अशोक सिंह
अंगूठा निशान से हस्ताक्षर अभियान तक अपने एक छोटे से संस्थागत कार्यक्रम की सफलता के बाद प्रभा सोरेन अब जिले में चल रहे नवभारत साक्षरता कार्यक्रम में वीटी अर्थात स्वयंसेवी शिक्षक के रूप में जुड़कर अपने गांव की असाक्षर महिलाओं को साक्षर कर रही हैं।
साक्षरता कार्यक्रम में इन दोनों प्रभा सोरेन इसलिए चर्चा में हैं कि उन्होंने कबाड़ से जुगाड़ लगा न सिर्फ टीएलएम अर्थात शिक्षण अधिगम सामग्री बनाकर उसके माध्यम से बहुत रोचक और प्रभावी तरीके से अपने जन चेतना केंद्र की असाक्षर महिलाओं को अंक व अक्षर पहचाना व पढ़ना लिखना सीखा रही हैं बल्कि बीच-बीच में जब पढ़ाई से महिलाएं ऊब जाती हैं तो उन्हें चित्र बनाना भी सीखाने लगती हैं।
कौन हैं प्रभा सोरेन :
दुमका जिले के जामा प्रखंड अंतर्गत चिकनियां पंचायत के लकरजोरिया गांव की 45 वर्षीय प्रभा सोरेन मूलत: एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और जनमत शोध संस्थान की प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर भी। साथ ही अपने गांव के ग्राम संगठन और सखी मंडल की अध्यक्ष भी रही हैं। इतना ही नहीं अपने कुशल व्यवहार व सहयोगात्मक स्वाभाव की वजह से अपने क्षेत्र में महिलाओं के बीच काफी लोकप्रिय भी रही हैं। साक्षरता का काम वह पिछले कई वर्षों से अपने गांव के प्राथमिक विद्यालय लकरजोरिया जन चेतना केंद्र में वीटी के रूप में जुड़कर कर रही हैं।
क्या है उनका कबाड़ से जुगाड़ का टीएलएम :
ताड़ के पत्ते, मिट्टी की रंग-बिरंगी गोलियां, साल के अंत में तारीख देखने वाला घर में बेकार पड़ा कैलेंडर, शादी के पुराने कार्ड, चूड़ी और जूते के बेकार पड़े डिब्बे, टूटे हुए मोबाइल फोन, पुराने केलकुलेटर, टूटी हुई पुरानी दीवार घड़ी, इंची, टेप फीता, टूटी हुई चूड़ियां, पानी की बोतल और रंग-बिरंगे बोतल के ढक्कन जैसी घर के कबाड़ में बेकार बड़ी चीजों को इकट्ठाकर चार्ट पेपर, कलर, कैंची, कटर, स्केल आदि के सहारे पूरी लगन और मेहनत से तैयार किए गए नंबर व अक्षर प्ले कार्ड, नंबर मैजिक बॉक्स और उस पर अंकित स्थानीय लोककला जादोपटिया पेंटिंग आदि से बने रंग-बिरंगे आकर्षक टीएलएम अर्थात शिक्षण अधिगम सामग्री। जिसमें स्थानीय भाषा, लोक कला और शिल्प का भी समावेश देखा जा सकता है। जिसमें हिन्दी के साथ संताली भाषा की एक से 10 तक गिनती भी है और सप्ताह के 7 दिनों के नाम के साथ-साथ रंगों का हिन्दी -संताली नाम वाला कई एक आकर्षक चार्ट भी है। जिसमें स्पष्ट शैक्षणिक संदेश और उनके विजन के साथ साथ उनकी शैक्षणिक गतिविधियों में गहरी रुचि व मेहनत भी दिखती है।

कहां से मिली प्रेरणा :
अपने कबाड़ से जुगाड़ के टीएलएम के बारे में वह कहती हैं कि जब शुरू शुरू में उनके जन चेतना केंद्र में असाक्षर महिलाओं की उपस्थिति कम होती थी और बुलाने पर भी नियमित रूप से केंद्र में नामांकित दीदी सब नहीं आती थी तब वह निराश हो जाती थी। ऐसे में साक्षरता केंद्र का अनुश्रवण करने जब जिला स्तर से एक बार जिला कार्यक्रम समन्वयक अशोक सिंह हमारे केंद्र में आए तो हमने उनको स्थिति से अवगत कराया। साथ ही शिक्षण सामग्री न मिलने को लेकर शिकायत भी की। जिसपर जाते-जाते उन्होंने कहा था कि बच्चों को पढ़ना आसान है लेकिन बड़ी उम्र के असाक्षर महिला-पुरुषों को पढ़ना लिखना सिखाना बहुत कठिन है। यह तभी संभव है जब भीड़ से अलग उनको पढ़ाने लिखाने का कुछ नया और रोचक तरीका अपनाया जाए। स्थानीय संसाधनों और घर में बेकार बड़ी चीजों से जुगाड़ लगाकर कुछ ऐसा टीएलएम बनाया जाय, जो आपके शिक्षण कार्य को आसान और रोचक बना सके। तब देखिएगा महिलाएं केंद्र में बिन बुलाए आयेंगी। वह कहती हैं तब टीएलएम क्या होता है हम ठीक से जानते भी नहीं थे लेकिन उनकी यह बात मुझे जंच गई और हम 3 महीने के अंदर कबाड़ से जुगाड़ लगाकर टीएलएम बना लिए। उसके बाद मेरा काम आसान हो गया और केन्द्र में उपस्थिति भी बढ़ गई।
