श्री रामचरित्र सिंह
सभ्यता के शैशव-युगीन मानव-जीवन के अवशिष्ट चिह्न-स्वरूप शताब्दियों से निर्यातन और कालांतर से परिवर्तन कि चोटें सहती हुई आज भी कुछ जातियां भारत के वन-प्रांतों में एवं पर्वताच्छन्न भू-भागों में अपने आस्तित्व को बचाए अपने विरोधियों को मूक चुनौती दे रही हैं। उन जातियों में संथाल भी एक है। संप्रति संथाल-जाति बंगाल के वीरभूम और बिहार के पलामू, हज़ारीबाग़, रांची, संथाल-परगना आदि जिलों में निवास कर रही हैं। कुछ अगल-बगल के अन्यानय जिलों में भी हैं, किन्तु वहां उनकी संख्या अत्यधिक न्यून है। संथाल-परगना जिले का नाम तो इसी जाति के नाम पार पड़ा है।

संथाल लोग संभवतया परिश्रमी और कष्ट-सहिष्णु हैं। शारीरिक श्रम के फल-स्वरूप उन्हें जो अन्न मिल जाए, उसी पर संतोष कर आनंदपूर्वक जीवन व्यतीत करना वे खूब जानते हैं। जंगलों को काट कर जमीन आबाद करने में वे बड़े दक्ष हैं। जिस समय ये हजारीबाग की ओर से वर्तमान संथाल-परगना इलाके में आकर बसे और खेती करने लगे थे, उस समय यहां अंगरेजों का आधिपत्य जम चुका था। उन लोगों के बीच बंगाली एवं भोजपुरी महाजन भी बस गए और अल्प काल में ही बड़े भाग्यशाली बन गए। उन्होंने बेचारे संथालों को खूब ठगा, और चूसा। तौलने के बटखरों में हर-फेर कर एक का तीन किया। उन लोगों ने संथालों को थोड़ा-बहुत कर्ज देकर उनकी जीविका का एकमात्र आधार भूमि पर भी पंजा फैलाना शुरू कर दिया। जहां-तहां महाजनों से तंग आकर बेचारे संथाल अपना पिण्ड छुड़ाने के लिए स्थान छोड़कर अन्यत्र जाने लगे, तो महाजनों ने उनका अवशिष्ट सामान भी कुर्क करवा लिया। महाजनों की चालबाजी के कारण उन्हें कर्ज के एक रुपये के कई-कई रुपये चुकाने पड़े। संथाल लोग स्वतंत्रता के पक्के एवं जंगली पुजारी हैं। कर चुकाना किस चिड़िया का नाम है, वे जानते नहीं। अपना ही खून और पसीना एक करने के फल-स्वरूप खेती के योग्य तैयार की हुई जमीन के लिए मालगुजारी देना उन्हें स्वीकार न था। ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारी उन्हें जंगली और असभ्य समझकर सताया करते थे। इन सब अत्याचारों से वे जर्जरित हो गए थे। जब अत्याचारों एवं दुर्व्यवहारों कि पराकाष्ठा हो गई, तो उन लोगों के भीतर विद्रोह की आग सुलगने लगी।
वर्षों के षड्यंत्रों, चालबाजियों, अत्याचारों, विरोध तथा दबाव के पश्चात भी संथाल-जाति ने अपनी आदिम-युगीन सभ्यता, अपने पूर्वजों के आचार-विचार तथा उनके सीधापन लिए शौर्य को बचाए रखा। मनुष्य द्वारा मनुष्य पर बर्बर-से बर्बर जो भी अत्याचार किये जा सकते हैं, उन्हें सहने के पश्चात भी ऐसे विरोधियों का सामना करते हुए अपने आस्तित्व को इस वीर जाति ने बनाए रखा। इस ओर भारतीय इतिहासकारों ने अब तक ध्यान नहीं दिया है। सन 1857 के गदर के तीन वर्ष पूर्व ही अपने पूर्वजों के धर्म और प्रकृति-प्रदत्त अपनी स्वाधीनता की रक्षा तथा दिकुओं (हिंदुओं) के अन्यायपूर्ण व्यवहारों का उन्मूलन करने के लिए सब प्रकार के प्रलोभनों को ठुकराकर उन्होंने जो लोहा लिया, उसकी याद कर आज भी रोमांच हुए बिना नहीं रहता। उनके विद्रोही नेता थे सिदो, कानु, चांद और भैरव। नायकों ने घोषित कर दिया कि ठाकुर (संथालों का ईश्वर) ने आदेश दिया है कि अत्याचारियों से उनके अत्याचारों का बदला लो और संथाल-राज्य की स्थापना करो। 