(डॉ राही मासूम रज़ा की कल जयंती है। 1 सितंबर 1927 को गाजीपुर के गंगौली में उनका जन्म हुआ था। 15 मार्च 1992 को निधन। उनका जन्म शताब्दी वर्ष भी शुरू हो रहा है। पढ़िए उनका एक महत्वपूर्ण लेेेख लगता है बेकार गए हम से लिया गया है। Vani Prakashan से यह पुस्तक 1999 में आई थी।)
◆◆◆◆◆◆
कल मैं हिंदुस्तान का नक्शा देख रहा था और तब मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ जब घंटों दीदे फोड़ने के बाद भी हिंदुस्तान के नक्शे में मुझे हिंदुस्तान नहीं दिखाई दिया, और तब मैंने सोचना शुरू किया कि वास्तव में हिंदुस्तान नाम का कोई देश है, या कभी था?
याद आया कि 1947 तक तो हिंदुस्तान नाम का एक देश हुआ करता था। चंद्रशेखर, भगत सिंह, बिस्मिल, अशफ़ाकुल्ला वगैरा ने भी मुझसे यही कहा। जलियाँवाला बाग की दीवारें भी कसम खाने लगीं। पूरा स्वतंत्रता संघर्ष आस्तीन चढ़ाकर खड़ा हो गया कि भारत नाम का एक देश है। मैंने नक्शा खोलकर सामने रख दिया और कहा-है तो दिखाओ ! और सारे स्वतंत्रता सेनानी और पूरा स्वतंत्रता-संघर्ष सर झुका के चुप क्योंकि नक्शे में तो हिंदुस्तान कहीं नहीं था। पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा, द्राविड़, उत्कल, वंग नक्शे पर सभी मौजूद थे, नहीं था तो सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्तां हमारा।
यदि मैं कोई जासूसी उपन्यासकार होता तो 'केस ऑफ़ ए मिसिंग कंट्री' नाम का एक उपन्यास अवश्य लिखता ।
मैंने सोचा पुलिस में रपट लिखवाऊँ कि तिरंगी शर्ट पहने हुए एक देश गायब हो गया है जो अपना नाम भारत दैट इज़ इंडिया बताता है। फिर यह सोचकर रुक गया कि हवलदार 20/-रपट लिखाई माँगेगा और देश इतना महत्त्वपूर्ण भी नहीं होता कि उस पर गाढ़ी या पतली कमाई के 20/- उड़ा दिए जाएँ।
परंतु यह समस्या तो फिर भी खड़ी है कि वह सारे जहां से अच्छा हिंदोस्ता हमारा गया कहाँ ? कन्याकुमारी से हिमालय तक फैला हुआ वह देश कहाँ है। नक्शे पर कन्याकुमारी भी है और हिमालय भी; पर बीच में सन्नाटा है। चंडीगढ़ पंजाब में है। आमची बंबई महाराष्ट्र में। वेलगाँव कर्नाटक में है (या शायद महाराष्ट्र में ! भाषाएँ इस देश के बदन से यूँ गुजर रही हैं जैसे साबुन से तार गुज़रे ये भाषाएँ हैं या चौदह जवानों वाला एक साँप है जो मेरे देश को निगल गया...
यदि आज भूगोल के किसी पर्चे में यह सवाल आए कि चंडीगढ़, श्रीनगर, बंबई बंगलूर, मद्रास, हैदराबाद, लखनऊ वगैरा कहाँ है तो कोई विद्यार्थी यह जवाब नहीं देगा कि ये शहर हिंदुस्तान में हैं। जवाब यह मिलेगा कि चंडीगढ़ पजाब में है, श्रीनगर कश्मीर में, बंबई महाराष्ट्र में है और बंगलूर कर्नाटक में।
तो फिर हमारी पहचान क्या है ?
हम हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई हैं। हम ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र है। हम पंजाबी, मराठी, उत्तर प्रदेशी, तेलगूदेशी भी हैं। पर नहीं हैं तो हिंदुस्तानी।
इसीलिए मैं आज आपको अपने एक डर में शरीक करना चाहता हूँ। हिंदुस्तान में हिंदुस्तानी लगभग खत्म हो चुके हैं और जो थोड़े बहुत रह गए हैं वे भी धीरे-धीरे खत्म हो जाएँगे। इसीलिए आवश्यक है कि उन्हें किसी रिजर्व जंगल में छोड़ दिया जाय और उनके शिकार पर कड़ी पाबंदी लगा दी जाय या फिर हिंदुस्तानियों का एक-एक जोड़ा दुनियाभर के चिड़ियाघरों को भेज दिया जाय ताकि दुनिया यह तो न भूले कि हिंदुस्तानी होते कैसे हैं।
हिंदुस्तानी बड़े सख़्त जान होते हैं। परंतु अकेली सख्त जानी कोई अच्छी बात नहीं है। हमारे भक्तिवाद और सूफीवाद ने हमारी खाल मोटी कर दी है और नतीजे में हम सख़्त जान हो गए हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि हम यह पुरानी खाल खुरच-खुरच के साफ करें और एक नयी खाल उगाएँ- नर्म, पतली और जीवित खाल और कोई ऐसा सावुन ईजाद करें जो धर्मवाद, जातिवाद और क्षेत्रवाद के कीटाणुओं को मार सके। क्योंकि मुझे लगता है कि राष्ट्रीय और एकता का 'प्रासेस' रुक गया है।
पहले हमें बुनियादी सवालों को उठाकर देखना चाहिए :
1. रोटी-रोजी का सवाल ज्यादा महत्त्व नहीं रखता क्योंकि इस समस्या को लेकर दंगे नहीं होते ।
2. यह देश अंदर से टूट चुका है। इसे क्षेत्रों के आधार ने तोड़ा है। फिर जन-हरिजन ने तोड़ा है, फिर धर्म-निरपेक्ष भारत को धर्मों ने तोड़ा है, इसलिए अल्पसंख्यक संप्रदाय और बहुसंख्यक संप्रदाय के भूत हमारे दिलों में नंगे नाच रहे हैं। पर अल्पसंख्यक संप्रदाय है कौन मुसलमान यह कश्मीर में बहुसंख्यक संप्रदाय है। सिख वह पंजाब में बहुसंख्यक संप्रदाय है। हिंदू ? वह पंजाब और कश्मीर में अल्पसंख्यक हैं। सच पूछिए तो हिंदुस्तान में अल्पसंख्यक संप्रदाय केवल एक है-हिंदुस्तानी।
इसलिए मैं प्रस्ताव करता हूँ कि हिंदुस्तान के इकलौते या सबसे छोटे अल्पसंख्यक संप्रदाय यानी हिंदुस्तानियों को संगठित करने की कोशिश की जाय। क्यों न हम एक पार्टी बनाकर हिंदुस्तान की सबसे छोटी अक़लीयत-हिंदुस्तानी-टिकट पर चुनाव लड़ें। हद-से-हद जमानत ही तो ज़ब्त हो जाएगी।

Comments (0)
Write first comment
Please Login to write comment