◆ हितेंद्र पटेल, इतिहासकार
सुमित सरकार के निधन के साथ भारतीय इतिहास-लेखन की एक ऐसी पीढ़ी का महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हुआ है जिसने इतिहास को केवल अतीत के तथ्यों का अनुशासित संकलन नहीं माना, बल्कि वर्तमान में मनुष्य की स्वतंत्रता, बराबरी और विवेक से जुड़ा हुआ बौद्धिक कर्म समझा। 13 अगस्त 2026 को 87 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। उनके जाने पर स्वाभाविक रूप से The Swadeshi Movement in Bengal, Modern India, Writing Social History जैसी पुस्तकों को याद किया जा रहा है, लेकिन सुमित सरकार का महत्व केवल इन पुस्तकों में नहीं है। उनकी सबसे बड़ी विशेषता शायद यह थी कि वे जिन वैचारिक मान्यताओं के भीतर से इतिहासकार बने, समय आने पर उन्हीं मान्यताओं और अपनी ही बौद्धिक परंपरा से कठिन सवाल पूछने का साहस भी उन्होंने दिखाया। इस अर्थ में उनका जीवन इतिहासकार की बौद्धिक ईमानदारी का एक उल्लेखनीय उदाहरण है।
सुमित सरकार का जन्म 1939 में एक ऐसे परिवार में हुआ जिसमें इतिहास और वामपंथी बौद्धिक संस्कृति की गहरी उपस्थिति थी। उनके पिता सुशोभन सरकार बंगाल में आधुनिक इतिहास-लेखन की अत्यंत सम्मानित हस्तियों में थे। प्रेसिडेंसी कॉलेज और कलकत्ता विश्वविद्यालय में शिक्षा पाने के बाद सुमित सरकार ने अध्यापन और शोध का जीवन चुना।
कलकत्ता और बर्दवान से होते हुए वे 1974 में दिल्ली विश्वविद्यालय पहुँचे और 2004 में सेवानिवृत्त होने तक वहाँ पढ़ाते रहे। किंतु उनकी बौद्धिक यात्रा को केवल संस्थानों और पदों की सूची से नहीं समझा जा सकता। वे उस दौर में इतिहासकार बने जब भारतीय इतिहास-लेखन में राष्ट्रवादी इतिहास, मार्क्सवादी इतिहास और कैम्ब्रिज स्कूल के बीच तीखी बहस चल रही थी। सुमित सरकार ने इनमें से किसी एक खाँचे को स्वीकार करके अपने लिए सुरक्षित जगह नहीं बनाई। उनके यहां मार्क्सवादी इतिहास-दृष्टि का प्रभाव स्पष्ट था, लेकिन उनका मार्क्सवाद किसी तैयार सूत्र को अतीत पर आरोपित करने वाला मार्क्सवाद नहीं था।
1973 में प्रकाशित The Swadeshi Movement in Bengal, 1903–1908 ने बहुत जल्दी उनकी अलग पहचान स्थापित कर दी। स्वदेशी आंदोलन भारतीय राष्ट्रवाद की सबसे गौरवपूर्ण घटनाओं में गिना जाता था। उसे केवल महान नेताओं, आदर्शवाद, स्वदेशी वस्तुओं के प्रचार और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की कहानी के रूप में प्रस्तुत करना आसान था। सरकार ने आंदोलन की सामाजिक बनावट को खोलकर देखने की कोशिश की। कौन-से सामाजिक वर्ग इसमें शामिल हुए, नेतृत्व और साधारण कार्यकर्ताओं के बीच क्या संबंध था, आंदोलन किन क्षेत्रों में फैला और कहाँ उसकी सीमाएँ थीं, हिंदू पुनरुत्थानवाद और राष्ट्रवाद के बीच क्या अंतर्संबंध बने—इन प्रश्नों ने राष्ट्रवाद के इतिहास को अधिक जटिल बनाया। उनके लिए किसी आंदोलन के महान होने का अर्थ यह नहीं था कि इतिहासकार उसकी कमजोरियों पर मौन हो जाए।
