कुबेर नाथ राय ने दक्षिणावर्त शंख फूंका है जो सनातन भारतीय वामधारा को भी अपने वैचारिक अनुष्ठान में शामिल और अन्तर्भूत करके चलता है। वे "त्रेता का वृहत्साम" गाते हुए भी समकालीन "चिन्मय भारत" की खोज करते हैं। वे आर्ष मनीषा के अन्वीक्षक हैं। वे एक वृहत्तर सांस्कृतिक भारत का पुनराविष्कार या पुनर्गठन करते हैं। वे डा. रामविलास शर्मा की तरह अंग्रेजी के प्रोफेसर थे। इसीलिए प्रोफेसर विद्यानिवास मिश्र को उनका संस्कृति का 'तलस्पर्शी संज्ञान' विस्मित करता है। उनकी वाग्मिता का अनुशीलन करते हुए सबसे पहले ध्यान उनकी भाषिक संस्कृति और शीर्षकों पर जाता है ------ रस आखेटक, प्रिया नीलकंठी, पर्णमुकुट, गंधमादन, त्रेता का वृहत्साम, निषाद बांसुरी, किरात नदी में चन्द्र मधु, विषाद योग, दृष्टि - अभिसार, मनपवन की नौका, महाकवि की तर्जनी ----- जो बरजती रहती है अवघट - घाट पर जाने से। जो हर क्रौंच - वध पर व्याध को शापित करती है। यह तो सूचक - वृत्त है।
आज के बौद्धिक व्याधों ने मायामृग के सहयोग से सीता का मृगया कर राम को सीता से अलग कर दिया है। स्त्री विमर्श ने पति - पत्नी के द्वंद्व समास पर बीचों बीच आघात करके समास को तोड़ दिया है, केवल द्वंद्व शेष रह गया है। शेषशायी विष्णु क्या करें? समष्टि - चित्त के क्षीरसागर में मन के सहस्र फणों पर अधिष्ठित परम चैतन्य आज चिन्ता मग्न है। कलि तो कलह की अधिष्ठान - भूमि है। रस को बूंद बूंद स्रवित करके श्रावण कैसे उपस्थित किया जाए? यहाँ तो रस का भी आखेट करना पड़ता है। वह दलित द्राक्षा की भांति जीभ की मुट्ठी में आने वाला नहीं। आज तो काव्य से रस निर्वासित हो चुका है। इसीलिए विश्व नाथ त्रिपाठी को कुबेर नाथ राय का विषाद योग "विषाद रोग" प्रतीत होता है। ज्वर - पीड़ित व्यक्ति का स्वाद चला जाता है। विचार धारा के बुखार से आक्रान्त व्यक्ति अपनी देसी संस्कृति को अजनबी की तरह देखता है और अपनी मातृभाषा के साथ व्यभिचार करता है। ऐसे असंख्य शब्द - स्वैराचारी आज बरसाती मेढकों की तरह टर्र - टर्र कर रहे हैं।
अजित कुमार राय
बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बावजूद सम्राट अशोक वार्धक्य में भी मयूर का मांस खाना नहीं छोड़ सका और न ही तिष्यरक्षिता की कटि मेखला के मादक संस्पर्श से स्वयं को वंचित कर पाया। आज के साहित्य सम्राटों का सामिष चिन्तन और पर्दे के पीछे का स्त्री विमर्श काव्य में क्रांतिकारी परिवर्तन उपस्थित कर दिया है। साहित्य के ये नेता वस्तुतः बदलाव की नहीं, बदले की राजनीति से ग्रस्त हैं। पृथक् वैचारिकी के प्रति ये असहिष्णु हैं। सच पूछें तो ये साहित्य के नेता नहीं, चालू राजनीति के चारण हैं। अब तो दक्षिण पंथी राजनीति ने भी अपने नये चारण पैदा करने शुरू कर दिए हैं। दो पाटों के बीच पिस कर सबसे