रूपा गुप्ता , प्रोफेसर , वर्धमान विश्वविद्यालय , पश्चिम बंगाल
रामनारायण शुक्ल की कहानियों को पढ़ते हुए बार-बार यह अनुभव होता है कि हम केवल किसी कथाकार की रचनाओं से नहीं, एक पूरे जीवन-संसार से गुजर रहे हैं। उनके यहाँ कलकत्ता कोई पृष्ठभूमि भर नहीं है। शहर अपने बाजार, दफ्तर, गलियों, ठंड, भीड़, अभाव, रिश्तों और बदलती हुई मूल्य-व्यवस्था के साथ कथा का सक्रिय पात्र बन जाता है। शायद इसी कारण उनकी कहानियों को पढ़ना एक ऐसे कलकत्ता से पुनर्परिचय भी है जो चमकते महानगर के पीछे छिपा रह जाता है।
रामनारायण शुक्ल की कथा-दृष्टि की सबसे बड़ी शक्ति उनकी साधारण मनुष्य में असाधारण रुचि है। उनके पात्र प्रायः कोई बड़े नायक नहीं हैं। वे नौकरी करने वाले लोग हैं, छोटे व्यापारी हैं, बेरोजगार हैं, परिवार की जिम्मेदारियों के बीच दबे हुए लोग हैं, बच्चे हैं, बूढ़े हैं। वे ऐसे मनुष्य हैं जिनके जीवन में कोई ऐतिहासिक घोषणा नहीं होती, लेकिन जिनके रोजमर्रा के संघर्ष में अपने समय का इतिहास दर्ज होता रहता है।
उनकी कहानियों का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष परिवार है। परिवार उनके यहाँ केवल भावनात्मक सुरक्षा का स्थान नहीं है। उसमें स्नेह है, दायित्व है, दबाव है, अभाव है और कभी-कभी ऐसी घुटन भी है जिससे निकल पाना व्यक्ति के लिए संभव नहीं होता। भाई-बहनों, पिता-पुत्र, पति-पत्नी और बच्चों के छोटे-छोटे प्रसंगों के माध्यम से वे भारतीय मध्यवर्गीय और निम्न-मध्यवर्गीय जीवन की उस संरचना को पकड़ते हैं जहाँ व्यक्ति का अपना जीवन लगातार दूसरों की जिम्मेदारियों से जुड़ा रहता है।
यह अनुभव उनके निजी जीवन-संघर्ष से भी बहुत गहरे जुड़ा था। परिवार का पैतृक व्यवसाय चौपट हो जाना, पिता द्वारा घर और दुकान तक बेच देना, किशोरावस्था के दिनों में लगातार बढ़ते खर्च और बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा—ये अनुभव उनके लिए बाहर से देखी हुई सामाजिक स्थितियाँ नहीं थे। परिवार में बड़े भाई के रूप में जिम्मेदारी उठाने का अनुभव भी उनके साथ था। इसीलिए उनकी कहानियों में आर्थिक संकट किसी वैचारिक नारे की तरह नहीं आता; वह मनुष्य के चेहरे, उसकी थकान, उसकी असुरक्षा और उसके छोटे-छोटे निर्णयों में उपस्थित रहता है।
यही बात उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘किसी शनिवार को’ को विशेष महत्त्व देती है। कहानी का नायक एक ऐसे विशाल शहर में रहता है जहाँ लाखों लोग हैं, फिर भी वह स्वयं को अभिभावकविहीन अनुभव करता है। वह कहता है कि इतने बड़े शहर में उसका कोई अभिभावक नहीं था, जबकि वह स्वयं कुछ लोगों का “असफल अभिभावक” था। ईश्वर में विश्वास का अभाव, अभिभावकहीनता और स्वयं असफल अभिभावक होने का यह त्रिकोण आधुनिक शहरी मनुष्य की गहरी असुरक्षा को सामने लाता है।
कहानी में आर्थिक संकट बहुत साधारण प्रसंग के माध्यम से आता है। शनिवार को बैंक बंद होने से पहले उसे सौ रुपये का चेक भुनाना है। चेक डिसऑनर हो जाता है। अगला दिन रविवार है और सोमवार से पहले कुछ हो नहीं सकता। जनवरी की ठंड में वह लगभग खाली जेब लेकर शहर में निकलता है। बाद में उसे एक अजनबी मिलता है—लगभग वैसा चेहरा जो कहानीकार को भविष्य में बूढ़ा होकर स्वयं अपना चेहरा लग सकता है। वह व्यक्ति उसे नोटों से भरा बैग दिखाता है और कहता है कि इसमें से वह अपनी जरूरत भर पैसे ले सकता है। नायक मना कर देता है। फिर अगले दिन उसकी जेब में सौ रुपये का नोट मिलता है और चेक गायब है। कहानीकार इस रहस्य का समाधान नहीं देता। वह पाठक को यह तय करने के लिए बाध्य भी नहीं करता कि वह घटना सच थी, स्वप्न थी या मानसिक भ्रम।
