डॉ. अंगद किशोर, इतिहासकार-सह-अध्यक्ष सोन घाटी पुरातत्व परिषद
परगना से स्टेट और स्टेट से प्रमंडल तक की प्रशासनिक यात्रा तय करने वाला पलामू, इतिहास के गलियारों में शताब्दियों तक अनेक उतार-चढ़ाव से गुज़रा है। आज की तारीख में झारखंड का एक जिला और प्रमंडल के रूप में ख्यात पलामू खयरवाल उर्फ खरवार, रक्सेल और चेरो राजवंशों के काल में एक स्टेट हुआ करता था। रक्सेलों ने लगभग दो सौ वर्षों तथा चेरओं ने लगभग पौने तीन सौ वर्षों तक पलामू में शासन किया, जबकि खरवारों ने उत्तरी-पश्चिमी पलामू प्रमंडल पर लगभग छह शताब्दियों तक शासन किया। प्राप्त शिलालेखों के अनुसार, खरवार राजवंश के शासक प्रताप धवल देव की राजधानी जपिला (वर्तमान जपला) में थी। उन्हीं के वंशज सोनपुरा, नगर ऊंटारी, गढ़वा, बेलौंजा तथा रोहतासगढ़ पर काबिज थे। जबकि रक्सेल और चेरो राजवंशों के शासक पलामू पर काबिज थे। ऐतिहासिक काल में यह भौगोलिक क्षेत्र मगध जनपद का हिस्सा हुआ करता था। मुगल काल में उनके सूबेदारों के बार-बार आक्रमण के बावजूद पलामू पर मुगलों का पूर्णतया आधिपत्य स्थापित नहीं हो सका। बाद में पलामू का हिस्सा बना जपला परगना के शासक ने पहली बार 1629 ई में मुगलों को कर अदा किया।
खरवार, रक्सेल और चेरो राजवंशों से शुरू हुआ पलामू का इतिहास
पत्रकार रामेश्वरम (दिवंगत) के अनुसार, 3 अरब 20 करोड़ वर्ष पुराना भू-खंड वाला पलामू प्रारंभ में एक टप्पा था। बाद में विभिन्न टप्पों को मिलाकर पलामू परगना बना। सल्तनत और मुगल कालों में परगना एक ऐतिहासिक, प्रशासनिक एवं राजस्व इकाई होता था, जिसमें अनेक मौजें होते थे। कालांतर में पहले खरवारों और रक्सेलों तथा बाद में चेरओं ने इस परगने पर अपना शासन स्थापित किया। बंगाल एम.एस. रिकार्ड (डब्ल्यू.डब्ल्यू.हंटर) के अनुसार, पलामू परगना 1765 ई में ईस्ट इंडिया कंपनी के मातहत हुआ। तत्पश्चात कर्नल कैमक ने 20 फरवरी 1771 ई को पलामू किला पर कब्जा कर लिया। अंततः कंपनी ने जुलाई 1771 ई में संपूर्ण पलामू पर अधिकार कर लिया।
रामगढ़ हिल ट्रैक से प्रशासनिक बदलावों का दौर
1773 ई में रामगढ़, छोटानागपुर और पलामू को मिलाकर रामगढ़ जिला बनाया गया। इसका कलक्टर कप्तान कैमक बना। 1780 ई में ‘रामगढ़ हिल ट्रैक’ की स्थापना कर चैपमैन को प्रधान बनाया गया, जिसे जज, मजिस्ट्रेट और कलक्टर तीनों का अधिकार प्राप्त था। ‘रामगढ़ हिल ट्रैक' का प्रशासन शेरघाटी और चतरा से चलाया जाता था। इसके अंतर्गत पलामू के अलावा हजारीबाग और छोटानागपुर क्षेत्र भी आते थे। 1790 ई में कलक्टर का काम इतना बढ़ गया कि एक साथ जज, कलक्टर और मजिस्ट्रेट का दायित्व संभालना मुश्किल हो गया। फलस्वरूप 1792 ई में जमींदारी पुलिस व्यवस्था की जगह दारोगा व्यवस्था लागू की गई। जब यह व्यवस्था भी कारगर नहीं हुई तो पुनः जमींदारी पुलिस व्यवस्था कुछ संशोधनों के साथ लागू की गई।
