हितेन्द्र पटेल, इतिहासकार
आज, 1 सितंबर 2026 को राही मासूम रज़ा की 99वीं जयंती के साथ उनका जन्मशती वर्ष आरंभ हो रहा है। अगले एक वर्ष में स्वाभाविक रूप से उनके साहित्य, उनकी भाषा, उनकी सांस्कृतिक दृष्टि और हिंदी-उर्दू के प्रश्न पर उनकी भूमिका को लेकर बहुत कुछ लिखा और कहा जाएगा। राही उन लेखकों में थे जिन्हें केवल उनकी पुस्तकों की सूची बनाकर या किसी एक साहित्यिक परंपरा के भीतर रखकर नहीं समझा जा सकता। वे खूब लिखते थे, खुलकर अपनी बात कहते थे और कई बार अपनी बात को वहाँ तक ले जाते हैं जहाँ सामान्यतः लेखक जाने से हिचकते हैं। उनकी कुछ बातें असुविधाजनक लग सकती हैं, कुछ को अतिशयोक्तिपूर्ण कहा जा सकता है और कुछ से असहमति भी संभव है, लेकिन उनमें एक विलक्षण बौद्धिक साहस था। वे दीवारों की रक्षा करने वाले लेखक नहीं थे। वे रास्ता बनाना चाहते थे।
राही के बारे में सोचते हुए मुझे बार-बार बी. आर. चोपड़ा की 1957 की फ़िल्म नया दौर का एक दृश्य याद आता है। दो गाँवों के बीच पुरानी दुश्मनी है। एक गाँव के मेहनतकश लोगों ने अपने रोज़गार और अस्तित्व को बचाने के लिए सड़क बनाने की कठिन चुनौती स्वीकार की है। सड़क समय पर पूरी न हुई तो उनकी हार निश्चित है। लेकिन जिस रास्ते से सड़क को गुजरना है, उसके बीच दूसरे गाँव के लोगों का खेत पड़ता है। पुराने वैर के कारण वे रास्ता देने के लिए तैयार नहीं हैं।
दिलीप कुमार का पात्र उनके पास जाता है। वह केवल सहायता नहीं माँगता; वह उन्हें उनकी प्रतिष्ठा, मनुष्यता और साझे जीवन का वास्ता देता है। वह समझाता है कि यह लड़ाई दो गाँवों के अभिमान की नहीं, उन ग़रीब लोगों की रोज़ी-रोटी की है जिनके जीवन पर मशीनों की मार पड़ने वाली है। अंततः पुरानी दुश्मनी पिघलती है। लोग खेत और गाँव की सीमा से ऊपर उठते हैं। वे सड़क बनाने वालों के साथ आ मिलते हैं। दीवार गिरती है और रास्ता बन जाता है।
इस दृश्य को रचने वाली रचनात्मक मंडली अपने आप में भारत की साझी सांस्कृतिक दुनिया का सुंदर उदाहरण थी। निर्माता और निर्देशक बी. आर. चोपड़ा थे—विभाजन से विस्थापित एक पंजाबी हिंदू। कहानी और पटकथा अख़्तर मिर्ज़ा की थी, संवाद कमिल राशिद के और गीत साहिर लुधियानवी के। परदे पर उसका चेहरा दिलीप कुमार थे। अलग-अलग अनुभवों और पृष्ठभूमियों से आए इन लोगों ने मिलकर ऐसी कहानी रची जिसका संदेश था—दीवारें मत बनाइए, रास्ते बनाइए।
यह केवल एक लोकप्रिय फ़िल्म का भावुक दृश्य नहीं था। यह स्वतंत्र भारत की सार्वजनिक कल्पना का एक रूपक था।
भारतीय सार्वजनिक कल्पना केवल राजनीतिक घोषणाओं और संविधान के अनुच्छेदों से नहीं बनी। उसे इतिहास, साहित्य, सिनेमा, लोकगीतों, महाकाव्यों और सार्वजनिक स्मृतियों ने मिलकर आकार दिया। हमारे समाज ने स्वयं को जिन कथाओं के माध्यम से पहचाना, उनमें बार-बार एक आकांक्षा दिखाई देती है—मनुष्यों को बाँटने वाली सीमाओं से ऊपर उठने की आकांक्षा। नया दौर की सड़क उसी आकांक्षा का आधुनिक रूपक थी।
इसके लगभग तीन दशक बाद यही बी. आर. चोपड़ा भारतीय टेलीविज़न के सबसे महत्त्वाकांक्षी धारावाहिकों में से एक, महाभारत, के लेखन से राही मासूम रज़ा को जोड़ते हैं। राही उसके संवादों के ऐसे रचनाकार बने कि करोड़ों भारतीयों के लिए महाभारत की आधुनिक सार्वजनिक भाषा के निर्माण में उनका योगदान स्थायी हो गया। यह केवल एक प्रतिभाशाली लेखक का व्यावसायिक चयन नहीं था। इसमें उस भारतीय विश्वास की निरंतरता भी दिखाई देती है जिसमें सभ्यता किसी एक धर्म, लिपि, भाषा या समुदाय की बपौती नहीं होती।
