डॉ ब्रजेश वर्मा
झारखंड का पूर्वी इलाका, जहाँ गंगा नदी बहती है, वह जोरासिक काल की एक पहाड़ी श्रृंखला से घिरा है, जिसे हम राजमहल की पाहडी के नाम से जानते हैं। उस पहाड़ी के ऊपर काले पत्थरों से बना एक जर्जर किला सदियों से खड़ा है, जिसके निर्माण के विषय में यह कोई नहीं जानता कि इस किले को दरअसल बनबाया किसने था? इतिहास में इसे तेलियागढ़ी किले के नाम से जाना जाता है।
मध्यकाल में राजमहल बंगाल की राजधानी हुआ करता था, जिसकी पकड़ बंगाल के अलावा बिहार, उड़ीसा और आजके सम्पूर्ण बांग्लादेश पर थी। झारखण्ड में यह एकमात्र इलाका है जहाँ गंगा नदी बहती है। इस स्थान को तेलियागढ़ी का किला और भी रहस्यमय बनाता है।
प्राचीन समय में भारत आए चीनी यात्री व्हेनसांग, जिसने तेलियागढ़ी को अपनी आँखों से देखा था, उसे “बुलंद मीनार” कहा। दरअसल तेलियागढ़ी किला आज भी झारखण्ड का एक “बुलंद मीनार” है।
काले पत्थरों से निर्मित इस किले के वास्तविक उम्र की कोई सटीक जानकारी नहीं मिलती। जैसे-जैसे हम इस किले के इतिहास के पीछे जाते हैं, यहाँ पर युद्धों की कहानियां और भी प्राचीन होते चली जाती है। इस किले को किसने बनाया? संथाल परगना गजेटियर से यह बात सामने आती है कि 18वीं सदी में इस किले का निर्माण किसी स्थानीय तेली जमींदार द्वारा करवाया था; किन्तु यह गलत है, क्योंकि इस किले को जीतने के लिए तो 16वीं सदी के मध्य में हुमायूं और शेरशाह के बीच यहाँ पर जंग हुई थी, जिसका जिक्र बाबर की बेटी बेगम गुलबदन की पुस्तक ‘हुमायूँनामा’ में भी मिलता है।

फिर उसके पूर्व सल्तनत काल के युग में भी इस किले की पहचान की गयी है। यहाँ पर इतिहास को और भी पीछे ले जाया जाए तो इसका जिक्र व्हेनसांग की यात्रा वृतांत में भी है, जिसके आधार पर इसे प्राचीन बौद्धों का मठ भी बताया गया है। किन्तु लोग धोखा इस बात को लेकर खा जाते है कि राजमहल की पहाड़ी पर बने इस किले के सामने की जो थोड़ी सी बची हुई दीवार है, उसमें इस्तेमाल की गयीं काली ईंटें उतनी प्राचीन नहीं लगती, जितनी कि ग्रंथों में बताई गयी हैं।
इतिहासकारों द्वारा तेलियागढ़ी के किले को “बंगाल का प्रवेश द्वार” कहकर संबोधित किया गया है। आज के समय में ठीक इस किले के नीचे से रेलवे लाइन गुजरती है। यह किला वर्तमान साहेबगंज और करामटोला रेलवे स्टेशन के बीच है।
किन्तु 18वीं सदी के अंत तक, आज जहाँ से रेलवे लाइन गुजरती है, वहां गंगा नदी की विशाल धाराएं हुआ करती थीं। इसका अर्थ है कि नदी किले की दीवार के ठीक नीचे की पहाड़ियों से होकर बहा करती थी, जबकि किला पहाड़ पर बनाया गया था।