30 जून 1855 ई. को इस जाति के अंतर में कुछ पहले से ही सुलगाने वाली विद्रोहाग्नि भड़क उठी। एक ही बार दस हजार संथाली विजय-पताका लिए चल पड़े। कोई-कोई उसकी संख्या तीस हजार भी बतलाते हैं। कई अंगरेज अफसर और कितने ही महाजन तथा साधारण व्यक्ति उनकी क्रोधाग्नि का हव्य बन गए। अंत में तंग आकर ब्रिटिश सत्ता ने उनका दमन करने के लिए सेना भेजी; पर उनकी बहादुरी के कारण गोरे सैनिकों के भी दांत खट्टे हो गए। अंत में विवश होकर अंगरेजों ने फौजी कानून जारी कर दिया। जब तक संथालों का जातीय डंका बजता था, तब तक वे धनुष-बाण लेकर लड़ा करते थे और साहस के साथ आत्म-बलिदान करते थे। इस स्वातंत्र्य-युद्ध को ‘संथाली-हुल’ के नाम से पुकारते हैं।
जिस प्रकार 1़857 के विद्रोह के पश्चात भारतीय जागृति के विकासोन्मुख होने के कारण यत्र-तत्र नए-नए संगठनों और सुधार-वादी आंदोलनों का सूत्र-पात होने लगा था, उसी प्रकार संथाली-विद्रोह के पश्चात उनलोगों के बीच भी एक सुधारवादी आंदोलन का सूत्र-पात हुआ। संप्रति संथालों के बीच एक सुधारवादी संप्रदाय है, जो आरंभ से ही संथाल-समाज के दुर्गुणों को दूर करने को सतत प्रयत्नशील रहा है। उस संप्रदाय को “सत्यं शिवं” कहते हैं। जो लोग इस समुदाय में सम्मिलित होते हैं, वे “सफ़ाहोड़” कहलाते हैं। “सफ़ाहोड़” का अर्थ साफ-सुथरा, अर्थात पवित्र संथाल है। उन लोगों को खरवार भी कहते हैं। खरवार-आंदोलन का सूत्रपात सन 1871 ई. में हुआ। इसका जन्मदाता भागृत (भगीरथ) नामक एक संथाली साधु था, जिसका घर तलडीहा नामक स्थान में था। उसे लोग बाबाजी के नाम से संबोधित करते थे। भागृत संथालों का बहुत बड़ा वैद्य भी था। धार्मिक-शिक्षा और सुधारात्मक उपदेशों के साथ-साथ वह औषधोंपचार का भी कार्य करता था। दवा कि अपेक्षा वह मंत्र एवं झाड-फूँक ही अधिक करता था। जब कोई बीमार पड़ता था, अथवा किसी को किसी भी प्रकार का शारीरिक एवं मानसिक कष्ट होता था, तो वह भागृत के यहां सूर्य के प्रकाश में सुखाया हुआ अरवा चावल, एक लोटा दूध, एक सुपारी तथा एक पैसा दे आता था। इसका अर्थ यह समझा जाता था कि देनेवाला भागृत से प्रार्थना करता है कि आप मेरे कष्टों को दूर करने कि कृपा करें। भागृत कहता था कि तुमने जो मुझ से निवेदन किया, उसे मैं “चांदी बोंगा” के सम्मुख पेश करूंगा। बहुधा सब-के-सब अपने विश्वास के बलपर उक्त कष्ट से मुक्ति पा जाते थे। भागृत कहता था कि सभी कोई मेरे आज्ञानुसार ही आचरण करो, नहीं तो भगवान का आशीष प्राप्त न कर सकोगे। सबको शुद्ध हृदय के साथ मेरे पास आना चाहिए।
पादरी लोग भागृत को अपने मार्ग में बाधक समझते थे। अतः उन्होंने उसके विरुद्ध प्रचार शुरू करना आरंभ कर दिया। एक पादरी ने लिखा--- कुछ दिनों में ही भागृत धनी हो गया और उसकी आमदनी बहुत बढ़ गई। 