यहीं रामनारायण शुक्ल की कथा-कला की एक विशेषता सामने आती है। वे जीवन को तर्क से पूरी तरह हल कर देने की कोशिश नहीं करते। जीवन में कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें मनुष्य समझने की अपेक्षा अपने भीतर लेकर चलता है। ‘किसी शनिवार को’ इसी अनिश्चितता के बीच आधुनिक मनुष्य के भय, आत्मसम्मान और आर्थिक असुरक्षा की कहानी बन जाती है।
उनकी कहानियों में पैसा बार-बार आता है। पर पैसा केवल आर्थिक वस्तु नहीं है; वह आधुनिक जीवन में बदलते संबंधों और मूल्यों की कसौटी बन जाता है। एक ओर परिवार की जरूरतें हैं, दूसरी ओर व्यक्ति का आत्मसम्मान। कहीं पैसे की कमी नौकरी चुनने को मजबूर करती है, कहीं गरीबी रिश्तों की दिशा बदलती है, कहीं बाजार मनुष्य को लगभग निर्जीव वस्तु में बदल देता है।
इसका मार्मिक उदाहरण उन प्रसंगों में दिखाई देता है जहाँ मनुष्य अपनी परिस्थितियों के कारण ऐसे काम करने को विवश होता है जिनसे स्वयं उसे घृणा है। एक पात्र को ऐसी नौकरी करनी पड़ती है जहाँ उसे गंदे कपड़े साफ करने हैं। नौकरी की जरूरत उसे वहाँ बाँधती है, लेकिन उस गंध और गंदगी को वह अपने भीतर स्वीकार नहीं कर पाता। रामनारायण शुक्ल यहाँ एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण सामाजिक तथ्य पकड़ते हैं—गरीबी केवल वस्तुओं की कमी नहीं है; वह मनुष्य को ऐसे अनुभवों से गुजरने को मजबूर करती है जो उसकी गरिमा को भी घायल करते हैं।
उनके कलकत्ता में दूसरी ओर उपभोक्तावादी संसार भी आकार ले रहा है। न्यू मार्केट, अंग्रेजी किताबें, सिगरेट, नए सामान, प्रतिस्पर्धा—एक ऐसा शहरी मध्यवर्ग दिखाई देता है जिसमें पैसा और ताकत धीरे-धीरे नए मूल्य बन रहे हैं। पुरानी सामाजिक संरचना टूट रही है, लेकिन उसकी जगह जो संसार बन रहा है वह आवश्यक रूप से अधिक मानवीय नहीं है। बाजार का विस्तार मनुष्य के विकल्प बढ़ाता है, पर उसके अकेलेपन और असुरक्षा को भी बढ़ा सकता है।
इसी संदर्भ में उनकी कहानी ‘ट्रंक कॉल’ विशेष अर्थ ग्रहण करती है। ठंड का चित्रण हो या एक ही स्वेटर में दिन काटता व्यक्ति—शुक्ल मामूली वस्तुओं के माध्यम से आर्थिक विषमता की गहराई को सामने लाते हैं। बड़े व्यापारियों और समाज के साधारण लोगों के अनुभव में कितना बड़ा अंतर है, यह किसी वैचारिक भाषण से नहीं बल्कि जीवन के छोटे प्रसंगों से खुलता है। युद्ध हो, सूखा हो या बाढ़—किसी के लिए ये संकट हैं, किसी और के लिए अवसर। यह टिप्पणी केवल अर्थव्यवस्था पर नहीं, उस नैतिक व्यवस्था पर भी है जिसमें दूसरे की विपत्ति किसी के लाभ का साधन बन सकती है।
फिर भी रामनारायण शुक्ल की कहानियाँ घोषणापत्र नहीं बनतीं। वे समाज की आर्थिक विषमता को देखते हैं लेकिन उसे किसी तैयार वैचारिक फार्मूले में बंद नहीं करते। यही उनकी शक्ति है। आर्थिक विषमता उनकी कहानियों में किसी सिद्धांत की तरह बाहर से आरोपित नहीं होती; वह कथा-वस्तु में घुली रहती है।
उनकी एक और बड़ी विशेषता बच्चों की दुनिया को देखने की क्षमता है। बच्चों के भीतर संसार को लेकर जो पहला विस्मय, असमानता का पहला बोध और प्रश्न करने की पहली बेचैनी पैदा होती है, उसे वे बड़ी संवेदनशीलता से पकड़ते हैं। बच्चा अपने अनुभव से धीरे-धीरे समझता है कि संसार वैसा सरल नहीं है जैसा उसे बताया गया था। स्वर्ग और नरक की पारंपरिक कल्पना से अलग वह अपने आसपास ही वैभव और अभाव, रोशनी और अँधेरे के दो संसार देखता है। उसके प्रश्नों का उत्तर बड़े लोग हमेशा नहीं दे पाते।
