डा. नीरज कुमार मिश्र
सहायक अधीक्षण पुरात्तत्वविद भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण रांची मंडल, रांची
झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्र में प्राचीन काल से ही अन्य धार्मिक परंपराओं की तरह ही वैष्णव परंपरा का भी विकास हुआ, जिसके ऐतिहासिक पुरातात्त्विक साक्ष्य हमें विभिन्न जगहों से प्राप्त होते हैं। झारखंड के चतरा जिले के इटखोरी, हजारीबाग के चौपारण स्थित दैहर, चैथी, कोडरमा के घोरसिमर धाम, गुमला के टांगीनाथ एवं देवगांव, सिमडेगा के कुड़रूम, पश्चिमी सिंहभूम के बेनीसागर सहित पलामू के कई क्षेत्रों जैसे देवगन में कई प्रस्तर विष्णु प्रतिमाएं प्राप्त होती हैं। इन विष्णु प्रतिमाओं को इस क्षेत्र में पंचोपासना के धार्मिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। क्योंकि पंचदेवता ( सूर्य, गणेश, शक्ति, शिव एवं विष्णु) की प्रतिमाएं इन पुरास्थलों से सामान्य रूप से प्रतिवेदित हैं। यह धार्मिक सांस्कृतिक स्वरूप हमें झारखंड के विभिन्न क्षेत्रों में आठवीं शताब्दी ईस्वी से लेकर सत्रहवीं अठरहवीं शताब्दी ईस्वी तक निरंतरता में प्राप्त होती है। विशेषकर पंद्रहवीं सोलहवीं शताब्दी ईस्वी में इस क्षेत्र में वैष्णव परंपरा अंतर्गत बहुसंख्यक जगन्नाथ, राधागोविन्द, राधावल्लभ एवं कृष्ण के विविध स्वरूपों की पूजा एवं मंदिर एवं मूर्ति निर्माण परम्पराओं में विकास देखा जा सकता है। दुमका के मलूटी, रामगढ़ के कई क्षेत्रों में, गुमला के नवरतनगढ़ में टेराकोटा (मृण्मय) मंदिरों की एक परंपरा के प्रमाण हमें प्राप्त होते हैं।
नागवंशी राजाओं के दौर में वैष्णव परंपरा का विस्तार
छोटानागपुर में बंगाल के सेनवंश के राजाओं के समकालीन दो प्रमुख नागवंशी राजा हुए जस कर्ण (1132-1180 ईस्वी ) एवं जल कर्ण (1180-1218 ईस्वी ) इस वंश के प्रतापी राजा थे इसी समय कोराम्बे में वासुदेव राय की मूर्ति का पुनः स्थापन किया गया। सेन कट्टर वैष्णव थे, उनका धार्मिक सांस्कृतिक प्रभाव छोटानागपुर के क्षेत्र पर विशेष रूप से प्रकट होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। छोटानागपुर के नागवंशी राजाओं द्वारा विष्णु की मूर्ति स्थापित, जगन्नाथ मंदिरों का निर्माण करने एवं कुछ महत्वपूर्ण कृष्ण मंदिरों की स्थापना करने के प्रमाण मौजूद हैं। नागवंश के राजा शिवदास कर्ण द्वारा संवत 1458 में (1401 ईस्वी) घाघरा के हापामुनी में विष्णु की प्रतिमा स्थापित कराए जाने का उल्लेख मिलता है। स्थापना करने वाले तत्कालीन राजगुरु मरहठ द्विज सियनाथ देव थे, यह घटना सांस्कृतिक रूप से अति महत्वपूर्ण संकेतक हैं। डा विशेश्वर प्रसाद केसरी ने अपनी पुस्तक (छोटानागपुर का इतिहास :कुछ सूत्र कुछ सन्दर्भ पृष्ठ 31) में जिक्र करते हैं की दृगपाल राम देवघरिया कृत कोराम्बे आख्यान नामक नागपुरी गीतों से यह ज्ञात