यही प्रवृत्ति आगे चलकर उनकी बहुचर्चित पुस्तक Modern India: 1885–1947 में और व्यापक रूप में दिखाई दी। भारतीय विश्वविद्यालयों में कई पीढ़ियों ने आधुनिक भारत का इतिहास इस पुस्तक से पढ़ा। उसकी लोकप्रियता के कारण कभी-कभी उसे केवल एक अच्छी पाठ्यपुस्तक समझ लिया जाता है, जबकि उसका वास्तविक महत्व इससे अधिक है। इस पुस्तक में राष्ट्रीय आंदोलन की राजनीतिक घटनाएँ हैं, गांधी, कांग्रेस और औपनिवेशिक सत्ता है, लेकिन उनके साथ किसान, मजदूर, आदिवासी, क्षेत्रीय आंदोलन और समाज के दूसरे हिस्से लगातार उपस्थित रहते हैं। राजनीति ऊपर से नीचे की ओर चलने वाली प्रक्रिया नहीं रह जाती। साधारण लोग राष्ट्रीय आंदोलन में आते हैं, लेकिन वे हमेशा वही नहीं करते जो नेता चाहते हैं। वे राष्ट्रीय नारों को अपने अनुभव, अपनी आकांक्षाओं और कभी-कभी अपनी स्थानीय शिकायतों के अनुसार अर्थ देते हैं।
बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में इतिहास-लेखन में एक समय ऐसा आया जब राजनीतिक इतिहास को लगभग पुराना इतिहास मान लिया जाने लगा था। सामाजिक और आर्थिक इतिहास के विकास ने इतिहासकार की दृष्टि को व्यापक बनाया, लेकिन उसका एक परिणाम यह भी हुआ कि राजनीति का इतिहास कभी-कभी नेताओं, संस्थाओं और घटनाओं के पुराने इतिहास का पर्याय मान लिया गया। सुमित सरकार की विशेषता थी कि उन्होंने राजनीतिक इतिहास की इस खोई हुई चाबी को समाज के भीतर खोजने का प्रयास किया। उनके महत्वपूर्ण लेख Popular Movements and Middle Class Leadership in Late Colonial India में यही समस्या उनके सामने थी। राष्ट्रीय आंदोलन में मध्यवर्गीय नेतृत्व और जन-आंदोलनों के बीच संबंध क्या था? जनता केवल नेतृत्व का अनुसरण करती थी या उसकी अपनी राजनीतिक सक्रियता थी? इस तरह उन्होंने राजनीतिक इतिहास और सामाजिक इतिहास के बीच ऐसी बातचीत संभव की जिसने आगे के इतिहास-लेखन को गहराई से प्रभावित किया।
इसी बिंदु पर उनका संबंध ‘सबाल्टर्न स्टडीज़’ से बना।
रणजीत गुहा के नेतृत्व में शुरू हुई इस बौद्धिक परियोजना का प्रारंभिक आग्रह था कि भारतीय इतिहास को केवल औपनिवेशिक अभिलेखों और अभिजात राष्ट्रवादी नेताओं की दृष्टि से नहीं लिखा जा सकता। किसानों, आदिवासियों, मजदूरों और समाज के उन लोगों की राजनीतिक चेतना और सक्रियता को समझना होगा जिनकी आवाज इतिहास की मुख्य कथा में बहुत कम सुनाई देती थी। सुमित सरकार इसके आरंभिक महत्वपूर्ण सहयोगियों में थे। यह उनके अपने इतिहास-लेखन की स्वाभाविक दिशा भी थी। इतिहास को नीचे से देखने की कोशिश और जन-आंदोलनों की स्वायत्तता की खोज उनके पहले के काम में मौजूद थी।
लेकिन सुमित सरकार की बौद्धिक पहचान को समझने के लिए इससे भी महत्वपूर्ण वह क्षण है जब उन्होंने उसी सबाल्टर्न इतिहास-लेखन की आलोचना करनी शुरू की, जिससे वे जुड़े रहे थे।
उनके प्रसिद्ध लेख ‘The Decline of the Subaltern in Subaltern Studies’ का महत्व इसी में है। उन्हें लगा कि जिस परियोजना ने किसान, मजदूर और दूसरे वंचित समूहों के वास्तविक जीवन, उनके संघर्ष और भौतिक परिस्थितियों को इतिहास के केंद्र में लाने की शुरुआत की थी, उसके एक हिस्से में धीरे-धीरे विमर्श, पाठ और औपनिवेशिक ज्ञान की दुनिया इतनी प्रभावी हो गई कि वास्तविक ‘सबाल्टर्न’ फिर पीछे छूटने लगा। यह आलोचना केवल किसी दूसरे बौद्धिक संप्रदाय पर किया गया आक्रमण नहीं थी। वह अपनी ही बौद्धिक यात्रा की आलोचना भी थी।
यहीं सुमित सरकार की दो अवस्थाएँ दिखाई देती हैं। पहले सुमित सरकार ने राष्ट्रवादी इतिहास की ऊपरी परत को तोड़कर उसके नीचे मौजूद सामाजिक इतिहास को सामने लाने में योगदान दिया। बाद के सुमित सरकार ने देखा कि ‘नीचे से इतिहास’ की भाषा भी एक नए बौद्धिक रूढ़िवाद में बदल सकती है। पर इन दोनों अवस्थाओं को परस्पर विरोधी मानना ठीक नहीं होगा। उनके भीतर एक बात लगातार बनी रही—इतिहास में वास्तविक मनुष्यों की उपस्थिति।
