डॉ. अंगद किशोर
इतिहास के अध्ययन, विश्लेषण और दस्तावेजीकरण में उत्कीर्ण अभिलेख का योगदान प्रामाणिक और महत्वपूर्ण होता है। हालांकि इतिहास के स्रोत अनेक होते हैं, किंतु अभिलेख का महत्व अन्य स्रोतों के बनिस्पत श्रेष्ठ और विश्वसनीय माना जाता है। प्राचीन काल में पलामू मगध जनपद का हिस्सा हुआ करता था। बावजूद इसके, पलामू का प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास धूमिल और अपूर्ण है। क्रमबद्ध शोध, तुलनात्मक अध्ययन, पुरातात्विक उत्खनन और तथ्यात्मक विवेचन का सर्वथा अभाव के कारण पलामू के इतिहास का वास्तविक और तथ्यपरक उद्घाटन नहीं हो पाया है। जबकि पलामू में नीलांबर पीतांबर विश्वविद्यालय की स्थापना जनवरी 2009 में हुई है, मगर यहां के धूमिल इतिहास के उद्भेदन में विश्वविद्यालय की ओर से कोई सार्थक, स्पष्ट और दूरगामी प्रभावकारी पहल नहीं की गई है।
यह विदित है कि पलामू का तथ्यात्मक इतिहास के उद्भेदन में सोन घाटी पुरातत्व परिषद के अध्यक्ष एवं लेखक-सह-गवेषक (डॉ. अंगद किशोर) और उनकी टीम के लोग विगत तीन दशकों से प्रयासरत हैं। सोन और उत्तर कोयल नदियों के संगम के समीप स्थित कबरा कलां गांव में लगभग दर्जन भर पुरातत्वविदों का आगमन हो चुका है। सोन घाटी पुरातत्व परिषद के प्रयास से ही वर्ष 2017-18 के अंत में कबरा कलां गांव में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, रांची सर्किल द्वारा उत्खनन किया गया था, जिसमें यह तथ्य उभरकर सामने आया कि कबरा कलां में नगरीय सभ्यता का विकास दो बार हुआ। एक मौर्यकाल में तथा दूसरा राजपूत काल में। हालांकि यह लघु उद्भेदन सिर्फ एक गांव का है, किंतु हुसैनाबाद अनुमंडल में लगभग एक दर्जन प्राचीन बस्तियों का अवशेष विद्यमान हैं, जिनका प्राचीन इतिहास अभी काल के गर्त में समाहित है।

प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक मैंने कई उत्कीर्ण अभिलेखों की खोज की है। पलामू प्रमंडल से प्राप्त उत्कीर्ण अभिलेखों को काल के आधार पर चार भागों में विभक्त किया जा सकता है :-
1.मौर्यकालीन अभिलेख
2.परवर्ती गुप्तकालीन शिलालेख
3.मध्यकालीन शिलालेख
4.आधुनिक कालीन शिलालेख
1.मौर्यकालीन अभिलेख: पलामू जिला के हुसैनाबाद अनुमंडल अंतर्गत हैदरनगर प्रखंड में स्थित कबरा कलां गांव में एक मृण्मय षष्ठफलकीय तल पर उत्कीर्ण सुनहले रंग का सुन्दर एवं सुसज्जित केश वाली एक औरत की मूर्ति मिली है। लगभग दो इंच ऊंची इस मूर्ति के पांच फलकों पर लिपि अंकित है, जो बाद में खुरेच कर लिखी गई प्रतीत होती है। इससे स्पष्ट होता है कि मूर्ति पहले बनी और लिपि बाद में अंकित की गई है। पुरातत्वविदों ने लिपि को ब्राह्मी लिपि बताया, जो पढ़ी जाने वाली भारत की प्राचीनतम लिपि है।*1 दूसरा पुरावशेष उत्तरी काली पाॅलिश मृदभांड पर ब्राह्मी लिपि जैसा एक चित्र मिला है। चूंकि कबरा कलां में उत्तर काली पाॅलिश मृदभांड पर्याप्त मिलते हैं। इससे ज्ञात होता है कि यहां से इस मृदभांड का व्यापार होता था। मृदभांड पर ब्राह्मी लिपि के चित्र का उकेरण ट्रेड मार्क की तरह हुआ हो, तो कोई आश्चर्य नहीं। यहां से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर दसशीशा नाथ का पूजा स्थल है, जो सोन नदी की धारा के बीच में है। बिहार के रोहतास जिला में स्थित यह पूजा स्थल काफी प्राचीन है, जहां शिवरात्रि के दिन विशाल मेला लगता है। यहां खरवार और चेरो राजवंशों के 12 शिलालेख हैं, जो 12 वीं शताब्दी से लेकर 16 वीं शताब्दी तक के हैं। इन शिलालेखों की लिपि नागरी और भाषा संस्कृत है। यहां 1812-13 ई में ईस्ट इंडिया कंपनी का सर्वेक्षक फ्रांसिस बुकानन का आगमन हुआ था। उसने ‘शाहाबाद यात्रा वृत्तांत’ में इन शिलालेखों की चर्चा की है।*2
