हितेन्द्र पटेल
अपने शिक्षक सुशोभन सरकार के बारे में लिखते हुए सब्यसाची भट्टाचार्य ने एक ऐसी बात कही थी जो किसी बड़े अध्यापक को याद करने की सामान्य पद्धति से कुछ अलग थी। उनका कहना था कि असली सुशोभन सरकार को केवल उनकी लिखी हुई पुस्तकों में नहीं खोजा जाना चाहिए। वे उस जीवन में अधिक दिखाई देते हैं जो अपने चुने हुए पेशे के प्रति पूरी निष्ठा से समर्पित था। इस समर्पण की नैतिक ईमानदारी ही वह चीज थी जिसने उनके विद्यार्थियों के मन पर सबसे गहरी छाप छोड़ी।
शिक्षक दिवस पर सब्यसाची भट्टाचार्य को याद करने के लिए शायद इससे बेहतर आरंभ नहीं हो सकता। उन्होंने अपने शिक्षक में जिस गुण को सबसे अधिक महत्त्व दिया था, वही उनके अपने अध्यापन और इतिहासलेखन को समझने की भी एक कुंजी है। किसी बड़े इतिहासकार का मूल्यांकन उसकी पुस्तकों, शोध-पत्रों और संस्थागत उपलब्धियों के आधार पर अवश्य किया जाता है, लेकिन उसकी वास्तविक विरासत कई बार इससे आगे होती है। वह इस बात में होती है कि उसने अपने विषय को किस नैतिक गंभीरता से लिया, प्रमाणों के साथ कैसा व्यवहार किया, असहमति को कितनी जगह दी और विद्यार्थियों को अपने विचारों का अनुयायी बनाने के बजाय स्वयं सोचने की कितनी स्वतंत्रता दी। सब्यसाची भट्टाचार्य इसी अर्थ में एक उल्लेखनीय अध्यापक और इतिहासकार थे।
उनका बौद्धिक जीवन किसी एक क्षेत्र में सीमित नहीं रहा। उन्होंने आर्थिक इतिहास से शुरुआत की; भारतीय पूँजीपति वर्ग और श्रम के इतिहास पर महत्त्वपूर्ण काम किया; सामाजिक इतिहास की सीमाओं और संभावनाओं पर विचार किया; संगठित औद्योगिक मजदूर से आगे विशाल श्रमजीवी गरीब समाज की ओर ध्यान खींचा; औपनिवेशिक समाज को समझने के लिए यूरोपीय श्रेणियों की पर्याप्तता पर प्रश्न उठाया; और बाद के वर्षों में बौद्धिक इतिहास, सभ्यता, राष्ट्रवाद तथा बंगाल की सामाजिक मानसिकताओं के इतिहास तक पहुँचे। जीवन के अंतिम दौर में उनके प्रश्न संस्कृति, जाति, भाषा और सार्वजनिक बुद्धिजीवी की भूमिका तक फैल गए।
पहली नजर में यह विषयों का बहुत बड़ा फैलाव दिखाई देता है, लेकिन ध्यान से देखने पर इसके भीतर एक स्पष्ट निरंतरता मिलती है। सब्यसाची भट्टाचार्य किसी स्थापित उत्तर के साथ इतिहास की ओर नहीं जाते थे। उनके प्रश्न बदलते थे क्योंकि शोध स्वयं उन्हें नए प्रश्नों तक ले जाता था। उनकी बौद्धिक यात्रा विषय बदलते रहने की कहानी कम और इतिहास की अपनी परिभाषा को लगातार विस्तृत करने की कहानी अधिक है। उनके इतिहासकार रूप को समझने के लिए शायद यही सबसे महत्त्वपूर्ण बात है।
कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रो. अमलेश त्रिपाठी के निर्देशन में शोध करने के बाद उन्होंने 1960 के दशक में जादवपुर विश्वविद्यालय, भारतीय प्रबंधन संस्थान, कलकत्ता और शिकागो विश्वविद्यालय में अध्यापन किया। अगाथा हैरिसन फेलोशिप के अंतर्गत वे ऑक्सफोर्ड के सेंट एंटनीज़ कॉलेज से भी जुड़े। 1970 के दशक के आरंभ में वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के इतिहास अध्ययन केंद्र में आर्थिक इतिहास के रीडर के रूप में आए। यह वह दौर था जब जेएनयू का इतिहास केंद्र आधुनिक भारत के इतिहास को पढ़ने और पढ़ाने की नई पद्धतियाँ विकसित कर रहा था। आर्थिक इतिहास, औपनिवेशिक राज्य, राष्ट्रवाद, वर्ग, किसान और मजदूर के प्रश्न भारतीय इतिहासलेखन के केंद्र में आ रहे थे।
बाद में वे विश्वभारती के कुलपति बने, फिर जेएनयू लौटे और 2003 तक वहाँ रहे। भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद, सामाजिक विज्ञान अध्ययन केंद्र, कलकत्ता, वी. वी. गिरि राष्ट्रीय श्रम संस्थान और संस्कृति मंत्रालय से जुड़े विभिन्न अकादमिक दायित्वों ने उनके संस्थागत जीवन को व्यापक बनाया। लेकिन संस्थागत पद उनके इतिहासकार व्यक्तित्व की सबसे महत्त्वपूर्ण पहचान नहीं थे। वे स्वयं इतिहास के पेशे को जिस जीवनधर्म की तरह देखते थे, उसकी असली अभिव्यक्ति उनके शोध और अध्यापन में थी।
