रांची: भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के वरिष्ठ अधिकारी प्रशांत आनंद ने मंगलवार को प्रभात प्रकाशन से छपी अपनी नई पुस्तक राज कौशल राज्यपाल संतोष गंगवार को भेंट की । लोकभवन में इस शिष्ट भेंट में राज्यपाल ने लेखक को बधाई दी और पुस्तक को उपयोगी बतायाl उनके साथ प्रभात प्रकाशन के राजेश शर्मा भी मौजूद थे। प्रशांत को राष्ट्रीय सुरक्षा, उग्रवाद-रोधी अभियानों तथा रणनीतिक संचालन का व्यापक अनुभव प्राप्त है।
अपने विशिष्ट कॅरियर के दौरान उन्होंने झारखंड सहित अनेक अति-संवेदनशील क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया है। उन्होंने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) में भी सेवाएं प्रदान की हैं, जहां वे आतंकवाद से संबंधित मामलों तथा आंतरिक सुरक्षा के लिए उत्पन्न खतरों की जांच और विश्लेषण से जुड़े रहे। 'केंद्रीय गृहमंत्री जांच उत्कृष्टता पदक' तथा 'पुलिस आंतरिक सुरक्षा सेवा पदक' से सम्मानित प्रशांत आनंद नेतृत्व, रणनीति और संस्थागत निर्माण के प्रति एक अनुशासित तथा प्रणाली-केंद्रित दृष्टिकोण रखते हैं।
अपनी पुस्तक, 'राज-कौशल' (Rules to Rule) में उन्होंने प्राचीन भारतीय शासकों के जीवन और निर्णयों से प्राप्त शाश्वत शिक्षाओं को आधुनिक नेतृत्व, शासन और प्रबंधन के संदर्भ में प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक इतिहास को केवल घटनाओं के संग्रह के रूप में नहीं, बल्कि रणनीति, नेतृत्व और सत्ता-संचालन की एक व्यावहारिक मार्गदर्शिका के रूप में देखने का प्रयास करती है।
पुस्तक की प्रस्तावना में लिखते हैं नेतृत्व कोई अमूर्त आदर्श नहीं है। यह एक अनुशासन है- उद्देश्य, धारणा और बदलती परिस्थितियों के अनुसार ढलने की क्षमता के बीच एक निरंतर सामंजस्य। वर्षों से, मैंने देखा है कि नेतृत्व को अकसर केवल करिश्मा या आदेश देने की शक्ति समझ लिया जाता है, लेकिन सच तो यह है कि स्पष्टता, साहस और सही नीयत ही वास्तविक नेतृत्व को आकार देते हैं।
इस पुस्तक की कहानियां हमें प्राचीन भारत की राजनीतिक प्रयोगशालाओं में ले जाती हैं- ऐसे राज्य और दरबार, जहां शासकों ने केवल सत्ता का उपयोग ही नहीं किया, बल्कि मजबूत प्रणालियों का निर्माण भी किया। चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा भारत के एकीकरण से लेकर हर्षवर्धन की रणनीतिक कूटनीति, राजराज चोल की दूरदर्शिता और अशोक के नैतिक आत्ममंथन तक, प्रत्येक अध्याय नेतृत्व का एक ऐसा मॉडल प्रस्तुत करता है, जो इतिहास में निहित होने के बावजूद आज के समय में भी अत्यंत प्रासंगिक है।
हम अकसर यह भूल जाते हैं कि- रणनीति की तरह ही नेतृत्व भी एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। सुधार तभी आता है, जब व्यक्ति को अपनी कमियों का एहसास होता है और वह लगातार उन्नत होने की आवश्यकता को स्वीकारता है। इसी निरंतर विकास ने अशोक को एक क्रूर विजेता से एक दार्शनिक राजा में बदल दिया। इसी सोच ने समुद्रगुप्त को न केवल अपने राज्य विस्तार के लिए, बल्कि गठबंधनों का निर्माण करने के लिए भी प्रेरित किया और इसी ने प्रभावतीगुप्त और राजेंद्र चोल जैसे शासकों को अल्पकालिक यश के बजाय दीर्घकालिक राज्य-निर्माण में निवेश कने का मार्ग दिखाया।और भी इसमें जानकारी हैl

Comments (0)
Write first comment
Please Login to write comment