असीत कुमार का संस्मरण
कभी-कभी जीवन में ऐसी घटनाएं घट जाती हैं, जिन्हें बरसों बाद भी भुलाया नहीं जा सकता। मेरे जीवन में भी ऐसी ही एक घटना हुई थी। आज शायद यह घटना कुछ लोगों को अविश्वसनीय लगे, लेकिन इसके मुख्य किरदार मेरे पिता थे। यह घटना इस बात का प्रमाण भी थी कि पुराने समय में लोगों के भीतर जो सहज मानवता थी, शायद वर्तमान समय में उसका लगातार क्षय हो रहा है। वाकया कुछ इस प्रकार है। यह 70 के दशक की बात है। उन दिनों मेरे पिता की पोस्टिंग झारखंड (तत्कालीन बिहार) के सिमरिया नामक प्रखंड में हुई थी। मैं उस समय स्कूल में पढ़ता था। अचानक मेरी तबीयत खराब हो गई। बीमारी ऐसी थी, जिसके लिए कुछ महीनों तक लगातार दवा खाने की जरूरत थी। सिमरिया में न तो कोई अच्छा डॉक्टर था और न ही चिकित्सा की कोई विशेष सुविधा। वह एक छोटा-सा कस्बा था, या यूं कहें कि गांव ही था। इसलिए मेरा इलाज रांची में कराने का निर्णय लिया गया।
उन दिनों रांची भी आज की तरह फैला हुआ शहर नहीं था, बल्कि एक छोटे-से कस्बे जैसा ही था। रांची में उन दिनों सुरेंद्र सिंह नाम के एक डॉक्टर हुआ करते थे। सिमरिया से रांची आने-जाने का साधन भी बहुत सीमित था। मेरे पिता किसी तरह मुझे लेकर रांची पहुंचे और डॉक्टर से परामर्श लिया।
डॉक्टर ने पिताजी को बताया कि इलाज थोड़ा लंबा चलेगा। उन्होंने उसी के अनुसार दो महीने की दवा लिख दी और कहा कि इसके बाद आगे का परामर्श दिया जाएगा।
डॉक्टर को दिखाने के बाद सिमरिया लौटने के लिए पिताजी ने बड़ी मुश्किल से एक टैक्सी का इंतजाम किया। सोचा गया कि लौटते समय दवा भी खरीद ली जाए।
उस समय आज के हजारीबाग रोड के आसपास, जहां अब कई बड़ी दुकानें हैं, वर्तमान में बाटा की दुकान है, उसके विपरीत दिशा में प्लाजा सिनेमा के निकट ड्रग लैंड नाम की एक दवा की दुकान हुआ करती थी। वहां पहुंचकर पिताजी के साथ मैं भी दुकान पर उतर गया। डॉक्टर की पर्ची देकर दवाएं ली गईं। जब बिल बना तो पिताजी ने देखा कि उनके पास पैसे काफी कम पड़ रहे हैं।
दवा की कीमत का उन्हें पहले से कोई अंदाजा भी नहीं था जो काफी महंगी थी।
पिताजी अचानक उदास हो गए। उनके सामने एक बड़ी चिंता थी,अगर दो महीने की पूरी दवा नहीं ले पाए, तो सिर्फ दवा खरीदने के लिए उन्हें फिर राँची आना पड़ेगा।
दुकान के मालिक ने शायद पिताजी की परेशानी समझ ली। जब उन्हें पता चला कि हम बहुत दूर सिमरिया से आए हैं, तो उन्होंने सहज भाव से कहा—
“आप चिंता मत कीजिए। बाकी पैसे फिर दे दीजिएगा।”
उन्होंने अपने कर्मचारी से दवाएं पैक करवा दीं। पिताजी के पास जितने पैसे थे, वे कैश बॉक्स में रख दिए गए। पिताजी ने संकोच से कहा, “मेरा नाम और पता लिख लीजिए।” दुकानदार ने मुस्कुराकर कहा— “कोई जरूरत नहीं। विश्वास है न! आप अगली बार दे दीजिएगा। बस बच्चा ठीक हो जाए।” इतना कहकर उन्होंने हमें दवा दे दी। न कोई जान-पहचान थी, न कोई परिचय। हम रांची के निवासी भी नहीं थे। फिर भी एक अनजान व्यक्ति ने केवल विश्वास के आधार पर हमें दवा दे दी थी। करीब दो महीने बाद जब हम उस दुकान पर पहुंचे तो उस दिन दुकान बंद मिली। किसी कारणवश पांच-छह महीने और बीत गए। इस बीच डॉक्टर के क्लीनिक से सटी किसी दूसरी दुकान से दवाएं ली जाती रहीं।
इलाज के अंतिम दौर में एक दिन पिताजी फिर उसी दुकान पर पहुंचे। उन्होंने दुकानदार को उस पुराने बकाये की याद दिलाई। उस समय उस दुकानदार का नाम मुझे मालूम नहीं था। लगभग 50 वर्ष बाद मुझे पता चला कि उनका नाम कन्हैया लाल प्रसाद था।
तब तक कन्हैया बाबू मेरे पिताजी का चेहरा भूल चुके थे। उन्हें यह भी याद नहीं था कि कितनी रकम बाकी थी। न कोई खाता था, न कोई लिखित हिसाब। पिताजी ने उन्हें पूरी बात याद दिलाई और बकाया पैसे चुका दिए। कन्हैया बाबू ने मुस्कुराकर सिर्फ इतना कहा— “कोई बात नहीं,बस बच्चा ठीक हो जाए।” उनका वह चेहरा मेरे मन में जैसे हमेशा के लिए अंकित हो गया।
मैं उस समय बहुत छोटा था, लेकिन मुझे यह एहसास जरूर हुआ था कि जरूरत के समय कोई आदमी फरिश्ते की तरह सामने आया था।
लेकिन यह संस्मरण यहीं खत्म नहीं होता...
