अजित कुमार राय, कन्नौज
बीसवीं शताब्दी के विश्वकवि पाब्लो नेरूदा की जिन्दगी के नक्शे को फैला कर देखा तो उसके पार उनकी कविता का सारा आकाश दिखलाई पड़ा। उनकी कविता की आवाज सदी के पार सुनाई पड़ती है। वे एक संवेदनशील, जिन्दादिल, दोस्तबाज और ऐक्टिविस्ट इंटेलेक्चुअल थे। लातीनी अमेरिका के पार्श्ववर्ती ब्राजील के नीचे चीले का प्राकृतिक परिदृश्य उनकी कविता के अन्त:संगठन के लिए उत्तरदायी है, जहाँ रमणीय पर्वतमालाएँ, नील झील और घने वर्षा - वन हैं, जिनमें विचित्र पशु - पक्षी, सरीसृप और प्राचीनतम आदिवासी विद्यमान हैं।
कवि का सारा जीवन एक लम्बी तीर्थयात्रा है और वह बार बार चीले की इसी पृथ्वी पर लौट आता है ----- और मैं भला देशान्तरण की बात कैसे कर सकता हूँ, अगर मेरी अस्थियाँ चीले में ही रहती हैं? यहाँ देशान्तर की जगह जन्मान्तर भी हो सकता है। एक राजनयिक और राजदूत के रूप में फ्रांस, मेक्सिको, वर्मा, श्रीलंका और भारत - भ्रमण के बाद वैश्विक बोध के साथ वे स्वदेश वापस लौट आते हैं। एक बौद्धिक नागरिक के रूप में साम्यवाद उनका स्वदेश है।
किशोर काल की उनकी प्रणय को सम्बोधित रोमानी कविताएँ भी आइसोलेशन में पैदा नहीं हुईं। जब विद्युत् पुष्प उनकी ओर बढ़ रहा था और उनके खून में कुछ बदल रहा था, उसी समय वे कामगारों के मौलिक अधिकारों के सरकारी दमन के विरुद्ध लेख भी लिख रहे थे और धरना प्रदर्शन में हिस्सा लेकर पुलिस की प्रताड़ना भी झेल रहे थे। हिटलर और मुसोलिनी की तानाशाही के विरुद्ध आक्रोश व्यक्त करने और स्पानी राष्ट्रवाद के समर्थन के कारण उन्हें बर्खास्त कर दिया गया और सन् 1941 में उनके ऊपर नात्सी समर्थकों द्वारा शारीरिक हमले भी हुए । बाद में एक भ्रष्ट राष्ट्रपति ने उनकी हत्या करवाने की कोशिश की लेकिन वे चीले से भाग निकले।
एक समय ऐसा भी आया कि चीले की जनता उन्हें देश का राष्ट्रपति बनाना चाहती थी, किन्तु देश की राजनैतिक एकता के लिए उन्होंने न केवल साल्वादोर अय्येन्दे के पक्ष में अपनी उम्मीदवारी छोड़ी, बल्कि उन्हें जिताया भी। इन घटनाओं का अन्त:साक्ष्य उनकी कविता में मौजूद है ----- आखिर उस चक्रवात को क्या कहा जाए, जिसकी सक्रियता की अवधि समाप्त हुई? जहाँ उन्होंने मुझे खोया, ठीक वहीं क्या मैं कामयाब हुआ अन्ततः खुद को पाने में? और कामयाब तो वे नोबेल पुरस्कार पाने में भी हुए सन् 1971 में। 23 सितम्बर सन् 1973 को लम्बे अर्से से कैंसर से पीड़ित नेरूदा की मृत्यु हो गई। क्योंकि सैनिक प्रतिक्रिया वादियों द्वारा तख्ता पलट कर 11 सितम्बर को अय्येन्दे की हत्या कर दी गई और नेरूदा यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर सके। यद्यपि कैंसर उनके हौसले को तोड़ नहीं पाया।
इसी प्रकार उनके अन्तरंग मित्र मोंखे रेल के डिब्बे से गिर कर पटरियों पर कुचल कर मौत हो गई। यह खबर उन्हें अपने पिता से मिली। शायद इसी घटना से भाव - विह्वल होकर उन्होंने लिखा था ----- अपराध में शामिल रही जो मोटर कार, उसके प्रायश्चित्त पर कौन कान देता है? यह केवल मोटर कार के मानवीकरण का मामला भर नहीं है, स्तालिन के अमानवीय अत्याचार के विरुद्ध क्षुब्ध एक मार्क्सवादी कलाकार की करुणा का प्लावन भी है। उनकी संवेदनशील चेतना एक दुखी मनुष्य के अवलोकन - बिन्दु से जीवन के वसन्त का पर्यवेक्षण करती है ----- कभी भला तुमने यह जानना चाहा कि बीमार को अप्रैल का रंग कैसा नजर आता है? पलट कर पूछा जा सकता है कि जो मानसिक रूप से बीमार हैं, या फिर विचारधारा के बुखार से पीड़ित हैं, उन्हें काव्य - सौन्दर्य की कैसी अनुभूति होती होगी या कविता के आस्वाद में कितना विचलन महसूस होता है?