नया दौर में उर्दू से जुड़े भारतीय मुस्लिम रचनाकार एक हिंदू निर्माता-निर्देशक के साथ मिलकर रास्ता बनवाते हैं। महाभारत में गंगौली में जन्मा एक मुस्लिम लेखक भारतीय सभ्यता के महान महाकाव्य को करोड़ों घरों तक पहुँचाने वाली आवाज़ बनता है। इन दोनों प्रसंगों के बीच केवल बी. आर. चोपड़ा की उपस्थिति ही समान नहीं है। दोनों के भीतर भारतीयता की एक साझा धारणा काम करती है—वह भारतीयता जो स्वामित्व का दावा नहीं करती, सहभागिता का आमंत्रण देती है।
राही की महत्ता इसी जगह अधिक स्पष्ट होती है। उन्होंने हिंदी और उर्दू की साहित्यिक दुनिया के बीच खड़ी की गई दीवारों को केवल सिद्धांत में नहीं, अपने लेखन और जीवन से भी चुनौती दी। वे उर्दू की दुनिया से आए, हिंदी के अत्यंत महत्त्वपूर्ण उपन्यासकार बने, भोजपुरी क्षेत्र की सामाजिक स्मृति को साहित्य में प्रतिष्ठा दी, बंबई के लोकप्रिय सिनेमा में लिखते रहे और अंततः महाभारत जैसे महाकाव्य को आधुनिक माध्यम की भाषा देने वाले लेखकों में शामिल हुए। इस पूरी यात्रा को किसी एक भाषा के विस्तार या किसी दूसरी भाषा के परित्याग की कहानी की तरह पढ़ना उनके साथ अन्याय होगा। यह आवागमन की कहानी थी।
राही और साझा भारतीयता की राह
इसीलिए राही मासूम रज़ा की जन्मशती पर हिंदी, उर्दू और भोजपुरी के बीच नई दीवारें खड़ी करने की कोशिश विशेष रूप से विडंबनापूर्ण लगती है। हाल में राही मासूम रज़ा और उनके उपन्यास आधा गाँव को लेकर अतहर फ़ारूक़ी ने एक नया विवाद खड़ा किया है। उन्होंने कहा कि आधा गाँव को उर्दू उपन्यास बताना गलत है; वह भोजपुरी उपन्यास है। उनके अनुसार भोजपुरी न उर्दू है और न उसे आधुनिक हिंदी की बोली कहा जा सकता है। आधुनिक हिंदी को अपेक्षाकृत नई भाषा बताते हुए उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उत्तर भारत की शक्तिशाली राजनीति के सहारे उसने भोजपुरी सहित कई भाषाओं को अपने छाते के नीचे समेट लिया।
इस वक्तव्य में एक वास्तविक चिंता मौजूद है। भोजपुरी की अपनी समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा है। उसकी अपनी ध्वनि, लय, शब्द-संपदा, लोकस्मृति, गीत, कथा, हास्य और सामाजिक संसार है। उसे केवल किसी दूसरी भाषा की अपरिपक्व या ग्रामीण बोली मानकर उपेक्षित करना उचित नहीं। भोजपुरी के सम्मान और उसके स्वतंत्र विकास की माँग पूर्णतः वैध है। परंतु एक वैध चिंता से निकला प्रत्येक निष्कर्ष ऐतिहासिक रूप से सही हो, यह आवश्यक नहीं।
आधा गाँव को भोजपुरी जीवन का महान आख्यान कहना और उसे भाषिक वर्गीकरण की दृष्टि से भोजपुरी में लिखा हुआ उपन्यास घोषित कर देना एक ही बात नहीं है। किसी रचना का सांस्कृतिक भूगोल, उसके पात्रों की बोलियाँ, उसकी संवाद-संरचना और उसके मूल कथात्मक गद्य की भाषा—ये परस्पर संबद्ध होकर भी अलग-अलग प्रश्न हैं।
आधा गाँव का सांस्कृतिक संसार निस्संदेह भोजपुरी क्षेत्र का है। गंगौली केवल उसका भौगोलिक स्थान नहीं, उसकी सामाजिक और नैतिक दुनिया का केंद्र है। वहाँ के संबंध, झगड़े, मुहावरे, मातम, धार्मिक संस्कार, जातीय समीकरण, पारिवारिक स्मृतियाँ और बोलचाल उपन्यास को उसका विशिष्ट जीवन देते हैं। भोजपुरी को उससे निकाल दीजिए तो उपन्यास की आत्मा का बड़ा हिस्सा नष्ट हो जाएगा।
लेकिन क्या इस कारण उपन्यास को केवल भोजपुरी का उपन्यास कहा जा सकता है?
