नई किताब
रांची : संथाल समाज के पवित्र धर्मस्थल लुगुबुरू घंटाबाड़ी धोरोमगढ़ से जुड़ी सदियों पुरानी मौखिक परंपराएं अब पुस्तक के रूप में सामने आ रही हैं। इस विषय पर तैयार 350 पृष्ठों की कॉफी-टेबल बुक की प्रस्तावना राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने लिखी है। राष्ट्रपति ने एक सितंबर, 2025 को नई दिल्ली से लिखी अपनी प्रस्तावना में आदिवासी समाज को दुनिया का प्रथम नागरिक बताते हुए जल, जंगल और जमीन की रक्षा को पृथ्वी के अस्तित्व से जोड़ा है। उन्होंने लुगुबुरू को प्रकृति और मनुष्य के सह-अस्तित्व की यात्रा का महत्वपूर्ण केंद्र बताया है। ‘लुगुबुरू घंटाबाड़ी : संथाल आदिवासियों का संविधान’ नामक इस पुस्तक के लेखक झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं जनजातीय संस्कृति के अध्येता डॉ. सोमनाथ आर्य हैं। इसका प्रकाशन संस्था ‘और एक प्रयास’ और सांस्कृतिक कार्य निदेशालय झारखंड सरकार द्वारा किया जा रहा है।
राष्ट्रपति ने प्रस्तावना में रेखांकित कीं चार प्रमुख बातें
जल, जंगल और जमीन में है पृथ्वी की रक्षा
राष्ट्रपति ने प्रस्तावना में लिखा है कि हमारे पूर्वजों ने काफी पहले यह समझ लिया था कि पृथ्वी और मानव जीवन की रक्षा का मूल सूत्र जल, जंगल और जमीन के संरक्षण में निहित है। प्रकृति का संरक्षण केवल पर्यावरण से जुड़ा विषय नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है।
आदिवासी दुनिया के प्रथम नागरिक
राष्ट्रपति ने आदिवासी समुदाय को मानव सभ्यता की प्राचीन यात्रा से जोड़ते हुए लिखा है, “यह सुस्थापित एवं अकाट्य सत्य है कि आदिवासी इस दुनिया के प्रथम नागरिक हैं।” उन्होंने आदिवासी जीवन-दर्शन, प्रकृति के प्रति सम्मान और सामुदायिक व्यवस्था को मानव सभ्यता की महत्वपूर्ण विरासत के रूप में प्रस्तुत किया है।
12 वर्षों के मंथन से बनी सामाजिक संहिता
प्रस्तावना में उस मान्यता का भी उल्लेख है, जिसके अनुसार लुगु बाबा की अगुवाई में संथाल समाज के पूर्वजों ने लुगुबुरू में लगातार 12 वर्षों तक विचार-विमर्श किया था। इस सामूहिक मंथन के बाद जन्म से मृत्यु तक के संस्कारों, सामाजिक संबंधों, धार्मिक आचरण, न्याय व्यवस्था और सामुदायिक जीवन से जुड़े नियम निर्धारित किए गए। पुस्तक में इसी पारंपरिक व्यवस्था को संथाल समाज के ‘आदि संविधान’ के रूप में समझने का प्रयास किया गया है।
सह-अस्तित्व की यात्रा का ऊष्म स्थल
राष्ट्रपति ने लुगुबुरू को केवल चट्टानों या पहाड़ियों का समूह न मानकर प्रकृति और मनुष्य के सह-अस्तित्व की यात्रा का एक महत्वपूर्ण ऊष्म स्थल बताया है। प्रस्तावना में कहा गया है कि आधुनिक तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के विस्तार के बावजूद मनुष्य को अपनी जड़ों की ओर लौटने के लिए ऐसे पवित्र स्थलों की आवश्यकता पड़ेगी।
धिरि दोलान और पवित्र झरने का भी उल्लेख
राष्ट्रपति ने प्रस्तावना में लुगुबुरू पहाड़ी पर स्थित पवित्र ‘धिरि दोलान’ गुफा का विशेष उल्लेख किया है। गुफा के भीतर चट्टानों से होने वाले पानी के निरंतर रिसाव तथा छरछरिया यानी ललपनिया के पवित्र झरने से जुड़ी स्थानीय मान्यताओं को भी पुस्तक का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया है। प्रस्तावना में मानव सभ्यता की हजारों वर्षों की यात्रा का उल्लेख करते हुए लुगुबुरू जैसे केंद्रों की तप, साधना और प्रकृति-केंद्रित जीवन पद्धति को गौरवशाली अतीत से जोड़ा गया है।