अधिक दुर्गति 'धर्मनिरपेक्षता' की हुई है। सर्वधर्म समभाव की भावना से निर्मित इस संवैधानिक पद के दूरारूढ़ आशय धर्म - निषेध या इस्लाम - सापेक्षता के रूप में ग्रहण किए गए। हिन्दुत्व - विरोधी इस अन्तर्निहित मंतव्य को भाजपा ने खूब भुनाया। अब गांधी किंकर्तव्यविमूढ़ हैं। उन्हें बार बार गोली मारी जाती है। राजनीति के लिए घृणा इतनी सरस और जायकेदार है कि वो अपना सारा नीति शास्त्र और जीवन - दर्शन इसी पर आधृत किए हुए है। ईश्वर ने जो शस्य और मधु दान किया है उसे भी ये बलात्कारी मुद्रा में ही भोगते हैं और जातिवाद के लौह कवच से बाहर आकर ये मल मूत्र तक नहीं त्यागते।
"देह - वृन्दावन में वंशीधुन" शीर्षक निबन्ध में धर्मनिरपेक्ष मानववाद के विषय में कुबेर नाथ राय कहते हैं कि यह गौतम बुद्ध, कार्ल मार्क्स या जवाहरलाल नेहरू के सन्दर्भ में एक यथार्थ हो सकता है। जिनका बोध इतना विकसित है कि धर्म और ईश्वर की अपेक्षा के बिना ही सारे मानवीय मूल्यों की क्षमता उनके पास आ गई है।
सत्य, अहिंसा, करुणा, मैत्री, परोपकार, सेवा, विनय, सात्विक चेतना और सहिष्णुता जैसे जीवन - मूल्य ईश्वर से जुड़े बिना समाज के चरित्र का स्थायी अंग नहीं बन सकते। परम सत्ता से संलग्न हुए बिना वे वैकल्पिक ही बने रहेंगे और अनिवार्य करण या वरण के बिना उनमें दृढ़ता नहीं आएगी। वे मूल्य हमारा रक्षा - कवच बनने में असमर्थ रहेंगे। जिस द्रव्य में भगवान् का तुलसी दल नहीं पड़ा है, वह किसी भी क्षण राजनीति द्वारा शैतान के डिनर - टेबल पर भी सजाया जा सकता है। यह ईश्वर ही है जो हमारे हाथ को पकड़ कर फिसलने से रोकता और बचाता है। समूह भागवत यान पर चढ़कर ही भवसागर को पार कर पाता है। यह अलग बात है कि आसाराम और राम रहीम ईश्वर का हाथ पकड़ कर ही फिसल जाते हैं। ये क्या जानें कि बौद्ध संन्यासी की मानसिक मुदिता या शुचि मानस की निर्विकार प्रसन्नता क्या होती है। इसीलिए शंकराचार्य और कुमारिल भट्ट के शास्त्रों के द्वारा बौद्ध धर्म इस देश से विदा नहीं हुआ, भारत की आत्मा में प्रतिष्ठित हो गया। स्वयं शंकराचार्य ने अपने मायावादी वेदान्त का पुनर्गठन बौद्धों के शून्य वाद और विज्ञान वाद के तत्त्वों को ग्रहण करके किया है। तथा अपने आम्नाय का संगठन बौद्ध संघ के अनुकरण पर किया है। इस देश में अतीत के प्राणवान तत्त्वों को लेकर चलने वाले की ही चली है। वे चाहे व्यास हों या बुद्ध, महावीर हों या फिर कबीर, शंकराचार्य हों या रामानुजाचार्य, विवेकानंद हों या गांधी, छिन्नमूल को यहाँ कभी स्वीकार नहीं किया गया। किन्तु आज तो भारतीय साहित्य में मार्क्सवाद का ही शासन है, जबकि केन्द्र में दक्षिण पंथी सरकार बैठी है।
संस्कृति का शेषनाग
