94 साल की उम्र। अशक्त शरीर। आवाज में थोड़ी बुजुर्गीयत के लक्षण। स्मृति एकदम ताजी। बक्सर, आरा, साहिबगंज से लेकर रांची तक की यात्रा एकदम एक सांस में....बचपन से लेकर उम्र के इस पड़ाव तक की पूरी कहानी स्मृतियों में एकदम ताजा। एक शाम कुछ क्षण उनके साथ बिताने का मौका मिला...। यादों का कारवां चल पड़ा। बच्चों का सा उत्साह दिखा। रांची विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर रहे। वहीं से सेवानिवृत्त। टीएस एलियट उनके प्रिय कवि रहे। उन्हें वे पढ़ाते थे। उनकी कविता द वेस्ट लैंड का अनुवाद ‘बंजर धरती’ नाम से किया। वे कहते हैं, एलियट की कविताओं में मेरी रुचि 1949 में हुई। तब उन्हें नोबेल पुरस्कार मिल चुका था। एक के बाद एक उनकी कविताएं पढ़ता गया। 1953 में, 21 साल की उम्र में टीएस एलियट के काव्य सिद्धांत पर लेख लिखा, जो त्रौमासिक ‘आलोचना’ में छपी थी। सोना, जागना, उठना, बैठना...हर समय एलियट उनके साथ होते।
जाक देरिदा के ‘डिफरेंस’ को लेकर कहते हैं कि हमने मतवादों से अलग हटकर इस पर लिखा। इतना विपुल लेखन के बाद भी वे अपने समय व शहर से ओझल ही हैं। एक छोटे से शहर में होने का खामियाजा उनके हिस्से आई।
पिता का बचपन में निधन और बक्सर में मामा के यहां से पढ़ाई और पढ़ने का संस्कार। कहते हैं, मामा को साहित्य से बड़ा प्रेम था और मुझे भी यहीं से साहित्य के प्रति झुकाव हुआ। इंटर में था तो हिंदी विषय पर एक लेख लिखने की प्रतियोगिता हुई थी।
बिहार राष्ट्र भाषा परिषद ने इसका आयोजन किया था और उस समय बाबू शिवपूजन सहाय यहां थे। पूरे देश से रचनाएं आई थीं, उसमें मुझे प्रथम स्थान मिला। एक सौ एक रुपये व चांदी के सिक्के मिले। जब इंटर से बीए में गया तब पता चला कि शिवपूजन सहाय जी बीमार हैं। हमने एक लेख लिखा, सुना है शिवजी बीमार हैं। यह लेखक विश्वमित्र में प्रकाशित हुआ था। इंटर के दौरान मैं बीमार हो गया। बीए की परीक्षा भी अच्छा नहीं गया। एमए में अंग्रेजी ले लिया। मन भारी था, यदि एमए में सेंकेंड या फर्स्ट नहीं आया तो क्या करूंगा? मैंने सोच लिया था कि अच्छा रिजल्ट नहीं आया तो अखबार बेचूंगा। पर, बक्सर में पहली नौकरी लग गई। इसके बाद साहिबगंज में आ गया। यहां नौ महीने कालेज में रहा। यहां काफी संख्या में बंगाली थे। यहां पढ़ाया। बहुत प्यार यहां से मिला। मेरे पढ़ाने का अंदाज कुछ अलग था। लड़के-लड़कियां सभी पसंद करते थे। यहां से आरा में कालेज चला गया और फिर वहां से एक दिन रांची आ गया।
रांची आने के बाद आकाशवाणी में अपनी रचनाओं के साथ हाजिरी लगाने लगे। यहीं पर उस समय के जाने-माने कथाकार राधाकृष्ण से भेंट हुई और फिर इसके बाद तो संबंधों का तार और मजबूत होता गया। कभी चाय की दुकान पर साथ-साथ चाय की चुस्की, कभी फ्रेंड्स केबिन में और कभी बड़ा तालाब के किनारे साथ-साथ तालाब के शांत और निर्मल जल को निहारते शाम बीतती थी। वे याद करते हैं, राधाकृष्ण से सालों जुड़ा रहा। बिहार सरकार की पत्रिका आदिवासी, जिसके वे संपादक थे, बराबर लिखता रहा। उन्हें मेरा लेखन बहुत पसंद था। प्रायः हर शाम हम दोनों रांची की विनोदाश्रम वाली गली में चाय पीते, देर रात तक सड़कों पर तरह-तरह की बातें करते चलते जाते और देश दुनिया की खबर लेते। राधाकृष्ण किसी को मानते नहीं थे। बहुत जिद्दी आदमी थे, लेकिन मुझे बहुत प्यार करते थे। रांची में योगेंद्रनाथ सिन्हा जी से संपर्क हुआ। वे वन विभाग में बड़े अधिकारी थे और कई किताबें लिख चुके थे। दोनों महामानवों का अंत मेरे सामने ही हुआ। अपनी रचनाओं के बाबत कहते हैं, कविताएं लिखी, आलोचना लिखा, संस्मरण लिखे। राधाकृृष्ण पुरस्कार मिला। रांची के जैन मंदिर में इसका आयोजन हुआ था-काफी भव्य। शहर की विदुषी डा. ऋता शुक्ल ने केशव प्रसाद एक संचयन में उनकी समस्त रचनाओं को एक जिल्द में समेट दिया है। उनके पास यादें बहुत हैं। सुनाई कम देता है, पर उत्साह में कमी नहीं। चलते-चलते उन्होंने अपनी प्रिय कविता सुनाई।

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