श्रवणकुमार गोस्वामी
बिहार ने कथा के क्षेत्र में जितने भी लेखक दिए राधाकृष्ण जी उनमें अग्रणी हैं। भाषा की सरलता और विनोद के खूब गहरे पुट के कारण वे समस्त हिंदी साहित्य में एक विशिष्ट स्थान के अधिकारी हैं। -रामधारी सिंह दिनकर
श्री राधाकृष्ण हिंदी के श्रेष्ठ कहानी-लेखकों में से हैं। मैं उनकी लेखनी से पूरी तरह परिचित और प्रभावित हुं। अपने निबंधों में मैंने उनका यथावसर उल्लेख किया है। -नंददुलारे वाजपेयी
हिंदी के माध्यम से आधुनिक भारत के प्रगतिशील जनवादी कथा-साहित्य को राधाकृष्ण की देन असाधारण है। अपनी पारदर्शी एवं तलस्पर्शी प्रतिभा के बल पर जन-मन के प्रेमचंदोत्तर रूपकारों की कतार में उन्होंने अपने लिए विशेष स्थान बना लिया है। व्यंग्य-विद्रूप, काकु और वक्रोक्ति की एक अपूवर् चाबुक हमारे इस साहित्यकार ने ईजाद की। शब्दशक्ति की उनकी यह चाबुक प्रतिगामी शिविरों में पिछले दो दशकों से दहशत का कारण बनी हुई है। -नागार्जुन
व्यक्ति और साहित्यकार दोनों ही रूपों में उनके जोड़ के व्यक्ति बहुत थोड़े मिलेंगे। उन जैसे सरल, स्नेही, निष्कपट, हंसमुख लोग बहुत कहां मिलते हैं ...प्रचार और दलबंदी से दूर रहकर इस आदमी ने सच्चे दिल से साहित्य की सेवा और साधना की है। -अमृत राय
रामधारी सिंह दिनकर, नन्ददुलारे वाजपेयी, नागार्जुन तथा अमृत राय की उपरिलिखित पंक्तियों को उद्धृत करने का उद्देश्य यहां साहित्यकार राधाकृष्ण के व्यक्तित्व को महिमामंडित करने का प्रयास न माना जाये। इन पंक्तियों से राधाकृष्ण की यदि कोई उज्ज्वल छवि बनती है, तो इसका लक्ष्य यही मात्रा है कि लोगों के सामने यह भी प्रकट होना चाहिए कि राधाकृष्ण कैसे इस ऊंचाई को प्राप्त कर सके कि 1954 को उनका नागरिक अभिनंदन किया गया। केवल 44 वर्षों की आयु में इस प्रकार के नागरिक अभिनन्दन का आयोजन किया जाना अपने आप में ही एक ऐतिहासिक घटना है।
ऐसा शानदार अभिनन्दन फिर न साहित्यकार या राजनेता या किसी व्यक्ति का रांचीवासियों द्वारा किया जा सका। यह अभिनन्दन अभूतपूर्व था। परंतु, इस अभूतपूर्व अभिनन्दन के पात्र बनने में राधाकृष्ण को-किन प्रकार की कठिन परीक्षाओं के बीच से गुजरना पड़ा, यह एक बहुत लंबी संघर्षपूर्ण और यातनापूर्ण कथा है, जिसके सत्य होने के बावजूद इस पर विश्वास करना कठिन हो जाता है।
यहां राधाकृष्ण के पारिवारिक जीवन का थोड़ा परिचय प्राप्त कर लेना उचित होगा। मुंशी रामजतन लाल अपर बाजार, रांची में रहते थे। वह रांची कचहरी में मुंशी का काम किया करते थे। वह अच्छी कमाई कर लिया करते थे। कहा जाता है कि उनके घरों में हर दिन दोनों जून सौ आदमियों का भोजन बनाया जाता था, क्योंकि घर में ऐसे अनेक लोग पड़े रहते थे जिनकी आय का कोई स्रोत नहीं था। मुंशीजी दयालु प्रकृति के व्यक्ति थे। ऐसे जरूरतमंदों की सहायता करना वह अपना धर्म मानते थे।
