रांची: इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, क्षेत्रीय केंद्र, रांची एवं कोल्हान विश्वविद्यालय, चाईबासा के संयुक्त तत्वावधान में द्वितीय पद्मश्री रामदयाल मुंडा स्मृति व्याख्यान का आयोजन कोल्हान विश्वविद्यालय के सभागार में किया गया। कार्यक्रम में साहित्यकार एवं चिंतक महादेव टोप्पो ने रामदयाल मुंडा के जीवन, चिंतन एवं योगदान पर व्याख्यान दिया। टोप्पो ने कहा कि पद्मश्री रामदयाल मुंडा ने आदिवासी समाज की भाषा, संस्कृति, संगीत और पारंपरिक ज्ञान को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने आदिवासी भाषाओं और सांस्कृतिक परंपराओं को भारतीय ज्ञान-परंपरा का अभिन्न हिस्सा माना। टोप्पो ने कहा कि उनके व्यक्तित्व में “जे नाची से बांची” जैसी आदिवासी जीवन-दृष्टि की गहरी अभिव्यक्ति दिखाई देती है। अमेरिका जैसे विकसित और चकाचौंध भरे परिवेश में लंबे समय तक रहने के बावजूद वे वहां के ऐश्वर्य और सुविधाओं से प्रभावित होकर अपनी जड़ों से दूर नहीं हुए। उन्होंने अपनी आदिवासी पहचान और सांस्कृतिक अस्मिता को कभी छिपाया नहीं, बल्कि उसे आत्मविश्वास के साथ स्वीकार करते हुए आगे बढ़ाया। यही उनकी वैचारिक दृढ़ता और व्यक्तित्व की विशिष्ट पहचान थी।

डा. मीनाक्षी मुंडा, सहायक प्राध्यापक, मानवविज्ञान विभाग, कोल्हान विश्वविद्यालय ने पद्मश्री रामदयाल मुंडा के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डाला। कुलपति अंजिला गुप्ता ने कहा कि रामदयाल मुंडा का व्यक्तित्व शिक्षा, साहित्य, संस्कृति और सामाजिक चेतना का अद्भुत संगम था। उन्होंने आदिवासी समाज की समृद्ध परंपराओं और ज्ञान को अकादमिक जगत से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग, डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय
के डा. बिनोद कुमार ने अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए कहा कि रामदयाल मुंडा ने जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं को केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि समुदाय की सांस्कृतिक स्मृति और पहचान के आधार के रूप में देखा। उन्होंने आदिवासी भाषाओं के संरक्षण के लिए साहित्य, मौखिक परंपराओं और लोकज्ञान के दस्तावेजीकरण तथा उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता पर बल दिया। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, क्षेत्रीय केंद्र, रांची के क्षेत्रीय निदेशक डा. कुमार संजय झा ने कहा कि पद्मश्री डा. रामदयाल मुंडा विद्वता और लोकजीवन, विश्वविद्यालय और अखड़ा तथा परंपरा और आधुनिकता के अद्भुत संगम थे। वे शिक्षाविद्, भाषाविद्, लेखक, संगीतज्ञ और जनजातीय संस्कृति के महत्वपूर्ण चिंतक थे। उन्होंने कहा कि आज जब जनजातीय भाषाएं और लोकपरंपराएं संरक्षण की चुनौती का सामना कर रही हैं, रामदयाल मुंडा के विचार और भी प्रासंगिक हैं।

Comments (0)
Write first comment
Please Login to write comment