होता है कि कोराम्बे, घाघरा, रांची में वासुदेव राय-विष्णु की मूर्ति का उद्धार एवं स्थापन 1530 संवत अर्थात 1473 ईस्वी में हुआ था। यह काल नागवंशी शासक चत्ता कर्ण के राज्य का है। संभवतः इन्हीं मूर्तियों के दर्शन का आकर्षण था, जिसके कारण महाप्रभु चैतन्य झारखंड के मार्ग से जग्गनाथपुर -वृन्दावन-जगन्नाथपुर की यात्रा में निकले थे। चैतन्य चरितामृत के अनुसार इस यात्रा का समय 1458 ईस्वी निश्चित होता है। इस दृष्टि से छोटानागपुर में महाप्रभु चैतन्य का धर्म प्रचार नागवंशी शासक चत्ता कर्ण के राज्यकाल में हुआ था।
झारखंड के प्रमुख वैष्णव मंदिर
नागवंशी राजा रघुनाथ शाह ने मराठा गुरु हरिनाथ के विचारो से प्रभावित थे। उन्होंने इस सगुन भक्ति शाखा के संत की प्रेरणा से रांची के चुटिया में राधावल्लभ मंदिर की स्थापना सम्वत 1742 (1685 ईस्वी) में कराया, जो इस मंदिर में कैथी लिपि में उत्कीर्ण अभिलेखों से यह स्पष्ट होता है। यह प्रस्तर निर्मित मंदिर सह मठ अत्यंत ही सुन्दर है इसमें एक बावली का भी निर्माण किया गया है, अब यह चुटिया का राम मंदिर के नाम से जाना जाता है। नागवंशी राजाओं ने विशेषकर रघुनाथ शाह (1645 -1705 ईस्वी ) ने राजधानी नवरतनगढ़ में (सिसई, गुमला) प्रस्तर निर्मित जगन्नाथ मंदिरों का निर्माण कराया एवं थोड़ी दूर पर मौसीबाड़ी भी निर्मित कराया। 1691 ईस्वी में नागवंशी महाराजा के एक खेरचोमदार ठाकुर एनी शाह ने रांची के धुर्वा में जगन्नाथ मंदिर का निर्माण कराया। इस क्रम में यह उल्लेखनीय है कि ओडिशा की जगन्नाथ स्वामी की ख्यातिलब्ध धार्मिक परंपरा का झारखंड के क्षेत्रों में प्रचार प्रसार हुआ। झारखंड के कृष्ण मंदिर : नागवंशी शासक रघुनाथ शाह द्वारा ही रांची के बोड़ेया में प्रस्तर निर्मित मदनमोहन मंदिर का निर्माण (1665 ईस्वी में) पंडित लक्ष्मी नारायण तिवारी के सहयोग से कराया गया एवं इसमें अष्टधातु निर्मित कृष्ण के मदन मोहन स्वरुप की मूर्ति की स्थापना की गई थी। इस मंदिर में सुरक्षित ताम्रपत्र एवं अभिलेखों के अध्ययन से कई महत्वपूर्ण सूचना प्राप्त होती है।
नगरउंटारी का प्रसिद्ध श्री बंशीधर मंदिर
झारखंड के नगरउंटारी में एक प्रसिद्ध कृष्ण मंदिर है, इसमें अष्टधातु निर्मित कृष्ण के श्री बंशीधर स्वरूप की मूर्ति स्थापित है, यह मूर्ति कलात्मकता एवं अपने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के कारण अत्यन्य ही महत्वपूर्ण है। यह मंदिर नगरउंटारी के स्थानीय राज परिवार की रानी शिवमनी कुवंर द्वारा 1828 ईस्वी में निर्मित है, जैसा कि मंदिर प्रांगण स्थित एक शिलापट्ट पर अंकित अभिलेख से विदित होता है। परंतु इसी बंशीधर की मूर्ति के कमलासन पर उत्कीर्ण अभिलेख से इसकी ऐतिहासिकता की ध्वनि मिलती है। उल्लेखनीय है कि मंदिर की स्थापना के समय से ही इस मूर्ति के साथ स्थानीय किंवदंतियां जुड़ी हुई हैं, लेकिन