हृदय शेषी रस - आखेटक कुबेर नाथ राय भाषा के किसान हैं। हमें मानसिक ऋद्धि प्रदान करने वाले उनके निबन्धों में या तो समकालीन भारतीय साहित्य में व्याप्त उग्रता, कोलाहल और क्रोध की प्ररोचना के प्रति क्रोध है या फिर अन्तर का हाहाकार। उनके धीरललित या क्रुद्ध ललित निबन्धों की पटभूमि में आधुनिक बुद्धिवाद की बिडम्बना का आखेट संलक्ष्य है, किन्तु विचार सरणि का विन्यास बौद्धिक शिल्प में ही है। सीवान - मथार की हरीतिमा का सांस्कृतिक साक्षात्कार कब जीवन - दर्शन में पर्यवसित हो जाता है, पता ही नहीं चलता। सृजन - पर्व में व्यवहृत लोकायत के शब्दों का तंत्र शास्त्र संस्कृत से व्युत्पन्न होकर ज्योतिष से भी समर्थन प्राप्त करता है। उनकी आत्मा की अमृत कला अब ललित की जवाकुसुम जैसी चटख लाल, उग्र और उत्तेजक भंगिमा पर मुग्ध नहीं होती।
वैदिक ऋचा की सारस्वत व्यंजना में परम व्योम की हंसपदी प्रकट होती है। साहित्य मनोमय पुरुष का अखाड़ा है। कवियों के कुसंग में कभी कभी उन्हें भी चिलम पकड़ा दी जाती है। इस लिए भाषा में लालित्य और भावात्मक नशा बरकरार रहता है। एक बार उन्होंने मुझसे कहा था कि आज कविता इमोशनल नहीं, रैशनल हो गई है। उनकी झील जैसी नीली आँखें आत्मिक सौन्दर्य की सान्द्रता और गहराई को परावर्तित करती थीं। उनकी वैष्णव चेतना मकुनी को मुकुन्दी के रूप में ग्रहण करती है और दाल से पूरित पूड़ी को भोजपुरी पूरी के रूप में आस्वाद्य बनाती है। नामों की बलाका रचते हुए उनकी पश्यंती विद्या घूंघट में छिपे कामिनी के मुखमंडल को ही नहीं देखती, अवगुंठन में छिपी हुई कृषक - पीड़ा का भी साक्षात्कार कर लेती है। आधुनिक / उत्तर आधुनिक युग में मनुष्य की हिंसक और लोलुप पाप दृष्टि का सर्वाधिक शिकार नारी और किसान के बाद भाषा ही हुई है। ज्ञान के कुबेर किसान ब्राह्मण हैं। उनके पिता जी मानते थे कि किसान शब्द जुड़ जाने से ब्राह्मण का अवमूल्यन हो जाता है, किन्तु लेखक की मान्यता है कि किसान शब्द से जुड़कर ब्राह्मण की महिमा कई गुना बढ़ जाती है। असल भारत है किसान भारत। वही तो धरती का शेषनाग है। पंचमहाभूत के हाथों से किसान का एक जोड़ा हाथ जुड़ गया, तब जाकर इस दिक् चक्रवाल तक फैली हरीतिमा का जन्म हुआ। किसान भारतीय समाज का नाभिक है। वह समाज की एक प्राणवान सांस्कृतिक इकाई ज्यादा है, अर्थव्यवस्था की आर्थिक इकाई कम। पूंजीवादी उत्तर औद्योगिक संस्कृति ने कृषि - व्यवस्था को आक्रामक भंगिमा में चुनौती दी है।
आज राजनीति के तुमुल द्वंद्व में किसान का कोई मुखपात्र नहीं। इसलिए उसकी निरन्तर अधोगति हो रही है और शेष सभी का भविष्य उज्ज्वलतर होता जा रहा है। वामपंथी राजनीति भी किसान के साथ कोई न्याय नहीं कर सकी और वह भी किसान की शपथ लेती हुई बड़ी धूर्त्तता से उसे मंच से धकेल कर उस पर मजदूर संघ का वर्चस्व स्थापित कर देती है। किसान और खेतिहर मजदूर के बीच यजमान और पवनी का मानवीय