◆कहानी
◆ अनिता रश्मि
विदेशी धरती पर पोडियम पर खड़ी सलोनी की आंखों में नमी, मन में गर्व है। अपने तिरंगे से लिपटी सलोनी उसके तीनों रंग को अंदर से महसूस कर रही है। विदेशी धरती पर उसे अपने देश, गांव की याद ज्यादा आ रही है।
हाथ में इस वर्ष के दो राष्ट्रीय के बाद तीसरा अंतर्राष्ट्रीय गोल्ड मेडल थामते ही उसके मन में देश के प्रति प्रेम भाव और बढ़ गया है। आज सलोनी के नाम का डंका बज गया। हर तरफ बज गया। देश में, विदेश में। वह शील्ड लेकर होटल लौटी। विदेश की धरा पर स्वदेश की याद उसके मन को भर रही है।
उसने माय को वीडियो कॉल किया। घर में टी.वी.नहीं है। उसे पता है, सभी गांववालों के साथ माय ने मुखिया के घर मैच देखा होगा।
माय ने रिंग होते ही उठा लिया। उसने आज साफ-सुथरी छापेदार साड़ी और सोहराईवाला ब्लाउज पहना है। जरूर मुखिया घर से लौटी है। बेटी की खुशी के मौके पर इतना तो बनता है।
मंइया, कैसी है रे?
खाना-ऊना खाई?"
माय को पता है, उत्तेजना में सलोनी खाना-पीना सब भूल जाती है। सलोनी बुदबुदाई, "माय! तू नहीं बदलेगी।" माय का मासूम, भोला चेहरा उद्भाषित। "खाई कि नय?" "हां माय! हम खा लिये हैं" का...का खाई गे?" माय को पता है, सलोनी को गांव का गोंदली का भात, मडुआ का रोटी और पानी में उबालकर बना मकई का नमकीन घट्ठा सबसे ज्यादा पसंद है। स्वाद के साथ पौष्टिक भी।
"यहां दूसरा खाना खाए इस बार।"
"का... का?"
“पिज्जा, बर्गर और आइसक्रीम।”
फिर उसने उत्साह में चाशनी घोली। माँ को पता होगा, जानते हुए भी बताया, "हम जीत गए माय।" "पता है...पता है। मुखिया चौपाले पर टी.वी. लगा दिया था।"
"चौपाले में? अरे...।"
"...केतना लोग सहर से आया था। वही सब लगवाया था। सब हमसे का-का तो पूछ रहा था। हम सब बताए मंइया।"
सलोनी ने अपना शील्ड उठाकर माय को दिखलाया। गले के चमचम चमकते मेडल को देखकर माय खुलकर हंसी।
"खुश हो माय?"
"खुस नय होंगे मंइया! हम बहुते खुस हैं। बाबा को भी बता दिए थे। ऊ देख नहीं सका था न।"
सलोनी को बिस्तर पर बीमार पड़े अपने बाबा को भी मेडल और शील्ड दिखलाने की इच्छा हुई।
"बाबा को दिखलाओ न माय। ऊ भी खुश हो जाएगा।"
"ऊ तो नींदे में झूमर नाच रहा है।"
हंसी माय, न जाने कितने दिन बाद खूब, खूब हंसी। उसकी साड़ी की सलवटों और ब्लाउज की ललाई में जाकर टंक गई दोनों की हंसी।
गोलपोस्ट में गोल कर विरोधी टीम को हराने से भी ज्यादा खुशी उसे माय की हंसी से मिली। जैसे विदेश में मिला माँ का आंचल। उसकी हंसी में वर्तमान के साथ भविष्य और भूत भी टंकित था।
सलोनी ने अपने शील्ड को अलग से पैक कर ऊंचे स्थान पर रख दिया।
कई सेल्फी लेने के बाद वह आराम से काउच पर जा बैठी।
