रांची: प्रेस क्लब रांची में शब्दकार साहित्यिक समूह ने हिंदी पखवाड़ा के अवसर पर काव्य गोष्ठी का आयोजन किया । इस अवसर पर शब्दकार टीम की कार्यकारिणी बैठक भी हुई। जिसमें टीम के सभी सदस्यों ने सर्वसम्मति से संगीता कुजारा टॉक को अध्यक्ष, नंदा पाण्डेय को उपाध्यक्ष, राजीव थेपड़ा को सचिव, अनामिका प्रिया को उपसचिव, रीता गुप्ता को कोषाध्यक्ष, जय माला मीडिया प्रभारी, सह मीडिया प्रभारी सुमिता सिन्हा को पदभार मिला। इस अवसर पर शब्दकार की पूर्व अध्यक्ष वीणा और रश्मि शर्मा ने नवनिर्वाचित अध्यक्ष को बधाई और शुभकााानाएं देते हुए शब्दकार के गठन का उद्देश्य और विस्तार पर बातें की । काव्य गोष्ठी की शुरूआत चारूमित्रा ने सरस्वती वंदना से किया। इस अवसर पर कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ अशोक प्रियदर्शी ने कहा कि हिंदी सम्पर्क की भाषा है।
दक्षिण भारत में हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में आरोपित करने की बात उठी तो यही कहा गया कि पूरे देश में ऐसी भाषा होनी चाहिए जिसे कमोबेश समझा जा सके । हिंदी ऐसी ही भाषा है । वरिष्ठ साहित्यकार पंकज मित्र ने कहा कि आजादी के बाद हिंदी को एक कारगर भाषा के रूप में लाया गया था। अब बहुत सारी भाषाएँ विलुप्त हो रहीं हैं। जब एक भाषा विलुप्त होती है, तो एक संस्कृति भी विलुप्त हो जाती है। आज रचनात्मकता को सबसे बड़ा खतरा ए आई से है। इसलिए रचनात्मकता को बचाए रखने के लिए स्थानीय भाषाओं को अपनी रचना में शामिल करना जरूरी है ।
विशिष्ट अतिथि डॉ सुरिंदर कौर नीलम ने कहा कि जब तक शब्दकार जैसी संस्थाएँ काम कर रही हैं, हिंदी उन्नत होती रहेगी। उन्होेंने 'मेरी धड़कन जान है हिंदी/मेरा अभिमान हिंदी/मेरी विरासत मेरी पहचान हिंदी' कविता का सस्वर पाठ भी किया। प्रोफेसर चेतन कश्यप ने कहा कि हिंदी लिखने वालों को अपनी वर्तनी और हिज्जे का ध्यान रखना चाहिए। ए आई के समय में खुद की कसौटी बनना चाहिए। उन्होंने अपनी एक रचना 'मैं जो बढ़ता हूँ तो/पीछे हट जाते हैं ख्वाब/एक सिरा तेरे हाथ में/एक सिरा मेरे हाथ में' का पाठ भी किया । इस अवसर पर कुमार वृजेंद्र ने बहुत ही सारगर्भित कविता 'क्या मेरी आवाज आप तक पहुँच रही है ?'का पाठ किया ।
महेन्द्र सिंह ने 'सब चुप हैं/चारों ओर अंधेरा खड़ा है/ पर सब चुप हैं' कार्यक्रम का स्वागत भाषण नंदा पाण्डेय ने और संचालन राजीव थेपड़ा ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन शब्दकार की नवनिर्वाचित अध्यक्ष संगीता कुजारा टॉक ने किया। उन्होंने कहा कि पूर्व अध्यक्षों ने अपने अनुभव और समर्पण से जिस तरह से इस संस्था को आगे बढ़ाया है, मेरी भी कोशिश रहेगी कि आप सभी के सहयोग से विचार और सृजन को सम्मान मिले। काव्य पाठ करते हुए रश्मि सिंह सिंह ने 'बचपन से यही सुनती है वह, बहुत बोलती है ।
सुनीता अग्रवाल ने 'सुनो नहीं है आसान पत्थर सा हो जाना' संगीता सहाय अनुभूति ने क्लेश की कोख में जन्मती है कविता' रिम्मी वर्मा ने 'निशा कितनी घनेरी हो, उषा नवकिरण लाती है' अनुराग अन्वेषी ने वर्तमान धर्मावलंबियों द्वारा राम के चरित्र के कुरूप चित्रण को इंगित करते हुए अपनी मार्मिक कविता राम-राम सुनायी। कविता रानी सिंह ने 'जरूरी तो नहीं कि हाँ ही कहें हम' । उक्त गोष्ठी में पचास से अधिक साहित्यानुरागियों में से प्रमुखतः मीरा सिंह, विम्मी वर्मा, पूनम वर्मा, जयंति मिश्रा, खूशबू बरनवाल, प्रीता झा, कल्याणी झा कनक, पंकज पुष्कर, संजय सहाय सरस, पुष्पा सहाय गिन्नी, रेणू झा, मंजुला सिन्हा, निराला पाठक ने भी अपनी कविताओं का पाठ किया । इस अवसर पर शब्दकार कार्यकारिणी टीम के अन्य सदस्य, सत्या शर्मा, रीता गुप्ता, अनामिका प्रिया, अंशुमिता शेखर, सोनल थेपड़ा के साथ-साथ शहर के साहित्यकार और गणमान्य कवि, नरेश बंका, सुषमा सिन्हा, कमलजीत कौर आदि प्रबुद्ध साहित्यकार उपस्थित रहे ।

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