(राधाकृष्ण की 18 सितंबर को जयंती है। यह विशेष टिप्पणी)
पंकज मित्र, वरिष्ठ कथाकार
राधाकृष्ण की कहानी रामलीला छोटे कलेवर में एक बड़ी कहानी है। पत्रिका के मात्र डेढ़ दो पृष्ठों में छपी यह कहानी विमानवीकरण की, राम के रावण में बदल जाने की परिस्थितियों की समूची दास्तान को जैसे हमारे सामने एक झटके में ला खड़ा करती । स्थितियों की टकराहट को एक ऐसे वक्त में बयान करती है जब देश में आजादी की आहटें अपने उरूज़ पर थी। 45-46 के आस-पास छपी इस कहानी की परिकल्पना ही मुश्किल लगती है जब हवाओं में एक आशाभरी उत्तेजना रही होगी लेकिन दृष्टि संपन्न कथाकार या कोई भी दृष्टिसंपन्न सर्जक तो कबीर की बतायी बीमारी से पीड़ित रहता ही है - ‘दुखिया दास कबीर है, जागे अरू रोवै’: आज़ादी हासिल होने से पहले ही उन स्थितियों का संघर्ष दिखाई पड़ने लगा जो आज़ादी के यूटोपिया के टूटने से घटित हुआ। राम से रावण में बदलनेवाले इस भारतीय मनुष्य का संकेत, या कहें कि उन परिस्थितियों का अशनिसंकेत प्रेमचंद अपनी कहानियों में दे चुके थे। परन्तु राधाकृष्ण ने विडम्बना के मारक प्रयोग से इन संकेतों को इतना जीवंत कर दिया कि पसे दीवार कुछ भी न रहा, स्थितियों की विडंबना को हमारे दौर के रचनाकार भी काफी स्पष्ट रूप से या यों कहें ज्यादा स्पष्ट देख पा रहे हैं क्योंकि नए बाजार के दौर में, बेशर्मी से छलछलाती पूंजी के इस समय में यह विमानवीकरण एक मिशन के तौर पर चल रहा है, लेकिन उस कालखंड में आशा और उल्लास को भेदकर उस पार देखना सचमुच चारों तरफ चल रही लीला के जादू को खंडित कर देना है, और राधाकृष्ण इस बारीकी और तटस्थता से इस काम को करते हैं जैसे कोई सिद्धहस्त सर्जन।
रामरतन रामलीला वाले की राम की तलाश रेणु की रसप्रिया कहानी के पंचकौड़ी मिरदंगिया की तलाश जैसी बिल्कुल नहीं है क्योंकि उसका उद्देश्य शुरू से ही पेशागत है। राधाकृष्ण उदात्त प्रेमकथा लिख भी नहीं रहे थे. वे तो लड़के की तरह आशा भरी दृष्टि से रंगून से आनेवाले मामा को देख रहे थे जो एक दोना मिठाई, रबर की गेंद, कोट और हाफपैंट देनेवाले थे और फिर कोई तकलीफ रहने वाली नहीं थी। यही आशा और उत्साह कहीं न कहीं हर भारतवासी को उद्वेलित कर रहा था। उछाह और विश्वासभरी पंक्तियां दी है राधाकृष्ण ने -‘‘हमारे एक मामा हैं सो बड़ी दूर रहते हैं, रंगून कहां है जानते हो ? हमारे मामा कहीं नौकरी करते हैं, जब वे आवेंगे तो मेरे लिए एक दोना मिठाई लावेंगे और एक रबर की गेंद लावेंगे। वे मेरे लिए कोट सिला देंगे और हाॅफपैंट खरीद देंगे. फिर कोई तकलीफ नहीं रहेगी’’. लेकिन बाद में जब मामा सचमुच आये और बालक को ले गये तो राम का रूपांतरण रावण में हुआ। यह रूपान्तरण किसी चमत्कार के रूप में नहीं हुआ बल्कि लेखक की विडंबना युक्ति के प्रयोग के कारण हुआ। ओ हेनरी की कहानियों की ट्विस्ट की तरह का अंत कहानी को प्रभावोत्पादक धारदार बनाता है। यह अनायास नहीं है कि मात्र बाईस वर्षों के अन्तराल में ही रामरतन की राम की तलाश रावण की तलाश में बदल गई। आजादी के वर्ष के आसपास का सांवला-सलोना राम बाईस वर्ष बीतते न बीतते रावण में परिणत होगा, इसका पूर्वाभास लेखक को था और यह कहानी सपनों के दरकने की - आजादी के स्वप्न से मोहभंग की भी कहानी के रूप में सामने आती है।
राधाकृष्ण कला की आंतरिक शक्ति के प्रति जितने सजग दीखते हैं उतने ही जीवन परिस्थितियों के संघर्ष के प्रति भी। अपने परवर्ती पीढ़ी के नयी कहानी के दौर के कथाकारों की तरह चरित्रों की मूल संवेदना का चित्रण और परिस्थितियों की विडंबना को गौण रखना शायद उनकी रूचि में नहीं होता क्योंकि जिस कथाकार को सरकारी बस में टिकट काटते हुआ राँची से लोहरदग्गा जाना-आना पड़ता हो उसके सामने जीवन स्थितियां सिर्फ विडंबनायें ही प्रस्तुत करती रही होंगी और जाने कितनी लीलायें रोज घटित होती रही होंगी। आवश्यकता थी तो सिर्फ दृष्टि संपन्नता की और राधाकृष्ण की कहानियों से गुजरते हुए यह दृष्टि संपन्नता बारं-बार चकित करती रहती है । चाहे वह रामलीला सी छोटे कलेवर की बड़ी कहानी ही क्यों न हो। शब्द स्फीति और सांकेतिकता के जरिये रामलीला एक विशाल परिदृश्य की कहानी बन जाती है। यह राधाकृष्ण जैसे कलासजग सर्जक ही साध सकते थे कि हर पंक्ति सांकेतिकता से भरी हो और छोटे-छोटे वाक्यों में शब्दों का अपव्यय न करते हुए बात रख दी जाये।
कुछ उदाहरण - उसकी मां को जो हिचक थी सो रूपयों की आवाज सुनते ही मिट-गई। ‘‘मैं आपसे पहले भी बहुत कुछ पा चुका हूं अब आज क्या मांगूं ? और अंत में रामरतन का कहना - हां तुम वही राम हो, मुझे याद आ गया, तुम वही राम हो’’ क्या आपको उन जनप्रतिनिधियों की याद नहीं दिलाती जिन्हें आजादी के बाद बड़े अरमान से देशहित में जन ने मान दिया, विश्वास रखा मगर .... कलात्मक अभिव्यक्ति रामलीला कहानी को एक ऐसी कहानी बनाती है जो खुद की सीमाएं उलांघ जाती है और एक क्लासिक कहानी का दर्जा आरक्षित कर लेती है।
(पंकज जी हिंदी के जानेमाने कथाकार हैं। कई संग्रह प्रकाशित। रांची में रहते हैं। आकाशवाणी से सेवानिवृत्त)

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