अरुणिमा अरुण कमल, दिल्ली
डॉ शिवशंकर मिश्र ने पिछले पांच दशकों में अपने साहित्य लेखन से हिंदी, मैथिली, भोजपुरी और अंग्रेजी साहित्य को अपनी अनेक उल्लेखनीय कृतियों से समृद्ध किया। उन्होंने कविता, गीत, गजल, रुबाई, नाटक, कहानियां और आलोचना हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनके द्वारा रचित ‘हिन्दी गजल की भूमिका’ नामक आलोचना ग्रन्थ आज भी वर्तमान हिन्दी गजल परिदृश्य को समझने के लिए एक मानक ग्रन्थ माना जा रहा है। डॉ शिवशंकर मिश्र का जन्म 18 दिसंबर 1944 को सोरपनिया, पूर्वी चंपारण, बिहार में हुआ। अत्यंत प्रतिभाशाली छात्र होने के बावजूद, साहित्य में अपनी रुचि के कारण, विज्ञान और इंजीनिरिंग की पढ़ाई को छोड़ कर साहित्य की पढ़ाई करते हुए अंग्रेजी विषय में एमए तथा पीएचडी की और रांची के योगदा कॉलेज के अंग्रेजी विभाग में अध्यापन कार्य करते हुए वहीं से विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत हुए। रांची ही उनको प्रिय रहा और वे आजीवन राँची में ही अपने रुचि कर्म में निरत रहे।
उनकी रचना यात्रा बहुत लंबी रही। अब तक विभिन्न विधाओं की उनकी लगभग 40 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनका पहला गजल संग्रह ‘शब्द चलते हैं’ 2004 में और दूसरा गजल संग्रह ‘ऐसे उदास मत हो’ वर्ष 2011 में प्रकाशित हुआ। उनकी 6 काव्य कृतियां में ‘बीच का पहाड़’, ‘सीढ़ियों का भंवर’, ‘एक नया दिनमान’, ‘आदमी हंसेगा जब’, ‘बोलो कोयल बोलो’ और ‘गूंजता है आत्मा का ग्राम’ प्रमुख हैं। उन्होंने 5 नाटक लिखे, जिनमें कुछ मंचित भी हुए; जिनमें- ‘लड़कियां’, ‘नहीं’, ‘एक बटा दो’ और ‘कालामोतिया’ प्रमुख नाटक हैं, एक कहानी संग्रह- ‘इसकी मां’ तथा आलोचना की चार कृतियां- ‘जनवादी कविता का संदर्भ’, ‘हिंदी गजल की भूमिका’, ‘आलोच्य का समास’ और ‘पाठ और विमर्श’ प्रकाशित हुए हैं, साथ ही प्रसिद्ध कथाकार द्विजेन्द्रनाथ मिश्र ‘निर्गुण’ पर एक संस्मरण ‘नीलकंठ निर्गुण’ एवं बाबा नागार्जुन की मैथिली कविताओं की पुस्तक का हिंदी अनुवाद ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ भी उनके प्रमुख प्रकाशनों में स्थान रखता है। इसके अतिरिक्त भोजपुरी, मैथिली और अंग्रेजी की भी 5 पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। उन्होंने अनेक पुस्तकों तथा पत्रिकाओं का संपादन किया। उनके निधन उपरांत भी उनके द्वारा संपादित दो पुस्तकें प्रकाशित हुईं- ‘साहित्य के कुछ सार्थक अनुभव’ एवं ‘चुनी हुई सार्थक गजलें’। पूर्व में उनके संपादन में रांची से ‘सार्थक’, ‘अवलोकन’ तथा ‘निर्णय’ नामक लघु पत्रिकाओं के भी कुछ महत्वपूर्ण अंक निकले। उन्हें ‘राधाकृष्ण पुरस्कार’ तथा ‘झारखंड राजभाषा साहित्य सम्मान’ एवं अन्य प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत व सम्मानित किया गया।
ऊपर दी गई सभी जानकारियों से बहुत स्पष्ट है कि डॉ. शिवशंकर मिश्र बहुमुखी प्रतिभा के धनी, विभिन्न विधाओं को समृद्ध करने वाले रचनाकार थे। जितने प्यार, लगाव व अपनत्व के साथ उन्होंने मुक्तक रचे, उतने ही प्यार से गीत एवं गजलें भी। डॉक्टर शिवशंकर मिश्र का मानना था कि वह कवि ही क्या जो सिर्फ मुक्तक ही रचता हो। फिर भी मुक्त छंद उनके लेखन की मुख्य धारा रही और मुक्त छंद की उनकी कई कविता पुस्तकें प्रकाशित हुईं हैं, जो अपनी शैली और कथ्य हेतु काफी प्रशंसित भी हुई हैं। निराला उनके सर्वाधिक प्रिय कवियों में थे, जिनकी तस्वीर, उनके सभी प्रिय रचनाकारों की तरह सदा उनके कमरे में सुसज्जित रही।
