कुमार कृष्णन
सीमा रेखाएं देशों को बांटती हैं, संस्कृतियां नहीं। नक्शे पर खिंची एक रेखा भारत को नेपाल से अलग करती है, लेकिन मिथिला की स्मृतियों में ऐसी कोई रेखा नहीं है। जनकपुर पहुंचते ही यह बात सबसे अधिक स्पष्ट होती है। यहां अयोध्या से आई राम की बारात की स्मृति है, सीता की जन्मभूमि मिथिला की कथा है और जनक की विद्वत् परंपरा की छाया है। इसलिए जनकपुर केवल नेपाल का एक धार्मिक नगर नहीं, भारत और नेपाल के बीच सदियों से चले आ रहे सांस्कृतिक संबंधों का जीवंत दस्तावेज है।
नेपाल सरकार ने अब जनकपुरधाम के प्रसिद्ध जानकी मंदिर और उसके आसपास के क्षेत्र को संरक्षित स्मारक क्षेत्र घोषित किया है। संस्कृति, पर्यटन तथा नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने राजपत्र में इसकी सूचना प्रकाशित की है। मंत्रिपरिषद ने प्राचीन स्मारक संरक्षण ऐन, 2013 के तहत यह निर्णय लिया। सरकार का घोषित उद्देश्य जानकी मंदिर को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने की दिशा में आगे बढ़ना है। जानकी मंदिर पहले से ही यूनेस्को की अस्थायी सूची में शामिल है। इसलिए संरक्षित स्मारक क्षेत्र की घोषणा को केवल प्रशासनिक फैसला मानना उसके व्यापक महत्व को कम करके देखना होगा।
विरासत बचाने का अर्थ केवल किसी इमारत को बचाना नहीं होता। इमारत के साथ उसकी स्मृतियां, आसपास का भू-दृश्य, रास्ते, जलस्रोत, लोकपरंपराएं और लोगों का जीवन भी बचाना होता है। जनकपुर की चुनौती इसलिए बड़ी है कि यहां जानकी मंदिर के साथ पूरा सांस्कृतिक परिदृश्य जुड़ा हुआ है। नेपाल सरकार ने संरक्षित स्मारक क्षेत्र की चारों दिशाओं की सीमाएं भी तय की हैं। पूर्व में भानु चौक, कदम चौक, जिला प्रशासन कार्यालय और मालपोत कार्यालय से होते हुए परिक्रमा पथ की सड़क, पश्चिम में भमरापुरा चौक, याज्ञवल्क्य संस्कृत माध्यमिक विद्यालय, ज्ञानकूप और हनुमान मंदिर से जुड़ा क्षेत्र, उत्तर में राजा जनक स्मारक, मधेस प्रदेश भवन और मिल्स एरिया से भानु चौक तक का परिक्रमा पथ और दक्षिण में विद्यापति स्मारक से भमरापुरा चौक तक का क्षेत्र इसके दायरे में रखा गया है। यह सीमा-निर्धारण बताता है कि संरक्षण को मंदिर की दीवारों तक सीमित नहीं रखा गया है।

यह जरूरी भी है। किसी तीर्थ की पहचान उसके गर्भगृह में ही नहीं होती। उसकी पहचान उस रास्ते में भी होती है जिस पर श्रद्धालु चलते हैं, उस तालाब में भी होती है जिसमें धार्मिक स्मृतियां प्रतिबिंबित होती हैं और उन लोकगीतों में भी होती है जिन्हें पीढ़ियां एक-दूसरे को सौंपती हैं। जनकपुर में मंदिरों के साथ तालाबों और कुंडों की एक लंबी परंपरा है। गंगासागर, धनुषसागर और रत्नसागर जैसे जलस्रोत यहां की धार्मिक और सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा हैं। अगर मंदिर सुरक्षित रहे और उसके आसपास का जल-संसार नष्ट हो जाए, तो संरक्षण अधूरा ही रहेगा।
जानकी मंदिर की स्थापत्य भव्यता अपने आप में असाधारण है। उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में टीकमगढ़ राजपरिवार की महारानी वृषभानु कुमारी ने इसके निर्माण का संकल्प लिया था। मंदिर को लोकप्रिय रूप से ‘नौलखा मंदिर’ कहा जाता है। निर्माण में बड़ी धनराशि लगी और कई वर्षों तक काम चलता रहा। नेपाल पर्यटन बोर्ड के अनुसार मंदिर का निर्माण 1910 में पूरा हुआ। मंदिर की वास्तुकला में राजपूत और अन्य स्थापत्य प्रभावों का समन्वय दिखाई देता है। उसकी भव्यता जनकपुर आने वाले किसी भी व्यक्ति को ठिठकने पर मजबूर करती है। लेकिन जानकी मंदिर की असली भव्यता उसकी ऊंची दीवारों में नहीं, उससे जुड़ी स्मृति में है। सीता और राम की कथा ने इस नगर को भारतीय सांस्कृतिक चेतना में एक विशिष्ट स्थान दिया है। धार्मिक परंपरा में जनकपुर वह भूमि है जहां राजा जनक की पुत्री सीता का स्वयंवर हुआ और राम ने शिवधनुष तोड़ा। इसी स्मृति के साथ विवाह पंचमी का उत्सव आज भी जनकपुर को भारत और नेपाल के श्रद्धालुओं से भर देता है।