वर्ग, जाति, लिंग, समुदाय और सत्ता की संरचनाएँ आवश्यक थीं, लेकिन वे मनुष्य के सामाजिक अनुभव की जगह नहीं ले सकती थीं। इसलिए उन्होंने मार्क्सवाद से विमुख हुए बिना मार्क्सवादी इतिहास-लेखन की सीमाओं को देखा और सबाल्टर्न स्टडीज़ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बाद उसके उत्तरवर्ती स्वरूप की आलोचना की।
Writing Social History और बाद में Beyond Nationalist Frames में उनका इतिहास-लेखन और विस्तृत होता है। सामाजिक सुधार, जाति, स्त्रियों का प्रश्न, धर्म, समय-बोध, राष्ट्रवाद और हिंदुत्व—इन विषयों पर लिखते हुए वे दिखाते हैं कि आधुनिक भारत को केवल औपनिवेशिक सत्ता और राष्ट्रीय आंदोलन के द्वंद्व के माध्यम से नहीं समझा जा सकता। औपनिवेशिक भारत के समाज में एक साथ कई प्रकार के परिवर्तन हो रहे थे। राष्ट्रवाद मुक्ति की शक्ति था, लेकिन उसके भीतर समुदाय, जाति और लैंगिक असमानता के प्रश्न भी थे। इसी कारण सरकार राष्ट्रवाद को न तो सरलता से खारिज करते हैं और न उसकी आलोचना को राष्ट्र-विरोध में बदलते हैं।
यह संतुलन आज विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है।
गांधी और गांधीवादी राष्ट्रवाद के प्रति उनका व्यवहार इसका अच्छा उदाहरण है। मार्क्सवादी इतिहास-लेखन में गांधी की आलोचना की एक लंबी परंपरा रही है—कभी उन्हें भारतीय पूँजीपति वर्ग का प्रतिनिधि बताया गया, कभी किसान और मजदूर आंदोलनों को नियंत्रित करने वाला नेता। सुमित सरकार ने इन प्रश्नों को गंभीरता से लिया, लेकिन गांधी को किसी एक वर्गीय सूत्र में समेट देने की सीमा भी उनके लेखन से सामने आती है। गांधीवादी आंदोलन के भीतर नेतृत्व और जनता के संबंध, अफवाहों, स्थानीय विश्वासों तथा गांधी के बारे में साधारण लोगों की कल्पनाओं को देखते हुए उन्होंने दिखाया कि जन-राजनीति को केवल संगठन के आधिकारिक कार्यक्रम से नहीं समझा जा सकता। जनता राजनीति में प्रवेश करती है तो वह अपने साथ अपनी दुनिया भी लेकर आती है।
उनकी बाद की किताब Modern Times को इस लंबी यात्रा के संदर्भ में पढ़ना चाहिए। वृद्धावस्था तक वे उन प्रश्नों पर लौटते रहे जिन्हें युवा इतिहासकार के रूप में उठाया था—पूँजीवाद, आधुनिकता, श्रम, सामाजिक परिवर्तन और मनुष्य के अनुभव के बीच संबंध। इस निरंतरता के कारण उन्हें केवल ‘मार्क्सवादी इतिहासकार’ कह देना उतना ही अधूरा है जितना उन्हें केवल ‘सबाल्टर्न इतिहासकार’ कहना।
मार्क्स ने उन्हें इतिहास को देखने के महत्वपूर्ण औजार दिए, लेकिन उन्होंने अपने बौद्धिक जीवन को किसी विचारधारा की रक्षा में नहीं लगाया। विचार उनके लिए अतीत को समझने के साधन थे, इतिहास पर शासन करने वाले सिद्धांत नहीं।
यह विशेषता उनके सार्वजनिक जीवन में भी दिखाई दी। हिंदुत्ववादी इतिहास-दृष्टि और इतिहास के सांप्रदायिकीकरण के विरुद्ध उन्होंने लगातार लिखा। Towards Freedom परियोजना के अंतर्गत 1946 से संबंधित दस्तावेजों के जिस विशाल खंड का उन्होंने संपादन किया, उसके प्रकाशन को लेकर भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद में विवाद हुआ और प्रकाशन रोका गया। सरकार इस विवाद में पीछे नहीं हटे। उनके लिए इतिहासकार की स्वायत्तता किसी पेशेगत सुविधा का प्रश्न नहीं थी; यह इतिहास-अनुसंधान की बुनियादी शर्त थी।