2.परवर्ती गुप्तकालीन शिलालेख: सबानो गांव की बौद्ध देवी तारा की प्रस्तर-प्रतिमा प्रारंभिक मध्य काल की दुर्लभ और विलक्षण धरोहर है। प्रतिमा की विलक्षणता में चार चांद लगाने वाला एक अभिलेख है, जो प्रतिमा का आभामंडल के घेरा के अंतर्गत अर्द्ध चंद्राकार में उकेरित है। बौद्ध धर्म से संबंधित इस अभिलेख से पता चलता है कि प्रारंभिक पालकाल में यह क्षेत्र बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा का महत्वपूर्ण केंद्र रहा होगा। यूं तो झारखंड में बौद्धकालीन धरोहरों की लंबी फेहरिस्त है, किंतु बौद्ध धर्म-सूत्र उकेरित बौद्ध देवी तारा की प्रतिमा अभी तक सबानो गांव छोड़कर पूरे झारखंड प्रदेश में कहीं नहीं मिली है।
सबानो गांव पलामू जिले के हुसैनाबाद प्रखंड अंतर्गत जिला मुख्यालय से लगभग 85 किमी तथा प्रखंड मुख्यालय से 8 किमी दूर है। यह गांव झारखंड को बिहार से अलग करने वाली कररबार नदी, जो सोन नदी की सहायक है, के बायें तट पर अवस्थित है। बौद्ध देवी तारा की यह प्रतिमा देश की आजादी के पूर्व एक प्राचीन कालीन पक्की ईंटों से निर्मित कुआं, जिसे ग्रामीण लोग "कोल्हरज्जी कुआं अर्थात कोलों द्वारा निर्मित कुआं" कहते हैं, से प्राप्त हुआ था। यद्यपि यह प्रतिमा भग्न है, तथापि ग्रामीणों द्वारा दशकों से प्रतिमा को स्थापित कर बतौर हिंदू देवी पूजा की जा रही है। अब यहां एक मंदिर बन चुका है, जिसके गर्भगृह में यह प्रतिमा प्रस्थापित है। संप्रति यह प्रतिमा हिंदू देवी के रूप में स्वीकार्य और ख्यात हो चुकी है। लगभग 40 ईंच लंबे तथा 21 ईंच चौड़े काले बैसाल्ट पत्थर के फलक पर निर्मित बौद्ध देवी तारा की लंबाई 29 ईंच है। मूर्ति का सिर आधा टूटा हुआ है, दोनों हाथ टूटे हुए हैं एवं एक स्तन क्षतिग्रस्त है। मूर्ति को देखने से स्पष्ट होता है कि इसे तोड़कर कुएं में डाला गया है। प्रतिमा की चरण-चौकी पर तारा की प्रतिमा की दोनों तरफ एक-एक मूर्ति उकेरित है, जबकि उसके नीचे चरण-चौकी के सामने के फलक पर पांच लघु मानव-आकृतियां उकेरित हैं। इन आकृतियों के देखने से प्रतीत होता है कि बीच की आकृति पुरुष और अगल-बगल दो-दो आकृतियां महिलाओं की हैं। तात्पर्य यह कि इस प्रतिमा-फलक पर तारा सहित सात स्त्रियां तथा एक पुरुष की आकृतियां उकेरित हैं।
प्रस्तर अभिलेख :- बौद्ध देवी तारा की प्रतिमा पर अर्द्ध चंद्राकार में उकेरित अभिलेख को गत 2019 ई में लखनऊ से आए पुरालेखक सुमित कुमार द्वारा पढ़ा गया, जो इस प्रकार है--
"ये धम्मा हेतुप्पभवा हेतुं तेसं तथागतो आह।
तेसं च यो निरोधो एवं वादी महासमणो।" *3
यह बौद्ध धर्म का चर्चित धर्मसूत्र है, जिसका उल्लेख अन्य बौद्ध-अभिलेखों में भी मिलता है। बौद्ध धर्म के विद्वान राहुल सांकृत्यायन कृत "महामानव बुद्ध" की पृष्ठ संख्या 31 पर अर्थ सहित इस सूत्र की चर्चा है। इसका अर्थ है--" जो पदार्थ हैं, सो हेतु से उत्पन्न हैं। उनके हेतु को और उनके निरोध को भी तथागत ने कहा,यह बतलाने वाले महाश्रमण हैं।" अभिलेख की लिपि नागरी और भाषा पाली है। अंकित लिपि के आधार पर पुरालेखक सुमित कुमार ने इस अभिलेख को नवीं शताब्दी का बतलाया है। इससे स्पष्ट होता है कि यह क्षेत्र नवीं शताब्दी के पूर्व से आबाद था।
3. मध्यकालीन शिलालेख :- पलामू जिले के तीन स्थलों से मध्यकालीन शिलालेख प्राप्त हुए हैं। दो स्थल हुसैनाबाद प्रखंड अंतर्गत स्थित है और एक स्थल पाटन प्रखंड का छेछौरी गांव है। पलामू किला (नया) में भी दो शिलालेख उकेरित हैं। हुसैनाबाद प्रखंड अंतर्गत जपला के दो अलग-अलग स्थलों से 12 वीं शताब्दी के दो शिलालेख मिले हैं, जो ग्रेटर जपिला (आधुनिक नाम जपला) के खरवार राजवंश के तत्कालीन शासक प्रताप धवल देव के हैं। उल्लेखनीय है कि तत्कालीन जपिला प्रताप धवल देव की राजधानी था। *4 जपला से प्राप्त दोनों शिलालेखों की खोज वर्ष 1998 ई. में स्वयं खोजी लेखक ने की है। इन दोनों शिलालेखों के बारे में दुनिया को पहली बार पता 20 फरवरी 1998 को तब चला, जब लेखक का शोधपरक आलेख जपला पलामू का मुकुट है, इसका इतिहास अति प्राचीन है "प्रभात खबर, रांची" से प्रकाशित हुआ। लखनऊ से आए पुरालेखक सुमित कुमार ने इन शिलालेखों की पहली बार छाप ली। बाद में उन्होंने आधुनिक नागरी लिपि में लिप्यंतर किया । जपला में ये शिलालेख दो स्थलों से प्राप्त हुए हैं:- एक संगत मुहल्ला से और दूसरा जमुहारी देई मंदिर से।