एक्सपोजर विजिट में असम के गुवाहाटी कार्यक्रम में भी कर चुकी हैं शिरकत :
प्रभा सोरेन कहती हैं कि राष्ट्रीय साक्षरता मिशन और एनसीईआरटी द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर असम के गुवाहाटी में आयोजित पूर्वोत्तर राज्यों के क्षेत्रीय सम्मेलन में झारखंड टीम के साथ उन्हें वहां भाग लेने का मौका भी मिला। वहां से भी उनको साक्षरता कार्यक्रम में कुछ नया और बेहतर करने की प्रेरणा मिली थी और वहां से वह एक नई ऊर्जा और कुछ नए आइडिया के साथ वापस लौटी थी। जिसके परिणामस्वरूप आज कुछ नया और बेहतर कर पा रही हैं और जिसकी वजह से उनकी चर्चा हो रही है।
क्या कहते हैं विद्यालय के शिक्षक ग्रामीण और अधिकारी :
संबंधित प्राथमिक विद्यालय लकरजोरिया के प्रधानाध्यापक निर्मल कुमार सिंह कहते हैं कि जब वह स्थानांतरण होकर इस विद्यालय में आए तो यहां साक्षरता का काम बहुत ढीला ढाला चल रहा था। विद्यालय के शैक्षणिक कार्य को लेकर इतना दबाव रहता था कि साक्षरता का काम हो ही नहीं पा रहा था। ऐसे में जब प्रभा सोरेन जी के बारे में पता चला और गांव में उनकी लोकप्रियता का अंदाजा लगा, तो उनसे मिलकर हमने साक्षरता कार्यक्रम में सहयोग मांगा और पूरे मान सम्मान के साथ उनको सपोर्ट देना शुरू कर दिया। उसी क्रम में जिला साक्षरता समिति दुमका के जिला कार्यक्रम समन्वयक अशोक सिंह का भी मार्गदर्शन हम लोगों को मिला। फिर क्या था उचित मान सम्मान और मेरा सकारात्मक सहयोग पाकर प्रभा सोरेन जी के प्रयास से हमारा जन चेतना केंद्र बेहतर तरीके से संचालित होने लगा। उसी क्रम में संबंधित प्रखंड की बीईईओ एस्थेर मुर्मू कहती हैं कि जब अपने प्रखंड के साक्षरता व्हाट्सएप ग्रुप में लकरजोरिया जन चेतना केंद्र की वीटी प्रभा सोरेन के द्वारा बनाए गए टीएलएम और उनके पढ़ाने के तरीके वाला वीडियो देखी तो हमें खुशी हुई कि हमारे प्रखंड में ऐसी एक्टिव वीटी हैं, जो इतना अच्छा कर रही हैं। यह हमारे प्रखंड के लिए गर्व की बात है।
क्या कहती हैं केन्द्र और गांव की महिलाएं :
जन चेतना केन्द्र लकरजोरिया में नामांकित साक्षरता पठन-पाठन गतिविधि से जुड़ी महिलाएं कुशीला सोरेन, सावित्री सोरेन, पानमुनि हेंब्रम, लिलमुनी टूडू आदि कहती हैं कि प्रभा दीदी बहुत अच्छी हैं। पढ़ना लिखना सीखाने के साथ-साथ घर परिवार का सुख-दुख भी पूछती हैं और सरकार की कल्याणकारी योजनाओं से जोड़कर समय-समय पर लाभ भी दिलवाती रही हैं। ग्राम प्रधान, वार्ड सदस्य बसंती हेंब्रम और पूर्व मुखिया फूलकुमारी पुजहरीन कहती हैं कि प्रभा जी अपने व्यवहार के चलते इस गांव में ही नहीं, इस इलाके में भी इतना लोकप्रिय हैं कि यहां जब भी कोई मीटिंग या सभा होती है प्रभा जी की एक बुलाहट पर आसपास के गांव से सैकड़ों महिलाएं इकट्ठा हो जाती हैं। क्योंकि वह सिर्फ नवभारत साक्षरता कार्यक्रम में एक वीटी ही नहीं एक जमीनी सामाजिक कार्यकर्ता भी रही हैं, जिनपर हम लोगों को गर्व है।

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