रिश्ता है जो पारस्परिक सहयोग तथा भलमनसाहत पर आधारित है। यह पूंजीपति और श्रमिक के बीच मात्र वेतन - बोनस वाला यांत्रिक सम्बन्ध नहीं है। अतः इस रिश्ते को वर्ग - द्वन्द्व के उसी अर्थशास्त्र से मापना गलत होगा। बहुत याद आते हैं मार्क्सवादी ऋषि स्वामी सहजानन्द सरस्वती, जिन्होंने तिलक - गांधी से आगे जाकर किसान - आन्दोलन को राष्ट्रव्यापी बनाया। किन्तु आज तो वर्ष पर्यन्त आन्दोलन करने पर भी अहंकारी सत्ता झुकती नहीं है। नेहरू ने जमींदारी प्रथा समाप्त की थी, किन्तु उनके उत्तराधिकारी ही देश में महाजमींदार पैदा करने लगे। अब नन्दी और नान्दी दोनों ही के स्वर विलुप्त होते जा रहे हैं और बाजार ने समाज को अपदस्थ कर दिया है। और संस्कृति का शेषनाग आज फुंकार रहा है।
गहि न जाइ अस अद्भुत बानी
आज कुबेर नाथ राय के हिरण्यमय आवरण को उतार कर उनकी नग्न भास्वर छवि के दर्शन करते हैं और आधुनिक युग - सन्दर्भों में एक शब्द - शिल्पी की सामाजिक भूमिका का साक्षात्कार करते हैं। एक लेखक की सर्जनात्मक भूमिका जीवन के विधेयात्मक अमृत से जुड़ी है, न कि गरल और संहार से। गरल का भी रसायन के रूप में उपयोग हो सकता है तो वह औषधि बन जाता है। किन्तु औषधि मात्रा में दी जाती है। औषधि सम्पूर्ण भोजन नहीं बनाई जा सकती। ध्वंस और विद्रोह ही एक मात्र प्रतिष्ठित मुद्रा नहीं है और न ही यह अन्धविश्वास कि जो विज्ञान - सम्मत नहीं, वह असत्य है। वैज्ञानिक अरूप भाव - प्रत्यय, सौन्दर्य और प्रेम को मापने का कोई थर्मामीटर नहीं बना पाए। वैज्ञानिक विकास वाद के पैगम्बर चार्ल्स डार्विन को अपने परवर्ती जीवन में शेक्सपीयर का सृजन - संसार उबाऊ और नीरस लगने लगा था। वर्तुलता को अस्वीकार कर पिकासो सौन्दर्य बोध की चित्र वीथिका को भावहीन, ज्यामितिक तथा गणितीय कर देना चाहता है। आधुनिक अर्थशास्त्र की संरचना के केन्द्र में मनुष्य नहीं, धन है। आज पूंजी तंत्र सम्मोहन का अभिचार चला रहा है और नयी राजनीति उच्चाटन और मारण मंत्र का जाप कर रही है। साथ ही पूंजी - आश्रित समूह माध्यम नयी राजनीति के द्वारा संचालित हैं और व्यक्ति की इच्छा शक्ति को बेडौल, चपटी, विभ्रान्त और निर्बीज कर डालने के षड्यंत्र में सक्रिय है।
बौद्ध राजनीति जनगण को घृणा, द्वेष और हिंसा का आश्रय लेकर संगठित करने का प्रयोग कर रही है। सेक्यूलरिज़्म को नया फासिज्म बनाने की उद्यमिता सक्रिय है। और अब तो उसकी प्रतिक्रिया में राजनीति की धार्मिक तानाशाही चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई है। साठोत्तरी साहित्य निरन्तर संस्कार विहीन, दु:शील और दुर्मुख होता गया है। इसमें फैलाव तो है, परन्तु यह अतिशय बाह्य प्रभाव - पीड़ित और प्रभाव - रुग्ण है। साहित्य में मूर्ति - ध्वंस तथा राजनीतिक मूल्यों के समर्थन के नाम पर