श्री वेंकट लाल ओझा
बंगला के महान उपन्यासकार बाबू बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रथम दो स्नातकों में से थे। वह डिप्टी कलक्टर जैसे बड़े पद पर पहुँच कर भी देशभक्ति से परिपूर्ण थे। उनका जन्म 1838 में हुआ और निघन 1864 में। उनके उपन्यास राजनैतिक दासता का विरोध तथा राष्ट्रीय गौरव व वीरता से परिपूर्ण थे। देश-गौरव की ललक उत्पन्न करने वाले थे। उनके पात्र चरित्र, साहस, शूरवीरता और त्याग की ज्योति के पूँज थे। वे पथ प्रदर्शक और पथ के शोधक थे। उनका पहला उपन्यास 'दुर्गेश नन्दिनी' ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि पर रचित था और 1894 में प्रकाशित हुआ । 1872 में उन्होंने लोगों को आंग्ल प्रभाव से मुक्त करने तथा जनता से उस भाषा में बातचीत करना जिसे वे समझते हैं, कि पवित्र व पावन उद्देश्य से 'बंगदर्शन' पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ किया। अगस्त 1875 में उन्होंने बन्दे मातरम् गीत लिखा और बाद में 1882 में उनके आनन्दमठ नामक उपन्यास में यह छपा ।
छपते ही यह लोकमानस पर छा गया। विप्लवियों ने इसे अपना मूलमन्त्र बना लिया जिससे यह देशदेशान्तर में देशभक्तों के हृदय का हार बन गया। अंग्रेज सरकार बन्देमातरम् के जय घोष से उतनी डरती थी जितनी की साँढ़ लाल रङ्ग से । क्रान्ति के अग्रदूत वासुदेव बलवन्त फडके ने 17 जनवरी 1883 में अंडमान जेल की कालकोठरी में प्राण छोड़ते हुए वन्दे मातरम् का ही जयघोष किया था। चाफेकर बन्धुओं ने भी इसका अनुसरण किया। इस तरह क्रान्तिकारियों के कारण यह देश भक्तों का मन्त्र बन गया।
मदन लाल धींगरा को 17 अगस्त 1909 में फाँसी दी गयी तो उसके विरोध में वीर सावरकर ने 'वन्दे मातरम्' नामक एक पत्रक प्रकाशित कर उसे श्रद्धांजलि अर्पण करते हुए उसके कार्य का समर्थन किया। बंगभंग के आन्दोलन के समय तो इसके कारण लार्ड कर्जन के नाकों दम था। चाहे क्रान्तिकारियों का आन्दोलन हो या महात्मा गांधी का असहयोग आन्दोलन हो, वन्दे मातरम् बराबर गूंजता रहा। इतना ही नही, 1899 की कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में (जो श्री मुहम्मद रहीमतुल्ला के सभापतित्व में हुआ था) में भी इसे एक प्रस्ताव द्वारा इस गीत को राष्ट्रीय गान के रूप में मान्य किया गया। तब से कांग्रेस के प्रत्येक अधिवेशन और समारोहों का श्री गणेश इसके गान से ही होने लगा ।
सारांश यह है कि महात्माजी के 1920 के सत्याग्रह, 1930 के नमक सत्याग्रह, विदेशी वस्त्रों की होली 1932 का सत्याग्रह और अन्त में 1952 के भारत छोड़ो आन्दोलन, वम्बई नौ सेना के विद्रोह में मी बन्दे मातरम् की उल्लेखनीय भूमिका रही ।
विदेशों में भी चाहे अमेरिका की गदर पार्टी हो या लन्दन की अभिनव भारत समिति, सभी ने वन्दे मातरम् से प्रभावित होकर अपने कर्तव्य के प्रति सजग हुए हैं। विश्व यात्री श्री रामनाथ विश्वास के कथनानुसार विदेशों बसे देशभक्तों को जब भारत आने की भावना तीव्र हो जाती तो वे बन्दे मातरम् का बोल कर ही अपने आवेग को शान्त करते थे । तेहरान, बगदाद आदि नगरों में उन्हें ऐसा ही अनुभव हुआ। 1937 में तुर्की के अदान नामक नगर में भारतीय मस्जिद के बाहर तुर्की लिपि में वन्दे मातरम् लिखा हुआ था। जिसे छोटे-छोटे तुर्की बालक वन्दे मातरम् जोर जोर से पढ़कर चिल्लाते थे। मस्जिद की चोटी पर भारत की राष्ट्रीय पताका फहराती है और हर शुक्रवार को सुबह उस पताका की सफाई की जाती और जुम्मे की नमाज के समय वन्दे मातरम् के साथ फहाई जाती है, तब कही नमाज पढ़ते है। अन्त में वे लिखते हैं 'भारतीय सीमा लांघते ही प्रत्येक के मन में कुछ राष्ट्रीयता के भाव आप से आप जगने लगता है। उस वक्त केबल तब वन्दे मातरम् की आवश्यकता अनुभव होने लगती है।' जो यह सिद्ध करती है कि वन्दे मातरम् का प्रभाव देश से बढ़ कर विदेशों में भारतीय अधिक अनुभव करते हैं। उस समय उनका यह संबल बन सकता है।
