विपुल नायक, कथक नर्तक एवं नृत्य प्रशिक्षक
सावन का महीना भारतीय लोकजीवन में केवल ऋतु परिवर्तन का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह भावनाओं, उमंग, प्रेम और प्रकृति के साथ मनुष्य के गहरे जुड़ाव का समय है। जब आकाश में बादल उमड़ते हैं, धरती वर्षा की बूंदों से भीगती है और चारों ओर हरियाली छा जाती है, तब लोकमन स्वतः ही गीत और नृत्य की ओर आकर्षित होने लगता है। इसी सावनी उल्लास की एक अत्यंत सुंदर लोक अभिव्यक्ति है कजरी। मेरे दृष्टिकोण से कजरी केवल एक लोकगीत या लोकनृत्य नहीं, बल्कि स्त्री-मन की संवेदनाओं, विरह, प्रेम, प्रतीक्षा और प्रकृति के साथ संवाद की जीवंत अभिव्यक्ति है। विशेषकर सावन में कजरी का महत्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि इस ऋतु में प्रकृति स्वयं मानो नृत्य करती हुई प्रतीत होती है। कजरी की परंपरा मुख्यतः उत्तर भारत के भोजपुरी, पूर्वांचली और बनारसी लोक-सांस्कृतिक क्षेत्रों से जुड़ी रही है। सावन आते ही गांवों में झूले पड़ते हैं, महिलाएं और युवतियां समूह में कजरी गाती हैं और गीतों के साथ उनके भाव-भंगिमाओं में जीवन की अनेक अनुभूतियां दिखाई देती हैं। कहीं मायके आने की खुशी है, कहीं प्रियतम से मिलने की आकांक्षा, कहीं विरह की पीड़ा और कहीं बादलों तथा वर्षा के प्रति आनंद का भाव। कजरी में सावन केवल मौसम नहीं, एक मनःस्थिति है।

नृत्य की दृष्टि से देखें तो कजरी में अत्यधिक शास्त्रीय जटिलता की अपेक्षा भावप्रधानता और सहज अभिव्यक्ति महत्वपूर्ण होती है। हाथों की कोमल गतियां, वर्षा और बादलों को दर्शाती मुद्राएं, झूला झूलने की भाव-भंगिमा, सखी-सहेलियों के संवाद तथा प्रिय के प्रति विरह और प्रेम—ये सभी कजरी नृत्य को अत्यंत भावपूर्ण बनाते हैं। एक कथक नर्तक के रूप में मुझे कजरी में सबसे आकर्षक बात यह लगती है कि इसमें लोक और शास्त्रीय नृत्य के बीच एक सुंदर सेतु दिखाई देता है। कथक में जिस प्रकार भाव, नज़ाकत, नेत्र-संचालन और हस्त-मुद्राओं के माध्यम से कथा कही जाती है, उसी प्रकार कजरी में भी बिना अधिक आडंबर के जीवन की कहानी कही जाती है। अंतर केवल इतना है कि कजरी की भाषा और उसकी अभिव्यक्ति सीधे लोकजीवन की मिट्टी से निकलती है।
मेरे लिए कजरी का अर्थ है—
बादलों में उमड़ती उम्मीद,
वर्षा में भीगता प्रेम,
झूले में झूलती स्मृतियां,
और गीत-नृत्य में बोलता हुआ लोकमन।
सावन जब धरती को हरा करता है, तब कजरी मन को हरा करती है। यही कारण है कि सदियों से सावन और कजरी का संबंध इतना आत्मीय रहा है। कजरी हमारे लोकजीवन की वह धरोहर है जिसमें प्रकृति, प्रेम, विरह, उत्सव और नृत्य—सभी एक साथ दिखाई देते हैं। आज आवश्यकता है कि हम कजरी को केवल सावन के मनोरंजन तक सीमित न रखें, बल्कि इसे हमारी लोक-सांस्कृतिक विरासत के रूप में नई पीढ़ी तक पहुंचाएं। जब कोई कलाकार कजरी को मंच पर प्रस्तुत करे, तो उसके कदमों में केवल ताल नहीं, बल्कि माटी की सुगंध और सावन की आत्मा भी दिखाई देनी चाहिए।

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