संजय कृष्ण
‘‘प्रेमचंद का जो व्यक्तित्व था वह न सूरज की तरह चमकता हुआ था न चांद की तरह दमकता हुआ। वह बनारस जिले के ठेठ किसान की तरह था, जिसे आप कहीं ऊंख के खेत के भीतर से निकलते हुए देख सकते हैं, जो किसान उर्द और मटर के खेतों के बीच से कुछ सोचता हुआ जा रहा हो, जो किसान रहट के पास बैठा हुआ हो और कुछ विचार कर रहा हो। उस सीधे-साधे निष्कपट व्यक्तित्व के भीतर साहित्य की बड़ी-बड़ी बातें हैं, यह पता ही नहीं चल सकता था। लमही गांव के किसानों के लिए वह ‘भैयाजी’ था, मुंशी नवाब राय था। वह उन्हीं की तरह बातें करता था, उन्हीं की तरह रहता था। वे तो यह भी जाने थे कि अपने घर में बैठकर यह क्या लिखा करते हैं? सोचते थे कि अरे भाई मुंशी है, लिख रहा होगा कुछ। खेवट-खतियान की नकल उतार रहा होगा, जमीनों की चैहद्दी लिख रहा होगा, अर्जी तैयार कर रहा होगा। हां, बेचारे गांव के किसान क्या जानें कि इस कागज और उस ब्लाटिंग-पेपर में क्या फर्क है। यह आदमी, और साहित्य! मगर जो जानता था वह ताज्जुब करता था।’’
प्रेमचंद कैसे थे, क्या थे, इस उद्धरण से साफ-साफ पता चलता है। यह राधाकृष्ण के संस्मरण की आरंभिक पंक्तियां हैं और अंत इस तरह करते हैं-‘‘प्रेमचंद की एक चिट्ठी की याद आती है, जिसमें उन्होंने लिखा था कि मैं जवानी के दिनों में रेलवे-गार्ड होना चाहता था, इससे जगह-जगह घूमने का मौका मिलता, तरह-तरह के पात्रों से भेंट होती, न जाने कितनी कहानियों के प्लाट मिलते।’’ लेखन उनका जीवन था। उसमें उनकी सांसें बसती थीं। अभाव के बीच भी उनकी कलम नहीं रुकती। संकट में भी पत्रिकाएं निकाल रहे थे।
प्रेमचंद की नजर में राधाकृष्ण
राधाकृष्ण हिंदी साहित्य का एक अनजाना नाम है। न उनकी जयंती मनाई जाती है न पुण्यतिथि। वह किसी मठ के सदस्य नहीं थे। इसलिए, बहुत से लोग जानते हुए भी अनजान बनने का ढोंग करते रहते हैं। हमारा हिंदी साहित्य का समाज कुछ ऐसा है। विपुल लेखन के बाद भी हम उन्हें भूल गए हैं। प्रेमचंद ने इनकी प्रतिभा को देखकर उस समय हिंदी के सर्वश्रेष्ठ पांच कथाकारों में इन्हें शुमार किया था। लिखा था-‘‘यदि हिंदी के उत्कृष्ट कथा शिल्पियों की संख्या काट-छांटकर पांच भी कर दी जाए तो उनमें एक नाम राधाकृष्ण का होगा।’’
मई 1936 के हंस में उन्होंने राधाकृष्ण के विषय में लिखा था-‘‘आपकी कई कहानियां प्रसिद्ध हो चुकी हैं। आपकी रचनाओं में हास्य और व्यंग्य की चाशनी रहती है।’’
प्रेमचंद ने राधाकृष्ण का परिचय कुछ इस तरह दिया था। आगे चलकर अपने लेखन के स्तर पर वे इस कसौटी पर खरे भी उतरे। उन्होंने झारखंड की कहानियां लिखीं। सांप्रदायिकता को लेकर उनकी कहानियां हैं। आदिवासी जन जीवन का संघर्ष भी उनकी कहानियों में दर्ज है। बहुविध और बहुमुखी प्रतिभा उनके भीतर थी।