मुंशीजी की छह बेटियां थीं। पांच लड़कियों का विवाह कर चुके थे। सभी लड़कियां अच्छे घरों में गयी थीं। अभी एक बेटी का विवाह करना बाकी था। उसी दौरान मुंशीजी की आय काफी घट गयी। उस खर्च को पूरा करने के लिए उन्हेंं अक्सर कर्ज लेना पड़ता था। मुंशीजी चिंतित और अस्वस्थ रहने लग गये। ऐसे ही समय में मुंशीजी के सुपुत्र राधाकृष्ण का जन्म हुआ। राधाकृष्ण की एक बड़ी बहन थीं-माना। उनका विवाह तय हो चुका था। विवाह के सारे सामान कर्ज के रुपयों से खरीदे जा चुके थे।
इस बीच एक दुखद द्घटना में उनका निधन हो गया। यह घटना इस प्रकार है-माना दीदी धार्मिक विचारों की थीं। रोज पूजा किया करती थीं। इस पूजा के पीछे एक दिन उनकी जान भी चली गयी। तुलसी-चबूतरा के सामने वे हाथ जोड़कर पूजा कर रही थीं कि तन्मयता में उनका आंचल धूपदानी में पड़ गया। आंचल में आग लग गयी, पर उन्हेंं होश न रहा। जब होश हुआ तब कोई उपाय भी नहीं था। तब तक सारे वस्त्रा लगभग जल चुके थे। सारा शरीर जल गया और लगभग दो घंटे के भीतर ही उनके प्राण निकल गये।
इस घटना ने मुंशी रामजतन लाल को पूरी तरह तोड़ दिया। बेटी को श्मशान में जलाकर मुंशीजी घर आये और चारपाई पर गिर पड़े। अंतत: उनकी इहलीला भी जुलाई को समाप्त हो गयी। उस समय राधाकृष्ण की उम्र छह साल की भी नहीं हो सकी थी। राधाकृष्ण की मां का नाम था सूर्यकुमारी देवी। उनका रंग गोरा था और स्वभाव से काफी मिलनसार थीं वह।
मुंशीजी के देहांत के बाद घर की स्थिति बहुत चिंतनीय हो गयी जिसका हाल राधाकृष्ण ने अपने शब्दों में लिखा है-उस समय हमलोग बड़ी गरीबी के बीच से गुजर रहे थे। पिताजी मर चुके थे। घर में कर्ज और गरीबी छोड़ कुछ भी नहीं बचा था। न पहरने को कपड़ा और न खाने को अन्न। किसी प्रकार कुटौना-पिसौना करके मां गरीब-गुजारा चला लेती थी।
पास-पड़ोस के लोग हमलोगों को तुच्छ समझते थे। अक्सर हम लोगों की उपेक्षा-अवहेलना करके हमारा मजाक उड़ाना ही उन लोगों को पसंद था। खेलते समय हमजोली लड़के भी मुझसे घृणा करते थे। फलत: मैं उन मित्रों के साथ रहना अच्छा नहीं समझता था जो गरीब होने के कारण ही मुझसे घृणा करते थे। वे घृणा और उपेक्षा को ही अपना महत्व समझते। पर मेरे सामने ऐसे लड़के भी आए जो पढऩे-लिखने में तो नहीं, पर प्रेम का जवाब प्रेम से दे सकते थे। वैसे मित्रों के साथ मटरगश्ती करना मुझे अच्छा लगता था। उन्हीं मित्रों के साथ रह कर मैंने बीड़ी पीना और पान के साथ जरदा खाना भी सीख लिया।
स्कूल की पढ़ाई चल नहीं पाती थी। पढऩे-लिखने की रुचि तो थी, पर स्कूल की पफीस दे सकना पार नहीं लगता था। आज इस स्कूल में हूं तो कल उस स्कूल में गया। इसी तरह किसी प्रकार चल रहा था। अभाव के कारण न जाने कितने स्कूलों में मेरा नाम लिखा गया और काटा गया। स्कूली पढ़ाई ठीक से चल नहीं पाती थी। पर पिफर भी मेरा अध्ययन आरंभ हो गया।