बुजुर्गों की स्मृतियों में सुरक्षित था इतिहास
लुगुबुरू से संबंधित अधिकांश परंपराएं अब तक लिखित अभिलेखों में उपलब्ध नहीं थीं। उनका संरक्षण गांवों के बुजुर्गों, पारंपरिक धार्मिक प्रतिनिधियों और सामाजिक पदाधिकारियों की स्मृतियों में होता रहा। पीढ़ियों के बदलने के साथ इस मौखिक ज्ञान के लुप्त होने का खतरा भी बढ़ रहा था। इसी कारण पुस्तक में स्थानीय स्मृतियों, सामाजिक मान्यताओं और उपलब्ध ऐतिहासिक संदर्भों को एक साथ दर्ज करने का प्रयास किया गया है। इसमें मांझी-परगना व्यवस्था, जोगमांझी की भूमिका, जन्म से मृत्यु तक के संस्कार, धार्मिक अनुष्ठान, सामूहिक निर्णय प्रक्रिया, जल-जंगल-जमीन से जुड़ा जीवन-दर्शन और वार्षिक जतरा का विस्तार से उल्लेख है।
ढाई वर्ष तक चला मैदानी शोध
पुस्तक तैयार करने के लिए डॉ. सोमनाथ आर्य ने ढाई वर्षों तक मैदानी शोध किया। इस दौरान उन्होंने कई बार लुगुबुरू की कठिन पहाड़ी यात्रा की तथा मांझी, परगना, जोगमांझी, धार्मिक प्रतिनिधियों और ग्रामीण बुजुर्गों से संवाद किया। बुजुर्गों से प्राप्त मौखिक जानकारियों का उपलब्ध ऐतिहासिक संदर्भों, धार्मिक मान्यताओं और सामाजिक परंपराओं के साथ अध्ययन किया गया। डॉ. आर्य के अनुसार, “यह पुस्तक केवल पुस्तकालय में बैठकर नहीं लिखी गई है। लुगुबुरू की पहाड़ियों और गांवों में जाकर बुजुर्गों से संवाद किया गया। प्रयास रहा कि मौखिक परंपराएं अपने मूल स्वरूप में दर्ज हों।” इस शोध में फिनलैंड की संस्था सोफ्टा ने तकनीकी एवं अकादमिक सहयोग प्रदान किया है।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को समर्पित है पुस्तक
लेखक ने यह पुस्तक झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को समर्पित की है। पुस्तक के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सहित कई गणमान्य व्यक्तियों के संदेश भी प्राप्त हुए हैं। इन संदेशों में संथाल समाज की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने के प्रयास को महत्वपूर्ण बताया गया है। डॉ. सोमनाथ आर्य इससे पूर्व दुमका जिले के ऐतिहासिक मंदिर गांव मलूटी पर शोध कर ‘बियॉन्ड कंपैरिजन : मलूटी’ पुस्तक लिख चुके हैं। इसके प्रकाशन में झारखंड सरकार के सांस्कृतिक कार्य निदेशालय ने सहयोग प्रदान किया था।
विश्वविद्यालयों के लिए संदर्भ ग्रंथ बनने की उम्मीद
पुस्तक में लुगुबुरू घंटाबाड़ी के धार्मिक महत्व के साथ संथाल समाज की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था और पर्यावरण-दर्शन को भी प्रमुखता दी गई है। लेखक को उम्मीद है कि यह पुस्तक विश्वविद्यालयों, पुस्तकालयों, सांस्कृतिक संस्थानों और जनजातीय विषयों पर काम करने वाले शोधार्थियों के लिए एक प्रामाणिक संदर्भ ग्रंथ बनेगी। इसके माध्यम से नई पीढ़ी को संथाल समाज के इतिहास, सामाजिक व्यवस्था और प्रकृति-केंद्रित जीवन मूल्यों को समझने का अवसर मिलेगा।
पुस्तक एक नजर में
- नाम: लुगुबुरू घंटाबाड़ी : संथाल आदिवासियों का संविधान
- कुल पृष्ठ: 350
- शोध-अवधि: ढाई वर्ष
- लेखक: डॉ. सोमनाथ आर्य
- प्रकाशक: और एक प्रयास
- शोध सहयोग: सोफ्टा, फिनलैंड
- प्रस्तावना: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू
- समर्पण: मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन

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