विद्यार्थियों की स्मृतियों में यह बात बार-बार आती है। वे किसी शोधार्थी पर अपना वैचारिक ढाँचा थोपने की कोशिश नहीं करते थे। विद्यार्थी अपना प्रश्न और अपनी व्याख्या विकसित कर सकता था, बशर्ते वह उसे ऐतिहासिक प्रमाणों के सहारे खड़ा कर सके। उनके बारे में यह भी याद किया गया है कि वे अपने शोधार्थियों की सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि से परिचित रहने की कोशिश करते थे। यह एक छोटी-सी बात लग सकती है, लेकिन उनके इतिहास-बोध के संदर्भ में इसका अपना अर्थ है। जिस इतिहासकार की रुचि व्यक्ति को उसके सामाजिक संदर्भ के भीतर देखने में थी, वही शिक्षक अपने विद्यार्थी को केवल शोध-विषय और शोधप्रबंध के रूप में नहीं देखता था।
एक कक्षा में उन्होंने स्वयं अपने अध्यापन की पद्धति का बहुत अच्छा परिचय दिया था। उनका तरीका था कि किसी विषय पर पहले सभी प्रमुख इतिहासकारों के मत प्रस्तुत किए जाएँ; उनमें उनका अपना मत भी रखा जाए; और फिर एक-एक करके सभी मतों की आलोचना की जाए—अपने मत की भी। इस छोटे से कथन में सब्यसाची भट्टाचार्य के इतिहासकार व्यक्तित्व का एक बड़ा हिस्सा समाया हुआ है। इतिहासकार का मत आलोचना से ऊपर नहीं होता। अध्यापक की प्रतिष्ठा उसकी बात को अंतिम सत्य नहीं बनाती। यदि इतिहास का काम प्रमाण के सहारे व्याख्या करना है तो शिक्षक की अपनी व्याख्या भी उसी कसौटी के सामने प्रस्तुत होनी चाहिए जिस पर वह दूसरों को परखता है।
इसी संदर्भ में उन्होंने एस. गोपाल और बिपन चंद्र की इतिहासकार के रूप में अलग-अलग प्रवृत्तियों की तुलना की थी। उनकी दृष्टि में गोपाल अपने तर्क की संभावना स्थापित करते थे, लेकिन पाठक को किसी एक निष्कर्ष के लिए राजी कर लेने का बहुत प्रबल आग्रह उनमें नहीं था। दूसरी ओर बिपन चंद्र में एक सक्रिय सार्वजनिक बुद्धिजीवी था। इतिहास उनके लिए राष्ट्र के विकसित होते जीवन में हस्तक्षेप का साधन भी था और इसलिए पाठक को समझाना उनके लेखन का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य था।
अपने इतिहास लेखन की शैली में सब्यसाची भट्टाचार्य स्वयं शायद गोपाल के अधिक निकट थे। पेशेवर इतिहासकार के रूप में वे प्रमाण को अपनी वैचारिक इच्छा से आगे रखने की कोशिश करते थे। एक वरिष्ठ इतिहासकार की प्रशंसा करते हुए उन्होंने लिखा था कि उसने प्रमाण के प्रति सम्मान और एक संतुलित अनुभवजन्य दृष्टि बनाए रखी जिसे सरल वैचारिक द्वैतों में नहीं बाँटा जा सकता। उनके अनुसार यही ऐतिहासिक विद्वत्ता का अर्थ था। यह टिप्पणी किसी दूसरे इतिहासकार के बारे में थी, लेकिन सब्यसाची भट्टाचार्य के अपने इतिहासलेखन पर भी उतनी ही अच्छी तरह लागू होती है।
आर्थिक इतिहास से सामाजिक इतिहास की ओर
उनके बौद्धिक जीवन का प्रारंभिक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र आर्थिक इतिहास था। उनकी पुस्तक द फाइनैंशल फाउंडेशन्स ऑफ द ब्रिटिश राज को केवल औपनिवेशिक सार्वजनिक वित्त के तकनीकी इतिहास के रूप में देखना गलत होगा। वित्तीय नीतियों, राजस्व, राज्य और आर्थिक हितों का अध्ययन करते हुए वे औपनिवेशिक शासन की संरचना समझने की कोशिश कर रहे थे। बहुत बाद की द कॉलोनियल स्टेट : थ्योरी एंड प्रैक्टिस तक आते-आते यही प्रश्न अधिक व्यापक रूप ग्रहण करता है। इसलिए उनके शुरुआती और बाद के काम के बीच केवल परिवर्तन नहीं, एक गहरी निरंतरता भी है।