उसकी आंखों में अपना अंतिम हिट और स्कोर घूम रहा था। '
पर जीत को दिमाग खराब करने की वजह नहीं बनाना है। आगे के लिए मशाल बनाना है।'
उसके सामने एक चेहरा।
"माही के जैसा। मि. कूल कूल रहकर ही इतिहास रचते रहे हैं। उनके राज्य का होकर हमको...।" कल हॉकी टीम को स्वदेश लौटना है। फिर सब पी.एम. से उनके आवास पर मिलने के बाद अपने-अपने गांव-घर की ओर। सलोनी को अपना गांव, खेत, गोहाल, खलिहान बेतरह याद आने लगा।
***
थोड़ी देर में टीम की अन्य चिड़ियों की चहचहाहट से कमरा भर गया। पूरे देश से वे हाकी खेलने और हर हाल में जीतने के लिए वे आई थीं। अब चहचहाहट से भरी। कोई फर्राटेदार अंग्रेजी बोलतीं, कोई हिन्दी भी ठीक से नहीं बोल पातीं।
स्थानीय बोलियों की छौक मिलाकर हिन्दी बोलने की कोशिश उनकी। दूसरों से खुलकर बात करने में कठिनाई आती। पर भिड़ने, जीतने का जज्बा एक समान।
दूसरे देश की टीमों पर भारी पड़ा वही जज्बा।
पंच सितारा होटल के कमरे में दो बेड पर जिद करके तीन और खिलाड़ी सोई थीं। सलोनी की आंखों में नींद नहीं। वह लेटते ही पुराने दिनों में खो गई। बचपन के दिनों में। बचपन के दिन उतने सुहाने दिन नहीं थे, न ही किशोरावस्था के।
फूस के कच्चे मकान में रहना, फटी कथरी पर सोना, गाय-बकरी चराना, घास काटकर माथे पर ढोकर पगडंडियों से हर शाम घर लौटना।
खाने के नाम पर माड़-भात या सूखल रोटी अचार के साथ। कभी फाका मस्ती। उसके समक्ष हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद नहीं थे। उसने नाम तक नहीं सुना था। हाँ, मेजर ध्यानचंद अवार्ड से सम्मानित सिमडेगा के ओलंपियन सिल्वानुस डुंगडुंग और सोमराय टेटे के सपने सामने। लेकिन अपना सपना डोंगी की तरह डगमग-डगमग।
सोनाली ने जब से जन्म लिया था, अपने झारखंड राज्य के इन्ही दोनों का नाम हॉकी के क्षेत्र में सुना था। बचपन से ही जैसे दोनों सलोनी के आदर्श। प्रायः हर झारखंडी हॉकी खिलाड़ी के।
बड़ी होती जाती क्षीणकाय सलोनी की इच्छा बलवती हो उठी थी।
वह भी हॉकी में नाम कमाना चाहती थी। पर हॉकी स्टिक और गेंद आए कहां से? घर में भुंजी भांग तक नहीं। बाबा और मजदूरिन माय की कमाई से घर का खर्ची ही मुश्किल से चले।
अंत में सलोनी ने उपाय निकाला।
कपड़े से गेंद बनाई, रस्सी से उसे बांधा।
वह और बाबा बंसवाड़ी जा पहुंचे। वहां से बांस को लाकर उसने बाबा के साथ बांस छिलकर एक स्टिक तैयार कर ली। उसी को लेकर मैदान जा पहुंची।
मैदान में सब बच्चे फुटबाल खेलते। उसे हॉकी की ही धुन। दुबली-पतली, ठिगनी काया, दो बेतरतीब चोटियाँ, फटी फ्रॉक पहने सलोनी घास पर ही अभ्यास करती रही।