प्रेमचंद के निधन के बाद उन्होंने ‘हंस’ निकालने में शिवरानी देवी की मदद की। यह भी उल्लेखनीय है कि प्रेमचंद की तरह ही उन्होंने भी अनेक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया और उससे जुड़े रहे- महावीर, संदेश (1930), माया (1931), हंस (1936), कहानी (1937), झारखंड (1938), स्वाभिमान आदि। स्वाभिमान लखनऊ से प्रकाशित होती थी। ‘आदिवासी’ का संपादन 1947 से 1970 तक रांची से किया। यह बिहार सरकार की पत्रिका थी।
राधाकृष्ण: रांची से हिंदी साहित्य तक
राधाकृष्ण का जन्म रांची के अपर बाजार में 18 सितंबर, 1910 को हुआ था और निधन 3 फरवरी, 1979 को। कहानी, उपन्यास, हास्य-व्यंग्य, बाल साहित्य, नाटक, संस्मरण, रेडियो रूपक, कविता, गद्यगीत आदि में उनकी प्रतिभा को देख सकते हैं। बिहार सरकार के लिए कई वृत्तचित्र भी बनाए। कलकत्ता के महान फिल्मकार ऋत्विक घटक पचास के दशक में उनके साथ मिलकर सरकार के लिए आधा दर्जन झारखंड पर वृत्तचित्र का निर्माण किया। तब ऋत्विक घटक 25 साल के थे। झारखंड से ऋत्विक घटक का परिचय कराने वाले राधाकृष्ण ही थे। बाद में ऋत्विक घटक ने झारखंड पर कई फिल्में बनाईं। राधाकृष्ण ने फिल्म लेखन भी किया। मुंबई में भी रहे और कई कहानियां लिखीं। शुरुआती दौर में रामानंद सागर के साथ भी जुड़े रहे। बाद में मुंबई रास नहीं आई तो रांची लौट आए। रांची से इतना लगाव था कि वे बहुत दिनों तक बाहर नहीं रह पाते।
फोटोग्राफी का शौक और बस कंडक्टरी करते हुए राधाकृष्ण ने कई कालजयी कहानियां कागज पर उतारीं। राधाकृष्ण का लेखन 1927-28 से लेकर 1979 तक फैला हुआ है। उनकी प्रारंभिक कहानियां 1927-28 में रांची के स्थानीय लेखक त्रिवेणी प्रसाद के संपादन में हस्तलिखित पत्रिका ‘विवेचन’ में प्रकाशित हुईं। इनमें उनके कई गद्यगीत भी प्रकाशित हुए। 1928 से राधाकृष्ण ने भी एक हस्तलिखित पत्रिका ‘वाटिका’ निकालना शुरू किया। इनकी प्रारंभिक कहानियां इन्हीं दो हस्तलिखित पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। 1929 के मार्च महीने में बनारस से प्रकाशित ‘हिंदी गल्पमाला’ में उनकी एक कहानी ‘सिन्हा साहब’ प्रकाशित हुई। यह उनकी पहली प्रकाशित कहानी है। इसके बाद इनकी कहानियां भविष्य, जन्मभूमि, महावीर, तपस्या आदि में प्रकाशित होती रहीं। इन्हीं में सामाजिक व मानवीय संवेदना से ओतप्रोत कहानियों को पढ़कर प्रेमचंद ने राधाकृष्ण के पास पत्र लिखा और मिलने को कहा। 1929 में राधाकृष्ण लखनऊ जाकर उनसे मिले।
जब राधाकृष्ण उनके समक्ष प्रस्तुत हुए थे उस समय राधाकृष्ण की उम्र 18-19 साल थी। वह अचंभित हुए इस उम्र का यह लड़का इतना परिपक्व लेखन कर रहा है। उनके मानस में था कि राधाकृष्ण कोई उम्रदराज व्यक्ति होगा। उस समय प्रेमचंद ‘चांद’ पत्रिका का संपादन कर रहे थे और ‘हंस’ पत्रिका निकालने की तैयारी में लगे हुए थे। ‘हंस’ पत्रिका के लिए कहानी भेजने को कहा। साथ ही, कहानी की विषय वस्तु के साथ-साथ कई सूत्र भी दिए। ‘हंस’ पत्रिका के प्रवेशांक में राधाकृष्ण की ‘धोखा’ कहानी प्रकाशित हुई।