आमतौर पर भारत में राजा अपने किले को बनवाकर उसके चारों ओर बड़े-बड़े नाले का निर्माण करा दिया करते थे, ताकि दुश्मन की सेना सीढ़ियों के सहारे किले के ऊपर चढ़ नहीं पाए। किन्तु तेलियागढ़ी किले को तो उत्तर की ओर से गंगा नदी ही सुरक्षा प्रदान करती थी। इसके दक्षिण में जंगलों से भरी एक पहाड़ी श्रंखला है और इसके पूरब से पश्चिम तक लम्बी सी राजमहल की पहाड़ियां हैं। पूरब की ओर बंगाल है और पश्चिम की ओर बिहार। इसका मतलब यह हुआ कि यदि कोई राजा किले की पश्चिमी दरबाजे को बंद कर दे, तो किसी भी दुश्मन सेना के लिए बंगाल में घुसना नामुमकिन हो जाएगा।
किले पर एक छोटी सी सेना अपने तोपों को रखकर पश्चिम की ओर से आने वाली किसी भी सेना को रोक सकती थी। यही कारण था कि शेरशाह के पुत्र जलाल खां ने हुमायूँ की सेना को 1539 में इस किले के पास एक महीने तक रोके रखा था, ताकि हुमायूं बंगाल के अंदर प्रवेश नहीं कर पाए। फिर उसके दो सौ साल बाद मराठों के पेशवा बालाजी राव ने भी 1743 में बंगाल में प्रवेश करने के लिए इस किले से होकर गुजरना मुनासिब नहीं समझा था। पेशवा ने अपनी चालीस हजार घुड़सवार सेना के साथ राजमहल में प्रवेश करने के लिए एक नया रास्ता पकड़ लिया था। इसी वजह से तेलियागढ़ी के किले को “बंगाल का प्रवेश द्वार” कहा जाता था।
इस किले को इतिहास के किस काल खंड में बनाया गया, इसपर उन खोजकर्ताओं और यात्रियों की अपनी अलग-अलग राय हैं, जो 17वीं सदी से आजतक यहाँ की यात्रा करने आते रहे हैं। कहीं भी किसी एक ऐसे राजा का जिक्र सामने नहीं आता, जिसने तेलियागढ़ी के किले की पहली नींव रखी हो।
तेलियागढ़ी के किले का जिक्र प्राचीन समय में चीनी यात्री व्हेनसांग (602-664), जो चीन के टेंगचुआन प्रान्त का रहने वाला था, ने अपनी यात्रा वृतांत “सी-यू-की” में किया है। वह हर्षवर्द्धन (590-647) के काल में 630 ई. में भारत आया था। वह भारत में पंद्रह वर्षों तक रहा। उन दिनों बंगाल में शशांक (शासनकाल- 590-625) का राज था। उसके समय में यहाँ पर कुछ बौद्ध मठ देखे गए थे।
किन्तु इस किले की ओर सबसे अधिक मुस्लिम, ब्रिटिश और डच इतिहासकार आकर्षित हुए। अबुलफज़ल (1551-1602), जिसने ‘आइन-ए-अकबरी’ (अकबरनामा) की रचना की और बेगम गुलबदन (1523-1603), जिसने ‘हुमायंनामा’ लिखा ने भी इस किले का जिक्र किया है। आगे के काल में सैयद गुलाम हसन (1727-) ने अपनी पुस्तक ‘सियार-उल-मुतखरीन’ में भी यहाँ हुए युद्धों का जिक्र किया। पश्चिम के विद्वानों में सबसे बड़ा नाम सर अलेक्जेंडर कनिंघम (1814-1893) है, जिन्हें भारत का एक सबसे महान पुरातत्वविद माना गया है, ने अपनी पुस्तक ‘एंसिएंट जिओग्राफी ऑफ़ इंडिया’ में तेलियागढ़ी किले का जिक्र किया है। इव्स ने भी 1757 में तेलियागढ़ी की यात्रा की थी। इसके अलावा विलियम होजेस, फ्रांसिस बुकनान, ब्लोच की किताबें एवं संथाल परगना गजेटियर में भी तेलियागढ़ी के किले के बारे में लिखा गया है।
