राकेश कुमार सिंह
पहले तो मैं यह स्वीकार कर लूं कि मैंने स्वर्गीय नरेन्द्र कोहली जी को बहुत नहीं पढ़ा है।बस एक उपन्यास पढ़ा है...'वसुदेव'।महासमर के एक-दो खंड भी पढ़ें हैं। हां,'रामकथा' की पूरी श्रृंखला अवश्य पढ़ी है इसलिए मैं जो भी कहूंगा, अपने अल्प पठित अनुभव के आधार पर ही कह सकूंगा।
आलोचना की प्रचलित धारा ने मौखिक रूप से नरेंद्र कोहली जी की साहित्यिक प्रतिभा और अवदान को विवशतापूर्वक स्वीकार तो कर लिया है परन्तु लिखित आलोचना ने नरेंद्र कोहली के प्रति वही नीति अपनाई जो जयशंकर प्रसाद, सुदर्शन, विश्वंभरनाथ कौशिक,शैलेश मटियानी आदि-आदि के प्रति अपनाई जबकि कोहली जी ने ऐतिहासिक महाकाव्यत्मक पौराणिक उपन्यासों के अलावा सामाजिक उपन्यास, नाटक, निबंध, यात्रा-संस्मरण...गोया गद्य की हर विधा में हिंदी साहित्य को श्रेष्ठ दिया है। उन्होंने 'साथ सहा गया दु:ख', 'पुनरारंभ','क्षमा करना जीजी' जैसे सामाजिक उपन्यास भी लिखे हैं जिन पर ढंग से बात होनी बाकी है।
नरेन्द्र कोहली जी ने भारतीय हिन्दी उपन्यास को एक नया आयाम दिया है जिसे महाकाव्यात्मक पौराणिक उपन्यास कहा गया।कह सकते हैं कि उन्होंने महाकाव्यात्मक उपन्यास श्रृंखला की नींव रखी है। हिंदी उपन्यास के विकास में नरेंद्र कोहली का अवदान गिनती और गुणवत्ता दोनों ही में अतुलनीय है। पौराणिक उपन्यास लेखन का विकास बाद के लेखकों में भी देखा जा सकता है। भगवतीचरण मिश्र ने श्रीकृष्ण पर लिखा है, हनुमान पर भी लिखा है। काशीनाथ सिंह श्रीकृष्ण के जीवन के आखिरी कुछ दिनों को लेकर 'उपसंहार' लिखा है।बाद की पीढ़ी की शरद सिंह का उपन्यास 'शिखंडी' भी चर्चा में रहा। रामकुमार भ्रमर ने भी महाभारत को लेकर उपन्यास श्रृंखला लिखी अवश्य है परन्तु इस उपन्यास श्रृंखला को वह लोकप्रियता नहीं मिल सकी जो नरेंद्र कोहली जी को सहज प्राप्त है।
हिंदी में किसी अन्य ने ऐसा लेखन किया हो, मुझे याद नहीं पड़ता अलबत्ता गुजराती में कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने 'कृष्णावतार' श्रृंखला के सात खंड लिखे। आठवां खंड उनके देहांत के कारण अपूर्ण रह गया। उदाहरण और भी कई हैं। 'मृत्युंजय' (कर्ण को लेकर शिवाजी सावंत),'युगंधर'(श्रीकृष्ण को लेकर शिवाजी सावंत),'ययाति'(विष्णु सखाराम खांडेकर), द्रौपदी (प्रतिभा राय) आदि-आदि।
नरेन्द्र कोहली ने महाभारत के चरित्रों पर स्वतंत्र रूप से 'कुंती','शिखंडी','वसुदेव','सुभद्रा' आदि उपन्यास भी लिखे हैं परंतु 'महासमर' के द्वारा उन्होंने आठ खंडों में महाभारत को जो औपन्यासिकता दी है वह विराट है। अद्भुत है। अप्रतिम है। लगभग चार हजार पृष्ठों के महाकाव्य को बिना बिखराव का शिकार हुए,प्रवाही पठनीयता के साथ साधना कितना कठिन प्रमेय रहा होगा इसे कोई उपन्यसकार ही समझ सकता है कोहली जी ने रामकथा को भी सात खंडों में औपन्यासिक रूप दिया है। नई जमीन तोड़ते हुए, आधुनिकता बोध के साथ मिथकों का आधुनिक संदर्भों में विश्लेषण करते हुए, बिल्कुल मौलिक स्थापनाओं के साथ जीवंत और विराट रूप दिया है।