सभी सात समानार्थी नहीं होते। किन्तु उनके जन्म के एक महीने बाद माँ के देहावसान के बाद उनकी विमाता ने माता के समान ही स्नेह किया था नेरूदा को। जब नेरूदा को सौतेले देशों और विश्व भर के पाठकों का प्यार मिला तो माँ का क्या कहना! स्पानी भाषा और अंग्रेजी में अनूदित उनकी काव्य कृतियाँ तो उपन्यास की तरह बिक जाती थीं। उन्होंने 90 काव्य - संग्रह और 14 गद्य की पुस्तकों का सृजन किया और संस्मरण भी लिखा। उनका 340 कविताओं वाला महाकाव्य 'कांतो खेनेराल' चीले का एक विश्वकोश है। उनकी आरम्भिक कविताओं में प्रयोगवाद, अति यथार्थ वाद, रहस्यवाद और शुद्ध सौन्दर्य वाद लक्षित किया जा सकता है लेकिन उत्तरवर्ती रचनाओं में वाल्ट ह्विटमैन के प्रभाव से नियोजित प्रतीकवादी विधान, रूमानियत और ऐन्द्रिक बोध को प्रगतिशील चेतना ने अपदस्थ कर दिया।
टकसाली भाषा और काव्य - रूढ़ियों, छंदों को छोड़कर संबोधन शील संप्रेष्य भाषा का आविष्कार किया, जिसमें वृत्तचित्रात्मक शैली और वक्तव्यों का संपुंजन भी शामिल है। अपनी 1937 से पहले की रचनाओं को अनगढ़ या अपरिपक्व कहकर स्वयं नेरूदा ने खारिज कर दिया था।
गौरतलब है कि उनका जन्म 1904 ई. में पारेल कस्बे में हुआ था। और वे सन् 1924 तक दो संग्रहों के प्रकाशन के बाद एक सनसनीखेज युवा कवि के रूप में चर्चित और स्थापित हो चुके थे। बाद में उनके ऊपर लियो टॉल्स्टॉय, दोस्तोयेव्स्की और चेखव का भी प्रभाव पड़ा। हिन्दी में उन्होंने सम्भवतः मुक्तिबोध, नागार्जुन और चन्द्रकांत देवताले को भी प्रभावित किया। प्रभावित तो पाब्लो नेरूदा ने विश्व - कविता के विनियोग को किया। उनके हिन्दी - अनुवादक हैं ---- प्रभाती नौटियाल, केदारनाथ अग्रवाल, धर्मवीर भारती, मंगलेश डबराल, विष्णु खरे और सुरेश सलिल। किन्तु उनके अपने रचना समय में आलोचक भी अवश्य रहे होंगे ------ मैं क्यों दंशित हूँ भिनभिनाती मक्खियों से और साहित्य के सार्जेंटों से? आज के साहित्य के सार्जेंटों को भी भिनभिनाती मक्खियों का रूपक दिया जा सकता है। आकस्मिक नहीं है कि उनके काव्य संसार में मधुमक्खियों से सताए गए अन्धे व्यक्ति की ठौर हीनता उन्हें बार बार दंशित करती है। किन्तु उनका उदार सौन्दर्य शास्त्र मक्खियों की मलिन लिपि को तितली के वर्ण - वैविध्य के रूप में पढ़ लेता है ------ तितली उस लिपि को आखिर कब पढ़ती है, लिखी मक्खियों ने जो उसके पंखों पर?