अब तेलियागढ़ी किले के अधिकांश निशान मिट गए हैं। गंगा नदी जो इसकी गवाही दिया करती थी, वह यहाँ से इतनी दूर चली गयी है कि उसे किले की दीवर पर चढ़कर भी नहीं देखी जा सकती। पुरानी विचारधाराओं में इसे बौद्ध धर्म का एक भग्नावशेष के रूप में देखा गया है, जबकि कनिंघम ने व्हेनसांग का उदारहरण देते हुए इस किले को एक “बुलंद मीनार” की संज्ञा दी है।
फिर भी इस किले के अंदर सातवीं सदी का एक भी खँडहर मौजूद नहीं दिखाई देता। कनिंघम के अनुसार, तेलियागढ़ी के किले में बौद्ध और ब्राह्मणों के उपयोग में आने वाली बहुत सारी चीजें हुआ करती थीं, जिन्हें उखाड़कर यहाँ से ले जाया गया और फिर उन चीजों का उपयोग कहलगांव (वर्तमान में भागलपुर जिला का एक ब्लाक) के पास एक भवन को बनाने के लिए कर लिया गया। और फिर बाद में, जब यहाँ पर रेलवे लाइनों का निर्माण शुरू हुआ तो इस किले की अधिकांश वस्तुओं को उखाड़कर उसका उपयोग रेलवे के निर्माण में किया गया। आज रेलवे लाइन ठीक किले के नीचे से गुजरती है। कनिंघम के अनुसार, निश्चित रूप से यह किला पाल वंश के राजाओं के अधिकार में रहा होगा।
इस किले को उन दिनों भी देखा गया था, जब 9वीं सदी के मध्य में गुर्जर राजा भोज प्रथम (मिहिर भोज), जिसने 836 से 885 ई. तक कन्नौज और दिल्ली पर राज किया था, ने अपनी सीमा का विस्तार करते हुए बिहार, गया और हजारीबाग होते हुए तेलियागढ़ी तक अपनी सत्ता को बढ़ा लिया था। इसकी खुदाई के समय किले की पश्चिमी दीवार पर 1940 में एक खंभा मिला था, जिसकी पूजा यहाँ के स्थानीय लोग किया करते थे। लेकिन आगे चलकर पुरातत्व विभाग ने उस खम्भे की तिथि को पता लगाने की कोशिश नहीं की। फिर इसी किले के बीच एक और भी छोटी सी संरचना प्राप्त हुई थी, जिसे स्थानीय लोग योगी गढ़ के नाम से पुकारा करते थे। इतिहासकारों का मानना है कि यह कुछ प्राचीन सा प्रतीत होता है, किन्तु इसके आगे की खोज नहीं की जा सकी।
राजमहल के तेलियागढ़ी किले के बारे में जो कुछ भी जानकारी मिलती है, उससे यही कहा जा सकता है कि यह किला भारत में मुसलामानों के आगमन के पहले बनाया गया था। बंगाल में इसके सामरिक महत्व को देखते हुए यह संभावना जताई जाती है कि मुसलमानों के इस देश में आने के पहले यह किला बहुत छोटे रूप में रहा होगा, जिसका विस्तार आगे के राजाओं ने किया। गुप्त वंश के पतन के बाद बंगाल पर शशांक का राज हुआ, जिसने गौढ़ वंश की स्थापना की। वह हर्षवर्द्धन का समकालीन था। शशांक दरअसल गुप्त साम्राज्य के राजा महासेन का सेनापति था, जिसने साम्राज्य की कमजोरी का लाभ उठाकर बंगाल में अपनी एक अलग हिन्दू राज की स्थापना की थी।
