डा. नीरज कुमार मिश्र
झारखंड शैव धर्म की ऐतिहासिक सांस्कृतिक विरासत के दृष्टिकोण से अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण है। इस क्षेत्र में प्राचीन काल से मध्यकाल एवं आधुनिक युग में भी शैव धर्म के प्रति आस्था एवं अनुराग के साथ अप्रतिम शिव भक्ति देखी जा सकती है। इसके विभिन्न प्रमाण हमें इस प्रक्षेत्र में स्थापित प्राचीन शिव मंदिर एवं शैव मठ तथा अन्य धार्मिक सांस्कृतिक संरचनाएं बहुतायत देखी जा सकती हैं। वस्तुतः सातवीं आठवीं शताब्दी ईस्वी से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी ईस्वी के उत्तरार्ध तक के शैव मंदिरों के निर्माण की परंपरा निरंतरता में दिखाई देती है। इस क्रम में झारखंड की पठारी नदियों एवं प्रवाहित जलस्रोतों में स्थित चट्टान खंडों एवं जलाशयों के किनारे भी शिवलिंग उत्कीर्ण करने की विशेष परंपरा के साक्ष्य देखे जा सकते हैं जो अत्यंत ही विशेष रूप से उल्लेखनीय भी हैं। यद्यपि हमें उत्तरी कन्नड़ जिले के सिरसी में स्थित शालमला नदी में हज़ारों की संख्या में उत्कीर्ण शिवलिंग, नंदी एवं अभिलेख प्राप्त होते है। झारखंड में भी दामोदर नदी ,दक्षिण कोयल , सुबर्णरेखा आदि नदियों सहित कई महत्वपूर्ण क्षेत्रीय नालों एवं जलाशयों के किनारे ऐसे अवशेष प्राप्त होते हैं। इस प्रकार के पुरातात्त्विक साक्ष्य तद्युगीन धार्मिक सांस्कृतिक क्रियाकलाप के ऐतिहासिक सन्दर्भों को अभिव्यक्त करते हैं।

झारखंड के लोहरदगा जिले के कुडू प्रखंड के जिन्गी (जोंजरो) गावं के समीप दक्षिणी कोयल नदी में स्थित प्रस्तर खंडों एवं चट्टानी सतहों पर अलग अलग जगहों पर कुल 17 शिवलिंग योनिपीठ के साथ उकेरे गए हैं। इसके अतिरिक्त यहां एक पदचिन्ह , कैथी भाषा के दो अभिलेख भी उत्कीर्ण किए गए हैं। नदी के समीप दक्षिणी किनारे पर एक एक प्राचीन टीला भी अवस्थित है जहां एक प्राचीन शिव मंदिर के वास्तु अवशेस अवशेष सहित शिवलिंग आदि पड़े हुए हैं। प्रारूपकीय दृष्टि से नदी में उकेरे गए शिवलिंग एक नहीं अपितु विभिन्न सांस्कृतिक कालखंडों के हैं। यदपि एक शिवलिंग के समीप जहां पदचिन्ह भी है के समीप उत्कीर्ण अभिलेख में सम्वत 1839 (1782 ईस्वी ) का उल्लेख किया गया है।
गुमला जिले के नागफेनी में योनिपीठ
झारखंड के ही गुमला जिले के नागफेनी में दक्षिणी कोयल नदी के मध्य एक बड़े चट्टान खंड के ऊपर एक योनिपीठ उकेरा गया है इसमें स्थापित शिवलिंग अब नहीं है। नदी के समीप ही एक औरअष्टकमलदल युक्त योनिपीठ में स्थापित शिवलिंग के प्रमाण मौजूद हैं। इसके अतिरिक्त नवरतनगढ़ (डोइसानगर) के कपिलनाथ मंदिर के समीप के एक छोटे नाले जिसे महादेवटुकु के नाम से जाना जाता है ,में एक गोलाकार प्रस्तर खंड पर एक बहुत ही सुन्दर शिवलिंग योनिपीठ के साथ उकेरा गया है। यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है की नागवंशी शासकों की राजधानी नवरतनगढ़ के परिसर में भी विभिन्न जगहों पर स्थित प्रस्तर खंडों अथवा पहाड़ी ढलानों पर शिवलिंग ,पदचिन्ह सहित गणेश की विशाल आकृति एवं कुछ अन्य आकृतियां भी उकेरी गयी हैं। गुमला जिले के ही घाघरा में स्थित देवाकी धाम में घाघरा नदी के किनारे एक योनिपीठयुक्त शिवलिंग उकेरा गया है , जिसे नदी के दक्षिणी ढलान पर स्थित चट्टानी सतह पर मुख्य मंदिर के समीप देखा जा सकता है।

