आदिवासी समाज में मांदर, तमाक, ढमसा, बांसुरी, रणसिंघा, सकुआ, आकाम, मदनभेड़ जैसे वायु-आधारित (Aerophone) वाद्य तथा घुंघरू और झाल जैसे घनवाद्य (Idiophone) प्राचीन काल से प्रचलित रहे हैं। किंतु इन सभी के बीच बनाम का स्थान विशेष है, क्योंकि यह तार आधारित (String Instrument/Chordophone) वाद्य है। संगीत विज्ञान की दृष्टि से तारवाद्यों का विकास किसी भी सभ्यता की उन्नत संगीत परंपरा का संकेत माना जाता है। इसी कारण बनाम को जनजातीय संगीत संस्कृति का सर्वोच्च प्रतिनिधि कहा जा सकता है। इसकी बनावट और वादन शैली आधुनिक वायलिन तथा अन्य पश्चिमी तारवाद्यों की याद दिलाती है, यद्यपि इसका विकास पूरी तरह स्थानीय आदिवासी परंपरा के भीतर हुआ।

बनाम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे एक ही लकड़ी के टुकड़े को तराशकर बनाया जाता है। पारंपरिक रूप से इसके निर्माण में स्थानीय वृक्षों की लकड़ी का उपयोग किया जाता है। आपके क्षेत्र में कई कारीगर इसे सतपर्णी (सप्तपर्णी) की लकड़ी से भी बनाते रहे हैं। अनुनादक (रेज़ोनेटर) भाग पर पशु-चर्म चढ़ाया जाता है और तारों को सावधानीपूर्वक स्थापित किया जाता है। पूरा वाद्य हाथ के साधारण औजारों से तैयार किया जाता है। यह जनजातीय कारीगरों की अद्भुत हस्तकौशल और तकनीकी दक्षता का प्रमाण है।
संताल समाज में बनाम केवल मनोरंजन का साधन नहीं रहा। यह लोकगीतों, धार्मिक अनुष्ठानों, पर्व-त्योहारों, आखड़ा संस्कृति और सामुदायिक जीवन का अभिन्न अंग रहा है। संताल लोकमान्यता के अनुसार बनाम की उत्पत्ति एक पौराणिक कथा से जुड़ी है और इसे ईश्वरीय वरदान माना जाता है। इस कारण यह वाद्य केवल संगीत का उपकरण नहीं बल्कि सांस्कृतिक आस्था और आध्यात्मिक पहचान का भी प्रतीक है।
झारखंड में बनाम के अनेक स्वरूप मिलते हैं। इनमें धोधरो बनाम, केंदरी (केंदरीत) बनाम, फेंटोर बनाम, झा फेंटोर बनाम तथा किदरी बनाम प्रमुख हैं। इनकी बनावट और वादन शैली में भिन्नता पाई जाती है। फेंटोर बनाम और झा फेंटोर बनाम को प्रायः पिक (Plectrum) से बजाया जाता है, जबकि धोधरो बनाम और किदरी बनाम को धनुष (Bow) की सहायता से बजाया जाता है। यही विविधता जनजातीय संगीत परंपरा की समृद्धि और प्रयोगशीलता को दर्शाती है।
एक समय था जब संताल परगना के अनेक गांवों में बनाम की मधुर ध्वनि सहज रूप से सुनाई देती थी। प्रत्येक गांव में ऐसे कलाकार मिल जाते थे जो स्वयं बनाम बनाते भी थे और बजाते भी थे। संगीत का ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक परंपरा से स्थानांतरित होता था। किंतु आधुनिकता, शहरीकरण और बदलती जीवनशैली के प्रभाव से यह परंपरा तेजी से कमजोर होने लगी। केंदरी बनाम का स्थान धीरे-धीरे वायलिन ने ले लिया, फेंटोर बनाम की जगह गिटार ने और धोधरो बनाम आज अधिकांशतः संग्रहालयों या विरले कलाकारों तक सीमित होकर रह गया है। नई पीढ़ी में इस वाद्य को सीखने वालों की संख्या लगातार घट रही है, जिससे इसके अस्तित्व पर संकट उत्पन्न हो गया है।
यह केवल एक वाद्य यंत्र के लुप्त होने का प्रश्न नहीं है, बल्कि इसके साथ एक संपूर्ण सांस्कृतिक ज्ञान, लोककला, पारंपरिक शिल्प और जनजातीय पहचान भी समाप्त होने का खतरा है। किसी भी समाज की संस्कृति उसके भौतिक साधनों से नहीं, बल्कि उसकी परंपराओं और ज्ञान प्रणालियों से जीवित रहती है। बनाम उसी सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण अंग है।
इसी संकट को समझते हुए एसआरवाईईए (SRYEA – Society for Rural and Youth Educational Advancement) ने वर्षों तक संताल परगना के दूरस्थ गांवों में भ्रमण कर पारंपरिक बनाम निर्माताओं और वादकों की खोज की। संस्था ने विलुप्त होती इस कला का दस्तावेजीकरण किया, कलाकारों को प्रोत्साहित किया, नई पीढ़ी को इससे जोड़ने का प्रयास किया तथा इस विरासत को राष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए निरंतर कार्य किया।
इन सतत प्रयासों का महत्वपूर्ण परिणाम यह रहा कि झारखंड बनाम को भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication – GI) का दर्जा प्राप्त हुआ। यह उपलब्धि केवल एक उत्पाद का पंजीकरण नहीं, बल्कि झारखंड की जनजातीय सांस्कृतिक अस्मिता की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर औपचारिक मान्यता है। GI टैग यह प्रमाणित करता है कि बनाम केवल एक वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि झारखंड की विशिष्ट पारंपरिक सांस्कृतिक धरोहर है, जिसकी मौलिकता और पहचान इसी भूभाग तथा यहां के आदिवासी समुदायों से जुड़ी हुई है।
आज आवश्यकता है कि बनाम को केवल संग्रहालयों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, संगीत संस्थानों, सांस्कृतिक महोत्सवों और पर्यटन कार्यक्रमों से जोड़ा जाए। यदि युवाओं को इसके निर्माण और वादन का प्रशिक्षण दिया जाए, कलाकारों को सम्मानजनक बाजार उपलब्ध कराया जाए तथा सांस्कृतिक नीतियों में इसे उचित स्थान मिले, तो यह विलुप्त होती परंपरा पुनः जीवंत हो सकती है।
बनाम की मधुर ध्वनि केवल संगीत नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने वाली जनजातीय सभ्यता की आत्मा का स्वर है। इसका संरक्षण केवल एक वाद्य यंत्र को बचाना नहीं, बल्कि भारत की अमूल्य सांस्कृतिक विविधता, आदिवासी ज्ञान परंपरा और झारखंड की गौरवशाली विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना है।

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