शहर में एक पुस्तकालय था। नाम था उसका हिन्द स्वाधीन पुस्तकालय। उस पुस्तकालय का मैं सदस्य था। वहा जाकर तो पढ़ता ही था। घर में भी किताबें लाता और पढ़ा करता। सच पूछिए तो वहीं के अध्ययन ने हमारी रुचि को विकसित तथा परिष्कृत किया। अगर सच पूछा जाय तो जो काम विश्वविद्यालय से नहीं हो सकता था, वह काम पुस्तकालयों के द्वारा हो सकता है। आज भी वह पुस्तकालय रांची में संतुलाल पुस्तकालय के नाम से चल रहा है।... आज भी वह पुस्तकालय है और मेरे लिए किसी देव-मंदिर की तरह है, पर मैं उस पुस्तकालय में जाता नहीं।
जो भी हो, तो हमारी जिंदगी का यही किस्सा रहा। गरीबी में बचपन गुजरा और लाइब्रेरी में शिक्षा मिली। जब बड़ा हुआ तो उस जिंदगी को चलाने के लिए भी तरह-तरह के पापड़ बेलने पड़े। पहले तो कचहरी में वकील के मुहर्रिर की ट्रेनिंग लेता था।... इस काम में मेरा मन लगता नहीं था, पर मां की इच्छा थी इसलिए मन मार कर कचहरी जाना पड़ता था। उन्हीं दिनों मैंने कुछ लिखना भी शुरू कर दिया था।...
उन दिनों स्व. श्री जयशंकर प्रसाद के मामा हिन्दी गल्प-माला नामक मासिक पत्रिाका निकाला करते थे। उनका नाम था अम्बिका प्रसाद गुप्त। सन् 1929 के अप्रैल में उन्होंने ही मेरी पहली कहानी छापी थी। उस कहानी का नाम था सिन्हा साहब। तब से मैं बराबर उनके पास कहानी भेजने लगा और वहां मेरी रचनाएं स्थान पाने लगीं।
सबसे अधिक मैं उस समय लिख पाया जब मैं मोटर बस में कंडक्टर का काम करता था। रोज रांची से लोहरदगा जाता। रात को द्वारका प्रसाद ; जो आजकल घेरे के बाहर नामक उपन्यास के कारण ख्याति पा चुके हैं आदि की बैठक होती। गप-शप चलता रहता। फिर जब लोग रात के समय सो जाते, मैं लिखना शुरू करता। नींद में जो कसर होती वह दूसरे दिन रांची में दिन के समय पूरी हो जाती।
वैसे दिन पिफर मेरी जिंदगी में न आये और न आने को है। प्रेमचंद ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और संवारा था। उनके संपादन काल में राधाकृष्ण ने 'हंस' और 'जागरण' में बड़े नियमित ढंग से और खूब जमकर लिखा-गंभीर कहानियां, राधाकृष्ण के नाम से और हंसी-दिल्लगी की कहानियां घोष-बोस-बनर्जी-चटर्जी के नाम से। इनकी तेजस्विनी प्रतिभा से प्रेमचंद इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कहा कि यदि हिंदी के उकृष्ट कथा-शिल्पियों की संख्या काट-छांट कर पांच भी कर दी जाये तो उनमें एक नाम राधाकृष्ण का होगा।