भारतीय पूँजीपति वर्ग और राष्ट्रीय आंदोलन के संबंध पर उनका प्रसिद्ध लेख “कॉटन मिल्स एंड स्पिनिंग व्हील्स : स्वदेशी एंड द इंडियन कैपिटलिस्ट क्लास, 1920–22” उनकी पद्धति का अच्छा उदाहरण है। भारतीय पूँजीपतियों और राष्ट्रीय आंदोलन के संबंध को किसी सीधी रेखा में नहीं रखा जा सकता था। असहयोग आंदोलन के दौरान व्यापारिक जगत की कई महत्त्वपूर्ण हस्तियाँ खुले तौर पर आंदोलन के विरोध में थीं। पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास, जमनादास द्वारकादास, कावसजी जहांगीर और सी. सेतलवाड़ जैसे प्रभावशाली लोगों की भागीदारी से असहयोग-विरोधी संस्था तक बनी। गांधी की नई जन-राजनीति और तथाकथित “अज्ञानी जनता” की बढ़ती राजनीतिक उपस्थिति से व्यापारिक अभिजात वर्ग के कुछ हिस्से स्पष्ट रूप से असहज थे।
लेकिन 1920 के दशक में स्थिति तेजी से बदली। गांधी की राजनीति की शक्ति बढ़ने के साथ पुराने हित-समूहों की वह बिचौलिया भूमिका कमजोर हुई जिसके माध्यम से वे औपनिवेशिक शासन से सौदेबाजी करते थे। बहिष्कार आंदोलन में व्यापारियों की भागीदारी और तिलक स्वराज कोष के प्रति उनका सहयोग इस बदलाव को दिखाता था। भट्टाचार्य के लिए इस प्रक्रिया को वर्गीय संदर्भ के बिना समझना कठिन था। इसी आधार पर वे उन व्याख्याओं से असहमति व्यक्त करते थे जिनमें भारतीय व्यापारिक वर्ग को सरलता से औपनिवेशिक पूँजी का “कम्प्राडोर” सहयोगी मान लिया गया था।
लेकिन इस प्रसंग में सबसे उल्लेखनीय बात उनका निष्कर्ष नहीं है। उससे अधिक महत्त्वपूर्ण वह है जो उन्होंने कुछ वर्ष बाद अपने ही निष्कर्ष के बारे में कहा। उन्होंने स्वीकार किया कि उनके पहले लेख ने समस्या को जरूरत से अधिक सरल कर दिया था। उसमें श्रम और पूँजी के संबंधों तथा वर्ग-संगठनों की जटिलता पर्याप्त रूप से नहीं आ पाई थी।
इतिहासकार के रूप में सब्यसाची भट्टाचार्य को समझने के लिए इससे अधिक उपयोगी उदाहरण शायद ही कोई दूसरा हो। अपने किसी प्रकाशित तर्क को वापस देखना और यह स्वीकार करना कि वह अधूरा था, केवल विनम्रता की बात नहीं है। यह इतिहास की प्रकृति के बारे में एक विशेष समझ से निकलता है। कोई भी व्याख्या अंतिम नहीं है। नया स्रोत, नया प्रश्न या बदला हुआ दृष्टिकोण पुराने निष्कर्ष को पुनः खोल सकता है। यही वह स्थान है जहाँ “इतिहासकार का धर्म” कोई अमूर्त नैतिक आदर्श नहीं रह जाता; वह शोध की वास्तविक पद्धति बन जाता है।
उनके एक विद्यार्थी द्वारा याद किया गया 1976 का एक व्याख्यान भी इसी पद्धति को दूसरे रूप में सामने लाता है। जेएनयू के पुराने परिसर में अगस्त की एक गर्म दोपहर में विषय था पश्चिमी भारत में कपड़ा उद्योग का उदय। पहली नजर में यह बेहद शुष्क विषय था और भट्टाचार्य की व्याख्यान शैली भी किसी करिश्माई वक्ता जैसी नहीं थी। वे शांत और सटीक बोलते थे। लेकिन जैसे-जैसे कक्षा आगे बढ़ी, मुक्त व्यापार और संरक्षण शुल्क की बहस कपड़ा मिलों की सफलता-असफलता से जुड़ी; पूँजी के स्रोतों की चर्चा जातीय और पारिवारिक संपर्क-जाल तक पहुँची; कारखानों की अवस्थिति पर्यावरणीय परिस्थितियों से जुड़ी; और श्रम की आपूर्ति गाँव और शहर के बीच संबंधों की कहानी बन गई। विद्यार्थी को लगा कि एक नई अर्थव्यवस्था और एक नया वर्ग उसकी आँखों के सामने बन रहा है।
इस स्मृति में अच्छे अध्यापन से अधिक कुछ है। इससे उस इतिहासकार की कार्यप्रणाली दिखाई देती है जिसके लिए आर्थिक तथ्य कभी अकेला नहीं था। संख्या सामाजिक संबंध से जुड़ती थी, पूँजी समुदाय से, कारखाना पर्यावरण से और श्रम ग्रामीण समाज से। आर्थिक इतिहास के भीतर ही सामाजिक इतिहास की संभावना पैदा हो रही थी।
1982 तक आते-आते यह संभावना अधिक स्पष्ट पद्धतिगत प्रश्न बन चुकी थी। उस वर्ष आधुनिक भारतीय इतिहास खंड के अध्यक्षीय भाषण में भट्टाचार्य ने आर्थिक और श्रम इतिहास दोनों की सीमाओं पर विचार किया। नए आर्थिक इतिहास और क्लियोमेट्रिक्स ने आर्थिक इतिहास को तकनीकी रूप से बहुत विकसित किया था। बड़े आँकड़े, दीर्घकालीन प्रवृत्तियाँ और मात्रात्मक विश्लेषण इतिहासकार को नई क्षमता देते थे। भट्टाचार्य इन उपलब्धियों को अस्वीकार नहीं करते थे। लेकिन उन्हें यह महसूस हो रहा था कि तकनीकी परिष्कार अपने आप ऐतिहासिक समझ को व्यापक नहीं बनाता।
