डाॅ मयंक मुरारी
क्या फेसबुक के पहले सोशल नेटवर्किंग साइट का अस्तित्व नहीं था ? अगर नहीं जवाब है तो हम गलत है ? वैज्ञानिक का मानना है कि हर एक मनुष्य के दिमाग में एक फेसबुक मौजूद है, जहां उसके सामाजिक संबंध दर्ज होते हैं। विज्ञान दिमाग के इस भाग को “एमाइग्डाला“ कहते हैं। यह माना जाता है कि “एमाइग्डाला“ का विकास मानव के सामाजिक संबंधों के साथ हुआ और वह सामाजिक संबंधों के लिए जिम्मेदार है। मार्क जुकरबर्ग ने 2004 में फेसबुक बनाई वह दुनिया में चर्चित हो गये। इस समय उन्होंने “एमाइग्डाला“ पर एक फीचर फिल्म भी बनायी, जिसकी चर्चा नहीं होती है। यह विज्ञान नहीं प्रकृति का हिस्सा है। और विज्ञान प्रकृति के रहस्य को सुलझता है और प्रकृति से प्रेरणा लेकर बेहतर टेक्नोलाॅजी बनाता है। हमारी तकनीक प्रकृति के नियमों का परिणाम है। आदिवासी समाज प्रकृति के इसी स्वभाव को अपने जीवन में अपनाते है, जो कम से कम साधनों एवं ऊर्जा से मनुष्य-मनुष्य, मनुष्य-वृक्ष और मनुष्य एवं जीव-जंतू के साथ सामाजिक संबंध बनाते हैं। आदिवासी समाज का यह सामाजिक संबंध तब से है, जब से उसका अस्तित्व है। आज आधुनिक समाज उस संबंध को छोड़ दिया और आभासी सामाजिक दुनिया में रहने लगा, तो समस्याएं उत्पन्न होने लगी।
आदिवासी समाज ऊर्जा संचयन की कला इन पक्षियों से सीखा, जो कम ऊर्जा खर्च करके हवा में उड़ते हैं। भारतीय ग्राम्य जीवन में लोग जानते है कि पक्षियों की बनावट में ही उसके ऊर्जा रहस्य छिपा है। मकड़ी अपना जाल जिस तंतु से बुनती है, उस पर आजकल शोध हो रहा है कि यह इतना पतला और इतना हल्का तंतु इस कदर मजबूत कैसे हो सकता है। हाथी में गुम ध्वनियां सुनने की कला होती है। जो दस कोस की दूरी तक चारों दिशाओं में स्थित अपनों से बात कर सकते हैं। यही क्षमता रात में पचास योजन बढ़ जाती है। दूसरे महादेशों से उड़कर आनेवाली पक्षियों में धरती से उठती गरमी को आधार बनाकर अपना रास्ता तय करती है। यह अनहद नाद का एक प्रकार है, जिसे जीव-जंतू, पशु-पक्षी, पेड़-पौधा सुनना जानते हैं। प्रकृति के समीप रहने के कारण कई आदिवासी समाज भी इस अनहद नाद को सुनने की क्षमता कान से विकसित कर पाते हैं। अंधेरे में देखने की कला भी इसी का एक भाग है।
कई आदिवासी समाज में लोग प्रकृति के संकेतों के आधार पर भूकंप, बाढ़, सुनामी या अन्य प्राकृतिक आपदा के बारे में पता लगा लेते हैं। आखिर आदिवासी जीवन और गैर आदिवासी जीवन में क्या अंतर है ? माना जाता है कि मस्तिष्क की चैदह सौ करोड़ कोशिकाओं में ज्ञान संचित भी कर लो और उसे अभ्यास में नहीं ढ़ालो तो ऐसे कोने में जा बैठेगी कि समय आने पर उसे ढूंढ़ना कठिन हो जायेगा। आदिवासी समाज का प्रकृति के साथ साहचर्य और समन्वय के साथ निरंतर अभ्यास ही उनमें प्राकृतिक इंटेलिजेंस के काबिल बनाता है। आखिर कैमरा हमारी आंख का, म्यूजिक सिस्टम कान का और कंप्यूटर हमारे दिमाग का ही विस्तार है। हम संकुचित स्तर पर सोचते रह जाते है जबकि प्रकृति हमको लघु नहीं वृहद् बनने का आमंत्रण देती है ! भारतीय जीवन और कला के मनीषी पाॅल क्ले अपने जर्नल में जंगल भ्रमण का अनुभव लिखा है- कभी-कभी जंगल में घूमते हुए लगता है कि वह ही वृक्षों को नहीं देख रहे हैं, बल्कि वृक्ष भी उन्हें देख रहे हैं। और यह विचित्र अनुभव है। स्वयं अपने को अन्य द्वारा देखा जाना। (निर्मल वर्मा, दूसरे शब्दों में, पृष्ठ 67)। जनजातीय जीवन में मनुष्य, पशु-जीव और प्रकृति के बीच इस किसी तरह का कोई अलगाव नहीं है। वे बहुत सरल और आत्मीय भाव से एक-दूसरे से जुड़े हैं।