राही का रचनात्मक गद्य एक ही भाषाई स्रोत से नहीं बना। उसमें हिंदी, उर्दू, भोजपुरी, फ़ारसी-अरबी शब्दावली, लोकभाषा और उत्तर भारत की साझा बोलचाल एक-दूसरे में प्रवेश करती हैं। पात्र अपनी सामाजिक स्थिति और भावनात्मक संसार के अनुसार भाषा बदलते हैं। कहीं भोजपुरी की मिट्टी बोलती है, कहीं उर्दू की साहित्यिक स्मृति, कहीं आधुनिक हिंदी गद्य की संरचना और कहीं ऐसी हिंदुस्तानी जिसे किसी एक भाषाई दरबार में बंद नहीं किया जा सकता।
यही उसकी शक्ति है। उसे किसी एक भाषा के स्वामित्व में सौंप देना उसके रचनात्मक वैभव को कम करना होगा।
हिंदी के इतिहास और भाषा-राजनीति का प्रश्न
यह तर्क कि हिंदी बहुत हाल की भाषा है और उसने राजनीतिक शक्ति के बल पर भोजपुरी तथा अन्य उत्तर भारतीय भाषाओं को अपने भीतर समेट लिया, इतिहास को एक सीधी राजनीतिक कहानी में बदल देता है।
आधुनिक मानक हिंदी का संस्थागत रूप उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में विकसित हुआ—इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता। मुद्रण, शिक्षा, औपनिवेशिक प्रशासन, व्याकरण-निर्माण, शब्दकोश, नागरी आंदोलन, साहित्यिक संस्थाएँ और राष्ट्रवादी राजनीति—इन सभी ने आधुनिक हिंदी के मानकीकरण में भूमिका निभाई। इस प्रक्रिया में खड़ी बोली को प्रमुखता मिली और ब्रज, अवधी, भोजपुरी, मैथिली तथा अन्य भाषिक परंपराओं के साथ हिंदी का संबंध नए ढंग से परिभाषित किया गया।
इस इतिहास की आलोचनात्मक जाँच होनी चाहिए। आधुनिक हिंदी के विकास में शक्ति-संबंध थे, संस्थागत आग्रह थे और कभी-कभी अन्य भाषाओं के स्वतंत्र दावों को पर्याप्त सम्मान न देने की प्रवृत्ति भी थी। लेकिन आधुनिक मानक हिंदी के निर्माण और हिंदी की पूरी ऐतिहासिक भाषिक परंपरा को एक ही वस्तु मान लेना उतना ही भ्रामक है। आधुनिक मानक रूप का अपेक्षाकृत नया होना यह सिद्ध नहीं करता कि ‘हिंदी’, ‘हिंदवी’, ‘हिंदुई’ या उत्तर भारत की साझा देशी भाषिक परंपरा का कोई पुराना इतिहास था ही नहीं।
भाषाओं का इतिहास इतना सरल नहीं होता कि किसी एक तारीख़ पर कोई भाषा पैदा हो जाए और फिर अपने आसपास की बोलियों और भाषाओं को राजनीतिक शक्ति से निगलती चली जाए। मानकीकरण की राजनीति होती है, लेकिन उससे बहुत पहले और उसके बाहर भी भाषिक संसार होते हैं। लोग बोलते हैं, शब्द एक भाषा से दूसरी भाषा में जाते हैं, लिपियाँ बदलती हैं, साहित्यिक परंपराएँ एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं और एक ही क्षेत्र में बोलने वाला व्यक्ति संदर्भ के अनुसार अपने भाषिक व्यवहार को बदलता रहता है।
राही स्वयं इस इतिहास को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखते थे। उनके अनुसार दिल्ली और उत्तर भारत में बोली जाने वाली भाषा को अलग-अलग समयों में हिंदवी, हिंदी, उर्दू-ए-मुअल्ला और उर्दू जैसे नामों से पुकारा गया। वे लिपि को भाषा का अनिवार्य अंग नहीं मानते थे। उन्होंने जायसी और तुलसी का उदाहरण दिया—एक ने अपनी अवधी को फ़ारसी लिपि में लिखा, दूसरे ने नागरी में; भाषा का सांस्कृतिक अस्तित्व लिपि की सीमा से बड़ा था।
राही इस विचार को बहुत आगे तक ले जाने का साहस रखते थे। उनका कहना था कि उनके अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी उर्दू की फ़ारसी-अरबी लिपि नहीं जानती। यदि उर्दू को बचाना है, यदि उसकी रचनाओं को अगली पीढ़ियों तक पहुँचाना है, तो उसे देवनागरी में भी उपलब्ध कराना पड़ेगा। उनका मूल तर्क सरल और उत्तेजक था—लिपि भाषा नहीं होती।
इससे सहमत होना आवश्यक नहीं। वास्तव में इस विचार पर गंभीर आपत्ति की पर्याप्त गुंजाइश है। लिपि केवल किसी भाषा को लिखने की तकनीक नहीं होती। उसके भीतर साहित्यिक स्मृति, सौंदर्यबोध, इतिहास, पांडुलिपियों की दुनिया और पूरे सांस्कृतिक अनुभव की परतें जमा होती हैं। उर्दू की फ़ारसी-अरबी लिपि को उसके इतिहास से काटकर नहीं देखा जा सकता। उसका संरक्षण न केवल उर्दू बल्कि भारतीय सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण का प्रश्न है।
