व्यास सिंह, इतिहासकार, पलामू
कोल विद्रोह प्रारंभ होने के पूर्व ही पलामू से अंग्रेजों को निकाल बाहर करने के दो सशक्त और संगठित प्रयास हो चुके थे। मार्च 1771 ई में पलामू में प्रवेश करने के तुरंत बाद अंग्रेजों को ठकुराई जमींदार सिंह के जबर प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। राजा रामगढ़ और मरोठाें के सहयोग से सेना संगठित कर जयनाथ सिंह ने ब्रिटिश फौज को कड़ी टक्कर दी। उदयपुर के युद्ध में तो ठकुराई ने अंग्रेजों को पलामू की सीमा से बाहर खदेड़ दिया था। पर दुर्भाग्य से 1775 ई. में उनके असामयिक निधन से अंग्रेजों को पलामू में जड़ जमाने का मौका मिल गया। पुन: 1800 ई. के अक्टूबर में भूखन सिंह चेरो ने एक बड़ा विद्रोही दल संगठित कर विद्रोह का झंडा बुलंद किया। इस बार भी मराठे (छत्तीसगढ़) उसका सहयोग कर रहे थे। भूखन सिंह का आंतक ऐसा व्याप्त हुआ कि अंग्रेज के नागपुर (महाराष्ट्र) के मराठा राजा रघु जी भोसले से आग्रह करना पड़ा कि वे अपने मराठा सरदारों को भूखन सिंह की मदद करने से रोके। भूखन के विद्रोह को भी अतत: दबा दिया गया। विडंबना यह रही कि जिस चेरो राज्य की पुनर्स्थापना के लिए दोनों विद्रोह हुए, इस चेरो वंश के तत्कालीन कठपुतली राजा अंग्रेजों की ओर से ही लड़ रहे थे।
खरवार जनजातियों का धधकता असंतोष
पलामू में कोल विद्रोह के फूट पड़ने का मूल कारण चेरो, खरवार जनजातियों के मन का धधकता असंतोष था। 200 वर्ष पुराने ऐतिहासिक चेरो राज को हड़प लिए जाने का उनके मन में गहरा मलाल था। आखिरी चेरो राजा चूड़ामन राय को अपमानजनक ढंग से अपदस्थ कर मात्र 200 रु मासिक पेंशन की विपन्न जिंदगी जीने को विवश किए जाने का अपमान वे भूले नहीं थे। ऊपर से चेरो राज्य को देव (औरंगाबाद) के राजा घनश्याम सिंह के हाथों बेचकर स्वाभिमानी शासक जाति चेरओं को उसका मातहत बना दिया जाना उन्हे कतई बर्दास्त नहीं था। समीपवर्ती रांची क्षेत्र में कोल विद्रोह की खबर पाकर यहां के चेरो खरवार भी यत्र तत्र सभा आयोजित कर विद्रोह की तैयारी करने देने लगे।
उधर, अंग्रेज पलामवी जनमानस को समझने में पूरी तरह विफल थे। रामगढ़ के कलेक्टर आर. नीब समझ थी कि विद्रोही लूटपाट की आशा एवं बाद में आम माफी की संभावना से विद्राेह के लिए तत्पर है। आम माफी की संभावना से विद्रोह के लिए तत्पर थे। उन्होंने अपने उच्चाधिकारी को पत्र लिखकर सूचित किया था कि कंपनी सरकार की अमानवतापूर्ण उदासीनता ही विद्रोहियों को उत्प्रेरित करने के लिए जिम्मेवार है।
लातेहार के उदयपुर ग्राम का दुखन शाही चेरो-खरवारों के विद्रोही दल को संगठित करने में जुटा था। वह तिस्सा घाट के घटवाल सुमेर शाही का करीबी रिश्तेदार था। बारियातू निवासी चंवर सिंह, ग्राम-जेरुआ के हुकुम सिंह के अतिरिक्त हारिल सिंह एवं सूरज सिंह जैसे सरदार उसकी मदद कर रहे थे। खबर थी कि रांची के कोल विद्रोही पलामू में प्रवेश करना चाहते थे। उनके आने के पूर्व ही दुखन शाही ने एक बड़ा विद्रोही दल संगठित कर लिया था।
पलामू में कोल विद्रोह की सुगबुगाहट पाकर अंग्रेज सतर्क हो गए। वे लोहे से ही लोहे को काटने की युक्ति लगाने लगे। पलामू के अपदस्थ चेरो राजा चूड़ामन राय के पुत्र रणबहादुर राय को कोल विद्रोहियों से लोहा लेने के लिए तैयार कर लिया। उसे भी झूठी उम्मीद पाल रखी थी कि शायद इस सहयोग के बदले अंग्रेज उसके पिता का राज्य उसे वापस कर दें। कलेक्टर आर नीव ने उसे सैन्य बहाली के लिए एक बड़ी रकम दी। रणबहादुर का एक रिश्तेदार देवगन का जमींदार शिवबक्स राय भी उसकी मदद कर रहा था। पैसा पाकर उत्साहित रणबहादुर अपना सैन्य दल गठित कर राँची से आने वाले कोल विद्रोहियों को रोकने चल पड़ा।
