रवि दत्त बाजपेई
फादर कामिल बुल्के का भारत आगमन
फादर कामिल बुल्के भारतीय हिन्दी जगत के इतिहास में एक अत्यंत विलक्षण व्यक्तित्व के रूप में जाने जाते हैं। उनका जन्म 1 सितंबर 1909 को बेल्जियम के रामस्कापेल नामक गाँव में हुआ था। बेल्जियम में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने ईसाई धर्म के जेसुइट संप्रदाय में दीक्षा ली, और 1935 में मात्र छब्बीस वर्ष की आयु में मिशनरी कार्य के उद्देश्य से भारत आए। भारत आते ही वे यहाँ की भाषा, संस्कृति और लोगों के प्रेम में इस कदर रम गए कि उन्होंने शेष जीवन भारत को ही समर्पित कर दिया, और 1951 में भारतीय नागरिकता भी ग्रहण कर ली।
रामचरितमानस से हुआ गहरा जुड़ाव
बुल्के के जीवन का सबसे निर्णायक मोड़ तब आया जब उनका परिचय गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरितमानस से हुआ। इस ग्रंथ में वर्णित मर्यादा, नैतिकता और आदर्श जीवन-मूल्यों ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि यह ग्रंथ उनके लिए लगभग पूजनीय बन गया। उन्होंने रामकथा के पात्रों के चरित्र और ईसा मसीह की शिक्षाओं के बीच गहरी नैतिक समानता का अनुभव किया, और इसी अनुभव ने उन्हें रामकथा के गहन शोध की ओर प्रवृत्त किया।

रामकथा पर गहन शोध
उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति डॉ. अमरनाथ झा से यह अनुरोध किया कि उन्हें अपना शोध-प्रबंध अंग्रेज़ी के बजाय हिन्दी में लिखने की अनुमति दी जाए, जो उस समय एक असाधारण और साहसिक माँग थी। अनुमति मिलने पर उन्होंने "रामकथाः उत्पत्ति और विकास" शीर्षक से अपना शोध प्रबंध हिन्दी में ही लिखा, जो 1950 में प्रकाशित हुआ। यह ग्रंथ रामकथा के उद्गम और विकास पर लिखा गया अब तक का सर्वाधिक प्रामाणिक और विस्तृत अध्ययन माना जाता है, जिसमें उन्होंने भारत तथा दक्षिण-पूर्व एशिया की विभिन्न परंपराओं में प्रचलित रामकथा के अनेक रूपों का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया।
हिन्दी के लिए भी किया महत्वपूर्ण काम
फादर बुल्के का योगदान केवल रामकथा-अध्ययन तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने "अंग्रेज़ी-हिन्दी शब्दकोश" नामक एक अत्यंत उपयोगी शब्दकोश तैयार किया, जो आज भी हिन्दी अध्येताओं और अनुवादकों के लिए एक प्रामाणिक संदर्भ-ग्रंथ माना जाता है। इसके अतिरिक्त उन्होंने "रामकथा और तुलसीदास" तथा "एक ईसाई की आस्थाः रामकथा और हिन्दी" जैसी अन्य महत्वपूर्ण कृतियाँ भी लिखीं, जिनमें उन्होंने हिन्दू और ईसाई धार्मिक परंपराओं के बीच तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया। वे रांची के सेंट जेवियर्स कॉलेज में हिन्दी और संस्कृत के प्राध्यापक भी रहे, और कॉलेज के समीप मनरेसा हाउस उनका निवास स्थान था। यही कारण है कि में रांची में उनके नाम पर एक मार्ग का नामकरण "कामिल बुल्के पथ" के रूप में किया गया है।
हिन्दी और रामकथा के अध्ययन में अमर योगदान
बुल्के का जीवन पूर्व और पश्चिम, ईसाई धर्म और हिन्दू धर्म, तथा यूरोपीय विद्वत्ता और भारतीय भक्ति-परंपरा के बीच एक अनूठे सेतु का प्रतीक है। जो लोग उन्हें "विदेशी हिन्दी विद्वान" कहते थे, उन्हें वे स्वयं याद दिलाते थे कि वे अब भारतीय नागरिक हैं। उनकी विद्वत्ता और हिन्दी-सेवा को सम्मानित करते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1974 में पद्मभूषण से अलंकृत किया, और बेल्जियम की रॉयल एकेडमी ने भी उन्हें अपना सदस्य बनाया। 17 अगस्त 1982 को दिल्ली में उनका निधन हुआ, परन्तु उनकी विद्वत्तापूर्ण रचनाएँ आज भी हिन्दी साहित्य, भारतविद्या (इंडोलॉजी) और रामकथा के अध्ययन में एक आधार-स्तंभ के रूप में प्रतिष्ठित हैं। इस प्रकार फादर कामिल बुल्के का जीवन इस सत्य का जीवंत प्रमाण है कि सच्ची विद्वत्ता और श्रद्धा किसी भी भाषा, धर्म या राष्ट्र की सीमाओं से परे होकर मानवता को जोड़ने का कार्य कर सकती है।
-रवि दत्त बाजपेई वरिष्ठ लेखक हैं। फादर कामिल बुल्के पर उनका गंभीर काम है। "कामिल बुल्के द जेसुइट एक्सपोनेंट आफ रामकथा" स्वाति पराशर के साथ मिलकर लिखी है।

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