अभ्यास करते हुए सलोनी ने सपने में भी नहीं सोचा था, वह यहां तक पहुंचेगी। वह तो अपने राज्य के उन दो चमकते नामों ने जो सपने बिखेरे थे, उसे सलोनी ने अपने अलकों-पलकों से चुपचाप चुन लिया था। खेत-घर में खटते हुए बस एक ही सपना, हॉकी खेलना है। थोड़ी भी फुरसत मिले, बस वह बांस के स्टिक और नकली गेंद लेकर निकल जाए। बड़ी होती जाती सलोनी पढ़ाई के बाद खेत-खलिहान और अक्सर खेल के मैदान में नजर आती। अभाव जिंदगी का हिस्सा। बस, हौसले बुलंद थे उसके और उस जैसी कई लड़के-लड़कियों के।
“पंखों से नहीं, हौसलों से उड़ान होती है।”
नहीं सुना था उसने। लेकिन उसका अंतर्मन हौसलों से भरा था।
एक बार मां संग राजधानी राँची गई।
जगह-जगह बड़े-बड़े होर्डिंग लगे थे। होर्डिंग से एक आंख बंदकर प्रसिद्ध तीरंदाज दीपिका नजर आ रही थी।
एकदम जीवंत तस्वीर। सीधे मैदान से। निशाना साधती हुई।
उसके मन में तीरंदाज दीपिका ने भी दस्तक दी थी।
दीपिका के पास भी नहीं थे धनुष-तीर।
उसकी भी शुरुआत आम, इमली पर निशाना लगाने से हुई थी।
उसके पिता थे टेम्पो ड्राइवर और मां गृहिणी।
उन्होंने बेटी की राह में रोड़े नहीं अटकाए, प्रकाश स्तंभ बन गए।
फिर मिला था दीपिका को जमशेदपुर के टाटा आर्चरी सेंटर का आंचल और वह लगन, मेहनत, निरंतर अभ्यास से ओलंपिक तक की दूरी पाट आई थी।
फर्श से अर्श तक पहुंचने के लिए उसने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था।
एकल हो कि विश्व कप महिला रिकर्व तीरंदाजी टीम में स्वर्ण पदक लेना...सब में वह अव्वल! स्वर्ण, रजत, कांस्य मेडलों से दीपिका का छोटा सा साधारण घर भर गया था।
“हमको भी अपने राज्य के खिलाड़ियों जैसा बनना है बाबा।”
गांव लौटते ही सलोनी ने कहा था।
“हां मंइया!”
बाबा और क्या बोले। ठीक से सबका पेट भी तो नहीं पाल पाता। हाँ, उसने कभी रोड़े नहीं अटकाए।
"हामर मइयां पैसा के कमी से बाहर खेलने नहीं जा पारेगी। उसके पास ठीक स्टिक भी नय है।"
यह दर्द बाबा के मन में हमेशा से था। वह जब-तब दुकान पर आनेवाले फागू से कह उठता। मन में हमेशा एक बोझ हावी रहता। बाद में हॉकी स्टिक और गेंद खरीद दी थी बाबा ने।
"तिवारी जी से उधार लिया न।"
बताया था।
सलोनी के मन में भी एड़ी-चोटी का जोर लगाने की इच्छा गहरा गई थी। मन का अंकुरित संकल्प परवान चढ़ा। उसने और मेहनत बढ़ा दी थी। पर राह में कुहरा, राह सुझाई नहीं दे। वह समय था, जब सब तरफ एक ही बात गूंजती थी,
खेलोगे कूदोगे होओगे खराब पढ़ोगे-लिखोगे होओगे नवाब
खासकर मिडिल, अपर क्लास में। लेकिन उसके समाज में मेहनत, कर्मठता के साथ खेल की भी छूट थी। कबड्डी, खो-खो, रस्सी कूद, पिटो, कित-कित खेलकर ही सब बच्चे बड़े होते। बावजूद सलोनी की राह में धुंध!
