झारखंड के पलामू जिले के ग्राम लहलहे निवासी युवा रंगकर्मी एवं शोधार्थी मनीष तिवारी ने नाट्य एवं प्रदर्शनकारी कला के क्षेत्र में महत्वपूर्ण अकादमिक उपलब्धि हासिल की है। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के प्रदर्शनकारी कला विभाग से उन्होंने नाट्य कला (Dramatic Arts) में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की है। विश्वविद्यालय द्वारा जारी अधिसूचना में उनके शोध-प्रबंध को पीएच.डी. उपाधि हेतु स्वीकार किए जाने की पुष्टि की गई है।
दामोदर तिवारी के सुपुत्र मनीष तिवारी ने “A Study and Analysis of Theatre and Quasi-Theatrical Folk Performance Traditions Prevalent in Jharkhand” विषय पर अपना शोधकार्य किया है। यह शोध झारखंड में प्रचलित नाट्य एवं नाटकीप्राय लोक प्रदर्शन परंपराओं के अध्ययन एवं विश्लेषण पर आधारित है। शोध का उद्देश्य झारखंड की समृद्ध लोकनाट्य एवं प्रदर्शन परंपराओं को अकादमिक दृष्टि से समझना और उनके विविध पक्षों का विश्लेषण करना है।
उनका वाइवा-वोसे 14 अगस्त 2026 को संपन्न हुआ। शोधकार्य का निर्देशन प्रदर्शनकारी कला विभाग की डॉ. विधु खरे दास ने किया। विश्वविद्यालय की अधिसूचना के अनुसार उनका शोधकार्य UGC के Minimum Standards and Procedure for Award of Ph.D Degree, Regulation 2016 के प्रावधानों के अंतर्गत स्वीकार किया गया है।
रंगमंच के प्रति अपनी गहरी रुचि और निरंतर सक्रियता के साथ मनीष तिवारी पिछले कई वर्षों से अभिनय, निर्देशन, रंगमंच प्रशिक्षण तथा लोक प्रदर्शनकारी कलाओं के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। अकादमिक शोध के साथ उनका व्यावहारिक रंगकर्म उन्हें लोक एवं प्रदर्शनकारी कलाओं के अध्ययन की एक विशिष्ट दृष्टि प्रदान करता है।
झारखंड की मिट्टी से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने की दिशा में मनीष तिवारी की यह उपलब्धि उनके परिवार, गांव और क्षेत्र के लिए भी गौरव का विषय है। विशेष रूप से लहलहे, पलामू जैसे ग्रामीण परिवेश से आने वाले युवा का लोककलाओं एवं रंगमंच के क्षेत्र में उच्च शिक्षा और शोध के माध्यम से आगे बढ़ना क्षेत्र के युवाओं के लिए प्रेरणादायी है।
मनीष तिवारी ने अपनी इस उपलब्धि का श्रेय अपने माता -पिता शोभा तिवारी -दामोदर तिवारी, परिवारजनों, गुरुजनों, शोध-निर्देशक तथा रंगमंच एवं अकादमिक क्षेत्र से जुड़े सभी सहयोगियों को दिया है। उन्होंने कहा कि झारखंड की समृद्ध लोक एवं नाट्य परंपराओं पर किया गया यह शोध उनके लिए केवल अकादमिक कार्य नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों और लोक परंपराओं को समझने का एक महत्वपूर्ण प्रयास भी है।
उल्लेखनीय है कि विश्वविद्यालय की अधिसूचना में मनीष तिवारी को प्रदर्शनकारी कला विभाग के शोधार्थी के रूप में दर्ज करते हुए उनके शोध-प्रबंध को पीएच.डी. उपाधि के लिए स्वीकार किए जाने की जानकारी दी गई है।

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