उनकी रचनाओं में जितना वे स्वयं नजर आते हैं, उतना ही समाज भी। हर कविता में समाज का एक नया पक्ष, नए शब्दों के साथ बिल्कुल नई अभिव्यक्ति में।
डॉ. मिश्र का रांची स्थित वह आवास, जिसमें चार सोफे लगने और एक दीवान के बाद चलने की जगह भी मुश्किल से ही बनती थी.. वहां की चहल-पहल आज भी आंखों में कैद है। देश भर से जितने भी साहित्यकार रांची पधारें.. वो उनके आवास तक न पहुँचें, ऐसा संभव नहीं.. और इन साहित्यिक मित्रों के स्वागत में माँ ने कभी कोई कमी रखी हो, ऐसा भी याद नहीं आता.. वह भी गाती-गुनगुनाती जाने क्या-क्या बनाती-परोसती रहतीं.. नाश्ते के कितने ही दौर चलते रहते, लेकिन चर्चा खत्म नहीं होती। हालांकि डॉ. शिवशंकर मिश्र सम्मेलनों और कवि गोष्ठियों में जाने से अक्सर कतराते। जबतक बहुत ही आग्रह के साथ किसी की जिद पर घर के आगे गाड़ी न खड़ी हो जाए.. वो अक्सर मना ही किया करते थे। दिन-रात अपनी रचनाओं में सक्रियता से लगे रहते। मोती से उनके अक्षर उन धारीदार कापियों में आज भी सुरक्षित हैं। शायद ही कोई पांडुलिपि उन्होंने टाइप कराई हो।
डॉ मिश्र कहते हैं, “मेरे अनुभवों में, कविता कवि की वैयक्तिक अभिव्यक्ति होती हुई भी किसी अंतःसक्रिय अज्ञात प्रक्रिया में कवि से मुक्त भी हुई जाती है और क्रमशः, कि अंततः, स्वयं कवि अपनी कविता का वशवर्ती होता जाता है, हो जाता है, मुक्त भी होता है उसी में। प्रायः उसे पता नहीं चलता और उस की कविता उसे से भिन्न ही नहीं, कई बार उस से एकदम अलग खड़ी हो जाती है, कि वह जितना ही स्वयं से छूटता जाता है, कविता भी उसकी उतनी ही स्वतंत्र होती जाती है- भावानुभव, विचार, अनुद्रवण, भाषा और छंद के प्रयोग, शिल्प और शैली के विकास और निर्माण, आदि सभी स्तरों पर।”
समाज की विभिन्न विद्रूपताओं में एक जो उनके कवि मन को व्यथित करता था, वह था समाज में स्त्रियों के प्रति होने वाला व्यवहार। यह विषय उनकी कविताओं में काफी देखने को मिला। सिर्फ कविताएं ही नहीं, कहानी और उनके द्वारा लिखे नाटकों में भी यह भाव काफी उभर कर आया।
कहानियां उन्होंने बहुत कम लिखीं, लेकिन बहुत वर्ष पहले उनकी एक कहानी ‘कादंबिनी’ में छपी थी, जो एक बड़ी कहानी का हिस्सा थी.. ‘वह कुछ न कर सकी’, जिसे बहुत ही सराहना मिली और जिस कहानी को कुछ अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित भी किया गया। उनके द्वारा रचित नाटक ‘लड़कियां’ में भी स्त्रियों के सम्मान, उनकी अपनी पहचान, उनकी आर्थिक स्वतंत्रता पर काफी जोर दिया गया था। इस नाटक के कई मंचन भी हुए थे। समाज में फैली अनैतिकता की गहरी खाई में लटकी-झूलती स्त्रियों की बेबसी को उन्होंने अपनी कई कविताओं-कहानियों में बहुत भावुकता पूर्ण ढंग से उठाया। हर घर, हर राह, हर चौक पर होनेवाली दुर्घटनाएं उन्हें तीली-तीली जलाती थीं और फिर जो कविताओं के रूप में उनकी अभिव्यक्ति बाहर आती थी, वह समाज की आंखें खोलने का ताकत रखती थी, समाज को संवारने-सुधारने की क्षमता रखती थी। कई-कई कविताओं में, कहानियों में उन्होंने समाज के जिन परिदृश्यों को उभारा, वह बिहार और झारखंड जैसी जगह में स्त्रियों की स्थिति का प्रत्यक्ष दर्पण था। प्रस्तुत है ...