एक दिन किशोरी सलोनी बाबा के दिए स्टिक से बॉल को गोल पोस्ट में गोल करने के लिए दौड़ रही। अंततः उसने विरोधी गोलकीपर को चकमा देकर गोल कर दिया था। कई गोल दागने के बाद उसने एक अनजान सूटेड-बुटेड आदमी को गौर से खेल देखते देखा। इसे उसने सहज रूप से लिया। ज्यादा ध्यान नहीं दिया। पहले भी एक-दो बार मैदान में देखा है शायद।
****
"दीपक सर! यही है सलोनी का घर।"
दीपक सर और फागू टेटे आधे कि. मी. के बाद जहां पहुंचे, वहां जंगल के बीच झोपड़ीनुमा एक घर था। दो तरफ की दीवारों पर हाथी, बांस, हिरण, मोर वाले सोहराई पेंटिंग से सजा, उधर के कुछेक घरों की तरह।
वे दरवाजे पर असमंजस में खड़े। कोई नजर नहीं आया।
उन्होंने झांककर भीतर देखा। वहां भी कोई नहीं। एक तरफ चूल्हा, थोड़े से बर्तन। कुछ कप ताखे पर पड़े थे। दीवार की खूंटियों पर कुछेक मेडल लटके नजर आए।
अलगनी पर चंद कपड़े तरतीब से सजे। एक खाट, खाट के नीचे से टीन के बक्से, कुछेक कनस्तर, डिब्बे, पुराने घड़े ने झांककर उनकी आगवानी की।
बाहर पेड़ के तनों के पटरे पर पानी से भरी एक डेगची।
दोनों बाहर ही खड़े रहे। लौटने की सोच रहे थे कि एक किशोरी सर पर पानी से भरी दो डेगचियाँ थामे आई। उसने दो नवजवानों को देखा, मुस्कुराते हुए। दोनों की उम्र पैंतीस और चालीस के लगभग।
दोनों को नमस्ते कहकर उसने डेगचियां पटरे पर रखीं।
"दीपक सर! यह है सलोनी।"
सकुचाई सलोनी फिक् से हंस पड़ी। झट अधटूटी दो कुर्सिंयां बाहर लगा दीं।
"बैठिए सर!"
फागू बोला,
"सर! इसको मौका मिले तो कमाल कर सकती है।"
"हाँ! इसका कमाल मैंने दो बार देखा है।"
दीपक सर ने मुस्कुराकर सलोनी को देखा। वह घबरा गई।
"बस! एक जौहरी की जरूरत है फागू।"
सिंकिया पहलवान सलोनी की टांगें कांप रही थीं। उसकी छोटी आंखों में उलझन गहराया था। एक खिसयानी मुस्कान काले होंठों पर। वह रोमांच और आवेग से भर गई थी।
"शांत हो जाओ। खुद पर काबू रखो।" सलोनी सतर्क।
"गौर से मेरी बात सुनो। बैठो।"
सामने की छोटी सी चट्टान पर बैठ गई थी।
"तुम्हें हाकी सेंटर में ट्रेनिंग लेनी चाहिए।" वह उतावली हो गई थी।
तुरंत बोली थी, "हमको मंजूर है, एकदमे मंजूर है। पर कइसे?"
"अपने बाबा के साथ आओ। मैं रिकमेंड कर दूंगा।"
"बाबा से आप मिल कर जाइएगा सर।"
वह एक गर्म दुपहरी थी। चारों ओर सन्नाटा छाया था। पर सलोनी को लगा था, पेड़ की डालियाँ बिन हवा के हिलने लगी हैं, पत्तियों का रंग एकबारगी बहुत चमकीला हो गया है।
सेमल के लाल दहकते फूलों को देखती सलोनी की आंखों में उम्मीद का इंद्रधनुष चमक उठा।
बाबा के घर आने पर सारी बातें समझाई गईं। वे सकपका गए।
"ऐसा कइसे हो सकता है?"
