भारत में हथकरघे की कहानी केवल कपड़ा बुनने की कहानी नहीं है। यह भारत की आर्थिक शक्ति, सामाजिक जीवन, सांस्कृतिक विविधता और स्वदेशी चेतना की कहानी भी है। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर देशभर में बुनकरों और उनकी कला को याद किया गया। लेकिन हथकरघा दिवस बीत जाने के बाद भी एक सवाल हमारे सामने बना रहता है—क्या हम अपनी पारंपरिक बुनाई और उससे जुड़े बुनकरों को आने वाली पीढ़ियों तक उसी मजबूती से पहुंचा पाएंगे?
इस सवाल का जवाब संताल परगना की एक पुरानी वस्त्र परंपरा पांची-परहान में तलाशा जा सकता है।
भारत में मशीनों से बड़े पैमाने पर कपड़ा बनने के युग से बहुत पहले भारतीय सूती वस्त्रों की दुनिया भर में पहचान थी। भारतीय कपड़ों की महीन बुनाई, गुणवत्ता और विविधता ने विदेशी बाजारों को प्रभावित किया। प्राचीन रोमन लेखकों के उल्लेखों में भी भारतीय वस्त्रों के प्रति आकर्षण और भारत के साथ होने वाले वस्त्र व्यापार के कारण रोम से धन के बाहर जाने की चिंता दिखाई देती है। उस समय यूरोप का वस्त्र उद्योग आज की तरह विकसित नहीं था, जबकि भारत के बुनकर अपने हाथों और पारंपरिक करघों से उत्कृष्ट कपड़े तैयार कर रहे थे।

भारत के तांती और दूसरे बुनकर समुदायों ने इस परंपरा को सदियों तक आगे बढ़ाया। लेकिन औद्योगिक क्रांति के बाद मशीन निर्मित कपड़ों ने दुनिया के बाजार को बदल दिया। ब्रिटेन के कारखानों में तैयार होने वाले सस्ते कपड़े भारत सहित दुनिया के बाजारों में पहुंचने लगे। इसका सबसे गहरा असर उन भारतीय बुनकरों पर पड़ा, जिनकी आजीविका हाथ से कपड़ा तैयार करने पर निर्भर थी।
यह केवल एक व्यवसाय का संकट नहीं था। गांवों की अर्थव्यवस्था, कारीगरों की आजीविका और भारत की पारंपरिक उत्पादन व्यवस्था को भी इससे बड़ा नुकसान हुआ। सी पृष्ठभूमि में स्वदेशी आंदोलन ने जन्म लिया। 7 अगस्त 1905 को स्वदेशी आंदोलन के व्यापक प्रसार ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग को राष्ट्रीय चेतना से जोड़ दिया। विदेशी कपड़ों की होली जलाना उस समय केवल राजनीतिक विरोध नहीं था, बल्कि अपने बुनकर, अपने श्रम और अपनी आर्थिक स्वतंत्रता के पक्ष में खड़ा होना था।
भारत की खूबसूरती उसकी विविधता में है। यहां भाषा बदलती है, बोली बदलती है, खान-पान बदलता है और उसी के साथ पहनावा भी बदलता है। संताल परगना की अपनी विशिष्ट वस्त्र परंपरा है पांची-परहान। पांची-परहान संताल समाज के लिए केवल पहनावा नहीं है। यह सामाजिक जीवन, परंपरा, उत्सव और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा हुआ है।
परंपरागत रूप से पांची लगभग 25 से 32 इंच चौड़ा और 2.5 से 3 मीटर लंबा सादा सूती कपड़ा रहा है। पुराने समय में इसका रंग मुख्यतः सफेद हुआ करता था। समय के साथ रंगों और डिजाइनों में बदलाव आया और आज सफेद से लेकर हरे सहित विभिन्न रंगों में पांची तैयार किया जा रहा है।
महिलाएं और पुरुष इसे अपनी-अपनी पारंपरिक शैली में पहनते रहे हैं। महिलाओं के पांची सेट में निचले हिस्से को लुंगी कहा जाता है, जबकि ऊपरी हिस्से में पांची पहना जाता है। पुरुषों के पारंपरिक पहनावे में डेंगा का प्रयोग होता है, जो पांची की डिजाइन और बुनाई परंपरा से जुड़ा हुआ है।
पर्व-त्योहारों और सामाजिक अवसरों पर आज भी पांची-परहान का प्रयोग यह बताता है कि यह परंपरा केवल इतिहास की किताबों में नहीं है, बल्कि आज भी जीवित है।
बदलते फैशन के साथ बदलता पांची
समय के साथ पांची ने भी अपने रूप बदले हैं। आज पांची से साड़ी, दुपट्टा, बंडी और कई तरह के आधुनिक परिधान तैयार किए जा रहे हैं। सादे कपड़े के साथ चेक, स्क्वायर चेक, फूल-पत्ती और संताल संस्कृति से जुड़े जनजातीय मोटिफ भी लोकप्रिय हो रहे हैं। हैंड एम्ब्रॉयडरी, मशीन एम्ब्रॉयडरी और हैंड पेंटिंग के माध्यम से पांची में वैल्यू एडिशन किया जा रहा है। इससे पारंपरिक कपड़े को आधुनिक बाजार की पसंद के अनुरूप बनाने की संभावनाएं बढ़ी हैं।
लेकिन यहां एक सावधानी भी जरूरी है। आधुनिकता के नाम पर यदि मूल बुनाई और बुनकर की भूमिका ही समाप्त हो जाए, तो हम केवल पांची का डिजाइन बचाएंगे, उसकी आत्मा नहीं।
GI पहचान : पांची के भविष्य की उम्मीद