विवाह पंचमी में अयोध्या से राम बारात का जनकपुर पहुंचना महज धार्मिक रस्म नहीं है। यह एक ऐसी सांस्कृतिक यात्रा है जिसकी कोई अंतरराष्ट्रीय सीमा नहीं। दूल्हा अयोध्या का और दुल्हन मिथिला की—लेकिन दोनों की कथा किसी एक देश की संपत्ति नहीं। यही जनकपुर की सबसे बड़ी सांस्कृतिक शक्ति है। मिथिला का यह संबंध केवल रामायण की कथा तक सीमित नहीं है। राजा जनक भारतीय दार्शनिक परंपरा में भी महत्वपूर्ण नाम हैं। उपनिषदों की परंपरा में जनक और याज्ञवल्क्य के संवाद भारतीय चिंतन की उस धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसमें सत्ता और ज्ञान का संवाद दिखाई देता है। जनकपुर की स्मृति में धार्मिकता और बौद्धिकता इसलिए अलग-अलग खांचे नहीं हैं। यहां आस्था के साथ ज्ञान की परंपरा भी चलती है। यही कारण है कि जनकपुर को केवल धार्मिक पर्यटन के केंद्र के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह सांस्कृतिक पर्यटन का भी महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां आने वाला व्यक्ति मंदिर देखता है, तालाब देखता है, विवाह मंडप देखता है, मिथिला की कला देखता है और लोकजीवन में राम-सीता की उपस्थिति महसूस करता है। तीर्थयात्रा यहां इतिहास, कला और लोकसंस्कृति से मिलती है।
भारत से जनकपुर की निकटता इस संबंध को और जीवंत बनाती है। बिहार का जयनगर रेल नेटवर्क से भारत के अनेक हिस्सों से जुड़ा है और वहां से जनकपुरधाम तक रेल सेवा उपलब्ध है। सीतामढ़ी-भिट्ठामोड़-जलेश्वर मार्ग भी जनकपुर तक पहुंचने का महत्वपूर्ण रास्ता है। सड़क और रेल संपर्क ने उस सांस्कृतिक यात्रा को आधुनिक साधन दे दिया है जो सदियों से लोगों की स्मृति में चलती रही है। लेकिन आधुनिक संपर्क केवल सुविधा नहीं लाता, दबाव भी लाता है। जैसे-जैसे तीर्थयात्रियों और पर्यटकों की संख्या बढ़ेगी, वैसे-वैसे होटल, दुकान, वाहन, पार्किंग और नए भवनों की जरूरत बढ़ेगी। यहीं संरक्षण की असली परीक्षा होगी।
विरासत को बचाने के नाम पर शहर को जड़ नहीं बनाया जा सकता और विकास के नाम पर उसकी आत्मा भी नहीं मिटाई जा सकती। दोनों के बीच संतुलन ही जनकपुर के भविष्य की कसौटी होगा। संरक्षित स्मारक क्षेत्र की घोषणा इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसके बाद मंदिर और आसपास के क्षेत्र में निर्माण तथा अन्य गतिविधियों पर संरक्षण संबंधी निर्धारित मानदंड लागू होंगे। यह व्यवस्था तभी सार्थक होगी जब उसका उद्देश्य स्थानीय जीवन को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि विरासत और विकास के बीच संतुलन बनाना हो। विश्व धरोहर का दर्जा मिलना किसी स्मारक के लिए सम्मान जरूर है, लेकिन उससे पहले और उसके बाद जिम्मेदारियां भी बढ़ती हैं।