1874 ई. में इस इलाके में एक अकाल पड़ा। इसी साल रंगुनिया चावल आया। भागृत ने सबसे कहा कि तुम लोगों ने जो चावल मेरे पास भेजा था, भगवान ने तुम लोगों को विपत्ति-ग्रस्त देख कर वापस भेज दिया है, ताकि तुम लोग उसे खाकर जीवन-रक्षा कर सको।” पर संथालों पर इसका कोई असर नहीं हुआ। वे तो भागृत के उपदेशों को ही मानते थे, जो इस प्रकार थे: “संथालों को साफ-सुथरा रहना चाहिए। चिड़ियों और सूअर के बच्चों की बलि नहीं देनी चाहिए। नित्य स्नान करके भोजन करना चाहिए।’ इन उपदेशों पर हिन्दुत्व कि स्पष्ट छाप दृष्टिगोचर होती है। यह आंदोलन संथालों के भीतर फैलती हुई जागृति एवं उनके विकास का द्योतक है। इस आंदोलन के सिलसिले में लोगों ने समाज के विभिन्न पहलुओं पर भी ध्यान दिया। इन लोगों का कथन था कि 1855 ई. वाले विद्रोह कि असफलता का कारण हम लोगों का धर्म-पथ से विचलित हो जाना ही था। भगवान कि सहायता भी हमें इसी कारण न मिल सकी।
चिड़ियों एवं सूअरों का मारना कोई-कोई बुरा जरूर मानते थे; पर उनके मानस-भक्षण को बहुत से लोग अधिक दिनों तक न छोड़ सके। संथाल भी देवताओं के नाम पर पशुओं एवं पक्षियों को मार कर खाने लगे। भागृत के सच्चे अनुयायियों ने ऐसा करना नैतिकता कि दृष्टि के समुचित न समझा और पहले की तरह अपना कार्य जारी रखा। इन लोगों ने अपना नाम “खरवार” रख लिया। अकाल के अवसर पर सरकार कि ओर से मिले हुए चावल का अब पीछे से दाम वसूल होने लगा, तो भागृत के विरोधियों ने उसके खिलाफ तरह-तरह कि झूठी बातों का प्रचार किया और उसे बदनाम करने की भरपूर कोशिश की। भागृत संथालों में ईसाइयत प्रचार का घोर विरोधी था। वह संथालों का राष्ट्रीय अथवा युग-प्रवर्तक नेता था। इस कारण सरकार की आंखों का भी कांटा बन गया। उसपर लोगों को बहकाने का अभियोग लगाकर सरकार ने उसे गिरफ्तार कर लिया। गिरफ़्तारी का वास्तविक कारण तो था जबरदस्त जन-आंदोलन की आशंका, जिसकी भूमिका भागृत ही तैयार कर रहा था। किन्तु उसके पकड़े जाने पर भी उसके अनेक शिष्यों ने उसके चलाए हुए कार्य को उसी के आदेशानुसार जारी रखा। वे सब-के-सब “गुरु” कहे जाते थे। जो ईसाइयों के प्रभाव में आ चुके थे, वे सब उनपर विश्वास नहीं करते थे।
‘गुरु’ लोग प्रति रविवार को घूम-घूमकर सभा करते थे और उसमें अपने मत का प्रचार करते थे। वे पशुओं पर दया करने को कहते थे और “राम चांदी दोहाई” के नारे लगाते थे। प्रारंभ में उनकी संख्या अत्यधिक न्यून थी; पर पीछे ताकत बढ़ने पर उस आंदोलन के साथ-साथ कर-बंदी को भी कार्यक्रम में शामिल कर लिया गया। (सरकारी रिपोर्ट में इस आंदोलन को “उत्पात” कहा गया है!) गोड्डा के आसपास इस आंदोलन का सूत्रपात हुआ। धीरे-धीरे पूर्वी तथा दक्षिणी हिस्सों में इसका प्रचार होता गया। 1880 ई. में अधिकांश नेताओं कि गिरफ़्तारी के पश्चात अब यह आंदोलन कमजोर पड़ने लगा और कोई पथ-प्रदर्शक नहीं रहा, तो वैद्यनाथ-धाम के पास किसी गांव से दुबिया जसाई आगे आया और आंदोलन का नेतृत्व करने लगा। पादरी एवं अंगरेजों ने प्रचार करना शुरू किया कि जसाई तो हिन्दू है। जसाई ने चिड़ियों और सुवरों को मार कर खाने कि आज्ञा दे दी थी, इससे यद्यपि सरकार का षड्यन्त्र ने चल सका; पर अंत में आंदोलन ही दबा दिया गया।