प्रेमचंद से मिली पहचान और अपनी अलग साहित्यिक राह
राधाकृष्ण दो नामों से कहानियां लिखते थे। घोष-बोस-बनर्जी-चटर्जी नाम से हास्य-व्यंग्य और अपने मूल नाम राधाकृष्ण नाम से कहानियां या अन्य रचनाएं। बहुत से लोगों को विश्वास था कि घोष-बोस-बनर्जी-चटर्जी कोई और नहीं, प्रेमचंद ही हैं। किंतु बहुत दिनों तक यह भ्रम कायम नहीं रह सका और यह बात सार्वजनिक हो गई कि इस नाम से लिखने वाला कोई और नहीं, राधाकृष्ण ही हैं।
राधाकृष्ण को एक कथा परंपरा मिली थी, जिसके दो व्यक्तियों ने उन्हें प्रेरित और प्रभावित किया था। एक व्यक्तित्व प्रेमचंद का था, जो जीवन के यथार्थ को समग्रता और विविधता में रूपायित करता था, दूसरा व्यक्तित्व जी.पी. श्रीवास्तव का था, जो परिवेश से असंगत और मनोरंजक व्यक्तित्वों और व्यवहारों का चुनाव करता था।
राधाकृष्ण के कथालेखन में ये दोनों व्यक्तित्व एक में रूपांतरित हो रहे थे। उन्होंने हास्य-व्यंग्य में एक अलग लीक कायम की। 1929-30 के दौरान राधाकृष्ण ने हास्य-व्यंग्य परंपरा को बहुत गहराई से प्रभावित किया। आचार्य नलिन विलोचन शर्मा ने राधाकृष्ण का उल्लेख ‘हास्य और व्यंग्य’ के क्षेत्र में युगांतर लाने वाले व्यक्ति के रूप में किया है। इसलिए बनारस के हास्य-व्यंग्यकारों-विश्वनाथ बनर्जी, भानुशंकर मेहता आदि ने 1954 में ‘राधाकृष्ण स्कूल’ की बात उठाई थी (बना रहे बनारस, ज्ञानपीठ)।
साहित्य के जरिए समाज और गांव से जुड़ने की कोशिश
राधाकृष्ण केवल लेखन के स्तर पर ही सक्रिय नहीं थे। वे समाज में साहित्य के प्रचार-प्रसार का उपक्रम भी करते थे ताकि गांव तक साहित्य की लौ जले और उसकी रोशनी में समाज में एक जाग्रति पैदा हो। अंग्रेजों की सत्ता को चुनौती देने के लिए गांव-गांव जागरण जरूरी था और साहित्य एक बेहतर माध्यम था। इसलिए, राधाकृष्ण अपने पैतृक जिले गुमला में एक साहित्य आश्रम खोलना चाहते थे।
राधाकृष्ण के पुत्र सुधीर लाल बताते हैं कि ‘‘सन् 1934 में गुमला में साहित्य आश्रम नामक एक साहित्यिक संस्था की स्थापना की थी, जिसका उद्घाटन करने के लिए प्रेमचंद अपनी पत्नी शिवरानी देवी के साथ रांची आने वाले थे। अचानक उनका तार आया कि रांची नहीं आ पाऊंगा क्योंकि मुझे मजदूर फिल्म के निर्माण के लिए बंबई जाना पड़ रहा है।
गुमला और रांची में उनका ठहरने का भी कार्यक्रम था। गुमला से उन्हें राधाकृष्णजी की बड़ी बहन के गांव नरकोपी और पहाड़ कंडरिया जाना था। राधाकृष्ण की बड़ी बहन की शादी पांडेय परिवार में हुई थी। मुगल बादशाह जहांगीर ने बनारस के श्रीवास्तव कायस्थ परिवार को ‘पांडेय’ उपाधि प्रदान की थी। तभी से यह परिवार अपने नाम के आगे पांडेय उपाधि धारण करता आ रहा है।