जब 1937 में कांग्रेस ने प्रान्तीय सत्ता ग्रहण की तब शपथविधि वन्दे मातरम् के बाद ही हुई। विधानसमाओं में भी कांग्रेसी सदस्यों ने वन्दे मातरम् ही सामूहिक रूप से गाया था। मद्रास विधानसभा के अध्यक्ष श्री साम्बूतिने तो नित्य ही वन्दे मातरम् गान के बाद ही विधानसभा की कार्यवाही आरंभ करने निर्णय दिया। तब इसका विरोध अंग्रेज समर्थक कुछ विधायकों ने किया था। फिर भी यह काफी समय तक चालू रहा ।
निजाम राज्य में उस्मानिया विश्वविद्यालय के छात्रों ने प्रातः वन्देमातरम् को अपनी प्रार्थना में सम्मिलित किया तो उन पर बडा अत्याचार किया गया। आन्दोलन ने इतना उग्ररूप धारण किया कि अन्त में उन छात्रों को विश्वविद्यालय से ही निकाल दिया गया। तब वे नागपुर विश्वविद्यालय में अपनी शिक्षा को आगे चालू रखने के लिये गये। वहां भी उनका पीछा निजाम के विशेष दूतों के रूप में श्री फरनाडिस ने किया और तत्कालीन कुलपति श्री केदार को इन विद्रोही छात्रों को प्रवेश न देने के लिए समझाने का प्रयत्न किया। इस आन्दोलन का नेता नेतृत्व करने वाले श्री रामचन्द्रराय का नाम ही श्री वन्दे मातरम् रामचन्द्रराव पड़ गया ।
उन दिनों लोग अपनी चिट्ठी-पत्री में जय गोपाल, जय श्री कृष्णा आदि के स्थान पर वन्दे मातरम् लिखते थे। चाहे पत्र किसी भी भाषा में किसी को क्यों न लिखा जाय। यहां तक कि सरकार से पत्र लिखते समय भी इसका प्रयोग होता था। वाइसराय को भी पत्र मे वन्देमातरम् लिखा जाता था। इस तरह वन्दे मातरम् हमारी राष्ट्रीय एकता का प्रतीक था। देश देशान्तर में इसको महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था ।
इस तरह सतत् 72 वर्ष तक वन्दे मातरम् हमारी राष्ट्रीयताका प्रतीक रहा। इसी का जय घोष करते हुए असंख्य क्रान्तिकारियों ने फांसी का आलिंगन किया। लाखों ने लाठियां खायी। असंख्य नर-नारी अंग्रेजों की गोलियों को अपने सीने पर भेल कर देश पर बलि हुए। कड्यो पर इसी नारे के कारण मुकदमे चले और उन्हे लंबी-लम्बी सजाएं हुई। अंडमान की जेल में लोग गये। यातनाएं सही। क्षमा तो क्या खेद प्रकाश भी नहीं किया। इतना प्यारा और ओजस्वी मंत्र है वन्दे मातरम् ।
15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र होने के बाद विश्वकवि रविन्द्रनाथ ठाकुर के जनगण मन को प्रथम राष्ट्रीय गीत का स्थान मिला और वन्दे मातरम् को दूसरा। पहले सभी समारोहों में जनगण मन आरम्भ में और वन्दे मातरम् अन्त में गाया जाता था, पर धीरे-धीरे अब इसको गाने की प्रथा कम होती जा रही है। कुछ काल के बाद भावी पीढ़ी इसे भूल जाय । क्योंकि स्वतंत्रता के बाद भारतीय स्वतंता संग्राम के कई इतिहास मूर्धन्य इतिहास वेताओं की पुस्तकें छपी हैं, उनमें वन्दे मातरम् का उल्लेख तक नहीं है। जबकि यह राष्ट्रीय एकता का, हमारी देश भक्ति का यह ज्वलंत प्रतीक रहा है।

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