लेकिन राही की बात को वहीं रोक देना भी ठीक नहीं होगा। उनका उद्देश्य उर्दू की लिपि को नष्ट करना नहीं था। उनकी चिंता थी कि कहीं लिपि साहित्य तक पहुँच की दीवार न बन जाए। वे उर्दू का पाठक-वर्ग कम नहीं, बड़ा करना चाहते थे। वे उस साहित्य को उन भारतीयों तक भी पहुँचाना चाहते थे जो उर्दू जानते, समझते या उसकी भाषिक दुनिया से जुड़े हैं लेकिन उसकी लिपि नहीं पढ़ पाते।
यहीं राही की बात खतरनाक भी हो जाती थी और आकर्षक भी। वे सुरक्षित मध्य मार्ग पर रुक जाने वाले लेखक नहीं थे। वे तर्क को उसकी आख़िरी सीमा तक ले जाने का साहस रखते थे ताकि प्रश्न साफ़ दिखाई देने लगे। उनकी बात हर बार सही हो, यह आवश्यक नहीं; लेकिन उनके भीतर रास्ता बनाने की बेचैनी थी।
इस अर्थ में उनकी दृष्टि भाषाई उदारता से आगे जाकर लोकतांत्रिक हो जाती है। भाषा साहित्यिक अभिजात वर्ग की निजी संपत्ति नहीं रह सकती। किसी लिपि, विश्वविद्यालय, साहित्यिक संस्था या समुदाय को यह अधिकार नहीं हो सकता कि वह पाठक और साहित्य के बीच स्थायी चौकी बना दे।
राही का भाषिक संसार: हिंदी, उर्दू और भोजपुरी के बीच
राही की इसी प्रवृत्ति का एक और अत्यंत अर्थपूर्ण उदाहरण उनके मित्र प्रो. कुँवरपाल सिंह से जुड़ा है। हिंदी और उर्दू के साझा साहित्यिक इतिहास पर कोई गंभीर काम हो सके, इस आशा से राही ने अपने पास उपलब्ध बहुत-सी सामग्री उन्हें दे दी। यह छोटी बात नहीं है। लेखक और अध्येता कई बार अपने संग्रह, नोट्स और दुर्लभ सामग्री को निजी बौद्धिक पूँजी की तरह सुरक्षित रखते हैं। राही इसके विपरीत उसे किसी बड़े साझा काम में लगाना चाहते थे। वे स्वयं उस इतिहास को लिखें या उनका नाम उसके लेखक के रूप में आए, यह उनके लिए निर्णायक बात नहीं थी। रास्ता बनना चाहिए था।
यह प्रसंग राही की भारतीयता को समझने में महत्त्वपूर्ण है। उनके लिए हिंदी और उर्दू दो दुर्ग नहीं थे जिनकी सेनाएँ आमने-सामने तैनात हों। वे एक लंबे साझा इतिहास से बने ऐसे सांस्कृतिक क्षेत्र थे जिनमें राजनीतिक संघर्ष, धार्मिक पहचान और संस्थागत प्रतिस्पर्धा के बावजूद निरंतर आवाजाही रही है।
इसीलिए भोजपुरी का सम्मान करने के लिए हिंदी के पूरे ऐतिहासिक अस्तित्व को राजनीतिक षड्यंत्र सिद्ध करना आवश्यक नहीं है। इसी प्रकार हिंदी की व्यापक साहित्यिक परंपरा को स्वीकार करने के लिए भोजपुरी को केवल उसकी बोली घोषित करना भी आवश्यक नहीं। भाषाएँ प्रशासनिक जिलों की तरह निश्चित सीमाओं में नहीं रहतीं। वे एक-दूसरे से शब्द लेती हैं, लय ग्रहण करती हैं, मुहावरे साझा करती हैं और सीमावर्ती क्षेत्रों में नए रूप बनाती हैं।
भोजपुरी ने हिंदी और उर्दू दोनों को समृद्ध किया है। हिंदी और उर्दू ने भी भोजपुरी के आधुनिक साहित्यिक संसार को प्रभावित किया है। यह एकतरफ़ा अधिग्रहण की नहीं, लंबे आदान-प्रदान की कहानी है। शक्ति और असमानता इस आदान-प्रदान में मौजूद हो सकती हैं, लेकिन केवल शक्ति से उसका पूरा इतिहास नहीं समझा जा सकता।
1857 से ‘नया दौर’ और ‘महाभारत’ तक
राही को भारतीय सार्वजनिक कल्पना के भीतर रखकर पढ़ने से एक और ऐतिहासिक धागा दिखाई देता है।
1857 का विद्रोह अत्यंत जटिल घटना थी। अलग-अलग क्षेत्रों, वर्गों और समुदायों ने उसमें अलग कारणों से भाग लिया। उसे किसी सरल धार्मिक एकता की कथा में बदल देना इतिहास के साथ अन्याय होगा। फिर भी यह भी सत्य है कि अनेक क्षेत्रों में हिंदुओं और मुसलमानों ने एक साझा शत्रु के विरुद्ध संघर्ष किया। बाद के भारतीय राष्ट्रवाद ने 1857 की स्मृति में इसी साझा प्रतिरोध की संभावना को पहचाना।
1857 ने भारतीय सार्वजनिक कल्पना को साथ लड़ने की एक शक्तिशाली स्मृति दी।
ठीक सौ वर्ष बाद, 1957 में, नया दौर ने स्वतंत्र भारत को साथ मिलकर बनाने का स्वप्न दिया। मशीन और मनुष्य के संघर्ष से आगे फ़िल्म का केंद्रीय नैतिक संदेश यह था कि जब सामान्य लोगों की रोज़ी और गरिमा का प्रश्न हो, तब पुरानी दुश्मनियाँ छोड़नी पड़ती हैं। रास्ता किसी एक गाँव का नहीं होता। वह उन सबका हो जाता है जो उसे बनाते हैं और जिनके जीवन को वह जोड़ता है।
और फिर राही मासूम रज़ा ने भारतीय समाज को साथ मिलकर अपनी स्मृतियाँ पढ़ने का अवसर दिया।
1857—साथ लड़ने की स्मृति।
नया दौर—साथ मिलकर रास्ता बनाने का स्वप्न।