रांची जिले में दो स्थानों पर ऐसे साक्ष्य हमें प्राप्त होते हैं। इनमें से एक महत्वपूर्ण स्थान है।
चुटिया का इक्कैसी महादेव
रांची के चुटिया का इक्कैसी महादेव यहां सुबर्णरेखा नदी एवं हरमू नदी के संगम क्षेत्र में कुल 21 योनिपीठ जिनमे से कई में शिवलिंग भी देखा जा सकता है। रांची का चुटिया क्षेत्र नागवंश की आरम्भिक राजधानी रही है अतः इस क्षेत्र में नागवंशी राजाओं द्वारा निर्मित कई मंदिरों एवं अन्य सांस्कृतिक धार्मिक कृतियों के साक्ष्य उनके अभिलेख सहित प्राप्त होते हैं। इसके अतिरिक्त रांची से लगभग 25 किलोमीटर की दुरी पर ठाकुरगांव (गिंजो ठाकुरगांव) रांची से लगभग उत्तर-पश्चिम (North-West) दिशा में पड़ता है। यह रांची शहर से सड़क मार्ग द्वारा लगभग 25 से 26 किलोमीटर की दूरी पर बुड़मू प्रखंड के अंतर्गत स्थित है। यहां की एक छोटी नदी जिसे भूर नदी के नाम से जानते हैं, में भी कुल सात शिवलिंग नदी स्थित चट्टानी सतहों पर उकेरे गए हैं। इस स्थान को इक्कीसो महादेव नाम से जाना जाता है। वस्तुतः यहां कभी और ज्यादा शिवलिंग रहे होंगे लेकिन नदी क्षेत्र से अवैध पत्थर खनन के कारण अन्य साक्ष्य विनष्ट हो गए। इस स्थान से थोड़ी दूरी पर एक अन्य सहायक जल स्रोत के किनारे के ऊंचे चट्टान पर दो और शिवलिंग उत्कीर्ण किये गए हैं।
बोकारो का चेचकधाम
बोकारो का चेचकधाम
एक अन्य महत्वपूर्ण साक्ष्य बोकारो से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित चेचकधाम के समीप मोदीडीह के पास दामोदर नदी के दाहिनी किनारे के सतही चट्टानों पर उकेरी गयीं कुल 17 आकृतियां हैं जिसमे 12 के करीब शिवलिंग , कई पदचिन्ह, कुछ मूर्तियां एवं आसनरत योगी आदि उत्कीर्ण किये गए हैं। यहां बहुतेरों पद चिन्ह उकेरे गए हैं जिसको देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि ये किसी विशेष प्रकार की धार्मिक क्रिया की अभिव्यक्ति हैं। इसके अतिरिक्त चेचकधाम मंदिर परिसर से लगे एक पहाड़ी जलस्रोत जो आगे चलकर दामोदर नदी में समाहित हो जाता है के बाएं किनारे पर कुल छह योनिपीठ जिनमे से कुछ में शिवलिंग भी हैं का अंकन किया गया है। यहां एक संस्कृत भाषा एवं नागरी लिपि का दो पंक्तियों का अभिलेख भी है जो लिपिगत दृष्टि से नवीं शताब्दी ईस्वी का प्रतीत होता है। इस प्रकार यह स्थल उपरोक्त स्थलों की तुलना में ज्यादा प्राचीन दिखता है। वस्तुतः नदियों के किनारे, नदी के मध्य स्थित प्राकृतिक शिलाओं अथवा नदी तल के बड़े पत्थरों पर शिवलिंग स्थापित करने की परंपरा भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास की अत्यंत प्राचीन परंपरा है। इसका संबंध केवल धार्मिक आस्था से नहीं, बल्कि भूगोल, जल-संस्कृति, व्यापारिक मार्गों, तीर्थ-परंपरा और स्थानीय समाज के विकास से भी है।
