डा मोहम्मद जाकिर
2000 साल की विरासत : रातू किला
लगभग 2000 वर्ष पूर्व आदिवासी राजा मंदरा मुंडा के दत्तक पुत्र फणिमुकुट राय से नागवंशी राजवंश की शुरुआत हुई। सूतियाम्बे से शुरू होकर चुटिया, खुखरा, डोईसा/नवरत्नगढ़ और पालकोट होते हुए अंतिम राजधानी रातू गढ़ (रातू किला) बनी। लंदन के बकिंघम पैलेस की तर्ज पर 61वें नागवंशी शासक महाराजा प्रताप उदय नाथ शाहदेव ने 1899–1901 के दौरान कोलकाता के ठेकेदार से 103 कमरों वाले इस दो मंजिला किले का निर्माण कराया। 22 कट्ठे में फैले इस किले का मुख्य 'सिंह द्वार' दो शेरों और नाग की प्रतिमा से सुसज्जित है। किले में कुलदेवी माँ चिंतामणि मंदिर, जर्जर कचहरी, धूप घड़ी, पैर से बजने वाला हारमोनियम, 62वें राजा लाल चिंतामणि शरण नाथ शाहदेव की राजनीतिक तस्वीरें और पक्षी उद्यान स्थित हैं। यहां दुर्गा पूजा, नागपंचमी और सरहुल जैसे पर्व धूमधाम से मनाए जाते हैं। यह किला नागवंशी राजवंश की 2000 वर्षीय समृद्ध विरासत का प्रतीक है।
पलामू का शाहपुर किला
पलामू में कोयल नदी के तट पर स्थित शाहपुर किला चेरो वंश के समृद्ध इतिहास का प्रतीक है। 17-18वीं शताब्दी में राजा मेदनी राय के वंशजों द्वारा निर्मित यह किला करीब 3 एकड़ में फैला है और स्थानीय स्तर पर 'चलानी किला' नाम से भी जाना जाता है। 1771 में पलामू पर अंग्रेजों का अधिकार होने के बाद भी यह राजाओं का निवास स्थान बना रहा। स्थापत्य दृष्टि से इस किले में पतली ईंटों और सुर्खी-चूने का प्रयोग हुआ है। ऊंचे दरवाज़ों, पत्थर के चौखटों और घुमावदार सीढ़ियों से सुसज्जित इस इमारत के बुर्ज में फायरिंग छिद्र बने हैं। जनश्रुति के अनुसार, यहां से 30 किमी दूर पलामू किला तक एक गुप्त सुरंग भी थी। 1857 की क्रांति का साक्षी रहा यह किला वर्तमान में बदहाली झेल रहा है। यद्यपि यहां राजा मेदिनी राय, चुड़ामन राय (1783–1813) और चंद्रावती देवी की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं, लेकिन पुरातात्विक महत्व घोषित होने के बावजूद जीर्णोद्धार कार्य अधूरा है।
पिठोरिया किले का रहस्यमय अतीत
रांची से 20 किमी दूर स्थित परगनैत गढ़ किले का खंडहर अपने रहस्यमय अतीत की गाथा गाता है। मुगल शैली में निर्मित ईंट और सुर्खी-चूने का यह दो मंजिला किला 100 कमरों, खूबसूरत नक्काशी, तालाब और शिव मंदिर से सुसज्जित था। 18वीं सदी में खजाना मिलने पर जगतपाल, जनक और जगदेव सिंह ने इसका निर्माण कराया और वे जमींदार बन गए। अंग्रेजों के प्रति वफादारी के लिए जगतपाल सिंह को 'रायबहादुर' का खिताब मिला। 1857 के विद्रोह के दौरान जगतपाल ने स्वतंत्रता सेनानी ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव की मुखबिरी कर उन्हें पकड़वाया। मान्यता है कि इस विश्वासघात के बाद किले पर बिजली गिरने का सिलसिला शुरू हुआ, जिससे पूरा वंश समाप्त हो गया और किला खंडहर बन गया। वैज्ञानिक जहां इसका कारण पठार, पेड़ों की अधिकता और लौह अयस्क को मानते हैं, वहीं स्थानीय लोग इसे ठाकुर शाहदेव के श्राप का परिणाम मानते हैं।
बादम किला
रामगढ़ राज्य की स्थापना 1368 ई में बाघदेव सिंह ने अपने भाई सिंहदेव के साथ मिलकर की थी। छोटानागपुर राजा से अनबन के बाद उन्होंने करणपुरा के राजा को हराकर 21 परगनों को जीता और सिसिया को पहली राजधानी बनाया। बाद में राजधानी उरदा और बादम होते हुए रामगढ़ स्थानांतरित हुई। वंश के छठे राजा हेमंत सिंह (1604–1661 ई०) ने बादम में ऊंचे स्थान पर दो मंजिला भव्य किला बनवाया, जिसके निर्माण में पत्थरों, पटनिया ईंटों, सुर्खी-चूने, गुड़ व उड़द का प्रयोग हुआ। इसका मुख्य 'सिंह दरवाजा' आज भी जर्जर अवस्था में मौजूद है। राजा ने पास ही शिव मंदिर बनवाए। 1670 ई में सुरक्षा कारणों से राजधानी रामगढ़ स्थानांतरित कर दी गई।