जैसे महाराजा छोटानागपुर से जुड़े हुए परिवार-पांडेय गणपत राय, पांडेय बिरेंद्र नाथ राय, पांडेय ललित मोहन नाथ राय आदि। यह परिवार भी बनारस से आकर महाराजा छोटानागपुर के साथ जुड़ा था। प्रेमचंद का वास्तविक नाम पांडेय धनपत राय था। वह भी बनारस के लमही गांववासी थे और छोटानागपुर में रह रहे पांडेय परिवार के साथ उनका गोतियारी रिश्ता भी था, परंतु कई पीढ़ी से उन दोनों का रिश्ता कायम नहीं के बराबर रह गया था।
उसी गोतियारी रिश्ते को पुनर्जीवित करने के सिलसिले में उन्हें नरकोपी और पहाड़ कंडरिया गांव जाना तय था। गुमला में राधाकृष्ण ने साहित्य आश्रम स्थापना के सिलसिले में युवा रचनाकारों--जनार्दन प्रसाद झा ‘द्विज’, जानकी वल्लभ शास्त्री, आरसी प्रसाद सिंह, बलदुआ जी, हंस कुमार तिवारी आदि को बुला रखा था।
प्रेमचंदजी के नहीं आने पर जनार्दन प्रसाद झा ‘द्विज’ ने साहित्य आश्रम का उद्घाटन किया। उद्घाटन के दिन राधाकृष्ण लिखित नाटक ‘जंगली डाकू’ का मंचन हुआ था जिसमें राधाकृष्ण ने मुख्य भूमिका निभाई थी। उसी दिन सर्व भाषा कवि सम्मेलन भी हुआ था, जिसमें हिन्दी, नागपुरी और जनजातीय भाषा के कवियों ने कविता पाठ किया था। कुडुख कवि आयता उरांव ने पहली बार मंच से कविता पाठ किया था। ऐसा आयोजन पहली बार गुमला में किया गया था।
रांची में भी प्रेमचंद जी का सम्मान आर्य समाज मंदिर और संतुलाल पुस्तकालय में किया जाना तय हुआ था। रांची आर्य समाज के प्रधान बैरिस्टर श्यामकृष्ण सहाय अपनी गतिविधियों की जानकारी से अवगत कराने वाले थे क्योंकि प्रेमचंद और शिवरानी देवी भी आर्य समाजी थे।
प्रेमचंद लाहौर आर्य समाज अधिवेशन की अध्यक्षता कर चुके थे। वह सामाजिक सुधार के लिए प्रतिबद्ध भी थे। आर्य समाज के सामाजिक सुधार आंदोलन से प्रभावित होकर ही उन्होंने बाल विधवा शिवरानी देवी के साथ शादी की थी।
राधाकृष्ण और प्रेमचंद के बीच प्रगाढ़ संबंध थे। उनके बीच पत्राचार होता रहता था। राधाकृष्ण की पहचान प्रेमचंद जी की जीवन काल में ही प्रेमचंदीय धारा के लेखक के रूप में बन चुकी थी।
प्रेमचंदजी के निधन के बाद जयशंकर प्रसाद, रायकृष्ण दास और शिवरानी देवी ने मिलकर राधाकृष्ण को ‘हंस’ पत्रिका का कार्यभार सौंप दिया था।’’
कहानी कुछ इस तरह थी। अक्टूबर 1936 में प्रेमचंद मृत्यु शैय्या पर थे। जयशंकर प्रसाद और रायकृष्ण दास सुबह-सुबह प्रातः भ्रमण करते थे। भ्रमण के बाद प्रेमचंद को देखने प्रतिदिन जाया करते थे।
एक दिन दोनों गमगीन हो गए, इसलिए कि उन्हें आभास हो गया था कि अब प्रेमचंदजी नहीं रहेंगे। उन दोनों की एक चिंता यह भी थी कि अब हंस पत्रिका का क्या होगा?