यहीं से “लोगों के इतिहास” और “मानसिकताओं के इतिहास” की ओर उनका झुकाव अधिक स्पष्ट होता है। यह उनके बौद्धिक विकास का महत्त्वपूर्ण पड़ाव है। आर्थिक इतिहास से बौद्धिक इतिहास तक उनकी यात्रा को सीधी रेखा में नहीं समझा जा सकता। उनके बीच सामाजिक इतिहास और लोगों के इतिहास का यह बड़ा विस्तार है। मनुष्य केवल मजदूरी, उत्पादन और उपभोग की आर्थिक इकाई नहीं है। वह जाति, समुदाय, परिवार, धार्मिक विश्वास, सामाजिक स्मृति और मानसिकताओं की दुनिया में भी रहता है।
लुसिएँ गोल्डमान और जाक ले गॉफ से संवाद करते हुए भट्टाचार्य सामाजिक इतिहास को इतिहास की किसी अलग विशेषज्ञ शाखा में बदल देने के पक्ष में नहीं थे। उनके लिए सामाजिक इतिहास समग्र इतिहास को देखने की एक दृष्टि था। समाज के आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों के बीच संबंधों को समझना उसका उद्देश्य था। आर्थिक इतिहासकार के लिए कोई परिस्थिति पहले से “दी हुई” हो सकती थी; सामाजिक इतिहासकार के लिए वही परिस्थिति स्वयं व्याख्या का प्रश्न बन सकती थी। यही परिवर्तन मजदूर के इतिहास को ट्रेड यूनियन से बाहर उसकी बस्ती तक, और बाद में बंगाल के राजनीतिक इतिहास को राजनीतिक संगठनों से बाहर रोजमर्रा के सामाजिक संबंधों और मानसिकताओं तक ले जाएगा।
इस विकास को उस अकादमिक समय से अलग करके भी नहीं देखा जा सकता जिसमें वे इतिहासकार बने थे। 1940 और 1950 के दशकों का बंगाल आर्थिक संकट और सामाजिक परिवर्तन से गुजर रहा था। द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण महँगाई बढ़ी थी, निश्चित आय वाले मध्यवर्ग पर दबाव था और पुराने अभिजात वर्ग की संरचना बदल रही थी। इतिहास और अर्थशास्त्र में पढ़ने वाले प्रतिभाशाली विद्यार्थियों की एक पीढ़ी विदेश गई, लेकिन लौटने पर विश्वविद्यालयी अवसर आसानी से उपलब्ध नहीं थे। भट्टाचार्य बारुण दे जैसे इतिहासकारों की कठिनाइयों से परिचित थे और विश्वविद्यालयी गुटबाजी तथा पुराने सत्ता-दलालों की शक्ति के बारे में जानते थे। भारतीय प्रबंधन संस्थान, कलकत्ता जैसे नए संस्थानों ने इस पुराने संस्थागत एकाधिकार को कुछ हद तक कमजोर किया। सुशोभन सरकार ने भी जादवपुर विश्वविद्यालय में उनके लिए आरंभिक अवसर उपलब्ध कराने में सहायता की।
इसी समय पश्चिमी इतिहासलेखन में श्रम इतिहास तेजी से उभर रहा था। भारत में भी अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और श्रम के इतिहास पर नए अध्ययन हो रहे थे। भट्टाचार्य इस क्षेत्र में आए, लेकिन बहुत जल्दी उसकी अपनी सीमाएँ उनके सामने आने लगीं।
पहली समस्या स्रोतों की थी। भारतीय श्रम आंदोलन का इतिहास अक्सर ट्रेड यूनियनों और उनकी संस्थागत गतिविधियों का इतिहास बनकर रह जाता था। प्रकाशित सामग्री और समाचारपत्रों पर निर्भरता अधिक थी। सरकारी अभिलेख, मजदूर और उद्योगपतियों के निजी कागजात, व्यापारी संगठनों के रिकॉर्ड, अदालती मुकदमों और श्रमिक पत्रिकाओं जैसी सामग्री का पर्याप्त उपयोग नहीं हो रहा था।
लेकिन इससे अधिक महत्त्वपूर्ण समस्या यह थी कि “मजदूर” की परिभाषा बहुत संकीर्ण थी। श्रम इतिहास का केंद्र संगठित औद्योगिक मजदूर था। इससे निर्माण मजदूर, परिवहन क्षेत्र के असंगठित श्रमिक, छोटी दुकानों और छोटे उद्योगों में काम करने वाले लोग, शहरी गरीब तथा गाँव और शहर के बीच आते-जाते प्रवासी मजदूर इतिहास के हाशिये पर चले जाते थे। इनमें से बहुत से लोग वर्ष के एक हिस्से में शहर में और दूसरे हिस्से में कृषि मजदूर के रूप में काम करते थे। औद्योगिक सर्वहारा की कोई स्थिर श्रेणी उनके जीवन को पूरी तरह नहीं पकड़ सकती थी।