जिस समय व्हेनसांग यहाँ आया था, बंगाल में पाल वंश की स्थापना नहीं हुई थी। पाल राजाओं ने 750 ई. में अपने वंश की स्थापना की, जिसकी नींव गोपाल (शासनकाल 750-770) ने रखी थी। पाल वंश का सबसे प्रतापी राजा धर्मपाल (शासनकाल 770-810) हुआ, जिसके काल में विक्रमशिला बौद्ध विहार की स्थापना की गयी थी, जो वर्तमान में भागलपुर शहर से चालीस किलोमीटर पूर्व की ओर कहलगांव प्रखंड में है। पाल वंश का अंतिम राजा मदन पाल (1143-1162) हुआ। मुसलमनों ने पहली बार 1343 में बंगाल पर कब्ज़ा किया। उस समय शमशुद्दीन इलियास (1343-1358) का शासन था, जो इलियाश वंश का था।
भारत में सल्तनत काल के समय तेलियागढ़ी से चलीस मील दक्षिण-पूर्व गौढ़ में सुल्तानों की राजधानी हुआ करती थी। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि इन्हीं में से किसी सुलतान ने 14वीं से 15वीं सदी के बीच तेलियागढ़ी के किले का निर्माण कराया होगा। लेकिन सल्तनत काल का कोई भी सबूत यहाँ दिखाई नहीं देता। हुमायूँ ने जब इस किले पर 1538-39 में आक्रमण किया था, तो उस समय शेरशाह गौढ़ में ही था, जिसने अपने पुत्र जलाल खां को हुमायूँ का मुकाबला करने को तेलियागढ़ी भेजा था।
शेरशाह और हुमायूँ की सेना के बीच हुई भिडंत की कहानी रोचक है। बाबर की बेटी और हुमायूँ की बड़ी बहन बेगम गुलबदन ने ‘हुमायूँनामा, में इसका रोचक जिक्र किया है। दरअसल यह लड़ाई बंगाल के स्वतंत्र सुल्तानों, जिसकी राजधानी गौढ़ हुआ करती थी, बिहार में रोहतास के शासक शेरशाह और हुमायूं के बीच हुई, जिसका केंद्र यही तेलियागढ़ी का किला था। मूल रूप ने यह संघर्ष अफगानों और मुगलों के बीच हुआ था, जिसमें अफगान सरदार शेरशाह ने हुमायूँ को पराजित कर दिल्ली की सत्ता पर अपना कब्ज़ा जमाया था।
जब बंगाल शेरशाह के कब्जे में था, हुमायूँ उसका पीछा कर रहा था। एक विशाल सेना के साथ हुमायूँ 1538-39 में तेलियागढ़ी के किले तक आ पहुंचा। जब शेरशाह को इस बात का पता चला, तब उसने हुमायूँ को रोकने के लिए अपने पुत्र जलाल खां को तेलियागढ़ी के किले में भेज दिया। जलाल खां ने तेलियागढ़ी के किले में जबरदस्त घेराबंदी करते हुए हुमायूँ को एक महीने तक आगे बढ़ने से रोके रखा। इस लड़ाई में हुमायूँ का सेनापति जहाँगीर कुली बेग गंभीर रूप से घायल हो गया था। किन्तु बाद में हुमायूँ ने इस किले पर अपना कब्ज़ा कर लिया। जलाल खां पीछे हट गया।
जहाँगीर कुली बेग दरअसल हुमायूँ के दूसरे पुत्र मिर्जा मुहम्मद हाकिम (1553-1585) का गुलाम हुआ करता था। शेरशाह ने जब देखा कि हुमायूँ किले को जीतता हुआ गौढ़ के ओर बढ़ रहा है, तो उसने टकराने की जगह वहां से सुरक्षित निकल जाना ही बेहतर समझा। वह राजमहल की दक्षिणी पहाड़ियों को पार करते हुए सासाराम पहुँच गया। एक ब्रिटिश इतिहाकर चार्ल्स स्टीवर्ट ने लिखा है कि शेरशाह ने बंगाल से इतना धन लूटा था कि जिससे आठ मिलियन पौंड की कीमत जितना सोना खरीदा जा सकता था।
