पंकज पुष्कर
इतना कहते-कहते उनकी आवाज़ थोड़ी धीमी हो गई।
"लेकिन अब चिंता एक ही बात की है। एक बेटा अपनी नौकरी में व्यस्त है और दूसरे की इस काम में कोई रुचि नहीं है। किताबों से मेरा प्रेम आज भी वैसा ही है, लेकिन शरीर अब साथ नहीं देता। कई बार सोचता हूंकि मेरे बाद इस ज्ञानदीप का क्या होगा? कहीं ऐसा न हो कि एक दिन इसकी रोशनी ही बुझ जाए और दुकान बंद करनी पड़े।"
उनकी यह बात सुनकर मैं कुछ क्षणों के लिए बिल्कुल शांत हो गया। सच कहूंतो भीतर कहीं एक टीस-सी उठी। यह चिंता केवल प्रदीप जी की नहीं है, बल्कि हम सबकी होनी चाहिए।
निस्संदेह, हर बेटे-बेटी को अपना करियर चुनने की पूरी स्वतंत्रता है। अपने सपनों का पीछा करना उनका अधिकार है। लेकिन इसके साथ-साथ परिवार की दशकों की मेहनत, समाज के प्रति अपने दायित्व और उस विरासत का भी महत्व समझना होगा, जिसे पिछली पीढियां अपने खून-पसीने से खड़ा करती हैं। हर विरासत केवल इमारत या व्यवसाय नहीं होती; कुछ विरासतें समाज की सांस्कृतिक और बौद्धिक चेतना की भी होती हैं।
ज्ञानदीप जैसी पुस्तकालय-सदृश दुकानें केवल किताबें बेचने का काम नहीं करतीं। वे पाठकों की रुचि गढ़ती हैं, लेखकों को पाठकों से जोड़ती हैं, विद्यार्थियों को उनके सपनों तक पहुंचने का रास्ता दिखाती हैं और समाज में पढ़ने की संस्कृति को जीवित रखती हैं। ऐसे स्थान किसी भी शहर की सांस्कृतिक धरोहर होते हैं।
आज जब मोबाइल स्क्रीन और ऑनलाइन बाज़ार के बीच किताबों की दुनिया लगातार सिमटती जा रही है, तब ज्ञानदीप जैसे संस्थानों को बचाए रखना पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है। यदि ये एक-एक करके बंद हो गए, तो केवल दुकानें नहीं बंद होंगी, बल्कि शहर की स्मृतियों का एक महत्वपूर्ण अध्याय भी हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा।
एक जागरूक नागरिक के रूप में हम सबका यह सामूहिक दायित्व है कि ऐसी शैक्षिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासतों को जीवित रखें। जब भी अवसर मिले, ऑनलाइन विकल्पों के बजाय अपने शहर की ऐसी पुस्तक दुकानों तक जाएं किताबें खरीदें, अपने बच्चों को वहां लेकर जाएं और उन्हें किताबों की खुशबू से परिचित कराएं।
क्योंकि समाज केवल इमारतों से नहीं, किताबों से बनता है। और किताबें केवल लेखक नहीं, उन्हें पाठकों तक पहुंचाने वाले ऐसे कर्मयोगी भी बचाए रखते हैं, जिनकी पहचान अक्सर इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं होती। ईश्वर करे, ज्ञानदीप की यह लौ यूं ही जलती रहे और आने वाली पीढ़ियां भी उसी आत्मीयता के साथ वहां पहुंचकर किताबों की खुशबू महसूस करती रहें।
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- अब तक विभिन्न शैक्षिक मंचों एवं सोशल मीडिया पर सैकड़ों कवियों की रचनाओं का वाचन । आम आदमी के जीवन संघर्ष पर आधारित पत्रिका 'प्रांजल धारा' का संपादन एवं प्रकाशन।
- देश में बढ़ती आत्महत्या की घटनाओं के विरुद्ध शैक्षिक संस्थानों में एवं विभिन्न सामाजिक मंचों से बौद्धिक उद्बोधन कार्यक्रमों का संचालन ।
- संग्रह की पहली कविता 'तुम्हारी कविता' रांची यूनिवर्सिटी द्वारा चयनित, प्रशंसित और पुरस्कृत है
संपर्क सूत्र : मोबाइल-8757679912
email: pankaj 173@gmail.com

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