दोनों शिलालेखों का विवेचन अधोलिखित है:-
जपला स्थित संगत मुहल्ला शिलालेख:- जपला का संगत मुहल्ला मुख्य बाजार के मध्य में अवस्थित है। यहां गुरु नानक-पंथियों का आज भी निवास है। मुस्लिम काल में इस पंथ के किसी गुरु का आगमन यहाँ हुआ हो, तो कोई आश्चर्य नहीं। नानक पंथियों का संगत स्थल होने के कारण इस स्थल का नाम 'संगत पर' पड़ा। बाद में मुहल्ला का नाम ही संगत मुहल्ला हो गया। इस मुहल्ला में एक मध्यकालीन कुआँ था, जो अब भर दिया गया है। इसी कुएँ से पांच दशक पूर्व एक विशाल विष्णु की प्रतिमा भग्नावस्था में मिली थी। इस प्रतिमा को कुएं के निकट ही अनौपचारिक रूप से स्थापित कर दिया गया। लगभग चार फीट ऊंची इस प्रतिमा की दोनों ओर एक ही प्रस्तर खंड में दो देवियाँ - लक्ष्मी और सरस्वती की प्रतिमाएं हैं। इसी खंडित प्रस्तर प्रतिमा की चरण चौकी पर दो पंक्तियों में एक अभिलेख उत्कीर्ण है। चरण चौकी कमलासन है। अभिलेख की भाषा संस्कृत और लिपि प्रारंभिक नागरी है। काले पत्थर से निर्मित यह प्रतिमा पालकालीन है। संप्रति सुरक्षा की दृष्टि से इस प्रतिमा को सोन घाटी पुरातत्व परिषद की टीम ने हुसैनाबाद अनुमंडल कार्यालय (24⁰ 31' 06" अक्षांश उत्तर एवं 84⁰ 0' 27" देशांतर पूर्व) में स्थानांतरित कर दिया है। प्रतिमा पर उकेरित अभिलेख इस प्रकार है:-
“ऊं नमो नारायणाय।। सिद्धम् साधवस्या रणदेव कुल:
स्वा वंश्यी नायक श्री प्रताप धवल:” *5
इस शिलालेख में निर्माण की तिथि अंकित नहीं है। मगर अनुमान है कि यह शिलालेख तुतराही शिलालेख (1158 ई) से पहले का है। यह शिलालेख नायक प्रताप धवल का है। विष्णु प्रतिमा की स्थापना के समय यह अभिलेख उत्कीर्ण किया गया है। इस शिलालेख में नारायण को नमन करते हुए प्रताप धवल देव के पितामह साधव तथा पिता रण धवल का उल्लेख किया गया है।
जपला स्थित जमुहारी देई शिलालेख :- जपला-छत्तरपुर मुख्य सड़क पर स्थित दिनेश सिंह चौक के दक्षिण में उत्तर कोयल मुख्य नहर के बायें तट पर जमुहारी देई मंदिर (24⁰ 31' 17" अक्षांश उत्तर तथा 84⁰ 0' 25" देशांतर पूर्व) स्थित है। यह मंदिर नवीन है, मगर इसमें स्थापित भग्न मूर्तियां पालकालीन हैं। कहा जाता है कि उत्तर कोयल नहर की खुदाई (1975-80) के दौरान ये पालकालीन भग्न मूर्तियां मिली थीं। मूर्तियों के कारण यहां नहर को थोड़ा टेढ़ा करना पड़ा। यहां अमूमन सभी खंडित मूर्तियां हैं। उमा-माहेश्वर की धूमिल प्रतिमा लगभग सही सलामत है। एक विशाल प्रतिमा का सिर्फ धड़ है, जो विष्णु की प्रतिमा का एक खंड प्रतीत होता है। अन्य खंडित प्रतिमाएं भी हैं। इसके अलावा एक ही पत्थर में तीन भग्न चरण चौकियां हैं, जिसपर दो-दो खंडित युगल चरण हैं। चरण का आसन प्रस्फुटित कमलाकार है। इन्हीं तीनों कमलाकार चौकियों के निचले भाग में अभिलेख उत्कीर्ण हैं। ये प्रस्तर अभिलेख चार भागों में विभक्त हैं, जो इस प्रकार हैं *6 :-
1. सिद्धम् महानायकायिनी रानी:
राल्हा काया पुण्य मिदम।।
2. सिद्धम् प्रतिमा श्री प्रतापिन तनुजा प्रतिमाह
करिता मातु रछाय सत्रु यात्राय।।
3. संवत १२२४ (1224)4. माघ सुदि
यह शिलालेख प्रताप धवल देव की बहन का है, जिसमें माता राल्हा देवी का उल्लेख हुआ है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसकी स्थापना का समय संवत् 1224 माघ सुदी अंकित है। तदनुसार उकेरित इस अभिलेख जनवरी 1168 ई का है। जपला से प्राप्त उक्त दोनों अभिलेखों से स्पष्ट हो जाता है कि प्रताप धवल के पितामह साधव, पिता रण धवल तथा माता राल्हा देवी थीं। विष्णु प्रतिमा की स्थापना के पुनीत अवसर पर ये शिलालेख अंकित कराए गए थे।
