22 साल बाद खीरी मठ का हुआ जीर्णोद्धार
रांची : झारखंड के पुरातात्विक इतिहास में एक ऐतिहासिक अध्याय जुड़ गया है। वरिष्ठ पुरातत्ववेत्ता एवं संस्कृति-पुरातत्व विभाग के पूर्व उप निदेशक डॉ. हरेन्द्र सिन्हा के 22 साल के अनवरत संघर्ष के बाद आखिरकार खीरी मठ बौद्ध मंदिर को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने संरक्षित (जीर्णोद्धार) कर दिया है। यह वही प्रसिद्ध खीरी मठ है, जिसे डॉ. सिन्हा ने पहली बार वर्ष 2002 में रिपोर्ट किया था। लंबे समय तक उपेक्षित रहे इस महत्वपूर्ण बौद्ध स्थल को संरक्षित कराने में ASI नई दिल्ली के महानिदेशक डॉ. यदुवीर सिंह रावत और ASI रांची सर्कल की अधीक्षण पुरातत्वविद् डॉ. करबी साहा की अहम भूमिका रही है।
सर्वेक्षण में मिले प्राचीन कुएं और अन्य अवशेष
संरक्षण कार्य शुरू होने के बाद जब डॉ. सिन्हा ने स्थल के आसपास सर्वेक्षण किया तो मुख्य स्मारक के पास झाड़ियों में एक प्राचीन कुआं और उसी काल की निर्माण सामग्री के कई अन्य अवशेष मिले। इससे यह संकेत मिलता है कि खीरी मठ अकेला मंदिर नहीं, बल्कि एक विशाल धार्मिक-सांस्कृतिक केंद्र का हिस्सा था। सर्वे के दौरान ही मिली दूसरी बड़ी सफलता खीरी मठ के सर्वे के दौरान ही रामगढ़ जिले में एक और महत्वपूर्ण खोज हुई। गोला चौक से चितरपुर जाने वाले मार्ग पर बक्शी टोला गांव में कचरे के टीले और कंटीली झाड़ियों में दबा एक प्राचीन टेराकोटा मंदिर मिला है। जांच में यह मंदिर राधा गोविंद मंदिर समूह का निकला, जिसकी स्थापत्य कला हूबहू दुमका के विश्व प्रसिद्ध मलूटी मंदिर समूह जैसी है।
रामायण के प्रसंगों से सजी टेराकोटा पट्टिकाएं
डॉ. सिन्हा के अनुसार यह इस शैली की छठी अनरिपोर्टेड खोज है। इससे पहले वे बोकारो के चंदनकियारी में 3, रांची के पांडरा में 1 और गुमला के नवरत्नगढ़ के पास धोबी मठ में 1 ऐसे ही मंदिर खोज चुके हैं। रामायण काल के दृश्यों से सजी टेराकोटा कला बक्शी टोला में मिले मंदिर की कला अद्भुत है। मंदिर का प्रवेश द्वार बंगाल की प्रसिद्ध 'चाला/रत्न' शैली में बने बहु-मेहराबदार चाप पर टिका है, जिस पर कमल-चक्र और ज्यामितीय पच्चीकारी है। मंदिर की टेराकोटा पट्टिकाओं पर धनुषधारी श्रीराम-लक्ष्मण, रावण युद्ध, हनुमान द्वारा द्रोणागिरी पर्वत उठाने, मत्स्य-वराह अवतार, चक्र-पद्म और घोड़े पर सवार योद्धाओं के सजीव चित्र उकेरे गए हैं।
ईंटों की गुणवत्ता और चूना-सुर्खी के गारे से इसके 17वीं-18वीं सदी में बने होने का अनुमान है। इतिहास की नई व्याख्या अब तक माना जाता था कि इस तरह के टेराकोटा मंदिरों का केंद्र सिर्फ दुमका का मलूटी ही है। लेकिन इस नई खोज ने साबित कर दिया है कि छोटानागपुर पठार - बोकारो, रांची, गुमला और रामगढ़ में भी बंगाल-झारखंड सीमावर्ती टेराकोटा परंपरा फल-फूल रही थी। डॉ. सिन्हा के मुताबिक, "संभव है कि चैतन्य महाप्रभु जब उड़ीसा से वाराणसी जा रहे थे, तो झारखंड में जिन-जिन पड़ावों से गुजरे, वहीं उनके भक्तों ने उनकी स्मृति में ये राधा गोविंद मंदिर बनवाए। अभी तक 6 मंदिर मिले हैं, आने वाले समय में ऐसे और मंदिर भी मिल सकते हैं।" इस खोज से झारखंड में उत्तर-मध्यकालीन वैष्णव परंपरा और बंगाल से उसके सांस्कृतिक संबंधों पर नई रोशनी पड़ने की उम्मीद है।

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