मूर्ति की ऐतिहासिकता इस पर कैथी लिपि में अंकित अभिलेख से ज्ञात होती है, जिसमें संवत 1763 (1706 ई.) में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष के तेरहवें दिन भगवान 'श्री बंशी' की प्रतिमा भेंट किए जाने का उल्लेख है। कमलासन के मुख्य भाग पर कैथी लिपि में अंकित अभिलेख से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि मूर्ति का संबंध छोटानागपुर के नागवंशी राजवंश से है, क्योंकि इस पर हरिनाथ गुरु और राजा रघुनाथ शाह के व्यक्तिगत नाम अंकित हैं। अभिलेख में गुरु हरिनाथ, श्री रघुनाथ (नागवंशी शासक श्री रघुनाथ शाह इसके शासन वर्ष में कुछ मतभेद हैं कुछ विद्वान 1663-1690 ई.जबकि कुछ 1645-1705 ई. मानते हैं,) रामविलास प्रकाश एवं श्री सुरभि श्रीनाथ कुल चार लोगों द्वारा उक्त तिथि को भगवान श्री बंशी (बंशीधर) के मूर्ति दान (भेंट) की चर्चा की गई है। कमलासन पर एक अन्य अभिलेख (बाएं पैर के दाहिनी ओर), जिस पर उड़िया लिपि में एक व्यक्ति का नाम अंकित है: 'श्रीकांत उस्ताद', संभवतया यह वैयक्तिक नाम मूर्तिकार का है, जिसने इस अलौकिक मूर्ति का निर्माण किया। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि नागवंशी राजवंश के राजाओं ने छोटानागपुर क्षेत्र (झारखंड) में भगवान जगन्नाथ, भगवान विष्णु और कृष्ण के कई वैष्णव मंदिर स्थापित किए थे।
टेराकोटा मंदिरों में दिखती कृष्णलीला
झारखंड के कुछ विशेष टेराकोटा (मृण्मय ) मंदिरों पर अंकित कृष्णलीला के अंकन: झारखंड के समीपवर्ती राज्य बंगाल के धार्मिक सांस्कृतिक प्रभाव से झारखंड के क्षेत्र में भी मृण्मय मंदिरों/ पकी ईंट निर्मित मंदिरों की स्थापना के ऐतिहासिक प्रमाण हमें विभिन्न क्षेत्रों में देखने को मिलते हैं। ये मंदिरों का संदर्भ विशेषकर वैष्णव सम्प्रदाय की भक्ति शाखा से घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई है। दुमका के मलूटी के इन मंदिरों का एक समूह हमें प्राप्त होता है। झारखंड के रामगढ़ के गोला के पास बक्शीटोली में इसी प्रकार का मंदिर है जिसके मुख्य सामने वाले भाग के मृण्मय पट्टिकाओं पर कृष्णलीला का सुन्दर चित्र उकेरा गया है, जिसमें कृष्ण गोपियों के साथ लीलारत हैं इसके अतिरिक्त बंशी बजाते राधाकृष्ण का अंकन एवं कंस वध का अंकन किया गया है। इसी प्रकार नवरतनगढ़ गुमला के धोबी मठ जो की एक मृण्मय मदिर है, पर भी दशावतार साहिर रामलीला एवं कृष्ण के जीवन से सम्बंधित पक्षों का अंकन किया गया है। सोलहवीं शताब्दी के बने इन मंदिरों का सम्बन्ध वैष्णव परपरा से है जिसके कारण इन्हें राधागोविन्द मंदिर भी कहा जाता है।
झारखंड की धरती पर चैतन्य महाप्रभु की यात्रा