इस प्रसंग पर शिवरानी देवी से बात हुई। सितंबर में राधाकृष्ण की मां सूर्यवंशी कुंवर गुजर गई थीं। इसलिए राधाकृष्ण को रायकृष्ण का तार आया कि बनारस आ जाओ। उन्हें खबर मिल गई कि प्रेमचंद भी अब इस दुनिया में नहीं रहे।
मां और प्रेमचंद के गुजर जाने पर वे टूट गए थे। वे इस संसार में बिल्कुल अकेले हो गए थे। बनारस पहुंचने पर राधाकृष्ण जी को हंस पत्रिका की जिम्मेदारी सौंप दी गई।
राधाकृष्ण हंस पत्रिका का प्रकाशन करने लगे हालांकि संपादक में शिवरानी देवी का नाम दिया जाता था, सम्मानपूर्वक अपना नाम नहीं जाने दिया था।
जब राधाकृष्ण बनारस में रहते हुए हंस पत्रिका संचालन कर रहे थे। इस संबंध में एक संस्मरण उन्होंने दैनिक आज के रविवारीय अंक में जयशंकर प्रसाद पर लिखा था- ‘‘सुबह पांच साढ़े पांच बजे प्रातः भ्रमण के दौरान आते थे। मैं बाहर दातून कर रहा होता था। वह पाकेट से एक रचना देते हुए कहते- कोई सामग्री की कमी हो तो मेरे पास आ जाना।’’
सुधीरजी बताते हैं कि राधाकृष्णजी ने प्रेमचंद पर कई संस्मरण लिखे हैं जो दृष्टिकोण, नईधारा, आज, हंस आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए थे। साहित्य अकादमी ने प्रेमचंद पर केंद्रित संस्मरण व लेख पर एक संग्रहित पुस्तक तैयार की थी, उसमें राधाकृष्ण का संस्मरण प्रकाशित है। इन्हें खोजने की जरूरत है।
प्रेमचंद की जयंती पर राधाकृष्ण ने उनके साथ गुजारे समय की बात करते थे। रांची की एक सभा में उन्होंने कई संस्मरण सुनाये थे।
उन्होंने कहा था- प्रेमचंदजी ग्रामीण परिवेश में रहना पसंद करते थे। 1934 को होली के समय राधाकृष्ण लमही गांव में उनके साथ थे। कबीरा गाते हुए गांव वालों की टोली आई, प्रेमचंद टोली में शामिल होकर लमही गांव का भ्रमण किया, अबीर-गुलाल लगाते हुए।
अमृत राय जब प्रेमचंद जी की जीवनी ‘कलम का सिपाही’ की पांडुलिपि तैयार कर रहे थे तब वह महीनों राधाकृष्ण के साथ रांची में रहे थे।
पत्रों और संस्मरणों में बची प्रेमचंद की यादें
एक और घटना का उल्लेख जरूरी है। कहते हैं, क्षितिंद्र मोहन मित्र ‘माया’ पत्रिका के लिए एक योग्य व्यक्ति की खोज में थे जो उस साहित्यिक पत्रिका का दायित्व निभा सके। वह इस सिलसिले में प्रेमचंद से मिले। उन्होंने राधाकृष्ण के नाम का सुझाव दिया। इस तरह राधाकृष्ण 1934 में ‘माया’ पत्रिका में काम करने इलाहाबाद चले गए। माया पत्रिका में राधाकृष्ण की कहानी ‘मां-बेटी’ प्रकाशित हुई थी, जो तब के समय सर्वाधिक चर्चा में आई थी। 1934 में प्रेमचंद ने गणेशशंकर विद्यार्थी के निबंधों का एक संग्रह राधाकृष्ण से तैयार करवाया था। उस निबंध संग्रह को स्वयं प्रकाशित भी किया था, जो अब अप्राप्य है।
प्रेमचंद के बड़े पुत्र श्रीपत राय ने 1937 में ‘कहानी’ पत्रिका राधाकृष्ण के सहयोग से शुरू की। इसकी परिकल्पना राधाकृष्ण ने ही की थी।एक अंक निकालने के बाद जब दूसरे अंक की तैयारी में थे, उसी दौरान राधाकृष्ण और श्रीपत राय के बीच किसी बात को लेकर मनभेद हुआ। राधाकृष्ण शिवरानी देवी के पास जाकर कहा- अम्मा, श्री धन्नू (श्रीपत राय) के साथ काम नहीं पाउंगा, रांची जा रहा हूं। उस समय बन्नू (अमृत राय) मैट्रिक की परीक्षा दे चुके थे और रिजल्ट की प्रतीक्षा थी। वह भी राधाकृष्ण के साथ रांची गए। इस प्रसंग पर अमृत राय ने संस्मरण लिखा है। वह राधाकृष्ण के साथ रांची और गुमला में रहे थे। अमृत राय ने भी राधाकृष्ण पर कई संस्मरण लिखे हैं।
