जयंती विशेष
◆ कुमार कृष्णन
शरतचंद्र चट्टोपाध्याय उन विरल कथाकारों में हैं, जिनकी लोकप्रियता भाषा की सीमाओं को पार कर सच्चे अर्थों में अखिल भारतीय बनी। बंगला में उन्हें जितनी ख्याति मिली, हिंदी, गुजराती, मलयालम और अन्य भारतीय भाषाओं के पाठकों ने भी उन्हें उतना ही अपनाया। उनकी रचनाओं में भारतीय समाज की मिट्टी की गंध है। उनके पात्र किसी कल्पित संसार से नहीं आते, बल्कि जीवन के उन्हीं रास्तों से निकलते हैं, जिन पर सामान्य आदमी चलता है। यही कारण है कि शरतचंद्र का साहित्य पढ़ते हुए पाठक को उसमें अपना जीवन, अपने संघर्ष और अपने आसपास के लोग दिखाई देते हैं।
भागलपुर:साहित्यिक चेतना की निर्माण भूमि
शरतचंद्र का जन्म 15 सितंबर 1876 को पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के देवानंदपुर गांव में हुआ था। उनका बचपन आर्थिक अभावों के बीच बीता, लेकिन इसी अभाव ने उनके भीतर जीवन को करीब से देखने की दृष्टि विकसित की। उनके व्यक्तित्व और साहित्यिक संस्कार के निर्माण में भागलपुर की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही। भागलपुर केवल उनके बचपन और किशोरावस्था का शहर नहीं था, बल्कि उनकी साहित्यिक चेतना के निर्माण की भूमि भी था। उनके पिता मोतीलाल चट्टोपाध्याय स्वभाव से स्वतंत्र और नौकरी में स्थिर न रह पाने वाले व्यक्ति थे। आर्थिक कठिनाइयों के कारण परिवार को देवानंदपुर छोड़कर भागलपुर में शरतचंद्र के नाना केदारनाथ गांगुली के घर आना पड़ा। आदमपुर स्थित गांगुली परिवार उस समय के संपन्न और शिक्षित बंगाली परिवारों में गिना जाता था। इस तरह शरतचंद्र के जीवन का एक महत्वपूर्ण दौर भागलपुर में बीता।

पांच वर्ष की उम्र में उन्हें देवानंदपुर के प्यारी पंडित की पाठशाला में भेजा गया था। बाद में 1883 में उनका दाखिला भागलपुर के दुर्गाचरण एम.ई. स्कूल की छात्रवृत्ति कक्षा में हुआ। उनके नाना केदारनाथ गांगुली इस विद्यालय से जुड़े थे। आगे चलकर उन्होंने टीएनबी कॉलेजिएट स्कूल में शिक्षा प्राप्त की और 1894 में प्रवेशिका परीक्षा उत्तीर्ण की। आर्थिक अभाव के कारण वे एफ.ए. की पढ़ाई पूरी नहीं कर सके।
भागलपुर के दिनों ने उनके व्यक्तित्व को जिस तरह आकार दिया, उसका प्रभाव उनके साहित्य पर भी दिखाई देता है। गंगा उनके जीवन का हिस्सा थी। गंगा किनारे बैठना, मित्रों के साथ घूमना, खेलना और आसपास के जीवन को देखना उनकी दिनचर्या में शामिल था। वे पतंग उड़ाते, लट्टू चलाते, कंचे खेलते और गुल्ली-डंडा खेलते थे। उनके बालसुलभ साहस और शरारतों में आगे चलकर उनके कई कथा-पात्रों की छवियां दिखाई देती हैं।
श्रीकांत के इंद्रनाथ
उनके बचपन के मित्र राजेंद्रनाथ मजूमदार, जिन्हें राजू कहा जाता था, का उनके जीवन में विशेष स्थान था। माना जाता है कि ‘श्रीकांत’ के इंद्रनाथ के चरित्र में राजू की छवि देखी जा सकती है। इसी तरह शरतचंद्र के जीवन और परिवेश ने उनके अनेक पात्रों को जन्म दिया। उनके लिए साहित्य कल्पना से अधिक जीवन का पुनर्सृजन था।
