे में अधिक जानना चाहते हैं जिन्हें उनके गुरु और उद्धारकर्ता के रूप में प्रस्तुत किया गया है। अपने व्यक्तिगत अनुभव से मैं कह सकता हूँ कि हिंदू घरों में पले-बढ़े लोगों को परमेश्वर द्वारा सिखाए गए सत्यों को समझने और स्वीकार करने के लिए प्रेरित करने से अधिक रुचिकर और आनंददायक कोई कार्य नहीं है।
-अमेरिकी लेखक, भारत पर कई पुस्तकें लिखी हैं। यह डेली लाइफ एंड वर्क इन इंडिया, टी फिशर अनविन, लंदन 1888 पुस्तक का एक अध्याय है।
1-हिंदी में इसका अर्थ हैः यह न समझो कि मैं पृथ्वी पर शांति कराने आया हूं। मैं शांति नहीं, बल्कि तलवार चलाने आया हूं।’ ईसाई धर्मग्रंथों और धर्मशास्त्रिायों के अनुसार, यीशु (जीसस) द्वारा ‘तलवार’ शब्द का उपयोग किसी हिंसा या युद्ध के लिए नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और सामाजिक विभाजन के रूप में किया गया है।
इसका वास्तविक अर्थ यह है कि उनके सत्य और शिक्षाओं को मानने वाले और न मानने वाले लोगों के बीच वैचारिक टकराव होगा, जो कभी-कभी परिवारों के बीच भी मतभेद (फूट) का कारण बन जाएगा।
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