स्वाती मालवीय
हिंदी साहित्य में जब झारखंड की बात आती है तो दो तरह के लेखक मिलते हैं -एक जो बाहर से आकर झारखंड पर लिखते हैं, और दूसरे जो झारखंड की मिट्टी में पैदा होकर उसकी धूल, भूख, विद्रोह और जंगल को जीते हैं। राकेश कुमार सिंह दूसरे वर्ग के सबसे प्रामाणिक हस्ताक्षर हैं। उनका व्यक्तित्व एक वैज्ञानिक, एक विधिवेत्ता, एक शिक्षक और एक जन-इतिहासकार का अद्भुत संगम है। राकेश कुमार सिंह का जन्म 20 फरवरी, 1960 को ग्राम: गुरहा, जिला: पलामू, झारखंड में हुआ। पलामू-जहां एक तरफ घने जंगल और पहाड़ हैं तो दूसरी तरफ सामंती शोषण, सूखा और पलायन की त्रासदी। इसी परिवेश में बचपन बिताने के कारण उनके व्यक्तित्व में एक गहरी लोक-दृष्टि आई। उनकी शिक्षा इस बात का प्रमाण है कि वे एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हैं-स्नातकोत्तर रसायन विज्ञान में पीएच.डी. और विधि स्नातक। विज्ञान का विद्यार्थी होने से उनमें तर्क, तथ्य और शोध की प्रवृत्ति आई, तो कानून की पढ़ाई ने उन्हें शोषण के तंत्र को कानूनी और सामाजिक दोनों नजरों से देखने की दृष्टि दी। वे लंबे समय तक हरप्रसाद दास जैन महाविद्यालय, आरा में रसायन विज्ञान के शिक्षक रहे, और वर्तमान में रांची के हीनू स्थित किलबर्न कालोनी में निवास करते हैं। शिक्षक होने के कारण ही उनके लेखन में एक बोधगम्यता है-वे कठिन इतिहास को भी कहानी की तरह सरल बना देते हैं।
उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता है-जमीन से जुड़ाव। दिल्ली-मुंबई के साहित्यिक विमर्शों से दूर रहकर उन्होंने पलामू को ही अपनी कर्मभूमि बनाया। उनके बारे में उनकी नवीनतम पुस्तक 'लो, आज गुल्लक तोड़ता हूं' में ठीक ही लिखा है-"राकेश कुमार सिंह मूलतः कथाकार हैं। कथा रस में उन्हें महारत हासिल है।" उनके संस्मरणों में केवल भावनात्मक खिंचाव नहीं, बल्कि जीवन के क्षणों में उभरे उल्लास, पीड़ा, द्वंद्व के साथ-साथ अद्भुत मानवीय बोध भी है। वे संस्मरण को कहानी और कहानी को संस्मरण बना देने की कला जानते हैं।
उनका कृतित्व लगभग 25 पुस्तकों में फैला हुआ है, जो बाल साहित्य से लेकर ऐतिहासिक उपन्यास तक जाता है। इसे चार भागों में बांटा जा सकता है -
1. कहानी साहित्य: पलामू का दस्तावेज उनके सात कहानी संग्रह हैं-'हांका तथा अन्य कहानियां', 'ओह पलामू', 'जोड़ा हारिल की रूपकथा', 'महुआ मांदल और अंधेरा', 'कहानी खत्म नहीं होती', 'तमस कोहरा और...'। 'हॉंका' पलामू का एक लोक-शब्द है - जंगल में जानवरों को खदेड़ने के लिए मचाया जाने वाला शोर। इसी शोर में वहां के आदिवासी का पूरा जीवन है। 'ओह पलामू' में पलामू की पीड़ा पर विलाप है। इन कहानियों में महाजन, वन विभाग, पुलिस और भूख-ये चारों मिलकर आदिवासी का शोषण करते हैं। यह प्रेमचंद की परंपरा की कहानियाँ हैं, पर परिवेश झारखंडी है।