यहीं “श्रमजीवी गरीब” की धारणा का महत्त्व सामने आता है। यह केवल “मजदूर वर्ग” के लिए नया नाम नहीं था। इससे देखने का पूरा क्षेत्र बदलता था। कार्यस्थल के साथ यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण बनता था कि मजदूर रहता कहाँ है और किन सामाजिक संबंधों के बीच उसका जीवन चलता है। कारखाने के साथ झुग्गी-बस्ती इतिहास में आती थी। स्थायी औद्योगिक मजदूर के साथ अस्थायी श्रमिक, प्रवासी, छोटा कामगार और शहर की अनौपचारिक दुनिया दिखाई देने लगती थी।
यही प्रश्न आगे वैश्विक श्रम इतिहास और काम के इतिहास से उनके संवाद का आधार बना। समस्या अंततः इतनी ही थी कि इतिहास की हमारी स्वीकृत श्रेणियाँ किन लोगों को दिखाई देती हैं और किन्हें गायब कर देती हैं।
सिद्धांत की परीक्षा इतिहास से
भारतीय श्रम इतिहास पर विचार करते हुए भट्टाचार्य एक और महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष तक पहुँचे। पश्चिमी यूरोप के विकसित पूँजीवादी समाजों के इतिहास के लिए बनी पद्धतियाँ औपनिवेशिक समाज पर उसी तरह लागू नहीं की जा सकतीं। भारत के अनुभव की तुलना तीसरी दुनिया के दूसरे समाजों से करना कई बार अधिक उपयोगी हो सकता है।
इसका प्रभाव उनके मार्क्सवादी इतिहासलेखन संबंधी विचारों पर भी पड़ा। आर. पी. दत्त जैसे इतिहासकार भारतीय सर्वहारा को शास्त्रीय मार्क्सवादी श्रेणी के भीतर रख सकते थे। भट्टाचार्य के लिए समस्या यह थी कि ऐसा करने से भारतीय श्रम की ऐतिहासिक विशिष्टता गायब हो सकती थी। उन्होंने औद्योगिक सर्वहारा को बाकी श्रमजीवी गरीबों की तुलना में पहले से तय “ऐतिहासिक” भूमिका देने पर भी सवाल उठाया। फ्रांत्ज़ फैनन के सहारे उन्होंने पूछा कि उपनिवेशित और विकासशील समाज में औद्योगिक मजदूर क्या वास्तव में सबसे वंचित सामाजिक समूह है, या वह श्रमजीवी गरीबों के दूसरे हिस्सों की तुलना में कुछ हद तक विशेषाधिकार प्राप्त भी हो सकता है?
इस प्रश्न का अर्थ मार्क्सवाद को अस्वीकार करना नहीं था। अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि सिद्धांत को इतिहास की कसौटी पर परखा जाए, न कि इतिहास को सिद्धांत की कसौटी पर ढाला जाए।
इसी कारण सब्यसाची भट्टाचार्य का वामपंथी इतिहासलेखन से संबंध सरल नहीं था। उनकी बौद्धिक दुनिया वर्गीय विश्लेषण से गहराई से प्रभावित थी और पश्चिम बंगाल के वाम बौद्धिक संसार से उनके घनिष्ठ संबंध थे। लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं कि वे किसी वाम प्रतिष्ठान के इतिहासकार थे। जब ऐतिहासिक प्रमाण स्थापित मार्क्सवादी धारणा से मेल नहीं खाते थे, तो वे धारणा को संशोधित करने के लिए तैयार रहते थे।
यही बात उनके सामाजिक इतिहास के अध्ययन में भी सामने आई। औपनिवेशिक इतिहासकार लंबे समय तक भारत से अधिक “भारत में अंग्रेजों” का इतिहास लिखते रहे थे। जब सामाजिक इतिहास की ओर मुड़े भी तो ब्रिटिश समाज का जीवन अक्सर केंद्र में रहा। दूसरी ओर अठारहवीं सदी से विकसित औपनिवेशिक ज्ञान ने “लोक हिंदू धर्म” और “दार्शनिक हिंदू धर्म” जैसी श्रेणियाँ बनाईं, जिनके माध्यम से भारतीय समाज के बारे में कई स्थायी रूढ़ियाँ तैयार हुईं। नृवंशविज्ञानपरक शोध भी औपनिवेशिक ज्ञान और सत्ता के इस संसार से पूरी तरह बाहर नहीं थे।
इस प्रश्न से बौद्धिक इतिहास की ओर उनकी यात्रा का संबंध स्पष्ट है। यदि अतीत के बारे में हमारा ज्ञान स्वयं ऐतिहासिक परिस्थितियों में निर्मित होता है तो इतिहासकार को केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि अतीत क्या था; यह भी पूछना चाहिए कि अतीत के बारे में ज्ञान कैसे बनाया गया और उसके विरुद्ध वैकल्पिक ज्ञान कैसे विकसित हुआ।

औपनिवेशिक एकालाप के विरुद्ध भारतीय उत्तर
विश्वभारती में उनके वर्षों के बाद बौद्धिक इतिहास की ओर उनका झुकाव अधिक दिखाई देता है। शांतिनिकेतन और टैगोर की बौद्धिक विरासत की निकटता ने संभवतः इसे कुछ प्रोत्साहन दिया, लेकिन इसके बीज उनके पुराने इतिहासलेखन में पहले ही मौजूद थे। आंग्ल-भारतीय इतिहासलेखन में उनकी रुचि और औपनिवेशिक ज्ञान के प्रति उनकी आलोचनात्मक दृष्टि बहुत पुरानी थी।