भागलपुर के गांगुली परिवार में साहित्यिक वातावरण भी था। परिवार के अमरनाथ गांगुली बंगला साहित्य के नवजागरण से प्रभावित थे। उनके माध्यम से ‘बंग-दर्शन’ जैसी पत्रिका परिवार तक पहुंचती थी। परिवार की साहित्यिक बैठकों में बंकिमचंद्र की रचनाएं, ‘मृणालिनी’, ‘मेघनाद वध’ और अन्य साहित्यिक कृतियां पढ़ी जाती थीं। कुसुमकामिनी देवी की साहित्यिक रुचि ने भी शरतचंद्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन गोष्ठियों ने उनके भीतर साहित्य के प्रति वह अनुराग पैदा किया, जिसने आगे चलकर उन्हें भारतीय कथा-साहित्य का महान कथाशिल्पी बनाया। भागलपुर उस समय सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा था। एक ओर परंपरा और रूढ़ियां थीं, तो दूसरी ओर आधुनिक शिक्षा और नवजागरण की लहर। बंगाली समाज के भीतर भी इन दोनों धाराओं के बीच संघर्ष था। शरतचंद्र इस वातावरण को बहुत करीब से देख रहे थे। यही कारण है कि आगे चलकर उनके साहित्य में रूढ़ सामाजिक व्यवस्था के प्रति प्रश्नाकुलता और स्त्री-जीवन के प्रति गहरी संवेदना दिखाई देती है।
रंगमंच से जुड़ाव
भागलपुर के रंगमंच से भी उनका जुड़ाव रहा। आदमपुर में बने नाट्य समूह से वे जुड़े और बंकिमचंद्र की ‘मृणालिनी’ के मंचन में मृणालिनी की भूमिका निभाई। उन्होंने ‘चिंतामणि’ आदि नाटकों में भी अभिनय किया। अभिनय ने उन्हें मनुष्य के बाहरी व्यवहार के साथ उसके भीतर छिपे भावों को समझने का अवसर दिया। आगे चलकर यही संवेदनशील दृष्टि उनके कथा-साहित्य की पहचान बनी।
4 अगस्त 1900 को भागलपुर में ‘साहित्य गोष्ठी’ की स्थापना भी उनके साहित्यिक जीवन की महत्वपूर्ण घटना थी। इसके प्रमुख सदस्यों में उनके मामा सुरेंद्रनाथ, गिरिंद्रनाथ और विभूतिभूषण भट्ट आदि थे। यहां रचनाओं पर चर्चा और समीक्षा होती थी। इसी वातावरण में हस्तलिखित पत्रिकाओं की परंपरा विकसित हुई। ‘आलो’ के बाद ‘छाया’ नामक हस्तलिखित पत्रिका निकली, जिसमें शरतचंद्र की रचनाएं भी प्रकाशित हुईं। ‘क्षुद्रेर गौरव’ और ‘आलो ओ छाया’ जैसी रचनाओं ने उनके आरंभिक साहित्यिक व्यक्तित्व को आकार दिया।
इस साहित्यिक वातावरण में निरूपमा देवी की उपस्थिति भी महत्वपूर्ण थी। वे स्वयं रचनाशील थीं और उस समय की साहित्यिक गोष्ठियों में उनकी रचनाएं विशेष रुचि से पढ़ी जाती थीं। शरतचंद्र के साहित्यिक विकास में भागलपुर की इन गोष्ठियों और मित्र-मंडली का योगदान इस बात का प्रमाण है कि उनका लेखक बनने का सफर अचानक नहीं हुआ था; वह धीरे-धीरे इसी सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश में तैयार हुआ।
शरतचंद्र की रचनाओं में उनके जीवन के अनुभवों की प्रतिध्वनि स्पष्ट सुनाई देती है। ‘देवदास’ की पारो और चंद्रमुखी, ‘श्रीकांत’ का इंद्रनाथ, ‘चरित्रहीन’ के पात्र और ‘पथेर दावी’ का क्रांतिकारी संसार—इन सबमें जीवन के वास्तविक अनुभवों की छाप मिलती है। उनकी कथा-दृष्टि का सबसे बड़ा गुण यही था कि वे सामान्य मनुष्य के जीवन को असामान्य साहित्यिक गरिमा प्रदान करते थे।
उनकी पहली प्रकाशित महत्वपूर्ण रचना ‘बड़ी दीदी’ थी, जो 1907 में ‘भारती’ में प्रकाशित हुई। इसके बाद उनकी साहित्यिक यात्रा तेजी से आगे बढ़ी। ‘देवदास’, ‘चरित्रहीन’, ‘गृहदाह’, ‘दत्ता’, ‘पल्ली समाज’, ‘श्रीकांत’, ‘पथेर दावी’, ‘देनापावना’, ‘विराज बहू’, ‘नारी का मूल्य’ और ‘शेष प्रश्न’ जैसी रचनाओं ने उन्हें बंगला साहित्य का अत्यंत लोकप्रिय कथाकार बना दिया।