यूनेस्को की अस्थायी सूची में जानकी मंदिर का होना अंतिम उपलब्धि नहीं है। इसके लिए संरक्षण, प्रबंधन, प्रामाणिकता, स्थानीय सहभागिता और दीर्घकालिक योजना जैसे कई पक्ष महत्वपूर्ण होंगे। मंदिर के साथ जुड़े सांस्कृतिक परिदृश्य को बचाना इस प्रक्रिया की सबसे बड़ी जरूरतों में से एक है। इसमें स्थानीय समाज की भागीदारी अनिवार्य है। किसी विरासत को सरकारी आदेश से जीवित नहीं रखा जा सकता। जिन लोगों के जीवन में वह विरासत रोजमर्रा की तरह मौजूद है, उन्हें उसका संरक्षक बनाना होगा। मंदिर के महंत, साधु-संत, स्थानीय परिवार, कारीगर, कलाकार, दुकानदार, तीर्थ-सेवा से जुड़े लोग और सामान्य नागरिक—सभी की भूमिका होगी। संरक्षण यदि केवल सरकारी फाइलों की भाषा बन गया तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। जनकपुर की अमूर्त विरासत भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। मिथिला के लोकगीत, विवाह संस्कार, चित्रकला, धार्मिक अनुष्ठान और लोककथाएं इस शहर की आत्मा हैं।
जानकी मंदिर को विश्व धरोहर बनाने की कोशिश में इन जीवंत परंपराओं को केवल पर्यटन के प्रदर्शन में बदल देने के बजाय उनकी स्वाभाविकता बचाना भी जरूरी है। भारत और नेपाल के संबंधों की चर्चा अक्सर राजनीति, व्यापार, सुरक्षा और सीमा के संदर्भ में होती है। लेकिन दोनों देशों के रिश्ते की सबसे गहरी परत शायद राजनीति से बाहर है। परिवारों के रिश्ते हैं, भाषाओं की निकटता है, पर्व-त्योहारों की साझेदारी है और तीर्थों की आवाजाही है। जनकपुर इसी सांस्कृतिक रिश्ते का सबसे सुंदर प्रतीक है। अयोध्या राम की जन्मभूमि की धार्मिक स्मृति से जुड़ी है और जनकपुर सीता के मायके की स्मृति से। दोनों को जोड़ने वाली कथा किसी आधुनिक राजमार्ग या कूटनीतिक समझौते से पहले की है। इसलिए रामायण सर्किट जैसी योजनाओं का वास्तविक अर्थ तभी सामने आएगा जब वे केवल सड़क और बस सेवा तक सीमित न रहकर साझा सांस्कृतिक विरासत की समझ को मजबूत करें।
विकास के इस दौर में तीर्थों के सामने एक विचित्र संकट है। जितने अधिक लोग आते हैं, उतना ही अधिक खतरा भी पैदा होता है कि तीर्थ पर्यटन-स्थल में बदल जाए। होटल बढ़ें, बाजार बढ़ें, वाहन बढ़ें, लेकिन तीर्थ की शांति घट जाए—तो विकास का अर्थ क्या रह जाएगा? जनकपुर को इस प्रश्न का उत्तर अपने संरक्षण मॉडल से देना होगा। जानकी मंदिर को संरक्षित स्मारक क्षेत्र घोषित करने के फैसले को इसलिए एक अवसर की तरह देखा जाना चाहिए। अवसर इस बात का कि जनकपुर अपनी ऐतिहासिक पहचान को आधुनिक जरूरतों के साथ जोड़ सके। ऐसा जनकपुर, जहां मंदिर सुरक्षित हों, तालाब जीवित हों, पुराने रास्ते बचें, स्थानीय कला फलती रहे, तीर्थयात्री सुविधापूर्वक आएं और स्थानीय लोगों की रोजी-रोटी भी मजबूत हो।
विश्व धरोहर की सूची में किसी स्थान का नाम दर्ज होना इतिहास का अंत नहीं, एक नई जिम्मेदारी की शुरुआत है। जनकपुर के लिए भी असली सवाल यही होगा कि क्या वह अपनी स्मृति को आने वाली पीढ़ियों तक उसी जीवंतता से पहुंचा पाएगा, जिस जीवंतता से उसे पिछली पीढ़ियों ने सौंपा है। जनकपुर को किसी एक देश की सीमाओं में बांधकर देखना उसके अर्थ को छोटा करना है। यह मिथिला की सांस्कृतिक स्मृति का नगर है। यह सीता और राम के रिश्ते की स्मृति का नगर है। यह भारत और नेपाल के बीच उस आत्मीयता का नगर है, जिसकी भाषा राजनीति से अधिक पुरानी है। नक्शे पर सीमा बनी रहेगी। राष्ट्र अपनी-अपनी संप्रभुता के साथ रहेंगे। लेकिन संस्कृति की अपनी यात्राएं होती हैं। वे पासपोर्ट नहीं मांगतीं, वीजा नहीं मांगतीं। वे स्मृति के रास्ते चलती हैं और पीढ़ियों को जोड़ती हैं। जनकपुर इसी सांस्कृतिक यात्रा का पड़ाव है—या शायद वह पुल है, जिस पर चलते हुए भारत और नेपाल एक-दूसरे को पड़ोसी नहीं, अपने साझा अतीत के सहयात्री के रूप में पहचानते हैं। जनकपुर की यही सबसे बड़ी पहचान है—जहां सीमा खत्म होती है, संस्कृति शुरू होती है।

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