रामकथा की युगानुरूप व्याख्या पहले कभी किसी ने नहीं की थी।राम को मानवीय धरातल पर समझना हो तो नरेंद्र कोहली की रामकथा श्रृंखला से गुजरने की जरूरत है।'दीक्षा','अवसर','संघर्ष की ओर','पृष्ठभूमि','साक्षात्कार' और 'युद्ध' खंडों में कोरी भक्ति की भावुकता नहीं बल्कि एक मनुष्य के संघर्ष का ताप है तिस पर कहीं भी रामकथा की गरिमा कम नहीं होती। प्रौढ़ चिंतन के आधार पर रामकथा को आधुनिक संदर्भों में प्रस्तुत करना बड़े साहस और कौशल का काम था वह भी मूल घटनाओं को बिना छेड़े, बिना विकृत किए,बिना लेखकीय छूट का लाभ उठाए। कोहली जी की रामकथा के वानर या रीक्ष जंगली बंदर-भालू नहीं हैं।
वे दोपाए मनुष्य की ही विभिन्न जातियां हैं। वह भी दोपाए मनुष्य का ही वन्य समाज है। अहिल्या के मिथक को कोहली जी की कलम ने यथार्थ का जो रूप दिया है वह विस्मित करता है। अहिल्या का नारी से पत्थर की शिला में बदल जाना मिथ हो सकता है परन्तु नरेंद्र कोहली इसे व्याख्यायित करते हैं। कहावत है...'जड़ हो जाना/पथरा जाना! यहां अहिल्या निर्जीव पाषाण-शिला नहीं है वरन् उसका जीवन और कार्य-व्यवहार जड़ हो गए हैं।मानव समाज से कटे,मानव समाज द्वारा उपेक्षित और बहिष्कृत हो गए हैं।
यह कोहली जी के चिंतन का आविष्कार है। समस्याओं को देश-काल के बहाव से निकाल कर मानव समाज की शाश्वत समस्या के रूप में प्रस्तुत कर देना नरेंद्र कोहली के चिंतन की विशेषता है और यही उनकी लेखनी की उपलब्धि भी है। नरेन्द्र कोहली जी की महाभारत और रामकथा उपन्यास श्रृंखलाएं अब उपन्यास से आगे शास्त्र बन चुकी हैं। इन दोनों उपन्यास श्रृंखलाओं के भीतर समय मानों बर्फ की भांति जमा पड़ा है और ज्यों ही पाठक इनके भीतर उतरता है, समय पृष्ठ-दर- पृष्ठ बहने लगता है। पाठक को अपने साथ बहाने लगता है।
रामकथा हो या महाभारत कथा... नरेन्द्र कोहली चरित्रों और घटनाओं को मात्र चित्रित भर नहीं करते वरन् वे चरित्रों के मनोविज्ञान के भीतर भी उतरते हैं। संवेदना और पात्रों के मनोजगत की तहों में परत दर परत गहरे पैठने के मामले में कोहली जी प्रेमचंद से कहीं इक्कीस ठहरते हैं। वर्ष 2021 के अप्रैल की सत्रह तारीख को नरेंद्र कोहली के देहावसान के कारण उनकी एक उपन्यास श्रृंखला अधूरी रह गई जो विवेकानंद के जीवन पर 'तोड़ो कारा तोड़ो' के नाम से छः खंडों में लिखी जा चुकी है।
स्व० नरेंद्र कोहली जी पर बात करने के लिए एक पूरा दिन भी कम पड़ेगा। एक पूरी थिसीस भी कम पड़ेगी। संक्षेप में इतना ही कि नरेंद्र कोहली जी ने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी की उपन्यास परंपरा को परवान चढ़ाते हुए उसे साहित्य की नई-नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। अच्छी बात यह कि नरेंद्र कोहली जी के जन्मदिवस 6 जनवरी (सन् 1940) को अब 'साहित्यकार दिवस' के रूप में मनाया जा रहा है जिसकी शुरुआत वर्ष 2023 से शुरू हो चुकी है।
(राकेश सिंह हिंदी के प्रतिष्ठित कथाकार हैं। झारखंड की पृष्ठभूमि पर कई उपन्यास प्रकाशित। )

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