प्रत्यक्षतः आंदोलन तो दब गया; किन्तु विद्रोह एवं समाज-सुधार की भावना भीतर-ही-भीतर संथालों के दिलों में पोषण पाती रही। 1891 ई. में पुनः इसका विस्फोट हुआ। खरवार लोग प्रचार करने लगे कि अंगरेजी राज्य का अंत काल अब समीप पहुंच गया है, उनके बदले में अब खरवार ही शासन करेंगे। उनके शासन में किसी को कर नहीं देना पड़ेगा। यहां की मिट्टी काली है, अतः काले लोगों का ही इसपर शासन रहना चाहिए। जिस देश की मिट्टी गोरी है, गोरे लोगों को वहां वापस चले जाना चाहिए। खरवारों में हिंदुओं के बहुत से आचार-विचार प्रवेश पा गए। बाबाजी तथा उनके सभी अनुयायी शाकाहारी थे; पर वे किसी को इसके लिए बाध्य नहीं करते थे। हाँ, प्रचार सदैव इसी का करते थे। बाबाजी स्त्रियों की छुई हुई वस्तु नहीं खाते थे। खरवार लोग आज भी बहुधा स्वयंपाकी ही होते हैं। 1907 ई. में भी कुछ बाबाजी लोग निकल आए, जो घूम-घूम कर प्रचार-कार्य करने लगे। वे किसी को स्त्री और किसी को बच्चा प्राप्त होने का आशीर्वाद देते थे। असल बात तो यह थी कि सरकार की कड़ी दृष्टि से बचकर समाज में कार्य करने का उन लोगों ने यह एक बहाना बना रखा था। इन कार्यों कि आड़ में इन लोगों ने अपना कार्य जारी रखा। कुछ लोगों का कथन है कि राजनीति से इस आंदोलन का कोई नाता न था; पर मूलत: तो यह राजनीतिक आंदोलन ही था। भागृत के अर्थ-संग्रह की बात को लेकर भी कुछ विरोधी उसे बदनाम करते हैं; लेकिन वह तो जननायक था। जन-आंदोलन में व्यय करने के लिए उसे भी औरों की तरह ही अर्थ की आवश्यकता थी। उसने पैसा जमा भी किया, पर अपने लिए नहीँ।
इस दल के गुरु लोग जटा रखते और महादेव कि पूजा करते हैं। प्रसिद्ध गुरु चरण मुर्मू, एम., एल्., ए. जो भारत के बाबा के खास शिष्य हैं, का कथन है कि इस आंदोलन का उद्भव इस प्रकार हुआ है: -जंगल में शिवजी का एक पुराना मंदिर था। बाबा भागृत वहीं पर रहते थे और शिवजी की उपासना किया करते थे। एक दिन उन्हें शिवजी का आदेश मिला कि तुम अपनी जाति को पतन के गहरे गर्त से निकाल कर उन्नत मार्ग पर ले चलो। इसी अनुसार भागृत बाबा ने कार्यक्रम किया। आंदोलन के प्रारंभ में आवश्यक जागृति फैलाने के लिए ही इसका श्री-गणेश हुआ था। प्रत्येक देश और जाति के स्वाधीनता-आंदोलन के इतिहास में धार्मिक एवं सामाजिक सुधारों का ही प्रारम्भिक अध्याय रहता है। वे लोग इसी भित्ति पर अपने समाज को ठीक करके अपनी प्रकृति-प्रदत्त स्वाधीनता को पुनः प्राप्त करना चाहते थे, जिसको वे लोग कुछ काल पूर्व ही खो चुके थे। पहले उन्हें पूरी स्वतंत्रता प्राप्त थी। अंगरेजों के आगमन एवं आधिपत्य के पश्चात उनसे कर मांगा जाने लगा। यही सब बातें उन्हें बुरी तरह खलती रहती थीं। उन लोगों ने स्वतंत्र होने का दावा किया। उनका कहना था कि हम लोगों ने एड़ी-चोटी का पसीना एक करके जंगली एवं पर्वतीय भूमि को कृषि-योग्य बनाया है, इसलिए इसपर हम लोगों का ही स्वामित्व रहना चाहिए, ताकि परिश्रम का फल हम चख सकें। इस प्रकार के क्रांतिकारी विचार के कारण सरकार की आंखों में बाबाजी कांटे कि तरह चुभने लगे। सरकार ने उन्हें दबाने के लिए सारी शक्ति लगा दी; किन्तु वह आंदोलन मरा नहीं और आज भी जारी है। अब तो उस दल की ताकत और भी बढ़ गई है। भारतीय स्वातंत्र्य संग्राम के जितने सैनिक इन जंगली एवं पर्वतीय इलाकों के हैं, उनमें अधिकांश इन्हीं लोगों से हैं।