कट्टर पंथी सम्प्रदाय वाद के पुरोहित ही अग्रपूज्य बन गए हैं। रोमानियत कह कर भाव सत्ता तिरस्कृत की जाती है और बुद्धि वाद के प्रति दुराग्रह अनुपात हीन ढंग से बढ़ता जा रहा है। किन्तु यह यथार्थ है। यथार्थ में अन्त:संचरित सत्य की अभिव्यक्ति ही काव्य का इष्ट है। पंक यथार्थ है तो पंकज सत्य। यथार्थ तो ठीक है लेकिन यथार्थ वाद अग्राह्य है। वस्तु धर्मी वास्तव अधोमुखी है और यह गुरुत्वाकर्षण की जड़िमा को काटने में सर्वथा असमर्थ है। परन्तु परावास्तव तो स्वभावतः ऊर्ध्व मूल एवं अधोशाखा है। किन्तु प्रगतिशील सोच को तो सत्ता के अतीन्द्रिय शुद्ध चैतन्य रूप पर ही विश्वास नहीं। फ्रायड के लिए काम निग्रह अकल्पनीय है। उनकी दृष्टि में मन अवदमन के प्रेतों का अड्डा है। यहाँ अवचेतन की विक्षुब्ध कामी प्रेतोपम शक्तियां ही महत्वपूर्ण हैं और मन के भीतर किसी ऊर्ध्वतर चैतन्य या उच्चतर बिन्दु पर ले जाकर संयोजन करने वाली किसी समन्वय कारी शक्ति में उनका विश्वास नहीं। यह मन की स्वीकृति नहीं, अपस्वीकृति है जो अस्वीकृति से कम खतरनाक नहीं। यह तो मन को शैतान के हाथों बेंच देने जैसा है। जिस देश ने बुद्ध, महावीर और गांधी को पैदा किया, उस देश में भी बीसवीं शताब्दी में इन अर्धसत्यों की धूम रही। अब मन के इस दरिद्रीकरण और बन्ध्याकरण को रोकने की जरूरत है। अंग्रेजी जमाने में वेशभूषा ही बदली थी, रसोई घर नहीं बदला था। पर अब तो खाद्य - रुचि और संस्कार - चेतना भी विदेशी पूंजीवादी संस्थानों की गुंजलक में आ गए हैं।
महापंडित राहुल सांकृत्यायन संस्कृत विहीन 'हिन्दुस्तानी' भाषा के दावे के खिलाफ अपनी कम्युनिस्ट पार्टी से लड़ गए। फलतः उन्हें पार्टी से निष्कासन झेलना पड़ा था। राहुल जी सनातन भारतीय वामधारा के अभिनव तीर्थंकर थे। वे अनीश्वरवादी थे परन्तु भौतिकवादी नहीं थे। धर्म की भी एक वाम - चेतना होती है। वे पराभौतिक मानवीय प्रमूल्यों के विश्वासी थे। स्थविरवाद "आत्मार्थं पृथ्वीम् त्यजेत्" का बौद्ध रूपान्तर था। अपने भीतर के बुद्धत्व को जागृत करके निर्वाण सुख लब्ध करना। किन्तु असहज और अप्राकृतिक संयम को लोकजीवन स्वीकार नहीं करता। राग और विराग के द्विधा विभक्त लय को वरण करके उभयनिष्ठ जीवन - पद्धति को ही समष्टि - चित्त स्वीकार कर पाता है। इसीलिए भागवत चेतना भक्ति को सहजता से ग्रहण कर लेती है। आध्यात्मिक चेतना का रागात्मक मनोवृत्तियों के साथ रचनात्मक सामंजस्य स्थापित करके ही अपनी अन्तर्निहित मनुष्यता की रक्षा की जा सकती है। यही मध्यमा प्रतिपदा ही सर्वोत्तम मार्ग है। कुबेर नाथ राय के ललित निबन्ध - समवाय में भी लालित्य पर बौद्धिक चेतना हावी हो जाती है तो उनसे हम यही प्रार्थना करेंगे कि महाश्रमण! इतना विराग असह्य है।
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