संभवत: पचीस वर्ष से नीचे की उम्र के किसी युवा कथाकार की ऐसी प्रशंसा कभी नहीं हुई होगी। प्रेमचंद के देहावसान के बाद शिवरानी देवी ने राधाकृष्ण को हंस का काम देखने के लिए बनारस बुला लिया। बाद में श्रीपत राय के साथ मिलकर उन्होंने कहानी नामक पत्रिका निकाली। कहानी तो जम गयी, पर राधाकृष्ण बनारस में नहीं जम सके। तब वह बंबई चले गये। फिल्मों में कहानी और कथोपकथन लिखने लगे। आय के हिसाब से यह काम ठीक था। पर अस्वस्थ होकर वह रांची आ गये।
1944 में भगवतीचरण वर्मा बाम्बे टाकीज से हट रहे थे। उस समय राधाकृष्ण को फिर बम्बई बुलाया गया। मगर राधाकृष्ण नहीं गये। सन् 1942 में कांति देवी से राधाकृष्ण का विवाह हो गया। विवाह के बाद राधाकृष्ण ने रांची में रहने का फैसला कर लिया। राधाकृष्ण के मन में रांची के लिए एक विशेष मोह था। उस मोह के कारण वह न बनारस में रुक सके थे और न बम्बई में। न वह कलकत्ता में ठहर सके और न पटना में।
सन् 1947 में बिहार सरकार ने यह तय किया कि पटना से 'बिहार समाचार' तथा रांची से 'आदिवासी' नामक साप्ताहिक पत्रिकाओं का प्रकाशन किया जाये। दोनों पत्रिकाओं के लिए संपादकों की तलाश जारी थी। बिहार के शिक्षा मंत्री बद्रीनारायण वर्मा ने अपने एक प्रतिनिधि को राधाकृष्ण के पास भेजा और कहा कि आप 'आदिवासी' और 'बिहार समाचार' दोनों में से जिस पत्रिका का संपादक बनना चाहें, सोचकर अपना निर्णय बता दें। बिहार समाचार के संपादक के रूप में आपको अधिक वेतन दिया जाएगा तथा आदिवासी के रूप में कम वेतन। राधाकृष्ण ने बिहार समाचार के प्रस्ताव को अस्वीकार कर कम वेतन पर आदिवासी का संपादक बनना स्वीकार कर लिया। उन्होंने ऐसा क्यों किया? राधाकृष्ण ने जो इसका उत्तर दिया था, वैसा जवाब केवल राधाकृष्ण जैसा ही अपनी जमीन से गहरा लगाव रखने वाला साहित्यकार ही दे सकता था-इस भूभाग में साहित्यकारों को प्रोत्साहित करने की मेरी तीव्र आकांक्षा थी। हृदय से मैं समझ रहा था कि मैं इस क्षेत्र की जनता और बिहार सरकार के बीच एक सेतु-स्वरूप हूं। मैं सेवा भाव से पथ पर चलते हुए इस क्षेत्र के दूर-दराज के गांवों में जाकर आलोक फैलाऊंगा।
आदिवासी बिहार जन-संपर्क विभाग द्वारा रांची से प्रकाशित होने वाला एक साप्ताहिक पत्रा था, जिसमें सरकारी समाचारों के अतिरिक्त कुछ प्रचारात्मक सामग्रियां रहती थीं। यदा-कदा कुछ लेख भी छपते रहते थे। इस प्रकार के पत्रा से साहित्य की सेवा की बात सोची भी नहीं जा सकती थी। परंतु, राधाकृष्ण छोटा नागपुर की माटी के कण-कण को जानते थे। उन्हेंं यह पता था कि यहां जनजातीय भाषाओं में मुंडारी, कुडुख, हो, संताली तथा खडिय़ा एवं क्षेत्राीय भाषाओं के रूप में नागपुरी, कुरमाली, खोरठा तथा पंचपरगनिया लोक भाषाओं का ही प्रचलन है। मगर, इन भाषाओं के पास ऐसा कोई मंच नहीं था, जिसके सहारे इन लोक भाषाओं के साहित्य और इनके साहित्यकारों को पफलने-फूलने का अवसर प्राप्त हो सके।