"क्या नहीं हो सकता? प्रतिभा, लगन का सम्मान होना ही चाहिए। हम तो ऐसे प्लेयर को ढूँढते रहते हैं।"
बाबा आश्वस्त।
"हां, सर! मंइया को लेके आएंगे।"
बाबा और सलोनी दो दिन बाद ही तैयार होकर नियत जगह पर पहुँच गए। सलोनी को जौहरी मिल गया।
रसूखदार दीपक सर से मिलना भगवान का वरदान साबित हुआ। उनके बल पर 'आवासीय हॉकी प्रशिक्षण केंद्र' में दाखिला मिलना टर्निंग पॉइंट था।
फिर मिला कुम्हार का चाक और अनगढ़ माटी गढ़ी जाने लगी। पूत के पाँव पालने में ही पहचान लिये गए और उड़ान की राह खुल गई।
मेहनत, लगन, प्रतिभा, एकाग्रता और दृढ़ इच्छाशक्ति से उसने पहले कोच का दिल जीता। फिर अन्य अधिकारियों का। उन सबको सलोनी ने निराश किया भी नहीं। ग्राम्य स्तर पर जीत हासिल हुई। मन बढ़ चला।
उसकी लगन, प्रतिभा के कायल प्रशिक्षक मि. एन. टुडू ने सलोनी पर विशेष ध्यान देना शुरू कर दिया।
उधर "खेलोगे-कूदोगे होओगे खराब" का विचार धाराशायी हो रहा था। देश भर में खेलों को महत्व मिलने लगा था। "खेलोगे-कूदोगे होओगे नवाब" अनेक घरों में प्रवेश कर चुका था।
घरों के प्रतिबंध खत्म हो रहे थे, इधर बेटियां मेडल-शील्ड से देश का नाम रौशन कर रही थीं। सलोनी की झोलियां भी भरने लगीं। जिला स्तरीय, राज्य स्तरीय, राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में उसके नाम का डंका बजने लगा था। उसने कई खिताब अपने नाम किये। तब बाबा ने उसकी कीमती हॉकी स्टिक जुटाने के लिए अपनी छोटी सी दुकान भी बेच दी।
मदद के कई हाथ खुद बढ़ आए।
सरकार भी सचेत हुई।
सलोनी ने सचमुच वह कर दिखाया, जो लड़के नहीं कर सकें। कुछ ही दिनों में वह खेल जगत की नामी हस्ती बन गई। उसके छुहारे से सूखे चेहरे पर सुख की परतें जमने लगीं। देह भर आई, सुगठित।
समय मिलता है तो वह अब भी सोहराई पेंटिंग बनाती है। हॉकी की कड़ी प्रैक्टिस के बाद वह जब कभी घर जाती, बाकी दीवारों पर चित्र उकेरती, मोर, ढेकी चलाती स्त्रयों के, मांदर बजाते कलाकार के। उसका दूसरा शौक। अपने राज्य के इस पुरानी, पारंपरिक कला को भी वह इतने ही लगन से करती है।
पहले आजीविका के लिए कभी-कभार दूसरे की दीवारों पर भी चित्रित करती थी। सलोनी ने करवट बदली। याद आया, किस्मत के करवट बदलने से पहले तंज के रोड़े भी कम नहीं मिलें।
खेलने की लालसा में उसके रास्ते में हिकारत, विरोध भी अनगिन। अपनी भतीजी के लिए टकटकी लगाए शख्स ने कहा था,
"ई का चलेगी। कुछ दिन में देखना नाम डुबा देगी हॉकी सेंटर का।"
कई रोड़ें, दाखिले में चुनाव के समय से ही। लगभग गालियों की भाषा में विरोध होता था। शुरुआत में इसी कारण उसके चेहरे पर कभी आत्मविश्वास नहीं आया। जगह-जगह खेलते, जीतते हुए भी मन में आशंका-कुशंका की लपलपाहट। मन का चैन, रातों की नींद छिन जाती। बेचैनी, छटपटाहट और भय का कद बढ़ जाता। फिर फिर दृढ़ संकल्प गहराता, फिर फिर हिलता वजूद।
जंगल में बसे धुर पिछड़े गांव की कमसिन छोरी ने कइयों को पछाड़कर कैप्टनशिप पाई तो तंज, ईर्ष्या, हिकारतें, बाधाएं बढ़ गई थीं।
"पौवा, पइसा के जमाना में ई कइसे इत्ता आगे बढ़ गई?"
