टोरांटो में इवान इलिच से कृष्ण कुमार की बातचीत, दिनमान, 23-29 जनवरी 1977
(इवान इलिच की पुस्तक 'मैडिकल नेमेसिस इस समय पश्चिम में काफ़ी चर्चित है। संस्थाई शिक्षा पद्धति और चरम यंत्रीकरण के बाद अब चिकित्सा प्रणाली इलिच की आलोचना का लक्ष्य बनी है। शिक्षा और यंत्रीकरण दोनों की तुलना में दवाई का इस्तेमाल अधिक व्यापक सामाजिक दिलचस्पी का विषय है। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं है कि आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था को तीखी आलोचना का शिकार बनाने के परिणामस्वरूप इलिच को स्वयं काफ़ी तीखी समीक्षाएं सुनने को मिल रही हैं. उन की नयी पुस्तक से उन की विवादास्पदता घटी नहीं, बढ़ी ही है और उन की आलोचना करने वालों के ख़ेमे में अब डाक्टर भी शामिल हो गये हैं। 15 अक्तूबर को टोरांटो में आयोजित व्यवसायी विशेषज्ञों की गोष्ठी में इलिच के ज़्यादातर श्रोता डाक्टर ही थे।)
डाक्टरी का धंधा उत्तरी अमेरिकी समाज में सबसे अधिक पैसा उगाने वाले धंधों में से एक है। उत्तर अमेरिका की औषधि निर्माता कंपनियों के दुनिया भर में व्यापार केंद्र है। विश्व भर में प्रचलित ऐलोपैथिक चिकित्सा विज्ञान पश्चिमी समाज के आधारों में से एक है। वह एक जीवन दर्शन है, महज विज्ञान नहीं स्वस्थ रहने के लिए आप को क्या क्या चाहिए, यह बताने के वास्ते अनगिनत विज्ञापन चौबीस घंटे उपभोक्ता के कानों और उस की आंखों पर अपनी ताक़त आजमाते रहते हैं। बीमारी और स्वास्थ्य दोनों ही अब चिकित्सा जगत की चिंता के विषय हैं। यदि आप बीमार हैं तो आप को ठीक करना डाक्टर और दवा विक्रेता का फ़र्ज़ है, पर यदि आप ठीक हैं तो भी आप को देखरेख और सलाह की ज़रूरत है, क्यों कि यह ज़रूरी नहीं कि आप सचमुच ठीक हों और यदि हों भी तो इस का क्या भरोसा कि ठीक इस वक़्त आप में कोई गड़बड़ी पैदा नहीं हो रही है?
ऐसी दुविधा से ग्रस्त पश्चिमी जगत के लिए इलिच की पुस्तक न बूझ साबित हो, यह स्वाभाविक है, बल्कि पश्चिमी जगत ही क्यों, भारत में भी आधुनिक चिकित्सा पद्धति का व्यावहारिक और मानसिक प्रभाव क्षेत्र इतना बढ़ चुका है कि इलिच की हमलावरी मुद्रा से भारतीय पाठक बहुत परेशान हुए बग़ैर नहीं समझ पाएंगे। मैंने एक ग्रामीण स्त्री को यह कहते सुना है, 'छह सुई लगी तब बचे'. सुई और छुरी की महिमा अब गांव गांव में पहुंच चुकी है, रंगबिरंगे द्रव और नन्हीं गोलियां देश के कोने कोने में स्वास्थ्य का संदेश पहुंचा रही हैं। टोना, टोटका और ओझा की झड़ाई के साथ-साथ जड़ी बूटियों का ज्ञान, भोजन और फलों की समझ और दैनिक आहार का पारंपरिक विज्ञान भी भारतीय जीवन से लुप्त हो रहे हैं। युवा डाक्टर का सफ़ेद कोट और आला नये भारतीय समाज के प्रतीक हैं। इलिच की पुस्तक इस वातावरण में शायद ही खप सके।