1800 ई में ‘रामगढ़ हिल ट्रैक' के कलक्टर का पद समाप्त कर राजस्व प्रशासन का भार गया के कलक्टर को दे दिया गया। पुनः 1809 ई में रामगढ़ में सहायक कलक्टर का पद सृजित किया गया और रिचर्ड वालपोल को नियुक्त किया गया। 1819 ई में रामगढ़ के सहायक कलक्टर को कलकत्ता बोर्ड रेवेन्यू से हटाकर बिहार और बनारस सेंट्रल प्राॅविंस बोर्ड ऑफ रेवेन्यू के अधीन कर दिया गया।
पलामू की नीलामी और विद्रोह की पृष्ठभूमि
पलामू के जागीरदार चुड़ामन राय द्वारा वार्षिक कर कंपनी सरकार को नहीं चुकाए जाने पर 1813 ई में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा पलामू को 51000 रुपए में नीलाम कर दिया गया। बाद में कंपनी सरकार ने जुलाई 1816 ई. में पूर्व तिथि से पलामू का हस्तांतरण देव के राजा तथा अंग्रेजी हुकूमत का खैरख्वाह घनश्याम सिंह के हाथों कर दिया। पलामू की नीलामी की घटना से यहां के जागीरदार काफी आहत हुए। फलस्वरूप अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह की लहर बढ़ती चली गई। अंततः अंग्रेजों को इस क्षेत्र की प्रशासनिक व्यवस्था पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य होना पड़ा। 25 अक्टूबर 1827 ई को सरकार ने बोर्ड ऑफ रेवेन्यू को नये आदेश दिए और कहा कि इन आदेशों के आधार पर पलामू में एक नया बंदोबस्त स्थापित किया जाए। रामगढ़ के कलक्टर एस.टी.कथबर्ट ने नीलामी कानून को ग़लत बताया, क्योंकि जागीर का अपहरण नहीं किया जा सकता है। पलामू की नीलामी पर सरकार ने 24 जुलाई 1828 को रिपोर्ट ए. प्रिंसेप से मांगी, किंतु 1830 में उसकी मृत्यु हो जाने के कारण इस रिपोर्ट को पूरा नहीं किया जा सका। परिणाम यह हुआ कि 1831-32 ई में कोल विद्रोह पलामू में फैला तो स्थानीय जागीरदारों ने खुलकर समर्थन किया।
कंपनी सरकार ने 1833 ई में कोल विद्रोह को ध्यान में रखते हुए पलामू सहित तमाम छोटानागपुर क्षेत्र के लिए रेगुलेशन -XIII, 1833 पास किया। इस रेगुलेशन के लागू होने से छोटानागपुर क्षेत्र ईस्ट इंडिया कंपनी के सीधे नियंत्रण में आ गया। पुनः 1834 ई में गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बैंटिक के समय रेगुलेशन एक्ट -XIII, 1833 के तहत पुराने रामगढ़ जिला को भंगकर एक ‘नन रेगुलेशन प्राॅविंस’ का गठन किया गया , जिसे ‘दक्षिण-पश्चिम सीमांत एजेंसी’ के नाम से जाना गया। इस एजेंसी के तहत छोटानागपुर-खास, पलामू , खड़गडीहा, रामगढ़ और कोरंदा (वर्तमान में सरगुजा जिलांतर्गत) को भूतपूर्व रामगढ़ जिला से अलग कर इन्हें जंगल महाल तथा ट्रिब्युटरी महाल के साथ एक नन रेगुलेशन प्रांत के रूप में संगठित किया। इस एजेंसी के सारे कार्यकारी अधिकार कैप्टन विल्किंसन के पास थे। एजेंसी का मुख्यालय किशुनपुर (वर्त्तमान रांची) में था और यह तीन डिवीजनों / जिलों में बंटी हुई थी - लोहरदगा, मानभूम और हजारीबाग। 