लातेहार जिले में स्थित पलामू किला (नया) के नागपुरी दरवाजे पर उत्कीर्ण दो मध्यकालीन शिलालेख चेरो राजवंश के इतिहास को जानने के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। दोनों शिलालेख 40 फीट ऊंचे नागपुरी दरवाजे की दोनों चौखटों पर उकेरित हैं। पहला शिलालेख नये किले का शिलान्यास तथा दूसरा उसका उद्घाटन का है। पहला शिलालेख नागरी लिपि में उकेरित तथा संस्कृत भाषा में है तथा दूसरा शिलालेख अरबी लिपि में अंकित और फारसी भाषा में है। ये दोनों शिलालेख चेरो राजा मेदिनी राय के हैं। चेरो राजवंश से संबंधित और दो शिलालेख मिले हैं, जो रोहतास जिले के बांदू गांव के समीप स्थित दशशीशानाथ महादेव के चबूतरा के पास है।
नये पलामू किले का संस्कृत शिलालेख
नये पलामू किले के नागपुरी दरवाजे पर संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण अभिलेख राजा मेदिनी राय का है। यह नया पलामू किला के शिलान्यास के अवसर पर लिखा गया अत्यंत महत्त्वपूर्ण अभिलेख है। इस शिलालेख का पाठ इस प्रकार है :-
" संवत् 1680 समय माघ वदी पंचमी बुधुवासरे च्यवनर्षि कुलेति पवित्रतमे उदव्रत महीपतिरस्य सुत:।भगवत्त नृपोद्विषदत्त करोभवदस्य सुतेपदनत्त नृप: हि(त)स्यात्मजोSय: जल्प्तादेक वीराधीरोधराधीश शतैकशागा(का) दुर्गं विधत्ते नृप मेतनीन्द्रो महेंद्र तुल्य: प्रथित प्रताप:।। पो(पू)जिते वैक्रमेवर्षे नमोनिधिरसेन्दुमि:मरना घमेचक पंचम्पी(पंचमपि) राजा दुर्गम ची(चि) करतु।।वनमालिमिश्रस्य"*7
डॉ श्याम सुन्दर तिवारी के अनुसार, इसका हिंदी पाठ इस प्रकार है :-
" संवत् 1680 के माघ माह कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि बुधवार को च्यवन ऋषि के पवित्र कुल में महाराज उदव्रत के पुत्र महाराज भगवत्त (राय), जिनसे शत्रु संतप्त रहे, उनके हाथों से वर्तमान (राजवंश) की स्थापना हुई। तत्पश्चात उनके पुत्र अनत्त (राय) राजा हुए जिनके सौभाग्यशाली आत्मज बालकलरव करते रहे और वंश विस्तार होता रहा । इन (वंशजों) में से एक राजा मेतनी (मेदनी राय) इंद्र के समान हैं, सैकड़ों वीर-धीर-धराधीशों में प्रमुख तथा शक्तिशाली हैं और जिनका प्रताप महेंद्र (पर्वत) के समान (जग) विख्यात है, उनके द्वारा दुर्ग (किला) का स्थापन किया गया। सिंधु के समान संपत्ति (निधि) वाले, चंद्रमा के समान करुणा बरसाने वाले, कालिमा (अंधकार) का नाश करने वाले दक्ष(चतुर) राजा द्वारा मनन(विचार)कर अनुशंसित विक्रम वर्ष में (दुर्ग की) स्थापना कराई गई और प्रतिष्ठापन अनुष्ठान संपन्न हुआ। इससे दुर्गम (स्थान/ पर्वत शिखर) पहुंच में (सुगम) और समृद्धशाली हो सकेगा।। वनमालिमिश्र।।"*8
संस्कृत शिलालेख का विश्लेषणात्मक अध्ययन करने पर अनेक महत्वपूर्ण बातें निकलकर आतीं हैं, जिसमें उल्लेखनीय तथ्य अधोलिखित हैं :-
1.यह संस्कृत शिलालेख राजा मेदिनी राय द्वारा लिखवाया गया है। अभिलेख में मेदिनी राय के लिए मेतनी दर्ज हो गया है। जबकि पलामू डिस्ट्रिक्ट गजेटियर (1926) में मेदिनी राय अंकित है।
2.यह अभिलेख नया पलामू किला का शिलान्यास का है।
3.नागपुरी दरवाजे की चौखट पर उकेरित यह अभिलेख 22 पंक्तियों में है।
4.अभिलेख की लिपि नागरी तथा भाषा संस्कृत है।
5.नये पलामू किला की स्थापना राजा मेदिनी राय द्वारा संवत् 1680 के माघ मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि दिन बुधवार, तदनुसार 8 जनवरी 1624 ई को की गई।
6.चेरो राजवंश का संस्थापक भगवत्त राय थे, जबकि उन्हें इतिहास में भगवंत राय के नाम से जाना जाता है।
7.भगवत्त राय के पिता का नाम उदव्रत है। उदव्रत के लिए महाराज शब्द आया है। इससे विदित होता है कि पलामू किला पर शासन करने के पहले उदव्रत कहीं के राजा थे।