लेकिन उनकी बौद्धिक स्वतंत्रता की शायद अधिक कठिन परीक्षा पश्चिम बंगाल में हुई।
वामपंथी पारिवारिक और बौद्धिक परिवेश से आने वाले सरकार के लिए वाम राजनीति किसी बाहर की विचारधारा का नाम नहीं थी। फिर भी नंदीग्राम में हिंसा और किसानों पर दमन के प्रश्न पर उन्होंने पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार की खुली आलोचना की और अपना रवींद्र पुरस्कार लौटा दिया। किसी इतिहासकार के लिए अपने वैचारिक विरोधियों की आलोचना करना अपेक्षाकृत सरल है; कठिन काम तब शुरू होता है जब वही कसौटी अपने राजनीतिक और वैचारिक निकटस्थ लोगों पर लगानी पड़े। सुमित सरकार ने यह जोखिम लिया।
इसलिए उनके बौद्धिक जीवन को ‘वाम से मोहभंग’ जैसी आसान कहानी में भी नहीं बदला जाना चाहिए। उन्होंने अपनी मूल समानतावादी प्रतिबद्धताओं को छोड़ा नहीं था। बल्कि संभवतः उन्हीं प्रतिबद्धताओं के कारण वे सत्ता के उस व्यवहार को स्वीकार नहीं कर सकते थे जो उनके विचार में उन मूल्यों का उल्लंघन कर रहा था। इसी प्रकार हिंदुत्व की उनकी आलोचना किसी दलगत निष्ठा से उत्पन्न आलोचना नहीं थी।
राष्ट्र, धर्म और इतिहास को एक समरूप कथा में बदलने का प्रयास उनके इतिहास-बोध के ही विरुद्ध था। इतिहास उनके लिए स्वभावतः बहुल, असमान और अंतर्विरोधों से भरा हुआ था।
उनकी पीढ़ी के इतिहासकारों में बड़ी विद्वत्ता असामान्य नहीं थी। सुमित सरकार को अलग करने वाली चीज शायद लगातार अपने निष्कर्षों को पुनः जाँचने की बेचैनी थी। वे अपने समय के सफल बौद्धिक मुहावरों में आराम से टिके नहीं रहे। जिस मार्क्सवादी इतिहास-लेखन ने उन्हें बनाया, उससे उन्होंने प्रश्न किए; जिस सबाल्टर्न इतिहास-लेखन को बनाने में उनका योगदान था, उसकी उन्होंने आलोचना की; जिस वामपंथी राजनीतिक संसार से उनकी गहरी निकटता थी, उसके सत्ता-व्यवहार का उन्होंने विरोध किया; और जिस राष्ट्रवाद के औपनिवेशिक-विरोधी महत्व को उन्होंने स्वीकार किया, उसके भीतर मौजूद सांप्रदायिक और बहिष्कारी संभावनाओं को भी रेखांकित किया।
सुमित सरकार को याद करने का सबसे सार्थक तरीका शायद यही है कि उन्हें किसी एक विचारधारा के प्रतिनिधि इतिहासकार में न बदला जाए। उनका अपना इतिहास-लेखन हमें ऐसा करने से रोकता है। वे हमें सिखाते हैं कि इतिहासकार के पास विचार होने चाहिए, लेकिन विचारधारा इतिहासकार की आँखों पर पट्टी नहीं बननी चाहिए; इतिहास में संरचनाएँ महत्वपूर्ण हैं, लेकिन मनुष्य उनसे गायब नहीं होना चाहिए; जनता का इतिहास लिखना जरूरी है, लेकिन ‘जनता’ को भी एक अमूर्त और पवित्र श्रेणी में नहीं बदल देना चाहिए।
ऐसे समय में जब इतिहास पर राजनीतिक अधिकार स्थापित करने की कोशिशें बढ़ी हैं और अकादमिक दुनिया भी अपने-अपने वैचारिक शिविरों में अधिक बँटती दिखाई देती है, सुमित सरकार की विरासत का यह पक्ष विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इतिहासकार की पहली निष्ठा अपने शिविर के प्रति नहीं, प्रमाण, तर्क और अपने प्रश्नों के प्रति होनी चाहिए। कभी-कभी इसका अर्थ अपने विरोधियों से बहस करना होता है और कभी अपने मित्रों से असहमति। सुमित सरकार ने दोनों किए। शायद इसी कारण उनकी पुस्तकों से अधिक लंबी उम्र उस बौद्धिक नैतिकता की होगी जिसे उन्होंने अपने जीवन और लेखन में निभाने की कोशिश की।

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