फिर भी यह सोच कर कि इलिच हिंदी पाठकों में अपरिचित नहीं है और अपनी पिछली दो पुस्तकों (डीस्कूलिंग सोसायटी और एनर्जी एनर्जी एंड इक्विटी) के कारण भारत में काफ़ी दिलचस्पी के विषय रहे हैं, मैंने व्यवसायी विशेषज्ञों की गोष्ठी के बाद उन से समय मांगा मुझे सुबह सात बजे का समय मिला, जो काफ़ी भयंकर था। लेकिन इस काम में दम है, यह सोच कर मैं किसी तरह उठ कर, दांत साफ़ किये बग़ैर अपने ऊनी दस्तानों में ठिठुरता हुआ इलिच के होटल पहुंच गया। नया टेप ख़रीदने का वक़्त नहीं मिला, इसलिए एक दोस्त से उधार मिला रविशंकर के संगीत से मंडित टेप अपने भरोसेमंद यंत्र में डाल कर संतोष किया। यंत्र ने मेरे भरोसे का आधा इस्तेमाल किया। इलिच की वार्त्ता टेप हो गयी, पर रविशंकर का सितार पृष्ठभूमि में बजता रहा। बाद में जब मैंने वार्त्ता काग़ज़ पर उतारी तो मुझे यह एक सटीक घटना प्रतीत हुई कि पश्चिम के एक उत्कट भारत प्रेमी के संवादों की पृष्ठभूमि में पश्चिमी ख्याति के स्वामी एक भारतीय संगीतज्ञ का वादन हो।
इलिच से सब से पहले मैंने यह जानना चाहा कि उनकी निगाह में उनके विचार केवल समृद्ध देशों के लिए सार्थक हैं, या एक ऐसे समाज के लिए भी जिसे अभी समृद्धि का स्वाद तक नहीं मिला है सीधा उत्तर देने की जगह इलिच ने मेरी समृद्धि विषयक धारणा पर टिप्पणी की और पूछा कि समृद्धि से मैं क्या मायने रखता हूं।मैंने अपना सवाल साफ़ करने के लिए कहना चाहा कि भारत के रुपये और डालर में यहां आ कर कोई संबंध नहीं दिखता। वह मेरी बात तोड़ते हुए बोले "और न ही कोई संबंध इस कमरे के जिसमें हम बैठे हैं, और उस घर के जिसमें मैं मैक्सिको में रहता हूं, बीच है। वह घर मिट्टी से बना है, जिसे मैंने और मेरे एक दोस्त ने बगीचे से निकाला और उस से सात सौ बीस ईंटे बनायीं फिर वह एक गधा ले कर पहाड़ पर गया और छप्पर बनाने के वास्ते बड़े पेड़ खींच कर लाया। ऐसे घर को बनाने में इस कमरे के फर्नीचर से भी कम ख़र्च लगता है और यह फर्नीचर भद्दा, भौंडा, महंगा है। होटल का फर्नीचर है, जब कि वह मकान जिसमें मैं रहता है बिना किसी ऊर्जा के बना है मेरा मतलब है बिना किसी प्राकृतिक ऊर्जा के ख़र्च के बना है। वह खूबसूरत है हमने गधे की लीद उसमें मिलायी है और गधे की लीद से मिट्टी की ईंट को अपार शक्ति मिलती है जिससे वह एक या दो पीढ़ी ज़्यादा चल सके और गधे की लीद फिर से इस्तेमाल हो सकती है..."
इलिच अपने मकान की स्मृति से एकदम से वापस लौटे। उनमें भावना में बह कर अचानक अपने तर्क पर लौट आने की प्रभावशाली क्षमता है। टोरांटो में के इस आलीशान होटल के जिस के फर्नीचर की ऐसी की तैसी वह शुरू में ही कर चुके थे, कमरे में डेढ़ घंटे की बातचीत के दौरान वह कई बार अपने अतीत में गये और हर बार अपने निष्कर्षों के लिए एक अतिरिक्त पाया ले कर लौटे। मेक्सिको में अब वह कुएर्नवाका में लगभग 'सेवा निवृत्त' जीवन जीते हैं. उन का अंतर संस्कृति केंद्र बंद हो चुका है।
मैक्सिको के गांव की शैली में जीने और इस संगोष्ठी के लिए सत्रहवीं मंजिल पर रहने में कोई संबंध नहीं है। इस कमरे को बनाने में हमारे गांव के एक हिस्से के मुक़ाबले ज़्यादा ख़र्च लगेगा और इस होटल में 580 कमरे हैं। फिर भी यह कितना असुविधाजनक है। आप खिड़की नहीं खोल सकते। आप केवल बासी हवा पा सकते हैं, जो इस आवाज़ के साथ बहायी जाती है, आप रात दिन किसी वक़्त इस आवाज़ से बच नहीं सकते, आप इसे बंद नहीं कर सकते. क्या तुम इसे ही समृद्धि कहते हो..?"