टॉकिंग बैक : द आइडिया ऑफ सिविलाइजेशन इन द इंडियन नेशनलिस्ट डिस्कोर्स इस यात्रा की एक बड़ी उपलब्धि है। पुस्तक का केंद्रीय विचार यह है कि लंबे समय तक भारत के अतीत के बारे में ब्रिटिश विमर्श एक प्रकार का एकालाप था। उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के आरंभ में भारतीय बुद्धिजीवी उस एकालाप का उत्तर देने लगे। वे केवल औपनिवेशिक दावों का खंडन नहीं कर रहे थे; वे भारत के अतीत के लिए अपनी वैकल्पिक भाषा भी बना रहे थे।
भट्टाचार्य के अनुसार राष्ट्रवाद के समानांतर “सभ्यता” का एक महत्त्वपूर्ण विमर्श विकसित हुआ। इसके तीन बड़े प्रश्न थे—यूरोप के मुकाबले पूर्व-औपनिवेशिक भारतीय सभ्यता का मूल्यांकन कैसे हो; क्या भारत की कोई दीर्घकालीन सभ्यतागत एकता थी; और इस एकता का आधुनिक राष्ट्रत्व से क्या संबंध था? भांडारकर और बंकिमचंद्र से लेकर गांधी, टैगोर और नेहरू तक इसका कोई एक उत्तर नहीं था।
गांधी की हिंद स्वराज में राजनीतिक स्वतंत्रता सभ्यता के बड़े प्रश्न के भीतर रखी जाती है। गांधी अंग्रेज व्यक्ति और पश्चिमी सभ्यता में अंतर कर सकते थे। पश्चिमी आधुनिकता की उनकी आलोचना अत्यंत तीखी थी, लेकिन साथ ही वे भारतीय सभ्यता की आत्मसात करने की क्षमता पर जोर देते थे।
टैगोर की सभ्यता की कल्पना अलग थी। भारत उनके लिए विभिन्न सांस्कृतिक धाराओं के समन्वय से बना था। लेकिन टैगोर का राष्ट्रवाद से संबंध समय के साथ अधिक आलोचनात्मक हुआ। उन्होंने ब्रिटिश संपर्क की बौद्धिक भूमिका के कुछ सकारात्मक पक्षों को भी स्वीकार किया। इस कारण उन्हें राष्ट्रवाद की सरल कहानी में समाहित करना कठिन था।
भट्टाचार्य की रुचि किसी एक विचारक को सही सिद्ध करने में नहीं थी। वे यह देख रहे थे कि आधुनिक भारत की कल्पना करने के अलग-अलग रास्ते किस तरह बने। इसीलिए वे विवेकानंद, अरविंद, राधाकुमुद मुखर्जी, सावरकर और नेहरू तक जाते हैं। महाराष्ट्र और बंगाल में बीसवीं सदी के आरंभ में “इतिहास की भूख” पैदा हुई—शिवाजी और सिराजुद्दौला जैसे अतीत के व्यक्तित्वों की छवियाँ राष्ट्रीय और क्षेत्रीय चेतना में नए रूप में निर्मित हुईं। इतिहास केवल अतीत का ज्ञान नहीं रह गया था; वह आधुनिक पहचान बनाने का साधन भी था।
नेहरू की डिस्कवरी ऑफ इंडिया में इस प्रश्न का एक दूसरा रूप मिलता है। नेहरू एशिया के अतीत से भी जुड़े हैं और आधुनिक पश्चिमी बौद्धिक परंपरा से भी। कोसांबी ने नेहरू में वर्गीय विश्लेषण की कमी देखी, लेकिन स्वयं कोसांबी भी भारत की किसी दीर्घ सभ्यतागत एकता की संभावना पूरी तरह अस्वीकार नहीं करते।
भट्टाचार्य का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न इस पूरी बहस के पीछे था—भारत को “सभ्यता” की अवधारणा की इतनी आवश्यकता क्यों हुई? उनका उत्तर राष्ट्र-निर्माण से जुड़ा था। पश्चिमी यूरोप में कई सदियों के दौरान जो राजनीतिक और संस्थागत एकताएँ विकसित हुई थीं, वैसी ऐतिहासिक परिस्थिति भारतीय उपमहाद्वीप में नहीं थी। आधुनिक राष्ट्र की कल्पना के लिए इसलिए सभ्यतागत एकता का विचार विशेष रूप से उपयोगी बना। उनके अनुसार सभ्यता के विमर्श ने भारत में राष्ट्रत्व को कल्पनीय बनाया।
यह बौद्धिक इतिहास की ऐसी पद्धति थी जिसमें विचार को उसके सामाजिक और ऐतिहासिक कार्य के भीतर समझा जा रहा था।
बंगाल के जीवन और मानस का इतिहास
द डिफाइनिंग मोमेंट्स इन बंगाल : 1920–47 में भट्टाचार्य की लगभग सारी पुरानी चिंताएँ एक स्थान पर आ जाती हैं। इसे केवल बंगाल का राजनीतिक इतिहास कहना पुस्तक के साथ न्याय नहीं होगा। यहाँ राजनीति है, लेकिन उसके साथ भाषा, क्षेत्रीय पहचान, नया मुस्लिम मध्यवर्ग, स्त्रियों का सार्वजनिक जीवन, जाति, समुदाय, साहित्य, अकाल, हिंसा और सामाजिक मानसिकताएँ भी हैं। वे बीसवीं सदी के बंगाल के “जीवन और मानस” को समझना चाहते थे।