तेलियागढ़ी के किले के बारे में ब्लौच ने भी लिखा है कि हालाँकि इसकी समतल जमीन से उत्तर की ओर कुछ भवन देखे गए थे, इनमें से कुछ पुराने मुस्लिम शासकों द्वारा बनाई गई एक छोटी सी मस्जिद भी थी। ब्लौच, जो 1903 में यहाँ आया था, ने यह भी लिखा कि एक खुदी हुई पत्थर यहाँ पाई गयी थी जैसा कि गौढ़ में भी देखा गया था। तेलियागढ़ी किले को एक सैनिक रणनीति के तहत बनाए जाने की बात आइन-ए-अकबरी में मिलता है।
अभी वर्तमान में पहाड़ों के ऊपर इसका जो स्वरुप दिखाई देता है, वह शाह शुजा के द्वारा बनाया गया लगता है, जिसकी राजधानी राजमहल में थी। दक्षिण की ओर यह किला राजमहल की पहाड़ियों से घिरा है, जो किसी भी सेना के लिए बंगाल में प्रवेश का एक बड़ा रुकबट हुआ करती थी। उत्तर की ओर गंगा नदी थी। नदी के तरफ 250 फीट लम्बी दीवार बनाई गयी थी, जिनमें पूर्वी और पश्चिमी सिरे पर बड़े-बड़े दरवाजे हुआ करते थे।
बुकानन ने तेलिया गाढ़ी के किले के बारे में जो लिखा है, उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि इस किले को मान सिंह ने किसी पहाड़िया सरदार से जीता था। ऐसा माना जाता है कि राजमहल की पहाड़िया जनजाति के लोग इतने स्वतंत्र विचारधारा के थे कि उन्होंने कभी भी मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं की। मानसिंह जब बंगाल की ओर बढ़ रहा था तभी पहाड़िया सरदारों ने उसे तेलियागढ़ी के किले के पास रोका था। फिर वहां एक युद्ध हुआ और मनसिंह ने इस किले को जीत लिया।
एक पुर्तगाली यात्री जोजो बैप्टिस्ट लवान्हा (1550-1624) ने तेलियागढ़ी के किले का चित्र भी बनाया था, जो डी. बर्सेस की किताब में प्रकाशित हुई थी। यह बंगाल का सबसे पुराना नक्शा है, जिसमें तेलियागढ़ी के किले को दिखाया गया है। जकोर्व डी. बार्रोस (1496-1570) ने अपनी पुस्तक “एशिया” में लिखा है कि एक संकरे से रास्ते पर बंगाल के राजा ने यहाँ एक किला बनवाया था, जिसके बगल से गंगा नदी बहती थी। यह किला उनलोगों के लिए बनाया गया था, जो जमीन और नदी के रास्ते बंगाल में प्रवेश करना चाहते थे।
तेलियागढ़ी किले के बारे में ब्रिटिश चित्रकार विलियम होजेस (1744-1797) ने बहुत कुछ लिखा है। वह पहला ब्रिटिश चित्रकार था, जो ईस्ट इंडिया कंपनी के संरक्षण में भारत आया था। उसने इस किले के अलावा सकरीगली का भी जिक्र अपने पुस्तक “ट्रेवल इन इंडिया” में किया है। वह 1781 में राजमहल आया और इस किले को पार करता हुआ भागलपुर पहुंचा था। वह लिखता है, “यहाँ का पूरा नजारा अद्भुत था। यहीं पर कुछ ब्रिटिश सैनिकों ने हमारा स्वागत किया; जिन्हें राजमहल और भागलपुर के कलक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड ने भेजा था। ये सैनिक मुझे अपने साथ मोती झरना ले गए। यह मोती झरना चार कोस या आठ इंग्लिश मील से एकदम साफ़ दिखाई देता था। वर्षा ऋतु के समय गंगा नदी तीस फीट ऊँची हो जाती थी। जब बारिश होती थी तो