8.अनत्त राय, जो अनंत राय के नाम से प्रसिद्ध है, भगवत्त राय का पुत्र है। भगवत्त के बाद पलामू राज्य की गद्दी पर बैठने वाला राजा अनत्त राय था।
9.अनंत राय और मेदिनी राय के मध्य कई राजा हुए। राजा मेदिनी राय अनंत राय के वंशज हैं, न कि पुत्र।
10.मेदिनी राय वीर योद्धा, दयालु तथा समस्याओं से निजात दिलाने में दक्ष थे। साथ ही धन-दौलत की कमी नहीं थी। धन-दौलत की कमी होती तो किला का निर्माण नहीं कर पाते, इसलिए अभिलेख में उन्हें सिंधु के समान संपत्ति वाला अर्थात रत्नाकर कहा गया है।
11.चेरो वंश च्यवन ऋषि का वंशज है। च्यवन ऋषि की चर्चा महाभारत और पुराणों में वर्णित है।
12.यह अभिलेख वनमालि मिश्र द्वारा लिखा गया है। संभवतः वनमालि मिश्र राजा मेदिनी राय के पुरोहित थे।
13.इस अभिलेख में राजा मेदिनी राय के पिता का नाम अंकित नहीं है। संभव है कि उनके पिता राजा न रहे हों।
14.राजा मेदिनी राय ने मुगल बादशाह जहांगीर के समय में किले की नींव रखी।
15.राजा मेदिनी राय का संबंध सनातन धर्म से था। किले की स्थापना के लिए उन्होंने प्रतिष्ठापन अनुष्ठान किया था। इस अनुष्ठान को वनमालि मिश्र ने संपन्न कराया था।
नये पलामू किले का फारसी शिलालेख
नये पलामू किले के नागपुरी दरवाजे की चौखट पर उकेरित दूसरा शिलालेख फारसी भाषा में लिखा गया है। दोनों शिलालेखों को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पुरातत्त्ववेत्ता जी. सी. चंद्रा ने 1932-33 में खोजा था। उस समय संस्कृत शिलालेख को नहीं पढ़ा जा सका था, मगर फारसी शिलालेख को पढ़ा जा चुका था। इसका पाठ कयामुद्दीन अहमद की पुस्तक में दर्ज है। *9 इस फारसी शिलालेख का नागरी लिपि में पाठ इस प्रकार है :-
"श्री राम चन्द्रजी सिद्धि
अल्लाहु अकबर
ई किला बर कोह पर दाख्त
महाराज राजा श्री मेदिनी राई
(पेश-रौ) श्री अनत्त रायी इब्न श्री भगवंत
(रायी) संबत शाजदा(शानवदा)सद नवद साल माह
-----बदी पंचमी रोज़ पंजशंबा मवाफिक बतारीख 18 माह
रजब अल्मुरजिब1043 (हिजरी)"*10
इसका हिंदी पाठ इस प्रकार है :-
"श्री राम चन्द्रजी सिद्धि। अल्लाहु अकबर (भगवान महान है)। यह किला पर्वत शिखर पर बनवाया है। महाराजा राजा मेदिनी राय ने। उनके अग्रगामी (पूर्वज) श्री अनत्त राय पुत्र भगवंत राय संवत सोलह सोलह सौ नब्बे वर्ष के माह----कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि बृहस्पतिवार, तदनुसार 1043 वर्ष( हिजरी) के प्रतिष्ठित माह रजब के 18 वें दिन (15 फरवरी 1634 ई) को लिखित।"
यह शिलालेख नया पलामू-दुर्ग में प्रवेश के शुभ मुहूर्त के अवसर पर लिखा गया है। इस शिलालेख के विश्लेषण से अधोलिखित तथ्य सामने आते हैैं, जो गौरतलब है।
1.नये पलामू किले में प्रवेश-मुहूर्त अथवा उद्घाटन के वक्त लिखा गया यह अभिलेख अरबी लिपि एवं फारसी भाषा में है।
2.यह राजा मेदिनी राय का शिलालेख है, जो 8 पंक्तियों में अंकित है।
3.नये पलामू किले का उद्घाटन महाराजा मेदिनी राय ने संवत् 1690, माह-------कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि, दिन वृहस्पतिवार, तदनुसार 1043 (हिजरी) के प्रतिष्ठित माह रजब के 18 वें दिन, तदनुसार 15 फरवरी 1634 ई में किया।
4.शिलालेख में महाराज मेदिनी राय के पूर्वज के रूप में अनत्त राय का नाम है, जबकि भगवंत राय का नाम अनत्त राय के पिता के रूप में अंकित है न कि राजा के रूप में। इससे अभिज्ञात होता है कि अनंत राय भगवंत राय के तुलना में अधिक प्रभावशाली राजा थे। चेरो राजवंश के स्थापना-काल में अनंत राय पट्ठा जवान रहे होंगे।
5.इस शिलालेख में सबसे पहले रामचंद्र जी का नाम लिया गया है। इससे पता चलता है कि राजा मेदिनी राय वैष्णव थे। उन्होंने भगवान की महानता को नमन भी किया है।
6.किला की अवस्थिति पहाड़ पर है। इससे प्रतीत होता है कि दुश्मन के हमलों को करारा जवाब देने के लिए किले का निर्माण पहाड़ पर कराया गया।