पाब्लो नेरूदा का प्रश्नोपनिषद् हिन्दी भाषा के उदात्त कवि कुंवरनारायण के "बाजश्रवा के बहाने" के लौकिक जीवन - दर्शन की याद दिलाता है। तथा एक घायल हंस को बचाने का विफल प्रयास क्रौंच वध की प्रौढ़ प्रतिक्रिया के फलस्वरूप शोक के श्लोक में रूपांतरण की आन्तरिक घटना के रूप में आदि काव्य रामायण के संघटन की स्मृति को ताजा कर देता है।
आज कविता के अन्तर्पाठ की बहुलता और अराजकता को निरस्त करते हुए कवि के अभिप्राय को जानने और कविता को गहराई से समझने का सूत्र या निकष इस नवाचार में न्यस्त है ----- कभी एक उंगली भी मेरे खून में न डुबोने वाले क्या कहेंगे मेरी कविताओं के बारे में? वे तो कविता के आशय का खून ही कर देंगे, जिन्होंने कवि के व्यक्तित्व और कृतित्व का गहरा अनुशीलन नहीं किया, उसके मानससर में डूबे नहीं, भावलोक का अवगाहन नहीं किया, वे कविता को ही डुबो देंगे।
आज मार्क्सवादी चिन्तन के आलोक में रामचरितमानस का अध्ययन ऐसी ही विसंगति पैदा करेगा। यदि उसके मूल सत्व को बचाया नहीं गया। सत्य को उसके मूल अक्ष पर बेधने की रचनात्मक कोशिश और उसे सामाजिक कार्यभार देने की उद्यमिता नेरूदा के सांस्कृतिक सृजन को कालजयी बनाती है।
हड्डियों के गल - सड़ जाने के बाद भी यदि नेरूदा पृथ्वी की खाक - धूल में जिन्दा हैं, तो इसके लिए उनके काव्य की जीवंतता, ताजे बिम्ब, अनश्वर अर्थ - संवेदना, स्फटिक विन्यास की धवलिमा, रूमानियत, रहस्यवाद, प्रश्नोपनिषद् की भंगिमा, बाल सुलभ अनन्त जिज्ञासा, कहन के अनछुए तेवर और छंद के अनस्तित्व में अन्तर्लय की उपस्थिति तथा काव्यार्थ की सान्द्रता उत्तरदायी है। आज सघन रसात्मक अनुभूति के बिना जो विचार - काव्य लिखे जा रहे हैं और कविता के नाम पर गद्यब्राण्ड सिंथेटिक संरचना का थोक उत्पादन हो रहा है, उन्हें नेरूदा से सीखने की जरूरत है।
सन् 1929 ई. में भारतीय कांग्रेस के अधिवेशन में जब नेरूदा एक राजनयिक पर्यवेक्षक के रूप में भारत आए थे, तब उन्होंने महात्मा गॉंधी, जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस को समीप से देखा था। वह हिन्दी में छायावाद युग का उत्कर्ष - काल था। यद्यपि 'कामायनी' सन् 1936 ई में लिखी गई थी जो आधुनिक युग का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य है। स्वाधीनता आंदोलन की समझ रखने वाले नेरूदा की भले ही हिन्दी कविता से अन्त:क्रिया न हुई हो, किन्तु वे हवाओं की भाषा पढ़ लेते थे।
वैसे सुप्रसिद्ध अमेरिकी कवि राबर्ट ब्लाइ के साथ नेरूदा ने कबीर का अनुवाद भी अंग्रेजी में किया था। उसी समय हिन्दी कवि प्रश्नवाची मुद्रा में लिख रहे थे ---- कौन तम के पार रे कह! न जाने नक्षत्रों से कौन निमंत्रण देता मुझको मौन? इस मौन निमंत्रण को नेरूदा की प्रश्नवाची कविताओं में पढ़ा जा सकता है ----- क्या मेघों का कोई कलेक्टर तैनात है, कोलम्बिया के ऊपर, आसमान में? कैसे भला जान पातीं यह बात जड़ें, उन्हें प्रकाशोन्मुख पथ पर चढ़ना होगा? जो समूचे ब्रह्माण्ड का अनुशास्ता है, जिसके सुपर प्रशासन में सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, ग्रह अपनी कक्षा में गतिमान हैं , जो सारे दृश्य के पीछे अदृश्य रूप में वर्तमान है, जो ऋतुओं का नियामक है, उसकी आभासी अनुभूति या रहस्यवाद को नकारना कहाँ तक समीचीन है?
यह लौकिक अध्यात्म जैसा कुछ है, जिसे प्रगतिशील आलोचक खारिज करते हैं और लौकिक दर्शन की संज्ञा देते हैं। यद्यपि यह तर्क उनके भौतिक जीवन - दर्शन के मेल में है ----- मेरे बीअर के कूजे से फिसलते हुए झाग की पैमाइश कैसे की जाए, भला? अब यदि यह कविता की मदिरा का नशा है तो वरेण्य है, अन्यथा जीवन - काव्य में झाग के सिवा कुछ नहीं छोड़ेगा। सुना है कि पीते तो गालिब भी थे और देवता भी सोमरस पीते थे। आज तो प्रायः साहित्य के सभी श्रद्धेय द्राक्षासव में डूबे रहते हैं और आमिषभोगी हैं तो उनसे निरामिष चिन्तन की आशा कैसे की जा सकती है! रक्तहीन क्रान्ति में इन कामरेडों का विश्वास नहीं। यह अलग बात है कि ये सिर्फ काठ की तलवारें भांजते हैं। अपने नशे में निमग्न इन्हें पता ही नहीं है कि कोई पाठक इनके आस पास बचा भी है कि नहीं! पाश्चात्य भोगवादी जीवन - दृष्टि का दूसरा उदाहरण नेरूदा की निम्नलिखित कविता है ----- सचमुच बेलिबास है गुलाब? बोलो, या फिर उसने वैसे ही परिधान पहन रखे हैं। शरीर में चिपके हुए और देह की ही रंग के कपड़े फैशन माडल के रूप में भारत में भी अपना लिए गए हैं।
गुलाब के घाघरों की गणना कोई काराकास सुन्दरी कैसे कर सकती है! तब नग्नता का प्रदर्शन था, अब तो सुन्दरियां नग्न हो गई हैं। न्यूनतम वस्त्र - विधान शायद स्वतंत्रता का द्योतक है। स्त्री विमर्श की देहवादी स्वाधीनता पुरुष के लिए शुभ लाभ का स्वर्ण पिंजर उपलब्ध कराता है। स्त्री विमर्श के पैरोकार राजेन्द्र यादव पुरुष विमर्श के शिकार हो गए और अपनी ही पत्नी मन्नू भंडारी को न्याय नहीं दे पाए।
नेरूदा ने अपने प्रेम तथा दैहिकता पर नि:संकोच खुले ढंग से लिखा, जिस पर कुछ आलोचक भड़के भी, किन्तु ऐन्द्रिक निवेश के साथ ही नेरूदा ने अपने आस पास की चीजों को संश्लिष्ट करके विचारों का एक संसार रचा था जो पाठकों तक संप्रेषित हुआ। वैसे ओशो का यह कथन समीचीन है कि हम अपने सामने महावीर स्वामी की तरह नंगे हो जाएं और अपने काम का ईमानदारी से साक्षात्कार करें , तभी राम की यात्रा शुरू हो सकती है। यद्यपि नेरूदा यह स्वीकार करते हैं कि वृक्ष अपनी जड़ों का वैभव छिपाते हैं, प्रदर्शित नहीं करते। ठोस क्रिस्टल की भांति तराशे गए बिम्ब और नूतन मौलिक उद्भावना उनके काव्य के धातु गत वैशिष्ट्य हैं ----- किसे देख - देख, चावल मुस्कुरा रहा, अपने असंख्य झक् सफेद दांतों से? "चांद का मुंह टेढ़ा है" के बरक्स चावल की यह धवल स्मिति कितनी स्पृहणीय है!
मानवीकरण और मानवीय विकृति में कितना फर्क है! परम्परागत सौन्दर्य बोध के निषेध की आत्यंतिक परियोजना कविता को लोक जीवन से दूर कर देती है। किन्तु इस अन्तर्यथार्थ को अतियथार्थवाद कैसे समझ सकता है? अगर मैं मर चुका हूँ, और इससे अनभिज्ञ हूँ, तब भला किससे जाकर यह पूछूँ मैं? और यदि आत्मा मुझसे दूर जा छिटकी है, तो एक कंकाल क्यों पीछा करता रहता है मेरा? आत्महीनता की लिपि आत्मवान् भाषा को कैसे व्यक्त कर सकती है! संवेदनात्मक मृत्यु या व्यक्तित्व के फांक को इससे बेहतर कैसे व्यक्त किया जा सकता है? सिद्धान्त और आचरण का यह द्वैतवाद आज की मानवीय नियति है। इस यथार्थ को नेरूदा ने आत्मपरक शैली में व्यंजित किया है। प्रश्नाकुलता सिद्ध करती है कि अभी कवि के भीतर एक बच्चा बचा हुआ है। और बचा हुआ है जिन्दगी का नमक भी ----- यदि सारी नदियाँ मीठी हैं, तो समुद्र अपना नमक कहाँ से पाता है?