राही का महाभारत—साझी सांस्कृतिक स्मृति को साथ पढ़ने का अनुभव।
इन तीनों के संदर्भ अलग हैं। उन्हें इतिहास की एक सीधी और निर्बाध रेखा में रखना उचित नहीं होगा। लेकिन भारतीय सार्वजनिक कल्पना में वे एक साझा आकांक्षा के अलग-अलग रूप अवश्य हैं—विभाजन से ऊपर उठने, किसी बड़ी सामूहिकता से जुड़ने और साथ मिलकर भविष्य बनाने की आकांक्षा।
महाभारत, सिनेमा और सांस्कृतिक सहभागिता
राही द्वारा महाभारत लिखे जाने को अक्सर एक मुस्लिम लेखक द्वारा हिंदू महाकाव्य लिखने की असाधारण घटना के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इस प्रशंसा के भीतर भी कभी-कभी एक छिपी हुई समस्या रहती है। मानो राही किसी ऐसी सांस्कृतिक सीमा को पार कर रहे थे जो स्वभावतः उनके लिए बंद थी।
राही की अपनी दृष्टि में शायद यह सीमा थी ही नहीं।
गंगा, गंगौली, हिंदुस्तानी भाषा, उत्तर भारत की लोकस्मृति और महाभारत—ये सब उनके लिए किसी बाहरी सभ्यता की वस्तुएँ नहीं थीं। वे उस भूमि और इतिहास का हिस्सा थे जिसने राही को बनाया था। इस अर्थ में उनका महाभारत लिखना किसी दूसरे समुदाय की विरासत में अनधिकृत प्रवेश नहीं था। वह अपनी ही सभ्यता के बहुस्तरीय संसार के साथ संवाद था।
यह बी. आर. चोपड़ा की दृष्टि का भी महत्त्वपूर्ण पक्ष था। एक पंजाबी हिंदू निर्माता ने भारतीय महाकाव्य की आधुनिक टेलीविज़न भाषा के लिए ग़ाज़ीपुर के एक मुस्लिम लेखक पर विश्वास किया। और राही ने उस विश्वास को अपनी असाधारण भाषिक क्षमता से सार्थक किया।
यह प्रसंग हमें बताता है कि भारतीयता का सर्वोत्तम रूप धार्मिक सहिष्णुता से भी आगे जाता है। सहिष्णुता में कभी-कभी यह भाव छिपा होता है कि कोई बहुसंख्यक किसी दूसरे को अपने क्षेत्र में प्रवेश करने की अनुमति दे रहा है। राही और महाभारत का संबंध अनुमति का संबंध नहीं था; वह समान सांस्कृतिक सहभागिता का संबंध था।
राही भारतीय सभ्यता के अतिथि नहीं थे। वे उसके उत्तराधिकारी और रचनाकार थे।
और शायद इसी कारण महाभारत के उनके संवादों को करोड़ों लोगों ने सहजता से स्वीकार किया। भारतीय जनता को उन्हें स्वीकार करने के लिए पहले यह तय नहीं करना पड़ा कि लेखक का धर्म क्या है। शब्द पात्रों के मुँह से निकले और लोगों की स्मृति में बस गए। लोकप्रिय संस्कृति कई बार वह काम कर देती है जिसे विश्वविद्यालयों और वैचारिक बहसों में हम अनावश्यक रूप से कठिन बना देते हैं।
राही की एक और बात मुझे विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण लगती है, जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है। वे इस बात के हिमायती थे कि साहित्य के पाठ्यक्रम में सिनेमा को भी पढ़ाया जाना चाहिए।
आज यह बात कुछ विश्वविद्यालयों में स्वाभाविक लग सकती है, लेकिन इसके पीछे एक बड़ी बौद्धिक समस्या है। आधुनिक भारत को यदि सचमुच समझना है तो साहित्य को सिनेमा से, सिनेमा को संगीत से, संगीत को सामाजिक इतिहास से और इन सबको लोक तथा लोकप्रिय संस्कृति से अलग करके नहीं पढ़ा जा सकता। बीसवीं शताब्दी के भारतीय मन को प्रेमचंद, निराला, मंटो, इस्मत, राही या निर्मल वर्मा ने बनाया तो उसे साहिर, शैलेंद्र, दिलीप कुमार, सत्यजित राय, ऋत्विक घटक, गुरुदत्त और असंख्य लोकप्रिय फ़िल्मों ने भी बनाया।
स्वतंत्र भारत की सबसे व्यापक सांस्कृतिक बातचीत विश्वविद्यालयों के सेमिनार-कक्षों में नहीं, बहुत बार सिनेमा हॉल में हुई है।
नया दौर इसी कारण केवल इस लेख का सजावटी उदाहरण नहीं है। वह हमारे आधुनिक सांस्कृतिक इतिहास का स्रोत है। उसी तरह महाभारत का टेलीविज़न रूपांतरण केवल मनोरंजन का विषय नहीं है। उसने धर्म, राष्ट्र, परिवार, न्याय और भारतीय अतीत के बारे में करोड़ों लोगों की कल्पना को प्रभावित किया। यदि साहित्य का विद्यार्थी इस दुनिया को नहीं पढ़ता तो वह आधुनिक भारतीय समाज की बड़ी सांस्कृतिक गतिविधि से दूर रह जाता है।
राही इसे समझते थे।
साहित्य, भाषा और ज्ञान की दीवारें
यहीं से एक और बड़ी समस्या हमारे सामने आती है। भारतीय बौद्धिकता ने लंबे समय तक विषयों को खाँचों में बाँटकर रखा है—साहित्य अलग, इतिहास अलग, सिनेमा अलग, संगीत अलग, लोकसंस्कृति अलग। उससे भी बड़ी दीवार भाषा की है। आधुनिक ज्ञान का बड़ा हिस्सा अंग्रेज़ी में बनता, पढ़ाया और प्रतिष्ठित होता है, जबकि भारतीय भाषाओं की विशाल दुनिया उससे पूरी तरह जुड़ नहीं पाती।