मुद्दत से यह जाति अनेक प्रकार कि चोटें सह रही है। अधिकांश लोग इन्हें ससभ्य समझ कर इनके साथ व्यवहार में भी असभ्यता ले आते हैं। लेकिन खरवार-आंदोलन के फल-स्वरूप आज ये अपनी दासता एवं तज्जनित कष्टों को महसूस करने लगे हैं और सक्रिय होकर आगे बढ़ने के लिए प्रयत्नशील हैं। विभिन्न प्रकार के राष्ट्रीय गीतों की रचना कर ये लोग संथाल-समाज को जगाने की चेष्टा कर रहे हैं, ताकि जो लोग अबतक जग न सके हैं, उनकी चेतना भी जाग्रत हो। इन गीतों को ‘विन्ती सेरेन’ कहते हैं। नमूने के लिए एक ‘विन्ती सेरेन’ देखिए:- संथाल परगना डिसोम तवेन हो; वीर वुरुते जावा आकान। होड़ होपेन हो मेना बोन; हलंग पुलुरे गुलाम दशा। ओत बड़गे मा मेना तवोन; सहर गवर हो अड़ी तवोन। चास बास उपजोवा आनेन धनेच्; रेहिड़ विदिड़ बंदीके चोंगीद। होड़ महाजन दिको होपन; बाबा दिदल खोन रिनमा तवोन। ओना सोंग तेवोन चवाएदा; सनाम अरजाव होडो दिकते लगि। नव दिसोम मानेवाँ हो हुदिस तावन पे, आवोगे चोंग हो बुनियादी जात कुरु मुटोते मावन रकाव लगि; ओलो पढ़ा चित जो लगि।”
अर्थात संथाल-परगनादि देशों में खूब जंगल और झाड़ियां सजी हैं और जंगल-झाड़ी साफ कर खूब अन्न उपजाते हैं। तब भी संथाल-जाति गुलाम ही बनी है। अन्न उपजाते तो हैं, किन्तु किसके लिए? उन्हीं कर्ज देने वाले महाजनों के लिए। इसीलिए गुलाम हैं। ही संथाल-जाति के सपूत, तू अब भी संभल, विद्या-ज्ञान प्राप्त कर (अर्थात सब प्रकार से कुसंस्कार, भूत-प्रेत, डायन, मंत्र-तंत्र आदि मिथ्या विश्वासों और शराबादि दुर्व्यसनों से मुक्त हो) और सच्चिदानंद सर्वशक्तिमान परमात्मा की उपासना से सुखी बन, जिससे पुनः ऐसी दुर्दशा न होने पावे।
जिस प्रकार संथालों में चेतना जगी है, उसे बाहर का प्रोत्साहन अब तक नहीं मिला है। बाहर की सहायता एवं सहयोग उन्हें उचित मात्रा में मिलें, तो फिर वे लोग स्वातंत्र्य-युद्ध कि दहकती हुई भट्ठी में भी अपने को झोंकने में नहीं हिचकेंगे। उन लोगों के बीच कार्य करने के लिए श्री ठक्कर बप्पा की सहायता से “संथाल पहाड़िया सेवाश्रम-संघ” नामक एक संस्था बनी थी और श्री प्रफुल्लचंद्र पट्टनायक, सत्यकाली बाबू एवं कुछ सफ़ाहड़-दल के कार्यकर्ताओं ने मिलकर एक दर्जन से भी अधिक केंद्रों कि स्थापना की भी थी; किन्तु सन 1942 के आंदोलन का बहना लेकर सरकार ने इस संस्था को ही जब्त कर लिया। उसके कार्यकर्ता आज बिना मुकदमा के जेलों में सड़ रहे हैं। बिहार के सुप्रसिद्ध कांग्रेस-कर्मी विनोदा बाबू एक नई योजना लेकर पुनः इस कार्य को चालू करने जा रहे हैं। आशा करनी चाहिए कि कांग्रेस के इन तपे हुए कार्यकर्ताओं की सहायता एवं पथ-प्रदर्शन को पाकर संथाल पूर्व की अपेक्षा अधिक उत्साह से स्वातंत्र्य-मोर्चे की ओर बढ़ेंगे और अपनी पिछड़ी जाति का उत्थान करेंगे।
(यह लेख विशाल-भारत, अक्टूबर 1945 में प्रकाशित हुआ था। लेखक ने भागृत बाबा का जिक्र है। इन्हें भगीरथ मांझी पढ़ें। संताल आंदोलन से लेकर खरवार व सफाहोड़ के साथ भारत छोड़ो आंदोलन का पूरा लंबा कालखंड इसमें दिया है। इस लेख को कर्नल रथीराज उपाध्याय ने उपलब्ध कराया है। वे एक स्वतंत्रता सेनानी परिवार से हैं। )
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