यहाँ बच्चों की दृष्टि वयस्क समाज की आलोचना का माध्यम बन जाती है। जो चीजें बड़े लोग सामान्य मान चुके हैं, बच्चा उन्हें पहली बार देखकर प्रश्न करता है। इसी कारण रामनारायण शुक्ल के यहाँ बाल-दृष्टि मासूम होने के साथ-साथ सामाजिक भी है।
उनकी कहानियों में सपनों का टूटना भी बार-बार आता है। छोटे बच्चे बड़े होकर कुछ बनना चाहते हैं। लेकिन गरीबी, पारिवारिक दायित्व और सामाजिक परिस्थितियाँ धीरे-धीरे उनकी संभावनाओं को सीमित करती जाती हैं। अच्छी प्रतिभा, सुंदर स्वप्न और व्यक्तिगत आकांक्षा अपने आप जीवन की दिशा तय नहीं कर पाते। सामाजिक परिस्थितियाँ भी मनुष्य के भाग्य के निर्माण में उतनी ही निर्णायक होती हैं।
यही भाव मित्रता, प्रेम और पारिवारिक संबंधों की कहानियों में भी दिखाई देता है। समय केवल बीतता नहीं, मनुष्यों के बीच दूरी भी पैदा करता है। सात वर्ष बाद मिलने वाले दो मित्र शारीरिक रूप से एक-दूसरे के सामने उपस्थित हो सकते हैं, लेकिन उनके जीवन के रास्ते इतने अलग हो चुके होते हैं कि पुरानी आत्मीयता वापस नहीं आती। यह अंतराल केवल समय का अंतराल नहीं है; यह अधूरे जीवन, बदल चुकी आकांक्षाओं और अलग-अलग सामाजिक अनुभवों का अंतराल है।
रामनारायण शुक्ल के यहाँ मृत्यु भी जीवन की बड़ी नाटकीय घटना बनकर नहीं आती। वह जीवन के आसपास लगातार उपस्थित रहती है। लेकिन उनकी कथा-दृष्टि निराशावादी नहीं है। बार-बार ऐसा लगता है कि मनुष्य अपनी पराजयों, अभावों और टूटे सपनों के बावजूद जीता रहता है। उसकी यही साधारण जिजीविषा कहानीकार के लिए महत्त्वपूर्ण है।
शिल्प की दृष्टि से उनकी सबसे बड़ी विशेषता सहजता है। वे जटिल कथा-प्रविधियों का प्रदर्शन नहीं करते। बोलचाल की भाषा, जीवन की छोटी घटनाएँ और परिचित पात्र—इन्हीं से वे अपना संसार बनाते हैं। किंतु यह सरलता सतही नहीं है। उनकी कहानियों के भीतर सामाजिक अनुभव की अनेक परतें हैं। किसी छोटे प्रसंग के पीछे पूरा परिवार दिखाई देने लगता है और किसी साधारण पात्र के पीछे पूरा शहर।
इसीलिए उनकी कहानियों में कलकत्ता इतनी बार आने के बावजूद वे केवल “कलकत्ता की कहानियाँ” नहीं रह जातीं। शहर उनकी कथा का अनुभव-क्षेत्र है, सीमा नहीं। कलकत्ता में दिखाई देने वाली गरीबी, बेरोजगारी, परिवार का विघटन, बाजार का दबाव, मनुष्य की गरिमा, बच्चों के सपने और मध्यवर्गीय असुरक्षा किसी एक शहर के अनुभव नहीं हैं। वे आधुनिक भारतीय समाज के व्यापक अनुभव हैं।
रामनारायण शुक्ल को केवल किसी साहित्यिक आंदोलन, प्रवृत्ति या खाँचे में रखकर पढ़ना इसलिए उनके कथा-संसार को छोटा करना होगा। उनकी स्थानीयता बहुत गहरी है, पर उसी स्थानीयता के भीतर से वे मनुष्य के व्यापक अनुभव तक पहुँचते हैं। उनके पात्र कलकत्ता की गलियों में चलते हैं लेकिन उनकी पीड़ा और आकांक्षाएँ किसी एक भूगोल में कैद नहीं रहतीं।
उनकी कहानियों की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही है कि जीवन और कथा के बीच की दूरी बहुत कम हो जाती है। खरी अनुभूतियाँ, गहरे सामाजिक अनुभव और निजी जीवन-संघर्ष उनकी कहानियों में इस तरह घुल जाते हैं कि उन्हें अलग-अलग पहचानना कठिन हो जाता है। इसीलिए उनके बारे में अंततः यही कहा जा सकता है—किसी का जीवन स्वयं कहानी में ढल जाए, इससे बड़ी कहानी कहने की कला और क्या हो सकती है।

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