शैव-शाक्त तथा तांत्रिक साधना
इस प्रकार प्रकार के साक्ष्य विशेषकर दक्षिण भारत , पूर्वी भारत—विशेषकर झारखंड, ओडिशा, बंगाल और छत्तीसगढ़—में नदी तटों अथवा अन्य जलस्रोतों में स्थित शिवलिंगों का संबंध शैव-शाक्त तथा तांत्रिक साधना से भी रहा है। नदी तट साधकों के लिए उपयुक्त माने जाते थे। इसलिए अनेक शिवलिंग ऐसे स्थानों पर स्थापित किए गए जहाँ बाद में कोई बड़ा मंदिर नहीं बना। ऐतिहासिक रूप से कई राजाओं (जैसे कर्नाटक के शासक) ने संतान प्राप्ति या राज्य की समृद्धि के लिए भगवान शिव को प्रसन्न करने हेतु नदियों के पत्थरों पर हजारों शिवलिंगों को उकेरने का संकल्प लिया था। नदी के भीतर स्थित पत्थरों पर शिवलिंग स्थापित करने की परंपरा केवल धार्मिक आस्था का परिणाम नहीं थी। यदपि यह प्रकृति-पूजा, जल-संस्कृति, तीर्थ-परंपरा, व्यापारिक मार्गों, स्थानीय भूगोल और शैव धर्म के प्रसार का संयुक्त प्रतीक है। विशेषकर पूर्वी भारत और झारखंड में ऐसे शिवलिंग इस बात के महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक साक्ष्य हैं कि प्राचीन समाज ने नदियों को केवल जलस्रोत नहीं, बल्कि पवित्र सांस्कृतिक परिदृश्य (Sacred Cultural Landscape) के रूप में देखा। इसलिए ऐसे स्थलों का अध्ययन क्षेत्रीय इतिहास, पुरातत्त्व और धार्मिक भूगोल—तीनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
वैदिक एवं उत्तरवैदिक साहित्य में जल को सृष्टि का मूल तत्व माना गया है। शिव को भी जल से अत्यंत प्रिय देवता माना जाता है। शिवलिंग पर निरंतर जलाभिषेक की परंपरा इसी विचार से जुड़ी है। इसलिए प्राकृतिक रूप से बहते जल के समीप शिवलिंग की स्थापना को विशेष पुण्यकारी माना गया। नदी के भीतर स्थापित शिवलिंग पर वर्षभर प्राकृतिक जलाभिषेक होता रहता है, जो मानव द्वारा किए जाने वाले अभिषेक का प्राकृतिक रूप माना जाता था। प्राचीन भारत में अनेक स्थानों पर किसी प्राकृतिक चट्टान, गोलाकार पत्थर अथवा नदी के बीच स्थित विशाल शिला को ही दिव्य मान लिया जाता था। बाद में उन्हीं शिलाओं पर—शिवलिंग उकेरे गए, योनिपट्ट निर्मित किए गए, अथवा सीधे प्राकृतिक शिला को स्वयंभू शिवलिंग मान लिया गया। यद्पि झारखंड सहित पूर्वी भारत के कई जलस्रोतों में स्थापित शिवलिंग अथवा बड़े शिलाखंड को जलेसर महादेव के रूप में भी पूजा जाता है। एक अन्य विचार यह है की झारखंड में स्थित नदियों के किनारे जहां शिवलिंग उकेरे गएं हैं, के समीप महाश्मशान भी स्थित हैं चुकी शिव को महाश्मशानवासिन, शमशानअधिपति भी कहा गया है, संभव हो की ये स्थल महाश्मशान के रूप में भी प्राचीन समय से ही प्रयुक्त हों।
सहायक अधीक्षण पुरातत्त्वविद भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण रांची मंडल, रां

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