मेरा अपना मानना है कि जिस दिन अंग्रेज़ी में उपलब्ध आधुनिक ज्ञान को हम बड़े पैमाने पर अपनी मातृभाषाओं में पढ़ने, पढ़ाने और सोचने लगेंगे, भारतीय बौद्धिकता की शक्ति कई गुना बढ़ जाएगी। इसका अर्थ अंग्रेज़ी से शत्रुता नहीं है। अंग्रेज़ी ने हमें संसार के ज्ञान से जोड़ा है और आगे भी जोड़ेगी। समस्या अंग्रेज़ी नहीं, ज्ञान पर उसका एकाधिकार है।
जब दर्शन, समाजशास्त्र, आधुनिक इतिहास, पर्यावरण, विज्ञान, सिनेमा अध्ययन और कलाओं की बड़ी बहसें केवल अंग्रेज़ी के छोटे शिक्षित वर्ग के भीतर घूमती रहती हैं, तब भारतीय समाज की अपनी बौद्धिक शक्तियाँ पूरी तरह सक्रिय नहीं हो पातीं। अंग्रेज़ी के श्रेष्ठ ज्ञान को हिंदी, बांग्ला, उर्दू, तमिल, मलयालम, मराठी, भोजपुरी, मैथिली और दूसरी भारतीय भाषाओं में ले जाना अनुवाद का साधारण काम नहीं है; यह बौद्धिक लोकतंत्रीकरण का काम है।
राही का लिपि वाला अतिवादी-सा दिखाई देने वाला तर्क इसी बड़े प्रश्न की याद दिलाता है। ज्ञान और साहित्य तक पहुँचने के रास्ते जितने अधिक होंगे, सांस्कृतिक जीवन उतना ही व्यापक होगा।
साहित्य और सिनेमा को अलग-अलग रखना, भारतीय भाषाओं और आधुनिक ज्ञान को अलग-अलग रखना और फिर इस पूरी व्यवस्था को अंग्रेज़ी की मध्यस्थता के हवाले कर देना भारत की सांस्कृतिक शक्ति को सीमित करता है।
भारतीयता को मैं यहाँ किसी बंद राष्ट्रवादी अर्थ में नहीं देखता। उसका अधिक सार्थक रूप वह है जिसे रवींद्रनाथ ठाकुर के व्यापक सांस्कृतिक बोध से समझा जा सकता है—एक ऐसी भारतीयता जो ग्रहण करती है, रूपांतरित करती है, बाहर से आने वाली चीज़ों को अपने भीतर जगह देती है और स्वयं भी बाहर जाती है। इसे एक प्रकार की रवींद्रिक, सामुद्रिक भारतीयता कह सकते हैं। समुद्र की पहचान उसकी दीवारों से नहीं, उसकी अनेक धाराओं से बनती है।
इस भारतीयता में फ़ारसी बाहर की चीज़ नहीं रह जाती, अंग्रेज़ी शत्रु भाषा नहीं रहती, उर्दू किसी एक समुदाय की भाषा नहीं होती, महाभारत किसी एक धार्मिक पहचान की निजी संपत्ति नहीं होता और सिनेमा ‘गंभीर’ साहित्य के बाहर की निम्नतर कला नहीं रहता।
राही का लेखन इसी सांस्कृतिक गतिशीलता की याद दिलाता है।
राही की विरासत: दीवारों के बजाय रास्ते
इस प्रश्न का सबसे ईमानदार उत्तर शायद यह है कि राही को उनकी पूरी रचनात्मकता के साथ किसी एक भाषा में समेटना संभव नहीं।
वे उर्दू के लेखक थे—क्योंकि उनकी साहित्यिक शिक्षा, कविता और बौद्धिक संस्कार का बड़ा हिस्सा उर्दू में बना।
वे हिंदी के लेखक थे—क्योंकि आधुनिक हिंदी साहित्य उनके उपन्यासों के बिना अधूरा है।
वे भोजपुरी सांस्कृतिक संसार के लेखक थे—क्योंकि गंगौली, पूर्वांचल और भोजपुरी लोकजीवन ने उनकी संवेदना तथा कथा-भाषा को गहरे रूप में रचा।
वे हिंदुस्तानी परंपरा के लेखक थे—क्योंकि उनकी भाषा उन कृत्रिम दीवारों को स्वीकार नहीं करती जिन्हें आधुनिक भाषा-राजनीति ने हिंदी और उर्दू के बीच खड़ा किया।
और सबसे बढ़कर, वे भारतीय लेखक थे—इस अर्थ में नहीं कि उनकी विशिष्ट भाषाई पहचानें अप्रासंगिक हो जाती हैं, बल्कि इसलिए कि वे सभी पहचानें एक-दूसरे को नष्ट किए बिना उनके भीतर साथ रहती हैं।
भारतीयता का अर्थ विविधताओं को किसी एक मानक भाषा या संस्कृति में विलीन करना नहीं है। उसका अर्थ यह भी नहीं कि हर भाषा अपने चारों ओर दीवार बनाकर स्वयं को सुरक्षित करे। भारतीयता की वास्तविक चुनौती यह है कि विशिष्टताएँ बनी रहें, फिर भी संवाद के रास्ते खुले रहें।
राही इसी कठिन भारतीयता के लेखक थे।
इस लेख का प्रतिपक्ष कोई एक व्यक्ति या कोई एक भाषा-समुदाय नहीं है। प्रतिपक्ष है—दीवार बनाने की मानसिकता।
वह मानसिकता कभी कहती है कि उर्दू केवल एक लिपि में जीवित रह सकती है। कभी कहती है कि भोजपुरी का सम्मान तभी होगा जब हिंदी को उसका राजनीतिक शत्रु सिद्ध कर दिया जाए। कभी दावा करती है कि आधा गाँव पर केवल एक भाषा का अधिकार है। और कभी पूछती है कि एक मुसलमान महाभारत कैसे लिख सकता है।