राधाकृष्ण के समक्ष यह स्पष्ट था कि छोटा नागपुर भाषाओं की दृष्टि से एक संपन्न भूखण्ड है और इसकी भाषिक संपदा को विकसित करने की आवश्यकता है। इसलिए उन्होंने अपने पत्र आदिवासी के अंकों में यहां की लोकभाषाओं को स्थान देना शुरू कर दिया। क्षेत्रीय भाषाओं की रचनाओं को मूल भाषाओं में ही प्रकाशित किया जाता था। जनजातीय भाषाओं की कविताओं को मूल भाषा के साथ-साथ हिन्दी अनुवाद के साथ प्रकाशित किया जाता था।
आदिवासी के दो विशेषांक स्वतंत्राता दिवस अंक तथा गणतंत्रा दिवस अंक प्रकाशित होते थे। ये दोनों ही विशेषांक जनजातीय तथा क्षेत्राीय भाषाओं की रचनाओं के कारण संग्रहणीय बन जाया करते थे। इस प्रकार राधाकृष्ण ने आदिवासी के द्वारा यहां की सभी लोकभाषाओं को एक साझा मंच प्रदान किया था। उन्होंने जो कार्य बीजरूप में किया था, आज वह रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्राीय भाषा एवं साहित्य विभाग के रूप में पुपति एवं पल्लवित हो रहा है।
राधाकृष्ण की पहली कहानी सिन्हा साहब सन् 1929 में प्रकाशित हुई और तब से वह आजीवन लिखते ही रह गये। उनकी जिन-जिन पत्रा-पत्रिाकाओं में रचनाएं प्रकाशित होती रहीं, आज उनकी अद्यतन सूची भी उपलब्धि नहीं है। उन्होंने केवल कहानियों, उपन्यासों, हास्य तथा व्यंग्य की रचनाओं और नाटकों को ही नहीं लिखा। उन्होंने बालकोपयोगी, किशोरोपयोगी तथा वयस्कों के लिए भी कापफी लेखन किया। अनेक पुस्तकों का उन्होंने संपादन भी किया।
इस दृष्टि से उन्होंने प्रचुर साहित्यिक लेखन किया। उनकी अधूरी किताबों की भी पर्याप्त संख्या है, जिनमें कहानी-संग्रह, लघु कथाएं, नाटक, रेडियो नाटक तथा कई उपन्यास भी सम्मिलित हैं। मगर, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित अपनी रचनाओं को सुरक्षित रखने पर उचित ध्यान नहीं दिया, फलत: आज उनकी कापफी रचनाओं का अता-पता भी नहीं मिल पाता।
राधाकृष्ण के देहांत के बाद उनके छोटे पुत्र सुधीर कुमार लाल ने उनकी रचनाओं की देख-भाल में अपने को लगा दिया है, अत: उनकी मुख्य रचनाएं आज उपलब्ध हो जाती हैं। मेरे जानते खपरैल मकान के कारण राधाकृष्ण के साहित्य एवं उनके अनेक बहुमूल्य साहित्यिक दस्तावेज भी नष्ट हो गए। जगदीशचन्द्र माथुर तब आकाशवाणी के महानिदेशक थे। उनके कार्यकाल में साहित्यकारों को आकाशवाणी में प्रोड्यूसर तथा सहायक प्रोड्यूसर के रूप में नियुक्त किया जा रहा था। इसी क्रम में राधाकृष्ण को भी आकाशवाणी, पटना में प्रोड्यूसर बनाया गया। सन् 1957 में जब रांची में आकाशवाणी के केन्द्र की स्थापना हो गयी तो राधाकृष्ण को रांची ही बुला लिया गया। पटना तथा रांची में रहते हुए उन्होंने अनेक मौलिक नाटकों की रचना भी की और अन्य लेखकों के नाटकों को प्रसारणार्थ प्रस्तुत भी किया। परंतु, आकाशवाणी की नौकरी के अनुभव बड़े कटु रहे।

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