जरियागढ़ का किला
नागवंशियों का लगभग 2000 वर्ष पुराना इतिहास सुतियाम्बे से शुरू होकर चुटिया, डोयसागढ़, नवरतन गढ़, खुखरा गढ़, पालकोट और रातू गढ़ तक फैला। जेष्ठाधिकार परंपरा के तहत बड़ी संपत्ति बड़े पुत्र को मिली, जबकि द्वितीय पुत्र कुंवर हरिनाथ शाहदेव को जरियागढ़ की रियासत प्राप्त हुई। उनके पुत्र ठाकुर इंद्र नाथ शाहदेव ने गोविंदपुर के बजाय जरियागढ़ को अपनी राजधानी बनाया। रांची से 50 किमी दूर (खूंटी) स्थित 6 एकड़ का जरियागढ़ कभी 700 गांवों वाले 'सोनपुर' का केंद्र था। परिसर में 1925 का मुख्य द्वार, खपरैल दरबार हॉल, मंदिर, कुआं और नागदेवता के प्रतीक मौजूद हैं। नागवंशी मान्यतानुसार मिट्टी के घरों में नाग रहते हैं, इसलिए यहां मिट्टी के घर भी बनाए जाते थे। ठाकुर महेंद्र नाथ शाहदेव ने यहां 1000 एकड़ का निजी जंगल बसाया था (जिसे 1968 में सरकार को सौंप दिया गया) और जयपाल सिंह मुंडा के आंदोलन को आर्थिक सहयोग दिया।
नारायणपुर किला
रांची से लगभग 119 किमी और लातेहार मुख्यालय से 11 किमी दूर नवागढ़ गांव की पहाड़ी पर स्थित नारायणपुर किला (नवागढ़ किला) चेरो राजाओं की ऐतिहासिक धरोहर है। 16वीं शताब्दी में निर्मित लगभग एक एकड़ में फैला यह बहुमंजिला किला कर संग्रह, सीमा निगरानी और राजा के विश्राम हेतु इस्तेमाल होता था। पतली ईंटों और 2 फीट चौड़ी दीवारों वाले इस किले के हर कमरे में 8 फीट ऊंचे दो दरवाज़े थे। जल आपूर्ति के लिए बना बड़ा कुआं अब ढह चुका है। जनश्रुति के अनुसार यहां पलामू किला तक जाने वाली एक गुप्त सुरंग भी थी। मुगलों से सुरक्षा के लिए बना था लालगढ़ रांची से लगभग 95 किमी दक्षिण-पश्चिम में स्थित पालकोट 18वीं शताब्दी में नागवंशी राजा यदुनाथ शाह द्वारा मुगलों से सुरक्षा के लिए बनाई गई राजधानी थी। रीवा की राजकुमारी से विवाह के उपरांत यहां हाथी पर लाकर दसभुजी माता ('नहरी देवी') की स्थापना की गई, जिससे नागवंश में दुर्गा पूजा की शुरुआत हुई। इसके लिए लालगढ़ में भव्य दो मंजिला नया महल (52 कमरे, 53 दरवाजे) और मंदिर बनवाया गया। हालांकि, इष्ट देवी भगवती के रुष्ट होने के कारण राजपरिवार को पुनः पालकोट के पुराने महल लौटना पड़ा, जिसके बाद लालगढ़ उपेक्षित होकर खंडहर में बदल गया। स्थापत्य की दृष्टि से साधारण दिखने के बावजूद इस ऐतिहासिक धरोहर का अतीत अत्यंत गौरवशाली है। वर्तमान में भी चैत्र व आश्विन नवरात्रि में राजपरिवार यहां पूजा के लिए आता है। यहां स्थित दसभुजी माता का मंदिर आम श्रद्धालुओं के लिए सदैव खुला रहता है, जबकि इष्ट देवी के दर्शन का अधिकार केवल राजा को है।
दामोदर के तट पर बना रामगढ़ किला