इन सभी प्रश्नों के पीछे संस्कृति को संपत्ति समझने की प्रवृत्ति है। भाषा, साहित्य और स्मृति पर स्वामित्व का दावा किया जाता है। यह तय करने की कोशिश होती है कि कौन भीतर है, कौन बाहर; कौन अधिकृत उत्तराधिकारी है और कौन अनधिकृत प्रवेशकर्ता।
राही का साहित्य इस पूरी मानसिकता का प्रतिरोध करता है।
उनकी रचनाएँ हमें बताती हैं कि भाषा किसी सीमा-चौकी पर खड़े सिपाही की तरह लोगों की पहचान जाँचकर प्रवेश नहीं देती। भाषा मनुष्यों के साथ चलती है। वह विवाह, विस्थापन, बाज़ार, शिक्षा, प्रेम, संघर्ष, गीत, मातम और स्मृति के साथ एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाती है। वह बदलती है, ग्रहण करती है और दूसरों को बदलती है।
उर्दू ने भोजपुरी से सीखा है। भोजपुरी ने हिंदी और उर्दू से सीखा है। हिंदी ने ब्रज, अवधी, भोजपुरी, राजस्थानी, फ़ारसी, अरबी, संस्कृत और अंग्रेज़ी सहित न जाने कितने स्रोतों से शब्द और संवेदनाएँ ग्रहण की हैं। भारतीय भाषाओं का यह पारस्परिक संसार किसी आधुनिक भाषाई नक्शे से बहुत पुराना और अधिक जटिल है।
किसी जीवित भाषा की शुद्ध वंशावली तैयार नहीं की जा सकती।
भाषाओं का इतिहास रक्त की शुद्धता का इतिहास नहीं; सहवास का इतिहास है।
नया दौर में सड़क बन जाने के बाद कोई यह नहीं पूछता कि उसका पहला पत्थर किस गाँव के व्यक्ति ने रखा था। कोई यह नहीं गिनता कि सड़क पर किस समुदाय का श्रम अधिक लगा। वह रास्ता सबका हो जाता है।
भारतीय भाषाओं की श्रेष्ठ रचनाएँ भी ऐसी ही सड़कें हैं।
आधा गाँव में भोजपुरी की मिट्टी है, उर्दू की संवेदनात्मक गहराई है, हिंदी गद्य की आधुनिक संरचना है और उस साझा हिंदुस्तानी संसार की स्मृति है जिसे आधुनिक भाषा और सांप्रदायिक राजनीति ने अलग-अलग नामों और लिपियों में बाँटने की कोशिश की। उसे केवल एक भाषा की सीमा में बंद करना उस सड़क पर नया बैरियर खड़ा करना होगा जिसे राही ने अपने जीवन भर खुला रखा।
भोजपुरी को उसका सम्मान मिलना चाहिए। उसकी शिक्षा, साहित्य, संस्थाओं और सार्वजनिक उपस्थिति का विस्तार होना चाहिए। उर्दू की लिपि और उसकी महान साहित्यिक परंपरा की रक्षा होनी चाहिए। हिंदी को अपनी व्यापकता सिद्ध करने के लिए भोजपुरी, मैथिली, अवधी या अन्य भाषाओं की स्वतंत्र सांस्कृतिक अस्मिता को कम करने की आवश्यकता नहीं। हिंदी का विस्तार यदि संवाद और ग्रहणशीलता के माध्यम से हुआ है तो उसकी शक्ति भी उसी उदारता में है।
हिंदी, उर्दू और भोजपुरी प्रतिस्पर्धी साम्राज्य नहीं हैं। वे इतिहास के लंबे सहवास से बनी हुई पड़ोसी भाषिक दुनियाएँ हैं। पड़ोसियों के बीच तनाव भी होते हैं, शक्ति की विषमताएँ भी और स्वामित्व के विवाद भी। परंतु उनके घरों के बीच केवल दीवारें नहीं होतीं; दरवाज़े और रास्ते भी होते हैं।
राही उन रास्तों के लेखक थे।
‘राही’ का अर्थ ही है—रास्ते पर चलने वाला, पथिक। यह शायद संयोग हो, लेकिन उनके जीवन और लेखन के संदर्भ में अत्यंत अर्थपूर्ण संयोग है। वे एक भाषा से दूसरी भाषा, गाँव से महानगर, उपन्यास से सिनेमा, उर्दू कविता से हिंदी गद्य और गंगौली से महाभारत तक यात्रा करते रहे। उनकी यात्रा ने पहचानों को मिटाया नहीं; उनके बीच आवाजाही संभव बनाई।
राही मासूम रज़ा की जन्मशती पर प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि हिंदी, उर्दू और भोजपुरी में से कौन उन्हें अपना सिद्ध करने में सफल होता है। न ही यह कि उनके नाम पर कितने आयोजन होते हैं और कितनी स्मारिकाएँ प्रकाशित होती हैं।
अधिक उपयोगी प्रश्न यह होगा कि क्या उनकी बेचैनी हमारे किसी काम आ सकती है।
क्या हम आज भी उस भारत की कल्पना कर सकते हैं जिसमें एक पंजाबी हिंदू फ़िल्मकार, उर्दू से जुड़े मुस्लिम लेखक और कलाकार तथा अलग-अलग क्षेत्रों से आए रचनाकार मिलकर ऐसा सांस्कृतिक संसार बना सकें जिसे पूरा देश अपना माने? क्या हम उस भारतीयता को पुनः पहचान सकते हैं जिसमें अख़्तर मिर्ज़ा की कहानी, कमिल राशिद के संवाद, साहिर लुधियानवी के गीत, दिलीप कुमार का अभिनय और बी. आर. चोपड़ा का निर्देशन मिलकर नया दौर बनाते हैं और कुछ दशकों बाद उसी चोपड़ा की महाभारत को राही की भाषा करोड़ों भारतीय घरों तक पहुँचाती है?