धुरंधरों को आश्चर्य। कुछ को चिढ़ भी। सामान्य से कुछ ऊंचा कद हो गया उसका। उसके बाद तो वह बेहद व्यस्त होती गई। उसने दीपक सर से कहा था, "आपने राह दिखाया सर! नहीं दिखलाते तो हमारा दम घुट जाता। हम स्टिक और गेंद के बिना नहीं रह...।"
उन्होंने उसके सर पर हाथ रखा था। "तू जिंदगी की जीत पर यकीन कर।" आजकल वह भी बोलने लगी है उनकी भाषा।
"अभावों में कहां जान होती है मन के हौसलों से उड़ान होती है।"
यही तो उससे कहते थे कोच टुडू सर। उसने गाँठ बाँध ली थी दोनों की बातें।
सलोनी की आंखों में आंसू आ गए थे, जब रेलवे की नौकरी ऑफर की गई थी।
कल्पना से परे था, कच्चा घर नहीं, एक दिन पक्का घर होगा। तब घर की स्थिति में परिवर्तन आया। लाइफ स्टाइल बदल गया। सलोनी की आंखें छत पर जा टिकीं। मन में खुशी, संतुष्टि और यादों की बारिश झमाझम!
डुंगडुंग और सोमराय टेटे अभी फिर से उसके सपनों में टहलते नजर आ गए। उसका हाथ जुड़ गया।
आज मैदान पर अपने, टीम और देश के नाम की गूंज अब तक कानों में रस घोल रही है।
उसने माय-बाबा को मन ही मन हाथ जोड़कर "जोहार!" कहा।
"हॉकी तो अपने देश का ही खेल है। क्रिकेट की तरह इसमें भी देश को अपना झंडा ऊंचा रखना है।" वह सोचती, 'दीपक सर ठीक कहते हैं। हमारे राज्य में केतना अच्छा लोग खेलती है।'
वे अक्सर कहते थे, "आदिवासी खिलाड़ी सिंकिया पहलवान भी हों तो अंदर से मजबूत होते हैं कारण - मोटा अनाज, जंगल-पहाड़ की शुद्ध हवा में खूब पैदल चलना, खूब मेहनत करना।" फिर हंसते।
"मेरी पहली पसंद तो भई ये ही हैं।"
****
जब सलोनी के मन का चलचित्र रुका, पौ फट रहा था। उसे देश का सूर्योदय, सूर्यास्त और चांद याद आया। उसने एक निगाह साथी खलाडियों पर भी डाली। वे बेसुध, खर्राटे में डूबीं, सुख-स्वप्न में लिपटी।
आखिर उनकी टीम ने विदेश की प्रसिद्ध प्रतिद्वंदी टीम को फाइनल में 6-0, 6-0, 4-2 से मात देकर स्वर्ण पदक हासिल किया था।
गोलकीपर को छकाकर गोल करती सलोनी के खेल देखने के लिए लाखों लोग उतावले थे। स्टिक के साथ चालाकी से तेज दौड़कर हिट करती सलोनी के अनगिन फैन।
उसने सबको जगाया।
"उठ जाग मुसाफिर भोर भई
अब रैन कहां जो सोवत है।"
जलपान में एप्पल जूस और टोस्ट, अंडे खाते हुए भी सलोनी की विगत में चहलकदमी।
"सबका बात सुन के एक समय तो हम खेल से दूर हो गए थे।"
उसने उत्तराखंड से आई उप कप्तान अनामिका से एकाएक कहा तो उसकी भी स्वीकारोक्ति,
"हां! हमें अपने को प्रूफ करते रहना है सलोनी। हम छोटे घर से आए प्लेयर को तो जरूर।"
असम के साधारण गाँव से आई नीता भी शामिल हो गई,
"पिछड़े इलाके का लेबल हमसे छूटता नहीं।"
"दीपक सर, कोच टुडू सर और मेरे बाबा-माय का विश्वास कभी नहीं डोला। वे सब नहीं होते तो...।"
वह मुस्कुराई। दूसरे टेबल पर बैठी टीम की अन्य खिलाड़ियों की ओर देखते हुए बोली, "दीपक सर कहते हैं, पिछड़े इलाकों से ही असली प्रतिभाएँ आ रही हैं।"
सराहना, विश्वास, प्रशंसा की खाद ने उसे कितना बूस्ट अप किया था, उसकी स्मृति में है।
"चयन समिति से लड़ गए थे दीपक सर और टुडू सर मेरे लिए।"
"ऐसी प्रतिभाओं में लगन, मेहनत, खेल भावना कूट-कूट कर भरी होती है। इग्नोर नहीं कर सकते।" दीपक सर ने चयन के समय कहा था।
टुडू सर भी बोले थे, "मत भूलिए, इससे पहले भी जिन्होंने इतिहास रचा है, वे प्लेयर सबसे पिछड़े गाँव से ही आए थे।"
"भारत ने हॉकी में अब तक ओलंपिक में जो आठ स्वर्ण, एक और दो कांस्य पदक जीते हैं, उसमें ऐसे प्लेयर्स का भी योगदान है।"
"माही (धोनी) को ही देख लीजिए।" "इनके हौसले देखिए, इनकी उड़ान देखिए, बस!"