शरतचंद्र की लोकप्रियता का सबसे महत्वपूर्ण कारण उनके नारी-पात्र हैं। उन्होंने स्त्री को केवल करुणा की पात्र बनाकर नहीं देखा, बल्कि उसकी इच्छा, आत्मसम्मान, संघर्ष और निर्णय की क्षमता को भी अभिव्यक्ति दी। उनके साहित्य की स्त्रियां रूढ़ सामाजिक व्यवस्था से टकराती हैं और पाठक को यह सोचने के लिए विवश करती हैं कि समाज ने नैतिकता के नाम पर स्त्री के लिए कितनी असमान कसौटियां बना रखी हैं।
‘चरित्रहीन’ अपने समय की सामाजिक नैतिकता को चुनौती देने वाला उपन्यास था। ‘पथेर दावी’ में उन्होंने क्रांतिकारी आंदोलन की बेचैनी को कथा का आधार बनाया। इसकी लोकप्रियता इतनी व्यापक थी कि ब्रिटिश सरकार ने इसे जब्त कर लिया। शरतचंद्र केवल प्रेम और पारिवारिक संबंधों के कथाकार नहीं थे; उनके भीतर सामाजिक अन्याय के विरुद्ध विद्रोह भी था।
साहित्य मनुष्य और समाज
1921 के असहयोग आंदोलन में उनकी भागीदारी और हुगली जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के रूप में उनकी भूमिका यह बताती है कि साहित्य और सामाजिक जीवन को वे अलग-अलग खानों में नहीं देखते थे। उनके लिए साहित्य मनुष्य और समाज से जुड़ने का माध्यम था। उनकी भाषा सरल थी, लेकिन संवेदना गहरी। वे कठिन शब्दों और अलंकारों के सहारे पाठक को प्रभावित करने के बजाय जीवन की सच्चाइयों से उसे जोड़ते थे। यही सरलता उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी। इसलिए शरतचंद्र केवल बंगला के लेखक नहीं रहे। उनके पात्र अनुवाद के साथ दूसरी भाषाओं में भी ऐसे पहुंचे जैसे वे उसी समाज के अपने लोग हों।
विष्णु प्रभाकर ने अपनी प्रसिद्ध जीवनी ‘आवारा मसीहा’ में शरतचंद्र के स्वच्छंद, संघर्षशील और संवेदनशील व्यक्तित्व को जिस तरह प्रस्तुत किया, उससे उनके जीवन और साहित्य को समझने की एक नई दृष्टि मिली। शरतचंद्र के जीवन में अभाव था, भटकन थी, संघर्ष था; लेकिन इन्हीं अनुभवों ने उन्हें उन लोगों का कथाकार बनाया, जिनकी आवाज साहित्य में अक्सर दब जाती थी।
16 जनवरी 1938 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी लोकप्रियता का अंत नहीं हुआ। आज भी ‘देवदास’, ‘श्रीकांत’, ‘चरित्रहीन’, ‘दत्ता’ और ‘पथेर दावी’ जैसे उनके उपन्यास नए पाठकों तक पहुंचते हैं। शरतचंद्र को याद करना केवल एक महान लेखक की जयंती मनाना नहीं है। यह उस साहित्यिक दृष्टि को याद करना है, जो मनुष्य को उसकी जाति, वर्ग, लिंग और सामाजिक स्थिति से ऊपर उठकर देखती है। उन्होंने साहित्य को अभिजात बैठक से निकालकर सामान्य मनुष्य के जीवन तक पहुंचाया। और शरतचंद्र को याद करते समय भागलपुर को भूलना उनके साहित्यिक जीवन की एक महत्वपूर्ण कड़ी को भूलना होगा। यही वह शहर था, जहां उनके बचपन की शरारतें, गंगा के किनारे बिताए दिन, मित्रों की संगति, साहित्यिक गोष्ठियां, रंगमंच और सामाजिक अंतर्विरोध उनके भीतर धीरे-धीरे उस कथाकार को गढ़ रहे थे, जो आगे चलकर भारतीय भाषाओं की सीमाएं लांघने वाला शरतचंद्र बना। उनकी लोकप्रियता का रहस्य शायद इसी में है—उन्होंने साहित्य में बड़े लोगों की दुनिया नहीं, साधारण मनुष्य के असाधारण दुख, प्रेम, संघर्ष और स्वाभिमान को आवाज दी।
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(कुमार कृष्णन वरिष्ठ पत्रकार हैं। शोधपूर्ण पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं। 15 सितंबर शरत की जयंती है। शरत का भागलपुर से गहरा लगाव था। )

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