मुकुंद नायक
सिमडेगा जिले के उस छोटे से गांव बोकबा की सात दशक पहले की कोई सुंदर सी शाम और शाम में गांव किनारे सजे अखरा में बजते मांदर-ढोल-नगाड़ा...दूर-दूर तक जाती हुई मधुर शहनाई की आवाज...। इन आवाजों ने आज तक पीछा नहीं छोड़ा। इस आवाज को उस छोटे से गांव से निकालर हांगकांग, अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस आदि देशों में पहुंचाया। तो उसी गांव में 15 अक्टूबर 1949 को प्रख्यात लोककलाकार पद्श्री मुकुंद नायक का जन्म हुआ था। कहते हैं, मां और बहन का आंचल पकड़कर अखरा जाता था। अखरा एक तरह से गीत-संगीत के साथ-साथ सुख-दुख बतियाने का भी केंद्र हुआ करता था। एक तरह से प्रारंभिक पाठशाला भी। तो, यहीं पर गीत-संगीत-नृत्य ने मेरे कोमल मन को प्रभावित किया और फिर इन आवाजों के पीछे भागता रहा...।
फिर जब रांची आया तो यहां अलग राज्य का आंदोलन चल रहा था। इसके सांस्कृतिक फ्रंट में शामिल हो गया और गांव-गांव संगीत-नृत्य के माध्यम से अपनी बात कहने लगा। लोगों से संवाद होता। 1980 में रांची विवि का जनजातीय भाषा विभाग खुला। यहां आने के बाद शहर की आबोहवा में अखरा कहीं दूर टूट-बिखर रहा था। 1985 में हमने कुंजबन नामक संस्था खोली और फिर इसे लोगों को जोड़ा। बताय, हमारी धरोहर, अपनी संस्कृति को बचाने की जिम्मेदारी भी हम सबकी है।
मुकुंद नायक कहते हैं, 1988 में विदेश जाने का पहला मौका मिला। हांगकांग में लोक संगीत पर कार्यशाला थी। यहां अखरा का प्रचार किया। इसी साल के दिसंबर में फिलपींस जाने का मौका मिला। फिर 1992 में ताइवान और अगले साल 1993 में अमेरिका गया। चूंकि 1981 में अमेरिका से एक स्कालर आई थीं यहां लोकसंस्कृति पर काम करने। उन्होंने ही मुझे बुलाया। उनके अध्ययन का विषय था-करम म्यूजिक आफ साउथ बिहार। तब यह बिहार का ही भाग था झारखंड। यहां हार्वर्ड विवि और एक और विवि में हमने मिलकर अखरा वर्कशाप किया। तीन महीने के प्रयास से एक ग्रुप वहां खड़ा कर दिया। 1996 में फिर अमेरिका गया। बोस्टन में एक माह रहा। 1997 में अमेरिकी स्कालर पुनः रांची आईं। इस बार उन्होंने नचनी प्रथा का अध्ययन करने आई थीं। इस तरह देश-विदेश में हमने अपनी छोटानागपुर की संस्कृति, विरासत के बारे बताया। उससे परिचित किया। आदिवासी-मूलवासी संस्कृति और धरोहरों के बारे में लोगों से संवाद किया। हमने बताया कि हमारे यहां चलना ही नृत्य है, बोलना ही संगीत है। हर आदमी यहां कलाकार है। हर महिला कलाकार है। कोई लैंगिक भेदभाव नहीं। अखरा में सब साथ मिलकर गाते-नाचते हैं। यहां कलाकार और दर्शक की कोई अवधारणा नहीं।
वैसे, जब मुकुंद नायक हरे रंग के सिल्क कुर्ते और लंबे-घुंघरोल-खुले बालों के संग मंच पर आते हैं तो पूरा दर्शक दीर्घा झूम उठता है। वे झूमर को बचा रहे हैं जो यहां का एक लोकनृत्य है। वे कहते हैं, नृत्य यानी लय। यहां सबकुछ लय में है। धरती पर एक लय में है। सूरज भी, चांद भी। आदिवासी-मूलवासी की संस्कृति में भी एक लय है। एक राग है। 2017 में ही पद्मश्री और संगीत नाटक अकादमी मिला। राज्य और देश के कई मंचों से सम्मानित हुए, पर वे कहते हैं, आज अखरा सूना हो गया है। इसे बचाने की जरूरत है। सरकार जब गांव-गांव आंगनबाड़ी खोल सकती है तो गांव-गांव अखरा क्यों नहीं? झारखंड की पहचान तो यही है। यह मिट गया तो हमारी विरासत भी खत्म हो जाएगी। एक समृद्ध संस्कृति का विनाश हो जाएगा। हमें आने वाली पीढ़ी की भी चिंता करनी है। वह लंबे समय से इस काम में लगे हैं,
अखरा बचाओ, झारखंड सजाओे, भारत बढ़ाओ...और अखरा संस्कृति अपनाइए, विश्व में शांति लाइए।

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