इस कहानी का असली क्लाइमैक्स तो लगभग 50 वर्ष बाद आया।
कुछ वर्ष पहले हम रांची में ही बस गए। मेरे पिता भी वर्षों पहले इस दुनिया से जा चुके थे। एक दिन मेरे मन में अचानक उस पुरानी दवा की दुकान को खोजने की इच्छा हुई। लेकिन दुकान का कोई पता नहीं मिल पा रहा था।
कुछ बुजुर्ग लोगों से पूछने पर इतना पता चला कि उस दुकानदार का नाम शायद कन्हैया बाबू था। इसके आगे कोई जानकारी नहीं मिल सकी।
फिर कुछ दिन पहले की बात है।
बरसात से बचने के लिए मैं एक दवा की दुकान के छज्जे के नीचे खड़ा था। अचानक मेरी नजर दुकान की दीवार पर लगे एक फ्रेम किए हुए फोटो पर पड़ी। फोटो पर माला चढ़ी हुई थी।
मैं उस तस्वीर को देखते ही ठिठक गया।
हां, यह वही चेहरा था!
जिस चेहरे को मैं लगभग 50 वर्षों से अपने मन में सँजोए हुए था, वही चेहरा वही तस्वीर में मेरे सामने थी।
मैंने दुकान के कर्मचारी से अपना परिचय दिया और दुकान के मालिक का मोबाइल नंबर माँगा। बाद में पता चला कि मालिक कन्हैया बाबू के ही पुत्र हैं।
मैं उनसे बातचीत की और इस पुरानी घटना के बारे में उन्हें बताया। तब मुझे कन्हैया बाबू के बारे में बहुत-सी बातें जानने को मिलीं।
उनका पूरा नाम कन्हैया लाल प्रसाद था। वे 1955-60 के आसपास रांची में आकर बसे थे। उनके दो पुत्र और तीन पुत्रियां थीं। उनके छोटे पुत्र आनंद कुमार आज भी उसी पुराने नाम से दवा की दुकान चलाते हैं, जो अब नॉर्थ समाज स्ट्रीट, थड़पखना, रांची में है।
आनंदजी ने बताया कि उनके पिता बहुत ही सहृदय व्यक्ति थे और हमेशा लोगों की सहायता के लिए तत्पर रहते थे। उन्होंने अपने जीवन में बहुत से लोगों का भला किया। अपने लिए उनकी विशेष कोई चाह नहीं थी। अपने पिता के बारे में बताते हुए आनंद जी का गला रुंध गया था। कन्हैया बाबू का निधन वर्ष 2014 में, लगभग 80 वर्ष की आयु में हुआ। मैं सोचता हूं, शायद इसी को कहते हैं—किसी व्यक्ति का चले जाना, लेकिन उसकी मानवता का जीवित रह जाना। आज ग्लोबलाइजेशन के दौर में कन्हैया लाल प्रसाद जैसे लोगों की नितांत कमी महसूस होती है। रिश्ते और संबंध धीरे-धीरे लेन-देन तक सीमित होते जा रहे हैं। आज लोग कैश की गिनती तो कंप्यूटर और मोबाइल पर करते हैं, लेकिन मानवता की गिनती कम होती जा रही है। लगभग 50 वर्ष पहले एक अनजान दवा दुकानदार ने बिना किसी परिचय, बिना किसी लिखित भरोसे और बिना किसी स्वार्थ के मेरे पिता पर विश्वास किया था। उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी- “बस बच्चा ठीक हो जाए।” आज भी जब उस घटना को याद करता हूं, तो लगता है कि उस दिन मुझे केवल दवा नहीं मिली थी। मुझे मानवता पर विश्वास करने की एक वजह मिली थी।
(असीत कुमार पेशे से अधिवक्ता और मन मिजाज से यायावर और खोजी पत्रकार हैं। रांची में रहते हैं)

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