डा. नितीश प्रियदर्शी। भूवैज्ञानिक
आपको जानकर आश्चर्य भी होगा कि झारखंड के कई भूभाग करोड़ों साल पहले समुद्र के नीचे था यानी यहां भी सागर की लहरें उमड़ती थीं। इसमें झारखंड की राजधानी रांची भी था जहां समुद्र के होने के साक्ष्य उपस्थित हैं। झारखंड में आज भले ही समुद्र नहीं है, लेकिन भूवैज्ञानिक साक्ष्य बताते हैं कि करोड़ों–अरबों वर्ष पहले यहां कई बार समुद्री वातावरण मौजूद था। विशेषकर सिंहभूम, हजारीबाग, रांची, पलामू और संताल क्षेत्र में प्राचीन समुद्र के प्रमाण मिलते हैं।
प्रमुख स्थान जहां समुद्र के साक्ष्य मिले हैं
1. सिंहभूम क्षेत्र:सबसे महत्वपूर्ण समुद्री साक्ष्य यह भारत के सबसे प्राचीन भूभागों में से एक माना जाता है। यहां लगभग 3.2–3.5 अरब वर्ष पुराने समुद्री अवसादी चट्टानों के प्रमाण मिले हैं। लौह-अयस्क की परतदार चट्टानें, जो समुद्री जल में घुले लोहे के आक्सीकरण से बनीं। लौह-अयस्क पट्टी वास्तव में प्राचीन समुद्री रासायनिक निक्षेप मानी जाती है। नोआमुंडी, गुवा किरीबुरू, चाइबासा, जगन्नाथपुर में इसके साक्ष्य मिलते हैं। प्रारंभिक पृथ्वी के समुद्रों में घुले हुए आयरन और आक्सीजन की प्रतिक्रिया से ये परतें बनीं। जैसे-जैसे प्राचीन सायनोबैक्टीरिया ने प्रकाश संश्लेषण द्वारा आक्सीजन उत्पन्न करना शुरू किया, वैसे-वैसे समुद्र के जल में मौजूद आयरन आक्सीजन के साथ मिलकर तल में जमने लगा। इसी तरह चूना पत्थर भी उथले समुद्र में बनने वाली चट्टान है। सूक्ष्म जीवों (सायनोबैक्टीरिया) द्वारा बने संरचनात्मक जीवाश्म, जो उथले समुद्र में बनते हैं, काफी मिलते हैं।

2. रांची–हजारीबाग क्षेत्र: इन क्षेत्रों में समुद्र के प्रत्यक्ष जीवाश्म कम हैं, लेकिन कई भूवैज्ञानिक संकेत समुद्री या तटीय वातावरण की ओर इशारा करते हैं। क्वार्टजाइट और शेल की परतें मिलती हैं। कुछ क्षेत्रों में प्राचीन उथले जल निक्षेप व डोलोमाइट और चूना पत्थर भी मिलता है। पतरातू घाटी, रामगढ़ बेल्ट इनमें प्रमुख है। इन क्षेत्रों में प्राचीन जल निक्षेप और तलछटी क्रम पाए गए हैं। पतरातू घाटी की भूवैज्ञानिक कहानी रोमांचक है। कभी यहां निचला बेसिन था। पानी और तलछट जमा हुए मिलते हैं। लाखों–करोड़ों वर्षों में वे चट्टान बनें। बाद में भूगर्भीय उत्थान हुआ। आज वही चट्टानें घाटियों और पहाड़ियों में दिखती हैं। आम आदमी चट्टान देखकर क्या पहचान सकता है? यदि आप पतरातू घाटी में देखें तों समुद्री/जल निक्षेप के संभावित संकेत मिलते हैं। परतदार चट्टान, लहर जैसी आकृतियां, गोल-मटोल कंकड़, महीन शेल, समानांतर तलछटी परतें भी दिखाई देती हैं।

3. संथाल परगना और राजमहल क्षेत्र: यह क्षेत्र मुख्यतः ज्वालामुखीय चट्टानों के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन इनके नीचे और आसपास समुद्री अवसादों के संकेत मिले हैं। यहां समुद्री जीवाश्मों के कुछ अप्रत्यक्ष प्रमाण मिले हैं। शेल और बलुआ पत्थर, पुरानी नदी–डेल्टा एवं तटीय निक्षेप, लगभग 10–15 करोड़ वर्ष पहले यह क्षेत्र समुद्र के किनारे या उथले समुद्री वातावरण के पास रहा होगा।
4. पलामू–गढ़वा क्षेत्र: विंध्य समूह की तलछटी चट्टानों में उथले समुद्र और ज्वारीय मैदान जैसे वातावरण के संकेत मिले हैं। बलुआ पत्थर, शेल, कीचड़ दरारें-ये संकेत बताते हैं कि कभी यहां समुद्र का किनारा या लैगून जैसा वातावरण रहा होगा। झारखंड के सिंहभूम में सबसे पहले समुद्र से निकली थी धरती और सबसे पहले सुनामी भी आया था। रहस्यों से भरा हुआ है झारखंड। भूवैज्ञानिक शोध नए-नए परतों को खोल रहा है। कुछ दिन पहले एक शोध आया कि अफ्रीका नहीं झारखंड के सिंहभूम में सबसे पहले समुद्र से निकली थी धरती। इस ताजा शोध में उस व्यापक धारणा को चुनौती दी गई जिसमे जलप्रलय के बाद करीब 2.5 अरब साल पहले विभिन्न महाद्वीपों के समुद्र से निकलने के बारे में तमाम दावे किए गए थे। ताजा शोध में कहा गया है कि करीब 3.2 अरब साल पहले धरती पहली बार समुद्र से बाहर निकली थी और जो इलाका सबसे पहले निकला था, वह झारखंड का सिंहभूम इलाका हो सकता है। इस शोध में भारत, आस्ट्रेलिया और अमेरिका के भूवैज्ञानिक शामिल थे। वैज्ञानिकों ने पाया कि सिंहभूम के बलुआ पत्थर में प्राचीन नदी चैनल, ज्वार भाटा और तट करीब 3.2 अरब साल पुराने होने के भूगर्भीय संकेत मिले हैं। इससे पता चलता है धरती का यही इलाका सबसे पहले समुद्र से बाहर निकला था।

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