1843 ई में एक डिप्टी कमिश्नर की नियुक्ति की गई और रांची में न्यायालय स्थापित किया गया, लेकिन डिप्टी कमिश्नर 1899 ई तक लोहरदगा से ही काम करते रहे। बोर्ड ऑफ रेवेन्यू के सदस्य रिकेट्स के रिपोर्ट पर 1854 ई में एक्ट-XX के द्वारा ‘साउथ वेस्ट फ्रंटियर एजेंसी’ को समाप्त कर ‘छोटानागपुर कमिश्नरी’ का गठन किया गया तथा एजेंसी के डिवीजनों / जिलों को इस कमिश्नरी के अधीनस्थ रखा गया। फलस्वरूप पलामू लोहरदगा डिवीजन का हिस्सा बना।
पलामू जिले के गठन से प्रमंडल बनने तक
एजेंसी के निवासी प्रशासकीय परिवर्तनों के बावजूद असंतुष्ट बने रहे क्योंकि एजेंसी के दूरस्थ भाग मुख्यालय से काफी दूर थे। अतः 1853 ई में जुनियर-असिस्टेंटों के अधीन सब-डिवीजन बनाए गये। फलस्वरूप 1853 में कोरंदा (सरगुजा, छत्तीसगढ़) को अनुमंडलीय मुख्यालय का दर्जा देकर पलामू परगना को उसमें शामिल कर दिया गया। कोरंदा सब-डिवीजनल ऑफिसर का कार्यलय-सह-आवास था। यहां कोई बाज़ार या बस्ती नहीं थी। अनुमंडल पदाधिकारी सरगुजा तथा उदयपुर की रियासतों की देखरेख के साथ-साथ पलामू परगना का शासन भी संभालते थे। लेस्लीगंज में तहसील कचहरी बनी और तहसील अधिकारी कर्नल लेस्ली को बनाया गया। वहां सेना की एक टुकड़ी को रहने के लिए छावनी बनाई गई। 1854 में कर्नल लेस्ली के नाम पर लेस्लीगंज थाना बना। वर्तमान में इसका नाम बदलकर नीलांबर - पीतांबर पुर कर दिया गया है। कोरंदा के बाद 1859 में लेस्लीगंज को पलामू परगना का अनुमंडलीय मुख्यालय बनाया गया। 1862 में पलामू अनुमंडल बना, जिसका मुख्यालय बिजराह उर्फ बिजराहा उर्फ बिजरा बाग को बनाया गया। इसी बिजरा बाग का नया नाम छोटानागपुर प्रमंडल के प्रथम आयुक्त कर्नल डाल्टन के नाम पर डाल्टनगंज पड़ा।
1871 ई में गया जिला से जपला एवं बेलौंजा परगनों को अलग कर पलामू अनुमंडल में शामिल किया गया। उल्लेखनीय है कि जपला (तत्कालीन नाम जपिला) 12 वीं शताब्दी में खयरवाल राजवंश का स्टेट हुआ करता था। रांची जिला से अलग कर टोरी परगना को पलामू में शामिल किया गया। संभावना है कि टोरी परगना पलामू जिले का गठन के समय या उससे पहले ही प्रशासनिक रूप से पलामू के अधीन आ गया था। 1 जनवरी 1892 को लोहरदगा जिला से अलग कर पलामू जिला का गठन किया गया, जिसका मुख्यालय डाल्टनगंज (वर्तमान नाम मेदिनीनगर) को बनाया गया। डब्ल्यू. आर. ब्राइट पलामू जिला के प्रथम उपायुक्त बने। 10 नवंबर 1972 को रोहतास जिला बना, जिसमें पलामू से अलग कर बेलौंजा परगना को शामिल कर दिया गया। पलामू जिला का दूसरा अनुमंडल 1924 में लातेहार बना। आजादी के बाद 24 जून 1955 को गढ़वा अनुमंडल बना। 1 अप्रैल 1991 को पलामू को विभक्त कर गढ़वा को जिला बनाया गया और इसी तारीख को पलामू जिला अंतर्गत हुसैनाबाद को अनुमंडल का दर्जा प्राप्त हुआ।