दामोदर नद के तट पर स्थित रामगढ़ किला (झारखंड) रामगढ़ राज्य के स्वाभिमान और बलिदान का प्रतीक है। 17वीं शताब्दी में सातवें राजा राम सिंह द्वितीय द्वारा निर्मित इस किले को मुगलों से सुरक्षा हेतु 1670 ई० में राजधानी 'बादम' से स्थानांतरित कर रामगढ़ में स्थापित किया गया था। काली व लाल चट्टानों, चूने-सुर्खी से बने इस किले में गुप्त सुरंगें भी थीं। 1772 ई० में महाराजा मुकुंद सिंह के शासनकाल में अंग्रेजों ने जागीरदार ठाकुर तेज सिंह के साथ मिलकर किले पर भीषण तोपबारी की। युद्ध में किला ध्वस्त हो गया और पराधीनता से बचने के लिए महाराजा ने गंगा नदी में कूदकर प्राणों की आहुति दे दी। वर्तमान में यह खंडहर आस्था का केंद्र है, जहां 'गढ़ बाबा' (बलिदत्त बालक) और वीर दासो मुंडा की पूजा होती है। उपेक्षा के कारण अब केवल मोटी पत्थर की दीवारें और प्रवेश द्वार के अवशेष ही बचे हैं।
चेरों की विरासत: पलामू किला
झारखंड की महत्वपूर्ण पुरातात्विक धरोहर 'पलामू किला' मेदिनीनगर से 45 किमी दूर औरंगा और कोयल नदी के संगम पर स्थित है। यहांघने जंगलों के बीच दो जुड़वा किले हैं—पुराना और नया किला। मैदानी भाग में स्थित पुराने किले का निर्माण 1562 ई० में रक्षेल वंश द्वारा धूप में पकी ईंटों और सुर्खी-चूने से कराया गया था। 3 वर्ग किमी में फैले इस किले में 25 फीट ऊंची व 7–8 फीट चौड़ी दीवारें, 'सिंह द्वार', दो मंजिला दरबार, जलसेतु और वाच टावर शामिल हैं। चेरो राजा मेदिनी राय ने 1673 ई० में 2 किमी दूर पहाड़ी पर 'नया किला' बनवाया। इसका मुख्य आकर्षण 80 फीट ऊंचा 'नागपुरी गेट' है, जो सफेद-पीले बलुआ पत्थर से निर्मित भारत-इस्लामी वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है। इस पर फारसी व देवनागरी शिलालेख और सुंदर नक्काशी है। रकशेल, चेरो, मुगल व ब्रिटिश काल का साक्षी रहा यह परिसर आज जर्जर स्थिति में भी अपनी ऐतिहासिक भव्यता समेटे हुए है।
पद्मा किला और हवा महल
हजारीबाग से लगभग 20 किमी उत्तर में स्थित पद्मा किला (लक्ष्मी पैलेस) और हवा महल रामगढ़ राज की ऐतिहासिक वास्तुकला के बेजोड़ उदाहरण हैं। 1368 ई में बाघदेव व सिंहदेव द्वारा स्थापित रामगढ़ राज्य की राजधानी 19वीं सदी के अंत में पद्मा स्थानांतरित हुई थी। महाराजा राम नारायण सिंह बहादुर (1866-1899) द्वारा निर्मित पद्मा पैलेस इंडो-सरसेनिक शैली, मुगल मेहराबों और पश्चिमी वास्तुकला के कोरिंथियन स्तंभों का अनूठा संगम है। परिसर में स्थित दो मंजिला 'हवा महल' में विशाल गुंबद, अलंकृत मेहराब और नक्काशीदार द्वार हैं। बुलू इमाम की पुस्तक के अनुसार इसे 'खोवर घर' (दुल्हन कक्ष) माना जाता था, जहां जाने के लिए किले से 1.5 किमी लंबा भूमिगत मार्ग था। परिसर में रानी पोखर और असुर-पोखर स्थित हैं। कभी सैकड़ों हाथियों और घोड़ों की शानो-शौकत का केंद्र रहा यह परिसर आज उपेक्षा के कारण जर्जर अवस्था में है।
नवरतन गढ़ किला
रांची से लगभग 40 मील दक्षिण-पश्चिम (सिसई, गुमला) स्थित नवरत्न गढ़ नागवंशी स्थापत्य का उत्कृष्ट उदाहरण है। 17वीं शताब्दी में महाराजा दुर्जन शाह द्वारा मुगल शैली में निर्मित यह किला चूना-सुर्खी, लाहौरी ईंटों और पत्थरों से बना है। इसे भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया गया है। मुख्य परिसर में चार मंजिला राजा महल (मूलतः पांच मंजिला), रानी महल, कचहरी, भूल-भुलैया, कमल सरोवर और जगन्नाथ मंदिर स्थित हैं। जगन्नाथ मंदिर (संवत 1739) से 3 किमी दूर रामनगर (मौसी बाड़ी) तक रथ यात्रा जाती थी। सुरक्षा हेतु यह तीन ओर भूप, शिव व बैल सागर नदियों और संतरी पोस्ट से घिरा था। दुर्जन शाह के बाद महाराजा देव शाह, राम शाह और रघुनाथ शाह (1704–1764) के शासनकाल तक यह नागवंशियों की राजधानी रहा, जिसके बाद राजधानी पालकोट स्थानांतरित हो गई।

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