इसी चुनौती को देखते हुए SRYEA ने पांची-परहान और पांची साड़ी की GI पहचान के लिए महत्वपूर्ण पहल की है। यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि GI पहचान किसी उत्पाद के नाम और बाजार की पहचान से आगे जाकर उसकी भौगोलिक, पारंपरिक और सांस्कृतिक विशिष्टता को सामने लाती है।
SRYEA के निदेशक अमित सिंह का मानना है कि पांची को केवल एक कपड़े के रूप में देखने के बजाय इसे संताल परगना की क्षेत्रीय पहचान के रूप में स्थापित करने की जरूरत है।
अमित सिंह कहते हैं, “पांची को बचाने का अर्थ केवल एक पारंपरिक वस्त्र को बचाना नहीं है। इसके पीछे बुनकर का हाथ, उसका परिवार, उसकी आजीविका और सदियों की सांस्कृतिक स्मृति जुड़ी हुई है। GI पहचान का वास्तविक लाभ तभी होगा, जब इसका फायदा उस बुनकर तक पहुंचे जो पांची को अपने हाथों से तैयार करता है।”
यही कारण है कि SRYEA की GI पहल को केवल प्रमाण-पत्र या पहचान तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। इसके साथ बुनकरों के लिए बाजार, डिजाइन विकास, प्रशिक्षण, गुणवत्तापूर्ण सूत और उचित मूल्य की व्यवस्था भी जरूरी है।
मशीन से बने पांची की चुनौती
आज बाजार में मशीन से तैयार सस्ते कपड़ों पर संताल मोटिफ की मशीन कढ़ाई कर उन्हें पांची के नाम से बेचने का चलन बढ़ रहा है। देखने में ये उत्पाद आकर्षक हो सकते हैं, लेकिन इससे पारंपरिक बुनकरों के सामने प्रतिस्पर्धा की कठिनाई बढ़ती है।
हाथ से बुने कपड़े में समय और श्रम अधिक लगता है। इसलिए वह मशीन निर्मित सस्ते कपड़े से कीमत में मुकाबला नहीं कर सकता। यदि उपभोक्ता केवल कीमत देखेगा, तो धीरे-धीरे बुनकर का काम कम होगा और अगली पीढ़ी करघे से दूर होती जाएगी।
इसलिए पांची की पहचान को सुरक्षित करने के लिए उपभोक्ता की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। उसे यह समझना होगा कि हाथ से बुना पांची खरीदना केवल एक कपड़ा खरीदना नहीं, बल्कि एक बुनकर के श्रम को सम्मान देना है।
परंपरा को बाजार से जोड़ना होगा
अमित सिंह के अनुसार, पारंपरिक उत्पाद को बचाने का रास्ता उसे बाजार से अलग करना नहीं, बल्कि बेहतर बाजार से जोड़ना है। वे कहते हैं, “पांची को संग्रहालय की वस्तु नहीं बनाना है। इसे आधुनिक जीवन का हिस्सा बनाना है। इसके लिए परंपरागत बुनाई को बनाए रखते हुए डिजाइन में प्रयोग, हैंड एम्ब्रॉयडरी, हैंड पेंटिंग और संताल संस्कृति के मोटिफ का प्रयोग किया जा सकता है। इससे पांची का मूल्य बढ़ेगा और बुनकर की आय भी बढ़ सकती है।”
यदि पांची को आधुनिक फैशन से जोड़ा जाए, तो इसके सामने बहुत बड़ा बाजार खुल सकता है। साड़ी और पारंपरिक परिधान के अलावा स्टोल, दुपट्टा, जैकेट, बंडी, होम फर्निशिंग और अन्य जीवनशैली उत्पादों में भी इसका उपयोग किया जा सकता है।
इससे केवल बुनकरों को रोजगार नहीं मिलेगा, बल्कि कढ़ाई, डिजाइन, रंगाई, सिलाई, पैकेजिंग और मार्केटिंग से जुड़े स्थानीय स्तर पर अनेक रोजगार पैदा हो सकते हैं।
GI से आगे की यात्रा
पांची को GI पहचान दिलाना एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, लेकिन मंजिल नहीं। GI की पहचान तभी सार्थक होगी जब संताल परगना का बुनकर अपनी कला से सम्मानजनक आय प्राप्त कर सके।
इसके लिए सरकार, सामाजिक संस्थाओं, डिजाइन संस्थानों, बाजार और बुनकर समुदाय को मिलकर काम करना होगा। स्थानीय स्तर पर बुनकर क्लस्टर विकसित किए जा सकते हैं। युवाओं को आधुनिक डिजाइन और डिजिटल मार्केटिंग से जोड़ा जा सकता है। पांची को पर्यटन और सांस्कृतिक उत्पाद के रूप में भी बढ़ावा दिया जा सकता है।
संताल परगना की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने में पांची महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसका असली सम्मान उस दिन होगा जब किसी संताल बुनकर के घर का करघा नियमित रूप से चलेगा, उसकी बुनी हुई पांची को उचित कीमत मिलेगी और उसकी अगली पीढ़ी भी इस काम को गर्व के साथ अपनाएगी। पांची केवल 25 से 32 इंच चौड़ा और कुछ मीटर लंबा सूती कपड़ा नहीं है। इसके ताने-बाने में संताल परगना का इतिहास, संस्कृति, श्रम और पहचान बुनी हुई है।
श्रेय की GI पहल ने इस पहचान को एक नया मंच दिया है। अब चुनौती यह है कि इस पहचान को बाजार, रोजगार और बुनकर की समृद्धि से जोड़ा जाए। क्योंकि परंपरा तभी जीवित रहती है, जब वह अगली पीढ़ी के लिए सम्मान और रोजगार—दोनों पैदा करती है।
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