इस क्षेत्र के गौरव में चार चांद तब लगा, जब पलामू को प्रमंडल का दर्जा 2 मई 1992 को प्राप्त हुआ। उस समय इस प्रमंडल के अंतर्गत मात्र दो जिले थे - पलामू और गढ़वा। बाद में जब 4 अप्रैल 2001 को पलामू जिला से अलग कर लातेहार जिला का गठन हुआ, तब इसे भी पलामू प्रमंडल में शामिल किया गया। 16 सितंबर 1994 को छत्तरपुर को अनुमंडल का दर्जा मिला। 4 अप्रैल 2001 को पलामू से विभक्त कर लातेहार को जिला बनाया गया और इसी दिन महुआडांड़ को अनुमंडल का दर्जा प्राप्त हुआ।
पलामू जिला :- 1912 ई के पहले पलामू अविभाजित बंगाल का एक जिला था। 15 नवंबर 2000 के पहले बिहार का तथा अब झारखंड का एक जिला है। संप्रति पलामू जिला का भौगोलिक क्षेत्रफल 5043.8 वर्ग किलोमीटर तथा 2011 के अनुसार जनसंख्या 1939869 है। इस जिले में तीन अनुमंडल - मेदिनीनगर, हुसैनाबाद और छत्तरपुर है तथा 21 प्रखंड हैं - मेदिनीनगर, चैनपुर, रामगढ़, सतबरवा, लेस्लीगंज, पांकी, तरहसी, मनातु, पाटन, पंडवा, विश्रामपुर, नावा बाज़ार, पांडू, ऊंटारी, मोहम्मदगंज, हैदरनगर, हुसैनाबाद, छत्तरपुर, नौडीहा बाज़ार, हरिहरगंज और पिपरा। इस जिले में 28 पुलिस थाने, 283 ग्राम पंचायत तथा 1918 ग्राम है। इस जिले के अंतर्गत 4 नगर पंचायतें - हुसैनाबाद, छत्तरपुर, विश्रामपुर और हरिहरगंज तथा एकमात्र नगर निगम मेदिनीनगर है। इस जिले में 16 रेलवे स्टेशन है। इस जिले की समुद्र तल से औसत ऊंचाई 222 मीटर है। गढ़वा जिला :- गढ़वा जिला का भौगोलिक क्षेत्रफल 4044 वर्ग किलोमीटर तथा 2026 के अनुसार जनसंख्या 1322784 है। गढ़वा जिले में तीन अनुमंडल - गढ़वा, नगर ऊंटारी और रंका तथा 20 प्रखंड हैं - गढ़वा, मेराल, रंका, भंडरिया, मझिआंव, वंशीधर नगर (नगर ऊंटारी), भवनाथपुर, धुरकी, डंडई, चिनिया, खरौंधी, रमुना, रमकंडा, कांडी, डंडा, केतार, बिशुनपुरा, बरडीहा, बरगढ़ एवं सगमा। इस जिले में संप्रति 21 पुलिस थाने, 196 ग्राम पंचायत तथा 978 गांव (62 बेचिरागी गांव लेकर) है। इस जिले में दो नगर पंचायत वंशीधर नगर और मझिआंव तथा एकमात्र नगर परिषद गढ़वा है। समुद्र तल से इस जिले की औसत ऊंचाई 197 मीटर है। लातेहार जिला :- लातेहार जिला का भौगोलिक क्षेत्रफल 3651.59 वर्ग किलोमीटर तथा 2011 के अनुसार, जनसंख्या 726978 है। इस जिले में दो अनुमंडल - लातेहार और महुआडांड़ तथा 9 प्रखंड हैं - लातेहार, चंदवा, बालूमाथ, बरियातु, हेरहंज, मनिका, बरवाडीह, गारू तथा महुआडांड़ है। संप्रति इस जिले में 12 पुलिस थाने, 115 ग्राम पंचायत तथा 774 गांव हैं। समुद्र तल से इस जिले की औसत ऊंचाई 387 मीटर है। इसी जिले में नेतरहाट एक बेहद खूबसूरत हिल स्टेशन है, जिसे 'छोटानागपुर की रानी' तथा 'झारखंड का मसूरी' कहा जाता है। बहरहाल पलामू का प्रशासनिक सफ़र परगना, स्टेट, सब-डिवीजन और जिला होते हुए प्रमंडल पर समाप्त हुआ। पलामू का उप राजधानी और केंद्रशासित प्रदेश बनने का सपना जो दिखाया गया, वह अब तक अधूरा है।

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