झरने की आवाज एक मील दूर से ही सुनायी पड़ती थी। यहाँ पर झरने का पानी लगभग डेढ़ सौ फीट की उंचाई से गिरता था, जो पानी आगे चलकर गंगा नदी में समा जाता था। यहाँ के पत्थर चारकोल के रंग के दिखते थे। इनमें से दो पत्थरों को हमने उठा लिया और कलकत्ता में अपने एक मित्र को दिखाया। यह स्थान स्थानीय लोगों के लिए अंधविश्वास और धार्मिक समारोह के लिए भी जाना जाता है।”
“इस किले के ऊपर से जमीन का नजारा बहुत मनोरम था। समतल इलाकों में गंगा नदी बहती थी। यहाँ खेती भी भरपूर होती थी। जहाँ तक नजर जाती खेत-ही-खेत दिखाई देते थे। तेलियागढ़ी के पास की सड़कें नदी के किनारे से होकर गुजरती थी और इन सड़कों के किनारे बड़े-बड़े जंगल थे, जिनमें ढेर सारी इमारती लकड़ियाँ थीं। इन जंगलों में कई तरह के पक्षियों का बसेरा था, जिनमें तोतों की संख्या सबसे अधिक थी। मोर पेड़ों की ऊँचाइयों पर विचरण करते थे। ये दृश्य किसी भी यात्री की आँखों को खुशियां देने वाला था। इन्हीं रास्तों से कई छोटी-छोटी नदियाँ भी बहती थीं, जिनकी धाराएं आम तौर पर कमजोर हुआ करती थीं। किन्तु बरसात के दिनों में ये नदियाँ अपनी उफान पर होती थीं।” - विलियम होजेस
गंगा नदी का जिक्र करते हुए विलियम होजेस ने भागलपुर के कहलगांव के पास का खास वर्णन किया है, जिसमें वह इसे भारत का एक सबसे सुंदर शहर बताया है। उसने लिखा है कि कहलगांव की नदी और जंगल उन्हें इंग्लैंड के पार्क की याद दिलाते हैं।
किन्तु आज तेलियागढ़ी के इस रहस्यमयी किले की स्थिति बहुत ही जर्जर है। इसे समय ने जितना जर्जर नहीं किया, उससे कहीं अधिक ठीक इसी पहाड़ के ऊपर वर्षों से चले आ रहे पत्थर खदानों के व्यापार ने इस किले को बरबाद कर दिया है।
यह बात तो प्रमाणित है कि पूरे झारखण्ड राज्य में तेलियागढ़ी के किले से अधिक प्राचीन कोई भी ऐतिहासिक इमारत नहीं है। यह किला झारखण्ड के कुछ आदिवासी समुदायों से भी कहीं अधिक पुराना है, जिन्होंने भारत के दूसरे राज्यों से आकर झारखण्ड में अपना घर बसाया था। किले के दक्षिणी पहाड़ को पत्थर व्यवसाय की वजह से पूरी तरह से ध्वस्त किया जा चुका है, किले के पूरब और पश्चिम की ओर की सारी ईंटों को उखाड़ दिया गया है, और जहाँ तक उत्तर की बात है, गंगा नदी अब यहाँ से नहीं गुजरती। अब उत्तर की ओर झुकी हुई काले पत्थरों की एक छोटी सी दीवार मात्र ही बची है, जो समाप्ति की ओर है। इस किले के दिन गिने-चुने हैं। फिर तेलियागढ़ी का किला सदा के लिए मिट्टी में मिल जाएगा। जिस तेलियागढ़ी के किले को शेरशाह, हुमायूँ, मानसिंह, शाहजहाँ और न जाने कितने जाने-अनजाने पश्चिम के भगोड़े सैनिक अपनी तोपों से नहीं तोड़ पाए, उसे हल के वर्षों में झारखण्ड के पत्थर माफिया ने बरबाद कर दिया है।

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