2. उपन्यास साहित्य: इतिहास का पुनर्पाठ यह उनके कृतित्व का सबसे सशक्त पक्ष है। उनके 9 उपन्यास हैं - -जहां खिले हैं रक्तपलाश: पलामू के सामंती दमन की कथा। -पठार पर कोहरा: झारखंड बनने के बाद भी आदिवासी के जीवन पर छाया कोहरा, यानी विकास का छलावा। -जो इतिहास में नहीं है: यह कृति ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ संतालों के विद्रोह पर है। सरकारी इतिहास ने जिसे भुला दिया, उसे इन्होंने कथा में जीवित किया। -साधो, यह मुर्दों का गांव: कबीर की पंक्ति से लिया गया शीर्षक। विस्थापन और पलायन के बाद कैसे गाँव मुर्दा हो जाते हैं, इसका चित्रण। -हुल पहाड़िया (तिलक मांझी की समरगाथा): भारत के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी तिलक मांझी, जिन्होंने 1784 में अंग्रेजों के खिलाफ 'हुल' यानी विद्रोह किया था, उन पर यह पहला प्रामाणिक उपन्यास है। -महारण्य में गिद्ध, मिशन होलोकास्ट, ठहरिए...! आगे जंगल है, खोई हुई कड़ियां: ये सभी उपन्यास जंगल, पर्यावरण, माफिया और आदिवासी के बीच के संघर्ष को दर्शाते हैं। 'ठहरिए...! आगे जंगल है' पर तो दूरदर्शन द्वारा इसी नाम से टेलीफिल्म भी बनाई गई और प्रदर्शित की गई, जो उनकी लोकप्रियता का प्रमाण है।
3. किशोर और बालोपयोगी साहित्य: एक बड़े लेखक की पहचान है कि वह बच्चों के लिए भी लिखे। राकेशजी ने तीन किशोर उपन्यास लिखे - 'केशरीगढ़ की काली रात' नीलगढ़ीं का खजाना और 'वैरागी वन के प्रेत'। ये रहस्य-रोमांच के साथ-साथ इतिहास-बोध भी कराते हैं। बच्चों के लिए उनकी पुस्तकें हैं-'आदिपर्व', 'उलगुलान', 'अग्निपुरुष', 'अरण्य कथाएं', 'अवशेष कथा' और 'कहानियां ज्ञान की विज्ञान की'। 'उलगुलान' बिरसा मुंडा के विद्रोह को बच्चों की भाषा में समझाती है, तो 'अग्निपुरुष' विज्ञान के प्रति जिज्ञासा जगाती है। यह विज्ञान के शिक्षक के भीतर बैठे बाल-मन का ही विस्तार है।
4. संस्मरण साहित्य: उनकी नवीनतम पुस्तक 'लो, आज गुल्लक तोड़ता हूं' संस्मरण विधा में है। बनारसी दास चतुर्वेदी से लेकर महादेवी वर्मा, रामवृक्ष बेनीपुरी तक संस्मरण विधा की जो परंपरा रही है, उसी कड़ी में इस पुस्तक को रखा गया है। भाषा में वे खड़ी बोली हिंदी के साथ पलामू की लोक बोली के शब्दों का सुंदर प्रयोग करते हैं। उनकी कई कहानियां पंजाबी, उड़िया, अंग्रेजी और तेलुगु में अनूदित हो चुकी हैं। उन्हें झारखंड और राष्ट्रीय स्तर पर कई सम्मानों से नवाजा गया है- आनंद सागर स्मृति कथाक्रम सम्मान (2016), जेसी जोशी शब्द साधक जनप्रिय पाखी सम्मान (2015), झारखंड का सबसे प्रतिष्ठित राधाकृष्ण सम्मान (2004), दिव्य रजत अलंकरण, कथाबिंब पुरस्कार आदि। ज्ञानदर्शन चैनल के लिए पटकथा लेखन के लिए भी वे अनुबंधित रहे हैं।
राकेश कुमार सिंह का व्यक्तित्व एक पुल की तरह है-एक तरफ विज्ञान और तर्क, दूसरी तरफ लोक और इतिहास। उन्होंने सिद्ध किया है कि बड़ा साहित्य महानगरों में ही नहीं, पलामू के पठार पर भी लिखा जा सकता है। उनका कृतित्व झारखंड के आदिवासी के आंसू, उसके हुल और उसके भविष्य की चिंता का एक पूरा अभिलेखागार है।

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