अलग-अलग समय पर उनके साक्षात्कारों में कही बातें उसे स्मरण है। उन दोनों के कारण ही सलोनी के काले चेहरे पर आज आत्मविश्वास की सच्ची चमक थी। "हिम्मत से अपना हंड्रेड पर्सेंट देते रहिए। किसी और बात पर कान मत दीजिए।" दीपक सर ने कहा था। उसने फिर दुहराया,
"अभावों में कहां जान होती है मन के हौसलों से उड़ान होती है।"
उस टेबल के समवेत ठहाके ने होटल के डाइनिंग हॉल को कुनकुनी मीठी धूप से नहला दिया।
"जिन्दा है तो जिंदगी की जीत पर यकीन कर।"
कहकर सलोनी उठ गई। "अब चलो। रिपोर्टिंग टेम से पहले एयर पोर्ट पहुँचना है। तैयार भी होना है न।" ट्राउजर और टी शर्ट पहने सलोनी टीम की सदस्यों के साथ हॉल से बाहर आ गई।
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प्लेन से अपनी राजधानी रांची के बिरसा मुण्डा एयरपोर्ट पर उतरते वक्त उसने एअर हॉस्टेस के चेहरे पर सच्चा आदरभाव देखा। नकली प्रोफेशनल नहीं, असली प्यारी मुस्कराहट महसूस की। सलोनी के आगे बढ़ जाने के बाद भी एयर हॉस्टेस उसे देखती रही।
देश की धरती पर कदम रखते ही पूरी टीम और प्रसन्न।
लगेज बेल्ट से अपना-अपना सामान लिया और सब बाहर गेट की ओर बढ़ गईं।
गेट के पास से ही सलोनी की नजर अगली पंक्ति में खड़े प्रवीण कुमार और राम विकास पर पड़ी। वे स्वागत में गर्मजोशी से दाहिना हाथ हिलाते नजर आए। उनके बाएं हाथ में गुलाबों की ललाई से सजे बड़े-बड़े कलात्मक बुके थे।
वह दंग रह गई। कभी ये लोग उस पर खुलकर हंसते थे। रोड़ों की बारिश सी की थी, सबसे बड़े विरोधी। रोड़े अटकानेवाले, बाधा डालनेवाले, टांग पीछे खींचनेवाले। 'ये दोनों आँख मिला पाएँगे? खुलकर मिल पाएंगे?'
उसके मन में उठा।
"सफलता के भी रिश्ते होते हैं, जैसे कुर्सी के।" दीपक सर की बात में जीवनदायी बादल की उमड़-घुमड़।
"सच्ची खुशी विरोधियों की प्रशंसा से मिलती है। एक दिन यही लोग नाम लेंगे।" सलोनी ठिठके बिन, आत्मविश्वासी मुस्कान होठों पर थामे बुके लेने आगे बढ़ आई।
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अनिता रश्मि हिंदी की सुप्रसिद्ध लेखिका हैं। कई कहानी संग्रह व उपन्यास प्रकाशित। रांची में रहती हैं। झारखंड की आबोहवा उनकी कहानियों में शिद्दत से महसूस की जा सकती है। इस कहानी में भी इसका अनुभव आपको होगा।

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