अपने प्रश्न का उत्तर एक प्रश्न की तरह मिलता देख कर मैं कुछ परेशान हुआ और मैंने तुरंत तय किया कि बात को कोई निश्चित प्रसंग देना चाहिए। मैंने कहा, समृद्धि के अनेक पहलू हैं. मैं आपकी नयी पुस्तक के संदर्भ में चिकित्सा के पहलू को लेकर सोच रहा था कि एक औसत, शिक्षित भारतीय के लिए अभी वह बहुत मुश्किल है कि वह पाश्चात्य चिकित्सा प्रणाली और बड़े अस्पतालों के ऊपर टिके अपने ताज़े मोह को तोड़ सके। भारत में लोगों का विश्वास पुरानी चिकित्सा शैलियों से हटता जा रहा है। एलोपैथी के अलावा जो अन्य चिकित्सा दर्शन हैं वे अपनी साख बढ़ा नहीं पा रहे।
"ऐसा क्यों हो रहा है?" इलिच ने अपने लंबे उत्तर की शुरुआत की, "हमें क्या करना चाहिए? मेरा ख़्याल है कि मैं लोक चिकित्सा में आस्था को बचाने की ख़ातिर कुछ सुझा सकता हूं। भारतीय जनता को यह बताइये कि अस्पतालों में क्या होता है। चौबीस वर्ष पहले न्यूयॉर्क में मुझे निजी रूप से एक गंभीर दिक़्क़त उठानी पड़ी थी, क्यों कि मैं पोर्टॉरिको के बच्चों के लिए एक गंदी बस्ती में काम कर रहा था और मैं उस गंदी बस्ती के जो मैनहैटन द्वीप (न्यूयॉर्क का केंद्रीय द्वीप) के उत्तरी भाग में थी, के बच्चों को उस समय संसार के सब से आधुनिक कहे जाने वाले अस्पताल— कोलंबिया प्रेस्बिटेरियन अस्पताल में ले गया। मैंने उन्हें दिखाया कि डाक्टर मरीजों के साथ क्या क्या करते हैं. मुझे बाल अपराधों से संबंधित अदालत में पेश होना पड़ा; इसलिए कि मैं बच्चों को भ्रष्ट करने की कोशिश कर रहा था. मैं उन्हें अस्पताल से जो एक मानव-भक्षी मशीन है। भयभीत कर रहा था..."
एक संक्षिप्त विराम के बाद इलिच अपनी बात ताज़े अतीत में ले आये । दो दिन से वे कैनाडा के डाक्टरों से जूझ रहे थे—तार्किक मुक़ाबलों में "... परसों शाम स्वागत समारोह के वक़्त कुछ डाक्टरों ने मुख से कहा कि मैं बहुत बुरा आदमी हूं, क्योंकि सामान्य आदमी सांत्वना चाहता है और यदि डाक्टर कहे कि वह सचमुच कुछ नहीं कर सकता तो कम से कम ऊंची कीमत पर सांत्वना तो बेच ही सकता है। मैंने कहा, डाक्टर ! यदि आप केवल यही करते तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन क्या आप फेफड़ों के सर्जन नहीं हैं? हां अवश्य. पर उसी क्षण तीन अन्य डाक्टरों ने मुझे रोक कर कहा, मिस्टर इलिच, आप ने बिल्कुल गलत व्यक्ति चुना है। मैंने कहा, क्या मतलब? एक बार जब उसने कह दिया है कि वह फेफड़ों का सर्जन है. मैं खुलेआम उससे यह कहूंगा कि मैं उससे कुछ दूर रह कर बात करूंगा—ठीक उन्हीं अनजान कारणों से जिनसे मैं एक एस. एस. (नात्सियों का यंत्रणा दल) आफीसर से दूर रह कर बात करूंगा। सब चुप। 'यह अतिश्योक्ति है', वह बिल्कुल आग बबूला हो गया, 'यह असहनीय है'। मैंने कहा, प्रिय डाक्टरों, क्या हम नहीं जानते कि यह आदमी कैंसर से पीड़ित फेफड़ों की शल्य चिकित्सा करता है और हमारी तरह वह जानता है कि तीस वर्षों से किया जा रहा शोध दिखा रहा है कि जिन लोगों का आपरेशन नहीं हुआ है उनकी तुलना में वे, जिनका आपरेशन हुआ है, कम आयु जीने की उम्मीद रख सकते हैं और मृत्यु के समय पीड़ा की संभावना उनके लिए कहीं अधिक बढ़ जाती है। कई डाक्टर बोल पड़े, 'मिस्टर इलिच, कृपया कोई एक चीज़ इस तरह पेश न करें जैसे यह सामान्यतया सच्चाई हो।' डाक्टर इस बात पर सहमत थे कि मैं जो कह रहा था, यह मूलतः सच था, इसलिए में मुड़ा भौर इंटेसिव केयर वाले सज्जन (हृदय विशेषज्ञ) की तरफ़ मुख़ातिब हुआ... वह लगभग वही कुछ करता है...."