राधाकृष्ण 1929 से 1936 तक प्रेमचंदजी के साथ रहे। प्रेमचंद साहित्य के विशेषज्ञ कमल किशोर गोयनका ने राधाकृष्ण और प्रेमचंद प्रसंग पर लिखा है और राधाकृष्ण द्वारा भेजे हुए पत्र भी प्रकाशित करवाए हैं। राधाकृष्ण चाय के साथ बीड़ी पीते थे। इसकी लत भुवनेश्वर और अमृत राय को भी लग गई थी। एक दिन बीड़ी पीते हुए प्रेमचंदजी ने देख लिया था। वह कुछ बोले तो नहीं, परंतु शिवरानी देवी से अवश्य कहा- ‘‘राधाकृष्ण को आज मैंने बीड़ी पीते हुए देखा था।’’
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प्यारे बेटा लालबाबू
शुभ आशीर्वाद
सरस्वती प्रेस, वाराणसी
10-2-67
तुम्हारा पत्र मिला। बड़ी खुशी हुई तुमको अच्छा जानकर। बन्नू तुम्हारे पास से लौटने के बाद पत्र लिखा था जिससे तुम्हारे बारे में लिखा था। मगर अफसोस के सिवा क्या हो सकता है। मगर फिर भी ईश्वर को धन्यवाद कि तुम अच्छे हो गये। हमारी बड़ी बहिन को भी लकवा लगा था। यहां आयीं तो यही की दवा से अच्छी होकर गयीं। चार महीने रही थीं। ईश्वर चाहेगा तो तुम अवश्य अच्छे हो जाओगे। हमेशा के लिए अच्छे हो हो जाओगे। मैं यहां अभी हूं। जगत तो अब यहां नहीं है। तीन साल से दिल्ली रहता है। हां, तुम कोई चीज ठंडी न खाना। बन्नू और धन्नू दोनों इलाहाबाद में मजे में हैं। बेटी अपने घर है। तुम मार्च में आना हो तो मुझे पहले से खबर कर देना कि हम...
मैं अच्छी हूं। और बहू और बच्चों को मेरी तरफ से प्यार कह देना। और क्या लिखें।
शुभेसु
तुम्हारी अम्मा
राधाकृष्ण को 1966 के नवंबर में लकवा लग गया था। शिवरानी देवी को अमृत राय से पता चला कि लालबाबू को लकवा लग गया है तो वह चिंतित हो उठीं। अमृत राय ने यह समाचार बनारस जाकर उन्हें दिया था कि लालबाबू को लकवा लग गया है। शिवरानी देवी ने अमृत राय (बन्नू) को कहा था कि तुम रांची जाकर लालबाबू को एक बार देख आवो। वहां से लौटने के बाद लालबाबू का समाचार मुझे देना। अमृत राय रांची आए और दस दिनों तक राधाकृष्ण के साथ रहे। राधाकृष्ण उस समय कुछ अच्छे हो चुके थे। लेखन कार्यों से जुड़ चुके थे।अमृत राय के इलाहाबाद लौट जाने के बाद राधाकृष्ण ने शिवरानी देवी के पास पत्र द्वारा समाचार दिया कि मैं अब अच्छा हो गया हूं। उसी पत्र के प्रत्युत्तर में शिवरानी देवी ने राधाकृष्ण के पास पत्र लिखा था। शिवरानी देवी भी राधाकृष्ण को लालबाबू से ही संबोधित करती थीं जबकि प्रेमचंद राधाकृष्ण। अमृत राय (बन्नू) और श्रीपत राय (धन्नू) भी राधाकृष्ण को लालबाबू ही कहा करते थे। राधाकृष्ण शिवरानी देवी को अम्मा और प्रेमचंद को बाबूजी संबोधित करते थे।
नोट: लेख की बहुत सी सूचनाएं व पत्र सुधीरलाल ने उपलब्ध कराए हैं। हम उनके आभारी हैं।

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