बाहर से आने वाले कोल तिस्सा घाट से पलामू में प्रवेश के लिए मंडरा रहे थे। इस घाट का घरवाल अनेक जमींदारों के साथ उन्हें रोकने के लिए मुस्तैद था। दुखन शाही रांची से आने वाले कोल विद्रोहियों के साथ लेकर पलामू में बड़े पैमाने पर विद्रोह की शुरुआत करना चाहता था। साथ ही वह तिस्सा घाट के घरवाल सुमेर शाही के प्रतिरोध और उससे युद्ध में जान-माल की हानि को भी टालना चाहता था। दुखन एक बहादुर योद्धा ही नहीं कूटनीतिज्ञ रणनीतिकार भी था। उसने रांची के कोल नेताओं के साथ सुमेर शाही से गुप्त मुलाकात की एवं पारंपरिक 'कोलरज्जी' (कोलों का राज्य) की पुनर्स्थापना का हवाला दिया। उसने निवेदन किया कि रांची के कोल तो पलामू के अपदस्थ कोलों की सहायता हेतु आए हैं। 'कोलरज्जी' की स्थापना की चिरपोषित अभिलाषा के प्रबल आकर्षण ने सुमेर शाही की पक्षधरता बदल दी। उसने अपने यहां लड़ने हेतु एकत्र जमींदारों को विदा कर दिया और रांची के कोलों को अप्रतिरूद्ध प्रवेश देने के लिए सहमत हो गया।
1832 से विद्रोह प्रारंभ करने का निर्णय
इस घटनाक्रम से उत्साहित दुखन ने कल्याणपुर ग्राम में एक बड़ी गुप्त सभा आयोजित की जिसमें 7 फरवरी 1832 से विद्रोह प्रारंभ करने का निर्णय लिया गया। यहाँ यह ध्यातव्य है कि सवर्णों एवं बनियों ने स्वयं को विद्रोह से दूर रहने की बात बतायी थी। निर्णयानुसार दुखन के दल ने संगठित होकर मानकेरी तथा इचाबार नामक सरकारी गांवाें पर हमला कर लूटा एवं वहां आग लगा दी। विद्रोह की खबर पाकर रणबहादुर राय विद्राेहियों से लोहा लेने हेतु आ पहुंचा। समीप के सोते-कमर नामक स्थान पर उसने मोर्चेबंदी की। दुखन शाही ने चतुराई पूर्वक अपने कुछ आदमी रणबहादुर की सेना में प्रविष्ट करा दिए। दुखन के लोगों ने रणबहादुर के सैनिकों, जनजातीय सैनिकों को समझाया कि दुखन शाही तो हम जनजातीय लोगों के अपने राज्य की स्थापना के लिए हथियार उठाया है। निम्न जातियों के अपने राज्य की स्थापना की जादुई परिकल्पना ने जादू भी कर दिया और रणबहादुर की सेना के प्रायः सभी निम्नवर्गीय सैनिक दुखन के दल से आ मिले। इस क्रम में रणबहादुर का दल सिकुड़ते-सिकुड़ते कुछ सैनिकों को रणबहादुर की सेना के पठानों ने बर्बरता पूर्वक मार डाला था। इस समय दुखन शाही के दल में सैनिकों की संख्या लगभग 5000 हो चुकी थी। कुपित दुखन शाही ने रणबहादुर पर जोरदार हमला किया। रणबहादुर के बहुत से सैनिक हताहत हुए, शेष भाग चले। स्वयं रणबहादुर किसी प्रकार जान बचा कर शाहपुर पहुँच सका। इस प्रकार कोलों से कोलों को ही लड़ाने की अंग्रेजी योजना प्रारंभिक दौर में ही विफल हो गई। यह दुखन शाही की कूटनीतिक जीत थी।
हताश अंग्रेजों ने फौजें बुलवायीं
हताश अंग्रेजों ने पटना, दानापुर, रामगढ़ एवं गया से बड़ी संख्या में फौजें बुलवायीं। इसके साथ ही रणबहादुर राम को भारी मात्रा में गोला-बारूद और शस्त्र उपलब्ध करवाया। अंग्रेजी सेना का भारी जमावड़ा देख दुखन ने अपनी रणनीति बदल दी। विद्रोही कई छोटे दलों में विभक्त होकर अलग-अलग स्थानों पर गुरिल्ला युद्ध लड़ने लगे। इस रणनीति ने अंग्रेजों को बहुत परेशान किया। टोरी, चतरा सहित संपूर्ण पलामू असुरक्षित हो गया। चतरा के व्यापारी तो इतने आतंकित थे, कि उन्होंने कलेक्टर आर. नीव को त्राहिमाम संदेश भेज कर सूचित किया कि अगर उनकी सुरक्षा का प्रबंध नहीं हुआ तो वे चतरा छोड़ कर भाग जाएंगे। लाचार अंग्रेजों ने फौज की कई कंपनियां पलामू में बुलवा लीं। टोरी क्षेत्र में कर्नल हारे के दल पर एक छोटा विद्रोही दल चढ़ गया। कर्नल ने घेर कर बर्बरता पूर्वक लगभग 200 विद्रोहियों को मार डाला। 