डॉ. शिवशंकर मिश्र की स्त्री विमर्श की कविताएं
1. असहमत
कोई हो-हल्ला नहीं होता
बाजू की फ़्लैट वाली औरत आती है
चाय पीकर चली जाती है
घर की दीवारें भी एक कान से सुनती हैं
दूसरे से निकाल देती हैं
किसी को कुछ पता नहीं चलता
आंख चुराती एक गुमसुम सिर्फ सब ओर
रोने वाली भी वह अकेली होती है।
आधी रात बिस्तर में
छाती पेट और घुटनों में गोल हुई
पत्थर हो गयी है वह
बंद पपोटों में जमा पानी
अचानक लुढ़क जाता है नाक की बग़ल से
जमी रहती है उसी तरह सांस
बाजू में उलटा उस का पति
निश्चिंत खर्राटे भरता है!
दो बेटियों के बाद यह तीसरा गर्भ
खुश हुआ था वह भी जैसे वह खुश हुई थी
डर गया था वह भी जैसे वह डर गयी थी
पता नहीं इस बार क्या है
फिर रुक गए थे दोनों
एक-दूसरे से सहमत हुए
दोनों ने एक साथ ईश्वर पर भरोसा जताया था।
लेकिन, जब गयी थी क्लिनिक आज मुंह अँधेरे
सहमत वह नहीं थी
न स्वयं से, न अस्वीकृता के पिता से
और जब लौटी थी क्लिनिक से सुबह सवेरे
अपने को कोसने के सिवा
उस के पास कुछ भी नहीं बचा था
ईश्वर भी कई दिनों से लापता था।
2. कन्यादान
एक:
अविवाहित परित्यक्ताओं के आश्रम में
डेढ़ लाख के रख-रखाव शुल्क के साथ
सौंप दी गयी-
माता-पिता ने
शिष्टतापूर्वक अपनी हार मान ली।
दोः
पितृहीना, चालीस के आसपास भी
उम्मीद में बैठी है कि उस के भाई
इस-उस साल में
उस का विवाह ज़रूर कर देंगे।
तीन :
भाई-बाप रहते भी उस की आँख अब
सामने वाले को ठीक से देखती है
पलटती-लारती भी है
बैठ जाती है उस की आंखों में-
कुछ करना होगा समय रहते स्वयं
शायद अब उसे ऐसा ही लगता है।
3. स्त्रियों ने ईश्वर से मनाया
उस ने सोचा-
ऐसी गुलामी की जिंदगी से अच्छा है
वह मर जाए
जान ही दे दे
उस के फेफड़ों में धंसी हुई उस की साँस उछलकर बाहर आ गयी
उस की आंखें चमकीं
आंखों में रोशनी नहीं थी
लेकिन अंधेरा कम हो गया था
रात जब आधी हुई
सारे दरवाज़ों से बचती-बचाती
वह दौड़ गयी
नदी की ओर
रास्ते में छोटा-सा एक जंगल था
एक भेड़िया
अचानक जब झपटा उस की ओर
वह पलटी, वह भागी
और भी तेज़, और भी तेज़
और पहुंच गयी वापस वहीं
जहाँ से चली थी
बैठ गयी धम् से हांफती-हलफती
जब चैतन्य हुई, विकृत-सी एक हंसी
फैल गयी उस के होठों पर-
क्या फर्क पड़ता था?
मर लेगी इसी तरह।
और फिर
कभी नहीं गयी वह नदी की ओर
एक लंबी उम्र जीकर जब मरी वह
पोते-पोतियों को आशीष देकर गयी
सब ने उस की नेकदिली के किस्से दुहराए
स्त्रियों ने ईश्वर से मनाया-
ऐसी ही सुहागिनें मरें वे भी
हंसी खुशी चैन से।
4. औरत इस देश की
यह किस की बेटी है?
यह किस की बहन है?
औरत जो यह है
औरत यह ऐसी क्यों है?
जिंदगी इस की यह कैसी है?
क्या है इस की इज़्ज़त
जो कहीं भी कभी
लुट जाती है, लूट ली जाती है
किन्हीं शोहदों
बड़ज़ादों और गुंडों के हाथों?
जो मां है वह तुम्हारी
खुश है न तुम से?
तुम्हारी दो नर्म रोटियों के
अलावा
उसे क्या चाहिए?
कब निकलेगी अपनी
पानी हुई हड्डियों से बाहर
यह औरत इस देश की
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