यहाँ 1982 में उभरी मानसिकताओं के इतिहास की चिंता अधिक विकसित रूप में दिखाई देती है। दुर्लभ बांग्ला पत्रिकाएँ, संस्मरण और साहित्य उनके लिए केवल घटनाओं की पुष्टि करने वाले पूरक स्रोत नहीं हैं; वे सामाजिक मानसिकताओं तक पहुँचने के माध्यम हैं।
इस पुस्तक का एक व्यक्तिगत संदर्भ भी था। उनके पिता निर्मल चंद्र भट्टाचार्य का परिवार पूर्वी बंगाल से आया था। 1943 के अकाल और 1946 के कलकत्ता दंगों की स्मृतियाँ उनके बचपन के अनुभवों का हिस्सा थीं। लेकिन उन्होंने निजी स्मृति को प्रमाण का विकल्प नहीं बनाया। स्मृति ने शायद प्रश्न को अधिक संवेदनशील बनाया; उत्तर फिर इतिहासकार को स्रोतों से ही खोजना था।
द डिफाइनिंग मोमेंट्स की एक महत्त्वपूर्ण अंतर्दृष्टि यह थी कि बंगाल की एकता केवल 1947 की राजनीतिक वार्ताओं में अचानक नहीं टूटी। जाति और समुदाय की रोजमर्रा की सामाजिक दूरियाँ बहुत पहले से उसके नीचे काम कर रही थीं। सार्वजनिक राजनीति में जो विभाजन अंततः दिखाई दिया, उसकी पूर्वपीठिका सामाजिक व्यवहार और मानसिकताओं में बन रही थी।
यहाँ भट्टाचार्य का आर्थिक इतिहास से लोगों के इतिहास तक पहुँचना अपना पूरा अर्थ ग्रहण करता है। राजनीति अब केवल संगठन और नेतृत्व की गतिविधि नहीं है; वह सामाजिक संबंधों की दुनिया से निकलती है।
इसी दिशा में वंदे मातरम् : द बायोग्राफी ऑफ अ सॉन्ग को भी रखा जा सकता है। एक गीत किस प्रकार राष्ट्रीय प्रतीक बनता है, समय के साथ उसके अर्थ कैसे बदलते हैं और अलग-अलग समुदाय उसे अलग-अलग तरह से क्यों ग्रहण करते हैं—यह प्रश्न एक सांस्कृतिक प्रतीक को इतिहास की गतिशील दुनिया में रखता है। यहाँ भी निर्णय सुनाना उनकी प्राथमिकता नहीं थी; अर्थ के ऐतिहासिक निर्माण को समझना था।
इतिहासकार की सार्वजनिक भूमिका
सब्यसाची भट्टाचार्य के बौद्धिक विकास का एक और महत्त्वपूर्ण चरण उनके अंतिम वर्षों में दिखाई देता है। 2016 के एक लेख में वे लेखकों और बुद्धिजीवियों की स्वतंत्रता को सीमित करने वाली गैर-कानूनी सामाजिक शक्तियों को लेकर चिंतित थे। लेकिन इसका उत्तर वे केवल बौद्धिक स्वतंत्रता की औपचारिक माँग में नहीं खोजते थे। उनका प्रस्ताव था—एक “जन-संस्कृति अभियान”।
यहाँ उनकी पुरानी चिंताएँ नए रूप में लौटती हैं। जिस इतिहासकार ने संगठित श्रम की सीमा से बाहर श्रमजीवी गरीबों को देखा था, वही अब कह रहा था कि जन-संस्कृति के किसी अभियान के केंद्र में दलित और श्रमजीवी गरीब होने चाहिए। और इसके साथ उन्होंने जाति का प्रश्न जोड़ा। भारतीय वाम के लिए जाति हमेशा सहज प्रश्न नहीं रही थी। भट्टाचार्य मानते थे कि वर्ग के साथ जाति को समझे बिना जनता तक पहुँचना संभव नहीं होगा।
यह उनके मार्क्सवाद से दूर जाने की कहानी नहीं थी। यह उसकी ऐतिहासिक सीमा को पहचानते हुए अपनी सामाजिक दृष्टि को व्यापक बनाने की कहानी थी।
भाषा के बारे में भी उनकी चिंता इसी से जुड़ी थी। जनता के सांस्कृतिक अभियान की भाषा जनता की भाषा होनी चाहिए। केवल अंग्रेजी या क्षेत्रीय भाषाओं के अत्यधिक शास्त्रीय रूप में बोलना लोगों से संवाद नहीं है। अगर भाषा लोगों के मन में कोई कंपन पैदा नहीं करती तो वैचारिक लड़ाई शुरू होने से पहले ही हार जाती है।
इस टिप्पणी में इतिहासकार और शिक्षक फिर एक-दूसरे के पास आ जाते हैं। ज्ञान केवल अर्जित करने की चीज नहीं है; उसे संप्रेषित भी होना चाहिए। लेकिन संप्रेषण का अर्थ ऊपर से ज्ञान देना नहीं, संवाद की ऐसी भाषा तलाशना है जिसमें दूसरा व्यक्ति अपनी जगह पा सके।
उनका निष्कर्ष था कि वास्तविक लड़ाई केवल बुद्धिजीवियों के बीच विचारों और उनके खंडन की नहीं है; असली लड़ाई लोगों के मन की है।
यह कथन उस व्यक्ति से आ रहा था जिसने अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत आर्थिक इतिहास के कठोर अध्ययन से की थी। आर्थिक इतिहास से श्रमजीवी गरीब, वहाँ से मानसिकताएँ, फिर सभ्यता और अंततः जनता के मानस तक पहुँचना एक अत्यंत रोचक बौद्धिक यात्रा है। इसके भीतर छलाँगें कम हैं, क्रमिक विस्तार अधिक है।