यह निरलंकृत चमत्कार तत्त्व ही नेरूदा की कविता का प्राण है। उनकी कविता की तृणमणि में जलपरियों के आंसू जज्ब हैं। दूब पर शबनम की बूंदों में करुणा का निवेश एक भिन्न सौन्दर्य शास्त्र की सृष्टि का प्रस्ताव करता है। उनकी अलहदा दृष्टि सवाल करती है ----- क्या शीबा की साम्राज्ञी के जिस्म में बैंगनी रंग का खून बहता था? जबकि महादेवी वर्मा मानवीय संवेदनों की सार्वभौमिक एकता का प्रतिपादन करती हैं ------ सब आंखों के आंसू उजले, सबके सपनों में सत्य पला। करुणा सर्वाधिक द्रावक मनोभाव है। नेरूदा हर हिटलर से तीखे सवाल पूछते हैं ----- क्या वह लाशों को रंगता है या दीवारों को? क्या वह नराहुति की गैस में सांस लेता है? "दीवारों पर खून से" (चंद्रकांत देवताले) अधिनायकवाद की जो इबारत लिखी गई, नेरूदा उसे प्रश्नांकित करते हैं ----- किस पश्चिमी राजतंत्र का ध्वज अफीम के फूलों से रंगा जाता है?
प्रश्न परक शैली में सत्ता की आलोचना अवगुंठन के भीतर से प्रतिभासित होती है तो उसकी दृष्टि से कुछ देर और दूर तक बचा जा सकता है। क्योंकि संघर्ष से थकान होती है और नेरूदा की परवर्ती कविताओं में विषाद और चिन्तन की रेखाओं को पढ़ा जा सकता है। जीवन और मृत्यु के प्रश्नों से भी नेरूदा ने मुठभेड़ की है। सत्ता को शक्ति के अहंकार का नशा तो होता ही है। तभी तो नेरूदा पोस्त के लाल फूलों के रेशम में भी जोखिम देखते हैं। शरद ऋतु में धरती की जुगाली, पीले विस्फोट को देख कर नेरूदा के मन में सवाल उठता है कि ऋतुओं को कैसे पता चलता है कि कमीज बदलने का वक्त आ पहुंचा है। उड़ते वक्त कौन सी चिड़ियां झुण्डों का क्रम तय करती हैं? और चांदनी रात में पंछियों और मछलियों को निरखते हुए वे एक चाक्षुष बिम्ब गढ़ते हैं ----- चन्द्रमा के जालों में छटपटाती हुई वे मछलियाँ हैं कि चिड़ियां?
राकेश की रश्मियों या ज्योत्सना के संजाल में उद्भासित मीन माला और विहग समूहों का सिमट आना अज्ञेय के 'बावरा अहेरी' की याद दिलाता है। आखेटक और जालिक सूर्य जब संध्या के समय अपनी लाल - लाल किरणों को समेटता है तो उसमें पतंगें, रंग - बिरंगे डैनों वाले पंखी, वृक्ष और विद्युत के खंभे सब कुछ फंस जाते हैं। सब कुछ अन्धकार के गर्भ में समाहित हो कर निराकार उपस्थिति में पर्यवसित हो जाता है। नेरूदा जीवन को दो धुंधली सी स्पष्टताओं के बीच एक सुरंग के रूप में देखते हैं और मृत्यु को अनस्तित्व से कुछ अधिक और खतरनाक प्रत्यय के रूप में। वे चट्टानों के भीतर सलवटें और गड्ढे गौर से देखते हैं। उनके जीवन में कितनी सलवटें हैं, कौन गिनेगा? उनके काव्य - जीवन में एक औदात्य मौजूद है। वे जग - जीवन के अमर शिल्पी हैं। कल्पना का नवोन्मेष और भाषा लालित्य और नवाचार स्पृहणीय और ईर्ष्या जनक है। एक कालजयी कवि की कला के अभिनन्दन में मेरी वाणी भी उत्सव धर्मी हो गई। सारस्वत मेधा किसी भी रूप में वन्दनीय है।

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