चैतन्य महाप्रभु की यात्रा जगन्नाथपुरी से वृन्दावन प्राचीन ‘झाडीखंड’ (झारखंड) के रास्ते हुई थी तथा वापसी के क्रम में भी झारखंड के रास्ते का प्रयोग किया। निश्चित रूप से चैतन्य महाप्रभु की झारखंड यात्रा के बाद वहां के कई आदिवासी समुदायों ने वैष्णव धर्म को अपनाया था। 16वीं शताब्दी (लगभग 1515 ईस्वी) में अपनी पुरी (ओडिशा) से वृंदावन की यात्रा के दौरान चैतन्य महाप्रभु झारखंड के घने जंगलों और आदिवासी क्षेत्रों से गुजरे थे। चैतन्य चरितामृत में इस क्षेत्र को उस समय 'झारीखंड' कहा गया है। वैष्णव धर्म के प्रसार और आदिवासियों पर उनके प्रभाव की मुख्य बातें विशेषकर प्रेम और भक्ति का संदेश महाप्रभु ने जात-पात और ऊंच-नीच के बिना सभी को गले लगाया। उन्होंने आदिवासियों को कृष्ण भक्ति और 'हरे कृष्ण' महामंत्र की दीक्षा दी।उनके सरल और प्रेमपूर्ण व्यवहार से प्रभावित होकर कई जनजातियां वैष्णव बन गईं। 'झारखंडी वैष्णव' संप्रदाय चैतन्य महाप्रभु के प्रभाव से झारखंड में एक नए सांस्कृतिक युग की शुरुआत हुई। उनके अनुयायियों को क्षेत्र में 'झारखंडी वैष्णव' कहा जाने लगा।आज भी झारखंड के पंचपरगना क्षेत्र (बुंडू, तमाड़, सिल्ली आदि) में वैष्णव संस्कृति का गहरा असर देखा जा सकता है। इस क्षेत्र में आयोजित हरिनाम संकीर्तन का गायन चैतन्य महाप्रभु की शैली दृश्टिगोचर होती हैं। सांस्कृतिक परिवर्तन वैष्णव धर्म अपनाने के बाद कई आदिवासी समूहों ने शाकाहार को अपनाया। मांस और मदिरा (हड़िया) का त्याग कर वे सात्विक जीवन जीने लगे। उनके पारंपरिक गीतों और नृत्यों (जैसे झूमर) में राधा-कृष्ण की लीलाओं और कीर्तन का समावेश हो गया। ऐतिहासिक ग्रंथ में उल्लेख चैतन्य महाप्रभु की इस झारखंड यात्रा और आदिवासियों पर उनके प्रभाव का विस्तृत वर्णन प्रसिद्ध ग्रंथ 'चैतन्य चरितामृत' (कृष्णदास कविराज द्वारा रचित) में मिलता है। इस ग्रंथ में रूपक के तौर पर यह भी लिखा गया है कि महाप्रभु के कीर्तन और प्रेम से प्रभावित होकर झारखंड के जंगलों के हिंसक पशु (बाघ, हाथी) भी आपस में बैर भूलकर नाचने लगे थे, जो वास्तव में वहां के सीधे-सरल और भोले आदिवासियों के हृदय परिवर्तन को दर्शाता है। 'चैतन्य चरितामृत' में दर्ज इस यात्रा के अन्य प्रसंगों के बारे में भी अन्य जानकारियां लिपिबद्ध हैं जो विशेषरूप से झारखंड प्रदेश में वैष्णव परम्पराओं की कृष्ण भक्ति के पक्ष को दर्शाती हैं।
आदिवासी समाज में वैष्णव भक्ति का प्रभाव
उरांव जनजाति के भीतर बड़े समूहों ने वैष्णव धर्म के सिद्धांतों को अपनाया और भगत (भक्त का अपभ्रंश ) के रूप में जाने जाने लगे। सिंहभूम में सुवर्णरेखा नदी के किनारे लगभग 700 वर्ष पूर्व विकसित नाचनी नृत्य की अवधारणा वैष्णव धर्मगुरुओं द्वारा विकसित की गई थी। स्थानीय महिलाओं को राधा-कृष्ण लीला की कथाओं को दर्शाने वाले अर्ध-शास्त्रीय नृत्य करने का प्रशिक्षण दिया जाता था, जिससे आध्यात्मिक दर्शन को सीधे ग्रामीण जनसमूह तक पहुंचाया जा सके।

Comments (0)
Write first comment
Please Login to write comment