22 फरवरी 1832 को दुखन शाही ने इस बर्बर हत्याकांड का बदला लिया। सतबरवा से थोड़ी दूरी पर ले. मार्श के सैन्य दल पर दुखन शाही अपने 7000 विद्रोहियों को लेकर टूट पड़ा। इस मुठभेड़ में अंग्रेजों को जन-धन की बड़ी हानि हुई। ले. मार्श एवं उसके शेष सैनिकों ने पीछे भागकर जान बचायी। दुखन शाही ने आगे बढ़कर पलामू में अंग्रेजों के तत्कालीन मुख्यालय लेस्लीगंज सहित आसपास के कई गांवों को नष्ट कर डाला। इस बीच सरगुजा राजा भी अंग्रेजों की मदद के लिए ससैन्य आ पहुंचा। उसने शाहपुर में एक विद्रोही दल पर हमला किया ।
अन्य संख्या कम के कारण शाहपुर में कुछ विद्रोही मारे गए। कुछ ने भाग कर कोयल नदी पार किया और पूर्व की ओर चले गए।
सतबरवा में लगा दी आग
सतबरवा के व्यापारी प्रारंभ से ही अंग्रेज समर्थक थे। कुछ व्यापारी तो अंग्रेजी सेना के साथ चलते थे। वे अंग्रेजी फौज को रसद उपलब्ध कराकर अच्छा मुनाफा कमाते थे। इस कारण सतबरवा विद्रोहियों के निशाने पर था। अप्रैल 1832 के प्रारंभ में दुखन शाही के सरदार चंवर सिंह, हुकुम सिंह एवं दरिया सिंह ने सतबरवा पर भीषण हमला किया। सतबरवा को लूटा एवं आग लगा दी। सतबरवा के आस-पास के गांव भी नष्ट कर दिए गए।
पलामू की धरती पर कोल विद्रोहियों द्वारा सतबरवा की यह आखिरी घटना थी। इसके बाद अंग्रेजों ने कोलों के दमन के लिए तोपें भी मंगवा लीं। ले. कर्नल हैमिल्टन 64वीं एन.आई. के साथ बड़ी तोपखाना लेकर पलामू आ पहुँचा। अंग्रेजी फौज के भारी जमावड़े और तोपों के मुहाने खोल दिए जाने के कारण विद्रोहियों की शक्ति क्षीण पड़ने लगी। शक्तिशाली विद्रोही सरदार पकड़ लिए गए। शेष बिखर गए। विद्रोह दबा दिया गया।
कलेक्टर नीव विद्रोहियों (गिरफ्तार) को फांसी की सजा दिलाना चाहता था, परन्तु सरकार का मानना था कि उदारता से काम लेना चाहिए। सरकार सुलह समझौता चाहती थी, अतः विद्रोहियों के साथ यथा संभव नरमी का व्यवहार किया गया। सरकार का स्पष्ट आदेश था कि केवल अत्यन्त गंभीर आरोपों में ही मृत्यु दंड या उम्र कैद की सजा दी जाए, वह भी सरकार के अनुमोदन के उपरान्त।
पूर्व राजा के पुत्र रणबहादुर राय की सेवाओं को देखते हुए कलेक्टर नीब ने उसके पैतृक राज्य को उसे वापस करने की अनुशंसा की, पर सरकार ने स्वीकार नहीं किया। सत्ता पर पकड़ बनाए रखने के लिए अंग्रेजों ने पलामू के तरहसी, मनातू, सतबरवा एवं बड़का गढ़ में पुलिस चौकी की स्थापना की।
कोल विद्रोह का सर्वाधिक प्रमुख परिणाम यह हुआ कि अंग्रेज भली-भांति समझ गए कि कोलों को दमन के बल पर शासित नहीं किया जा सकता। उनकी पारंपरिक शासन व्यवस्था, उनके रीति-रिवाज और उनकी संस्कृति को सम्मानित किए बिना उन पर राज्य करना संभव नहीं। अतः आदिवासी बहुल छोटानागपुर, खड़गडीहा, पलामू, रामगढ़ एवं कोडरमा को मिलाकर एक अलग प्रशासनिक इकाई का गठन हुआ जिसे साउथ-वेस्ट फ्रंटियर एजेंसी का नाम मिला। यहां आदिवासियों के मुंडा-मानकी जैसी पारंपरिक व्यवस्था को मान्य किया गया। यहां अन्य प्रांतों के सामान्य नियमों से अलग कानून लागू हुए जिसे अंग्रेज Non-Regulation Province कहते थे। ध्यातव्य है कि इस क्षेत्र की यही विशिष्ट पहचान आगे चलकर छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (C.N.T.) का आधार बनी।
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