7.इस अभिलेख में लेखक का नाम दर्ज नहीं है। संभवतः फारसी के ज्ञाता को बाहर से बुलाया गया था।
8.दोनों अभिलेखों से ज्ञात होता है कि इस किले के निर्माण में लगभग 10 साल लगे।
9.किले का शिलान्यास मुग़ल बादशाह जहांगीर के काल में हुआ, जबकि शुभ प्रवेश बादशाह शाहजहां के काल में हुआ।
उक्त दोनों शिलालेखों के अध्ययन से पलामू राज्य के प्रारंभिक चार राजाओं तथा दो कालों अथवा तारीखों का पता चलता है। तीन राजाओं में भगवंत राय, अनंत राय तथा मेदिनी राय का नाम अंकित है। एक और नाम महाराज उदव्रत राय का मिलता है, जो चेरो राजवंश के संस्थापक भगवंत राय के पिता हैं। उदव्रत राय की राजधानी कहां थी, यह अज्ञात है। शिलालेखों में दो तारीखों का उल्लेख हुआ है, जो 1624 ई तथा 1634 ई है। इन शिलालेखों के अध्ययन से यह अभिज्ञात होता है कि चेरो राजवंश सनातन धर्मावलंबी अर्थात वैष्णव था।
बहरहाल चेरो राजवंश का इतिहास किंवदंतियों के आधार पर लिखे जाने के कारण भ्रांतियों एवं मिथ्या सूचनाओं से भरे-पड़े हैं। उनके प्रारंभिक शासनकाल संबंधी अवधारणा तो बिल्कुल फिजूल है। यह तो मुगलिया ऐतिहासिक ग्रंथों से भी मेल नहीं खाती। उक्त दो शिलालेखों के अध्ययन-विश्लेषण से जो निष्कर्ष सामने आया है, वह भले चौंकानेवाला हो, मगर बिल्कुल साफ और यथार्थ है। शिलालेखों से प्राप्त शासनकाल संबंधी विवरणों से न केवल चेरो राजवंश का इतिहास पर से विभिन्न भ्रांतियों की धूल साफ होती हैं, बल्कि शासनकाल का आगाज और 75 वर्ष पीछे (शेरशाहकालीन, 1538 ई) चला जाता है। *12 मालूम हो कि चेरो राजवंश की स्थापना 1613 ई में माना जाता है, जो किंवदंती पर आधारित है।
औरंगजेब कालीन बिहार के सूबेदार दाऊद खां कुरैशी ने दिसंबर 1660 ई में पलामू किला पर आधिपत्य स्थापित कर लिया था। उसने 1661 ई में पलामू किला परिसर में अवस्थित मंदिर और प्रतिमाओं को ध्वस्त किया। तत्पश्चात उसकी जगह पर एक मस्जिद का निर्माण किया। *13 उसने मस्जिद की दीवार पर फारसी भाषा और अरबी लिपि में निम्न अभिलेख अंकित कराया :-
“कुफ्र-ए-देरिनबुद पलामुन अजनाबर्द, हालिया दाऊद खां इस्लमा कर्द।”अर्थात पलामू लंबी अवधि तक अधार्मिक तत्वों का स्थल था। युद्ध द्वारा दाऊद खां ने इसे इस्लाम का पवित्र स्थल बना दिया।*14 यह शिलालेख अब उपलब्ध नहीं है।
मेदिनीनगर से 25 किलोमीटर उत्तर-पूरब स्थित ग्राम छेछौरी (पाटन प्रखंड) में एक मध्यकालीन बौद्ध मंदिर का खंडहर है। इसी मंदिर के निकट पक्की ईंटों से निर्मित एक कुआं है, जिसे स्थानीय लोग ‘रक्सेलवा कुआं’ के नाम से संबोधित करते हैं। आश्चर्यजनक रूप से बौद्ध मंदिर और कुएं में प्रयुक्त ईंटों में समानता है। इसी कुएं से एक अभिलेख उकेरित पत्थर मिला था। ग्रामीणों द्वारा इस बाबत लेखक को बताया गया कि एक सरकारी अधिकारी द्वारा उस कुएं से शिलालेख को निकालकर पटना भेजा गया था। उस शिलालेख की तहकीकात करने की आवश्यकता है।
आधुनिक कालीन शिलालेख :- हुसैनाबाद में आधुनिक काल के तीन शिलालेख हैं, जो एक शिव मंदिर, मकबरा और कब्र पर अंकित है।
जपला रेलवे स्टेशन से 4 किलोमीटर दूर देवरी स्थित सोन नदी के दाएं तट पर एक सौ साल पुराना शिव मंदिर है। स्थानीय लोग इस मंदिर को शिवाला कहते हैं। इस मंदिर में शिव परिवार की प्रस्तर-प्रतिमाएं हैं। मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है, जिसके सामने नंदी की प्रस्तर-प्रतिमा है। यहां गणेश और पार्वती की भी प्रतिमा है। मंदिर की दीवार पर एक अभिलेख अंकित है। तदनुसार जमींदार सैयद हसन इमाम के तहसीलदार रामदेनी सिंह, जो पीरो, शाहाबाद के निवासी थे और ग्राम कुसुआ स्थित बंगला में रहते थे, ने 26 दिसंबर 1926, दिन रविवार को इस शिव मन्दिर का शिलान्यास किया था। मजे की बात यह है कि इसी दिन देवरी में ही एक मस्जिद भी तामीर की गई थी। उल्लेखनीय है कि पटना के रहने वाले सैयद हसन इमाम की जपला में जमींदारी थी। उन्होंने जपला सीमेंट फैक्ट्री को 99 साल की लीज पर जमीन दी थी। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1918 में मुंबई में आयोजित विशेष अधिवेशन के अध्यक्ष रह चुके हैं। गौरतलब तथ्य यह भी है कि 19 अप्रैल 1933 को उनके निधन के पश्चात उनका विशाल मकबरा जपला स्थित देवरी में स्थापित है। इस मकबरे पर भी अरबी लिपि में एक अभिलेख अंकित है। हुसैनाबाद शहर के इमामबाड़ा में वासला बेगम की कब्र है। इस कब्र पर एक शिलालेख जड़ा हुआ है, जिसकी लिपि अरबी है। वासला बेगम मध्यकालीन इतिहासकार सैयद गुलाम हुसैन (18 वीं शताब्दी) से संबंधित थीं।
गढ़वा जिला मुख्यालय से 35 किलोमीटर दूर वंशीधर नगर ऊंटारी में लगभग दो सौ वर्षों पूर्व श्रीकृष्ण एवं राधा की अद्भुत एवं आकर्षक प्रतिमा स्थापित है। जनश्रुति है कि तत्कालीन राजा भवानी सिंह की विधवा पत्नी शिवमानी कुंवर देवी ने वंशीधर कृष्ण की स्वर्ण मूर्ति को जमीन के नीचे दबे होने का स्वप्न देखा। स्वप्न के अनुसार, यह अद्भुत प्रतिमा नगर से 22 किलोमीटर दूर कनहर नदी के निकट अवस्थित शिवपहरी की पहाड़ी में अवस्थित एक गुफा में जमींदोज मिली। विडंबना यह थी कि सिर्फ कृष्ण की प्रतिमा मिली। पंडितों ने रानी को राय दी कि कृष्ण के साथ राधा की प्रतिमा वामपार्श्व में अवश्य होनी चाहिए। तब रानी शिवमानी कुंवर ने अष्टधातु की राधा की विलक्षण प्रतिमा का निर्माण कराकर संवत 1885 में काफी धूमधाम से राधा-कृष्ण की युगल प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा की। तत्पश्चात मंदिर का निर्माण किया गया।
कथित 32 मन (1280 किलोग्राम) वजन तथा साढ़े चार फीट ऊंची श्री कृष्ण की आदमकद प्रतिमा वंशीवादन में तल्लीन त्रिभंगी मुद्रा में है। त्रिभंगी मुद्रा में कृष्ण सुनहला शेषनाग के मस्तक पर जड़ित कमल-पुष्प पर स्थानक मुद्रा में वंशीवादन कर रहे हैं। शेषनाग भूमि में गड़े होने के कारण अब दृष्टिगोचर नहीं होते, जबकि चरण पादुका, जो कमल-पुष्प है, स्पष्ट दिखता है। श्री कृष्ण के शरीर पर पीतांबर, गले में रूद्राक्ष की माला, कानों में चमकते हुए कुंडल, कमर में करधनी, भुजा में भुजबंध, कलाई में वलयाभूषण तथा ऊंगली में मुद्रिका शोभित है। उनके मुकुट के अग्र भाग में मयूर के पंख एवं छत्र लगे हुए हैं। कृष्ण के वाम अंग में राधिका जी शोभित हैं। प्रतिमा किस धातु की है, इस पर लोगों में मतैक्य नहीं है। ब्राह्मण पुजारी और अन्य भक्त इसे सोने की प्रतिमा मानते हैं, जबकि अधिकांश लोगों की दृष्टि में यह प्रतिमा अष्टधातु की है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, रांची मंडल की टीम, जिसका नेतृत्व भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, रांची मंडल के सहायक अधीक्षण पुरातत्वविद डॉ. नीरज कुमार मिश्र कर रहे थे, को यहां तीन आभिलेखिक साक्ष्य मिले हैं, जिनमें दो श्रीकृष्ण की मूर्ति के कमलासन पर और एक मंदिर के प्रवेश द्वार के दाईं ओर दीवार पर बने एक आले में अंकित है। इन अभिलेखों का पाठ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, मैसूर की पुरालेख शाखा द्वारा किया गया है। आभिलेखिक अध्ययन से स्पष्ट है कि वंशीधर की प्रतिमा निर्मित मंदिर से पुरानी है। मूर्ति की ऐतिहासिकता कैथी लिपि में अंकित अभिलेख से ज्ञात होती है, जिसमें संवत् 1763 (1706 ई) में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष के 13 वें दिन भगवान श्री वंशी की प्रतिमा भेंट किए जाने का उल्लेख है। कमलासन के मुख्य भाग पर कैथी लिपि में अंकित अभिलेख से ज्ञात होता है कि मूर्ति का संबंध छोटानागपुर के नागवंशी राजवंश से है। दरअसल इस अंकित अभिलेख में हरिनाथ गुरु और नागवंशी राजा रघुनाथ शाह के नाम अंकित हैं। अभिलेख में गुरु हरिनाथ तथा नागवंशी शासक रघुनाथ शाह के शासनकाल में कुछ मतभेद है। कुछ विद्वान रघुनाथ शाह का शासनकाल 1663 से 1690 ई मानते हैं, जबकि अन्य विद्वान 1645 से 1605 ई मानते हैं। रामविलास प्रकाश एवं सुरभि श्रीनाथ कुल चार लोगों द्वारा उक्त तिथि को भगवान श्री वंशी (श्री वंशीधर) के मूर्ति-दान की चर्चा की है। सर्वविदित है कि नागवंशी शासकों ने छोटानागपुर क्षेत्र में भगवान जगन्नाथ, विष्णु और कृष्ण के कई वैष्णव मंदिर स्थापित किए थे। मुगल बादशाह औरंगजेब के समकालीन छोटानागपुर के नागवंशी राजा रघुनाथ शाह अत्यंत धार्मिक प्रवृत्ति और अपने दानी स्वभाव के लिए विख्यात थे। कहा जाता है कि एक अवसर पर राजा रघुनाथ शाह ने अपना समस्त राज्य अपने धर्म गुरु हरिनाथ को दान कर दिया था, जिसे गुरु ने अस्वीकार कर दिया। रघुनाथ शाह को गुरु से इतना प्रेम था कि उनके कार्यकाल में निर्मित मंदिरों में जो अभिलेख मिलते हैं, उनमें गुरु हरिनाथ का नाम पहले आता है। वंशीधर प्रतिमा के कमलासन पर बाएं पैर की दाहिनी ओर उड़िया लिपि में एक व्यक्ति का नाम अंकित है :- ‘श्रीकांत उस्ताद।’ नाम में उस्ताद लगा है, इससे पता चलता है कि वंशीधर प्रतिमा का मुख्य मूर्तिकार वही है।
वंशीधर मंदिर की दीवार पर मूर्ति की स्थापना एवं मंदिर के निर्माण के संबंध में कैथी लिपि में एक शिलालेख है, जो इस प्रकार है - “श्री स्वास्ति ठाकुर जी श्री कृष्ण जी का धाम महाराज भवानी सिंहस्य धर्मपत्नी शिवामानी कुंवरी देव देवी ने तैयार की हेन। श्री शुभ संवत् 1885 श्री कृष्ण प्रीत्यर्थे शुभम्।”*15
स्पष्टतः वंशीधर की प्रतिमा की प्राप्ति और प्राण-प्रतिष्ठा वर्ष 1828-29 ई है।
बहरहाल पलामू में प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक के अभिलेख मिले हैं, जो शोध एवं संरक्षण के अभाव में निरर्थक होते जा रहे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि इन अभिलेखों में तत्कालीन समय या शासन का इतिहास छिपा हुआ है। पलामू के शिलालेखों में गौरवशाली खरवार और चेरो राजवंशों के इतिहास के प्रामाणिक साक्ष्य हैं। अच्छी बात है कि भारत सरकार द्वारा इस धरोहर के सर्वेक्षण, संरक्षण, अभिलेखीकरण एवं डिजिटलीकरण के लिए प्रयास किया जा रहा है। इसके लिए हर जिला में “ज्ञान भारत मिशन” के तहत एक कमिटी गठित कर काम को अंजाम दिया जा रहा है।
संदर्भ-सूची
1. झारखंड का मौर्यकालीन नगर जपला (2023) - डॉ अंगद किशोर, पृष्ठ 63-64
2.Journal of Francis Buchanan kept during the servey of the district of Shahabad in 1812-13,page 75
3. झारखंड की बौद्ध विरासत (2024)- डॉ अंगद किशोर, पृष्ठ 48
4.द एंटिक्वैरियन रिमेंस इन बिहार (1963)- डी आर पाटिल, पृष्ठ 182
5.चरैवेति (2026) में प्रकाशित आलेख “मध्यकालीन जपला स्टेट के शासक प्रताप धवल देव”- संपादक-सह-लेखक डॉ अंगद किशोर, पृष्ठ 15
6.वही, चरैवेति, संपादक-सह-लेखक डॉ अंगद किशोर, पृष्ठ 15-16
7.पलामू का मध्यकालीन जनजातीय चेरो राजवंश : नवीन अभिलेखीय साक्ष्य (अर्णव,2020, पृष्ठ 219-241)- डॉ श्याम सुन्दर तिवारी
8.वही, डॉ श्याम सुन्दर तिवारी
9.कार्पस आप अरेबिक ऐंड पर्शियन इंस्कृप्शंस आफ बिहार (ए.एच.640-1200),1973-क्यामुद्दीन अहमद
10. वहीं, क्यामुद्दीन अहमद
11.चेरो राजवंश का इतिहास (2021)- डॉ अंगद किशोर, पृष्ठ 113
12.वही, डॉ श्याम सुन्दर तिवारी
13.वही, डी आर पाटिल, पृष्ठ 352
14.आई. एच. आर. सी. प्रोसिडिंग्स, जिल्द 36,भाग 2, पृष्ठ 94-97
एवं झारखंड : इतिहास एवं संस्कृति (2006)- डॉ बी. वीरोत्तम, पृष्ठ 74
15. बिहार-झारखंड का मध्यकालीन स्टेट : जपला-रोहतासगढ़ (2026)- डॉ अंगद किशोर, पृष्ठ 159-60
इतिहासकार एवं अध्यक्ष सोन घाटी पुरातत्व परिषद, जपला, पलामू

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