क्या हम भोजपुरी को सम्मान देते हुए हिंदी से संवाद बनाए रख सकते हैं? क्या हम उर्दू की लिपि और विरासत की पूरी शक्ति के साथ रक्षा करते हुए उसके साहित्य को दूसरी लिपियों के पाठकों तक पहुँचने से भयभीत नहीं होंगे? क्या साहित्य का विद्यार्थी सिनेमा पढ़ सकता है और सिनेमा का विद्यार्थी इतिहास? क्या अंग्रेज़ी में उपलब्ध विश्व-ज्ञान को अपनी भाषाओं में लाकर भारतीय समाज की बौद्धिक शक्ति को व्यापक बनाया जा सकता है?
ये केवल राही से संबंधित प्रश्न नहीं हैं। ये उस भारतीय सार्वजनिक कल्पना से जुड़े प्रश्न हैं जिसमें हम अपने भविष्य को देखना चाहते हैं।
मैं राही मासूम रज़ा का विशेषज्ञ नहीं हूँ। मैं उनका एक पाठक हूँ। विशेषज्ञ उनसे असहमत होने के अधिक कारण खोज सकते हैं और शायद उनकी अनेक स्थापनाओं को ऐतिहासिक या भाषावैज्ञानिक कसौटी पर संशोधित भी करना पड़े। लेकिन एक पाठक के रूप में मुझे उनकी दृष्टि में जो बात सबसे अधिक आकर्षित करती है, वह है उदार भारतीयता की बेचैनी। वे चीज़ों को अलग-अलग खाँचों में बंद देखकर सहज नहीं थे।
इसीलिए मुझे लगता है कि जन्मशती वर्ष में हिंदी और उर्दू दोनों की दुनिया के लोगों को राही पर सक्रिय होना चाहिए। भोजपुरी के लेखक और अध्येता भी इस बातचीत में शामिल हों। उनकी कृतियों को फिर से पढ़ा जाए, उनके उर्दू लेखन को नए पाठकों तक पहुँचाया जाए, हिंदी में उनकी उपस्थिति पर गंभीर काम हो, सिनेमा और टेलीविज़न में उनके लेखन को साहित्यिक अध्ययन के योग्य माना जाए और उनके भाषा-संबंधी साहसी विचारों से असहमति रखते हुए भी उनसे बहस की जाए।
राही की जन्मशती का उपयोग यदि हम हिंदी और उर्दू की पुरानी खाइयों को फिर से गहरा करने में करते हैं तो वह विडंबना होगी। उनके सहारे शायद इस हिंदी-उर्दू के दलदल से थोड़ा बाहर निकलने की कोशिश की जा सकती है। अपनी साहित्यिक-सांस्कृतिक धरोहर को बचाने का अर्थ उसे बंद कमरों में सुरक्षित रख देना नहीं है।
धरोहर तब बचती है जब उसे लोग पढ़ते हैं, सुनते हैं, देखते हैं, अनुवाद करते हैं, दूसरी लिपि में भी खोजते हैं, उससे बहस करते हैं और उसे अपने समय के प्रश्नों से जोड़ते हैं।
1857 ने हमें साथ लड़ने की स्मृति दी थी। नया दौर ने साथ मिलकर रास्ता बनाने का स्वप्न दिया। राही मासूम रज़ा ने साथ मिलकर अपनी सभ्यता और स्मृतियों को पढ़ने की भाषा दी।
उनकी जन्मशती पर सबसे अच्छी श्रद्धांजलि शायद यही होगी कि हम भाषाओं की विशिष्टताओं की रक्षा करें, लेकिन उनके बीच आवाजाही बंद न करें; अपनी-अपनी खिड़कियाँ खुली रखें; स्वामित्व की चौकियाँ थोड़ी कम करें और संवाद के रास्ते अधिक बनाएँ।
राही मासूम रज़ा किसी एक भाषा के साम्राज्य के लेखक नहीं थे। वे एक साझा सभ्यता की अलग-अलग आवाज़ों को सुनने और सुनाने वाले लेखक थे।
वे दीवारों के नहीं, रास्तों के लेखक थे।

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