इसी संदर्भ में उनके जीवन के अंतिम वर्षों का प्रसंग अधिक अर्थपूर्ण ढंग से रखा जा सकता है। नवंबर 2017 में गंभीर बीमारी का पता चलने के बाद उनके पास समय सीमित था। फिर भी उन्होंने लगभग अंतिम सप्ताहों तक काम जारी रखा। फ्रंटलाइन के लिए लिखते रहे। टॉकिंग बैक और द डिफाइनिंग मोमेंट्स इन बंगाल के बांग्ला अनुवादों को देख रहे थे। द कॉलोनियल स्टेट के हिंदी अनुवाद की योजना थी। एशियाटिक सोसाइटी की आधुनिक बंगाल के इतिहास की तीन खंडों वाली परियोजना के सामान्य संपादक के रूप में काम कर रहे थे। इसी दौर में आर्काइविंग द ब्रिटिश राज उनके जीवनकाल की अंतिम अंग्रेजी पुस्तक के रूप में सामने आई।
यदि इस प्रसंग को लेख के आरंभ में रखा जाता तो वह किसी श्रद्धांजलि की भावभूमि बना सकता था। लेकिन उनके इतिहासकार रूप को समझ लेने के बाद इसे देखें तो इसका अर्थ अलग दिखाई देता है। यह उसी पेशागत जीवनधर्म की अंतिम अभिव्यक्ति थी जिसकी प्रशंसा उन्होंने सुशोभन सरकार में की थी। इतिहास के साथ उनका संबंध पेशे की सामान्य सीमा से आगे चला गया था। जिन प्रश्नों को जीवन भर खोलते आए थे, वे अंत तक उनके साथ रहे।
और इसीलिए शिक्षक दिवस पर सब्यसाची भट्टाचार्य को याद करते हुए अंततः फिर उनके शिक्षक सुशोभन सरकार पर लौटना उचित लगता है।
उन्होंने सुशोभन सरकार में जिस “नैतिक ईमानदारी” को देखा था, वह केवल निजी चरित्र का गुण नहीं था। वह अपने चुने हुए पेशे और बौद्धिक कर्म के प्रति ईमानदारी थी। सब्यसाची भट्टाचार्य के इतिहासलेखन में भी यही गुण सबसे अधिक टिकाऊ दिखाई देता है।
उन्होंने आर्थिक इतिहास लिखा, लेकिन उसकी तकनीकी सीमा पहचानी। भारतीय पूँजीपति वर्ग का वर्गीय विश्लेषण किया, लेकिन अपनी ही व्याख्या को बाद में जरूरत से अधिक सरल कहने से नहीं हिचके। श्रम का इतिहास लिखा, लेकिन पूछा कि मजदूर वर्ग की स्थापित श्रेणी के बाहर कौन छूट रहा है। मार्क्सवादी बौद्धिक परंपरा से निकले, लेकिन उसकी यूरोपीय श्रेणियों की आलोचना की। सामाजिक इतिहास की ओर गए, लेकिन उसे एक और विशेषज्ञ शाखा बनाने के बजाय पूरे इतिहास को देखने का दृष्टिकोण माना। बौद्धिक इतिहास में पहुँचे तो राष्ट्रवाद की परिचित कथा के समानांतर सभ्यता के विमर्श को खोजा। बंगाल के राजनीतिक इतिहास में आए तो राजनीति के नीचे रोजमर्रा के सामाजिक जीवन और मानसिकताओं को देखा। और सार्वजनिक बुद्धिजीवी के रूप में वर्ग के साथ जाति, संस्कृति और भाषा को जोड़ने की आवश्यकता महसूस की।
इनमें से कोई बदलाव पिछले सब्यसाची भट्टाचार्य को नकारकर नहीं आया। प्रत्येक नया चरण पिछले चरण की किसी सीमा को पहचानने से पैदा हुआ। इसलिए उनकी बौद्धिक यात्रा का केंद्रीय गुण केवल परिवर्तन नहीं बल्कि आत्म-संशोधन की क्षमता था।
एक इतिहासकार के लिए इससे कठिन गुण बहुत कम हैं। अपने तर्क से प्रेम होना स्वाभाविक है; अपने स्थापित निष्कर्ष को छोड़ने की तैयारी दुर्लभ है। विचारधारा बौद्धिक शक्ति भी देती है, लेकिन वह प्रमाण के ऊपर बैठ जाए तो इतिहास को बंद भी कर सकती है। भट्टाचार्य की कोशिश थी कि विचार और प्रमाण का संबंध बना रहे, लेकिन अंतिम अधिकार प्रमाण का हो।
इतिहासकार का धर्म इसलिए यह नहीं कि वह हमेशा सही साबित हो। उसका धर्म यह है कि वह अपने विषय के प्रति इतना ईमानदार हो कि अपने सबसे प्रिय निष्कर्ष को भी संशोधन के लिए खुला रख सके; और इतना सजग हो कि हर स्थापित ऐतिहासिक श्रेणी से पूछता रहे—इसके बाहर कौन छूट गया है?
शायद अपने विद्यार्थियों को इतिहास पढ़ाते समय सब्यसाची भट्टाचार्य ने यही सबसे बड़ी शिक्षा दी थी। शिक्षक दिवस पर किसी इतिहासकार-शिक्षक को याद करने का इससे अधिक सार्थक तरीका शायद ही कोई हो।

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