आदिवासी जीवन की एक विशेषत यह है कि उनकी दुनिया में संबंध कोई द्रष्टा और दृश्य का नहीं है। इस कारण कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से किसी निष्क्रिय वस्तु को नहीं बदल सकता। प्राकृतिक इंटेलिजेंस के बदले आर्टिफिशियल दुनिया में सामाजिक संबंध आखिर तब बना, जब हमने प्रकृति को अपने जीवन से “देश निकाला“ दे दिया, जिस कारण एक दैवीय संरक्षण का छत्रछाया होता है, वह भी खत्म हो गया। इस कारण आधुनिक मानव का कर्म और उसके निर्णय अतिवाद एवं अतिरेक बन जाता है। आज किसी भी व्यक्ति से बात कीजिए। उसको क्या हो रहा है, उसकी समझ है। आत्म-चेतना की कमी नहीं है, लेकिन उसकी आत्म की शक्ति ही नैसर्गिक शक्ति-केंद्र से स्खलित हो चुकी है। यही कारण है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया में मनुष्य एक ही समय में अपनी क्रियाओं, अनुभूतियों एवं भविष्य के आंकलनों में बेहद ही असुरक्षित और अपनी मानसिक प्रवृत्तियों में इतना अक्रामक हो जाता है।
एक कथन है कि जो आदमी जंगल में जीता और मरता है, वह पेड़ों के गुप्त जीवन को जानता है। आज मनुष्य ने प्रकृति को वश में कर लिया। ऐसा लग सकता है। सच यह है कि प्रकृति हमारे जीवन से दूर हो गयी है। यह पृथ्वी और उसका जीवन प्राकृतिक इंटेलिजेंस के नेटवर्क पर आधारित है जो पेड़ो, मिट्टी के समुदायों और वायुमंडल के बीच आदान-प्रदान से उभरी है। हमने उस नेटवर्क को ही बदल दिया है। हम भूल जाते है कि प्रत्येक जीवित प्राणी न केवल जैविक संबंधों से जीवित रहता है, बल्कि इन संबंधों से बना है। जब हम पेड़ों, प्रकृति के महान संयोजकों को सुनते हैं, तो हम सीखते हैं कि उन रिश्तों में कैसे रहना है जो जिीवन को उसका स्त्रोत, सार और सुंदरता देती है।
प्राकृतिक इंटेलिजेंस के कारण हम अपने विस्मय की भावना को पुनः प्राप्त कर सकते है, जो फेसबुक और आर्टिफिशियल दुनिया में संभव नहीं है। हम अपने आसपास को पूरी तरह से नई नजर से देख सकते हैं। प्रकृति जीवन को संभव बनानेवाली विशाल प्राकृतिक प्रणालियों मनुष्य को एक विचारोत्तेजक खोज पर ले जाती है। आखिर खोज और पाना ही जब जीवन का लक्ष्य है तो उसे आभासी दुनिया में खोजने से बेहतर है कि हम पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता को बनाए रखने के लिए सभी पारिस्थितिकी तंत्रों और बायोम में और उनके अंतर्संबंध में खोज करें। प्रकृति का गुप्त ज्ञान प्रकृति के वनस्पतियों और जीवों के बीच संबंध पर केंद्रित है। ऐसे में आदिवासी जीवन और उनके प्रकृति के साथ सहसंबंध का अध्ययन से हम वास्तव में यह जान सकेंगे कि प्रकृति कैसे काम करती है।
(चिंतक व आध्यात्मिक लेखक। रांची में रहते हैं। आधा दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं।)

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