जब किसी समाज के पास अपना लिखित इतिहास नहीं होता, तब उसकी स्मृतियां लोककथाओं, गीतों और चित्रों में जीवित रहती हैं। झारखंड के संताल परगना की जादोपटिया चित्रकला इसी सांस्कृतिक परंपरा का अद्भुत उदाहरण है। सदियों तक इस चित्रकला ने संताल समाज की उत्पत्ति, जीवन-दर्शन, पर्व-त्योहार, प्रकृति के साथ उसके संबंध और मृत्यु के बाद की मान्यताओं को सुरक्षित रखने का कार्य किया। यही कारण है कि जादोपटिया केवल एक लोकचित्रकला नहीं, बल्कि संताल सभ्यता का दृश्य इतिहास मानी जाती है।
विश्व के अनेक देशों, विशेषकर पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशिया में स्क्रॉल पेंटिंग (पट्ट चित्र) की समृद्ध परंपरा रही है, किंतु झारखंड की जादोपटिया चित्रकला अपनी विषयवस्तु और सांस्कृतिक आधार के कारण सबसे अलग पहचान रखती है। इसका संपूर्ण कथानक संताल समुदाय के मिथकों, लोकविश्वासों और सांस्कृतिक इतिहास पर आधारित है। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है।

संताल सृष्टि की कथा का दृश्य रूप
जादोपटिया चित्रकला का सबसे महत्वपूर्ण पट जोनमो पट माना जाता है। इसमें संताल समाज की उत्पत्ति की कथा चित्रित होती है। लोकमान्यता के अनुसार प्रारंभ में संपूर्ण पृथ्वी जलमग्न थी। मरांग बुरु (ठाकुर जिउ) ने पहले जलचर जीवों की सृष्टि की। इसके बाद दो पक्षियों की उत्पत्ति हुई, जिनके अंडों से प्रथम मानव युगल का जन्म हुआ। उनके निवास के लिए हिहिरी-पिपिरी नामक भूमि बनाई गई। वहीं उनका पालन-पोषण हुआ और आगे चलकर उनके वंश से संताल समाज के विभिन्न पारिस (गोत्र)—मुर्मू, हेम्ब्रम, मरांडी, टुडू, सोरेन, किस्कू आदि—का विस्तार हुआ। यह कथा आज भी संताल समाज की सांस्कृतिक पहचान का आधार मानी जाती है।
पर्व, प्रकृति और लोकजीवन का दस्तावेज
जादोपटिया चित्रों में केवल सृष्टि कथा ही नहीं, बल्कि करम, बाहा, सोहराय जैसे पर्व-त्योहार, कृषि, शिकार, लोकनृत्य, पारिवारिक जीवन और प्रकृति के साथ संताल समाज के गहरे संबंध को भी चित्रित किया गया है। चित्रों के बॉर्डर प्रायः ज्यामितीय आकृतियों से बनाए जाते हैं, जबकि मछली, कछुआ, केंचुआ, पक्षी, मोर, गाय, अंडा, करम वृक्ष और अन्य प्राकृतिक प्रतीकों का व्यापक प्रयोग इसकी विशिष्ट पहचान है।
मृत्यु के बाद के जीवन का चित्रण
जादोपटिया चित्रकला का सबसे अनूठा पक्ष मृत्यु के बाद के जीवन से जुड़ा है। जमपट और चाक्षुदान से संबंधित चित्रों में यह विश्वास व्यक्त किया जाता था कि मृत्यु के बाद आत्मा को दृष्टि प्राप्त कराने के लिए विशेष अनुष्ठान आवश्यक है। जादोपटिया चित्रकार मृतक का चित्र बनाते थे और धार्मिक अनुष्ठान के उपरांत चित्र में आंखें अंकित करते थे। इसे चाक्षुदान कहा जाता था। समय के साथ इस परंपरा को अंधविश्वास से जोड़कर देखा जाने लगा, जिसके कारण जादोपटिया कलाकारों की सामाजिक प्रतिष्ठा और आजीविका दोनों प्रभावित हुईं।
विलुप्ति की कगार से पुनर्जीवन की ओर
बदलते समय के साथ अनेक कलाकारों ने यह परंपरा छोड़ दी और दिहाड़ी मजदूरी करने लगे। एक समय ऐसा आया जब जादोपटिया चित्रकला लगभग विलुप्त होने की स्थिति में पहुंच गई। ऐसे कठिन दौर में कुछ सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं ने इसके संरक्षण का बीड़ा उठाया।
इन्हीं प्रयासों में सोसायटी फॉर रूरल एंड यूथ एजुकेशनल एडवांसमेंट (श्रेया) की भूमिका उल्लेखनीय रही है। संस्था वर्षों से संताल परगना के गांवों में जाकर जादोपटिया कलाकारों को खोजने, उनकी मौखिक परंपराओं का दस्तावेजीकरण करने, पुराने पटों का अध्ययन करने, नई पीढ़ी को प्रशिक्षण देने तथा इस कला को समकालीन पहचान दिलाने का कार्य कर रही है।
श्रेया के निदेशक अमित सिंह बताते हैं कि एक समय ऐसा था जब कलाकारों को ढूंढने के लिए गांव-गांव जाना पड़ता था। बाहरी लोगों पर उनका विश्वास नहीं था। धीरे-धीरे संवाद स्थापित हुआ, परंपराओं को समझा गया और कलाकारों के साथ मिलकर पुराने विषयों पर नए पट तैयार किए गए। संस्था ने डिज़ाइन विकास, प्रशिक्षण, विपणन और दस्तावेजीकरण के माध्यम से इस कला को केवल संग्रहालय की वस्तु नहीं, बल्कि रोजगार का माध्यम बनाने की दिशा में भी कार्य किया है।
अमित सिंह का कहना है कि जादोपटिया केवल एक चित्रकला नहीं, बल्कि संताल समाज की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत है। यदि इसे संरक्षित नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से जुड़ी एक अमूल्य धरोहर खो देंगी।
आज श्रेया के प्रयासों से जादोपटिया चित्रकला को नई पहचान मिल रही है। संस्था कलाकारों के साथ मिलकर इस कला के मानकीकरण, डिज़ाइन विकास, विपणन और संरक्षण पर कार्य कर रही है। साथ ही झारखंड की अन्य विलुप्तप्राय जनजातीय कलाओं के संरक्षण के लिए भी लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।
संताल परगना लंबे समय तक विकास और सांस्कृतिक पहचान के मामले में उपेक्षित रहा है। ऐसे में जादोपटिया जैसी लोककलाओं का संरक्षण केवल कला बचाने का अभियान नहीं, बल्कि एक पूरे समाज के इतिहास, संस्कृति और पहचान को भविष्य के लिए सुरक्षित रखने का प्रयास है। यदि यह अभियान निरंतर आगे बढ़ता रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब संताल परगना की जादोपटिया चित्रकला विश्व लोककला के मानचित्र पर अपनी विशिष्ट पहचान के साथ स्थापित होगी।

Comments (0)
Write first comment
Please Login to write comment