फ़ोन की घंटी ने एक संक्षिप्त व्यवधान पैदा किया। फ़ोन से लौट कर इलिच डाक्टरों की एक और कहानी सुनाने की जगह मेरे सवाल पर वापस आए, ठीक उतनी रफ़्तार से जितनी रफ़्तार से वह सामान्यतया चलते हैं।
"अब हम भारत के गांव में क्यों नहीं जाते? क्या वह किसी भी शासन के लिए उपयोगी नहीं होगा कि वह भारी टेक्नोलानी से बनी दवाओं का कम से कम प्रचार करे? तुम्हारी परंपराओं ने लोगों को पश्चिमी चर्च से इतनी सफलता पूर्वक दूर कैसे रखा? और अब हम पश्चिमी अस्पतालों के धोखे में फंस रहे हैं। पश्चिम का चिकित्सा धर्म, पश्चिम शिक्षा संबंधी धर्म—वे भद्दे से भद्दे क़िस्म के मिशनरियों से भी ज़्यादा भद्दे धर्म हैं।"
मैंने जानना चाहा कि सरकारें बहुदेशीय व्यापार और उद्योग प्रतिष्ठानों से नाराजगी मोल लिये बिना आधुनिक चिकित्सा पद्धति से किस तरह मुक्ति पायेंगी। इलिच का उत्तर था कि किसी भी क़िस्म की सरकार के लिए विदेशी पूंजी का अनावश्यक जमाव हटाना अहितकारी नहीं हो सकता। अनुसंधान से यह ज्ञात हो चुका है कि कुल पचास आधुनिक दवाइयां उन बीमारियों में से जिन पर दवायें असरदार साबित हुई हैं 69 वा 99 प्रतिशत का इलाज करने के लिए पर्याप्त हैं। बाक़ी दवाइयों को पूरी तरह बेकार कहा जा सकता है।
औषधि विज्ञान और स्कूली शिक्षा, इन दो विषयों में इलिच के विचारों में कुछ परस्पर विरोध दिखता है। औषधि विज्ञान के क्षेत्र में यह टेक्नोलाजी के ख़िलाफ़ दिखते हैं। शिक्षा के लिये वह टेप रिकार्डर, ग्रामोफ़ोन आदि यंत्रों की उपयोगिता स्वीकार करते हैं। मैंने इलिच से इस विरोधाभास का कारण और हल जानना चाहा। जैसे ही मैंने कहा कि वह चिकित्सा के क्षेत्र में टेक्नोलाजी के विरोध में दिखायी पड़ते हैं, वह पूरे आवेग सहित मेरे वाक्य को तोड़ कर एक लंबी व्याख्या में प्रवेश कर गये।
"विरोध में ? या उस के सीमांकन के पक्ष में ? मैं टेक्नोलाजी के ग़ैर तकनीकी प्रयोगों के विरोध में हूं। समाज में तकनीक के मात्र तकनीकी लक्ष्य नहीं है। तुम वह ऊंची मीनार देख रहे हो (खिड़की के बाहर तीन ऊंची इमारतें खड़ी थीं), कितनी ऊंची हैं वह। यह न आर्थिक दृष्टि से वांछनीय है न तकनीकी दृष्टि से कि वह इमारत-बीमा वालों की इमारत— 'बे' कंपनी की इमारत से दस मंजिल ऊंची हो। इसका उद्देश्य प्रतीकात्मक है। बीमा वाले मिस्टर बे से ऊंचा दिखना चाहते हैं। इसे ही मैं टेक्नोलाजी के ग़ैर तकनीकी लक्ष्य कहता हूं। तकनीक के लक्ष्य ग़ैर तकनीकी हैं, धार्मिक हैं, वे अक्सर जादुई, रहस्यात्मक और नैतिक होते हैं। मैं तब चिंतित होता है जब तकनीक का इस्तेमाल पाश्चात्य विचारधारा के घोर ध्वंसात्मक लक्ष्यों के लिए होता है जिन का तकनीकी उपयोगिता से कोई ताल्लुक़ नहीं। किसान के तौर पर जब गति का इस्तेमान कुल जनसंख्या के जीवन की उपलब्ध अवधि घटाने के लिए किया जाता है, जैसा कि मैंने अपनी पुस्तक 'एनर्जी एंड इक्विटी' में दिखाया है तब मैं इन वाहनों को कालचकी देव या दानव कहता हूं। मैं एक विचित्र अनुभव कभी नहीं भूल सकता। मैं भारत में, दक्षिण भारत में किसी जगह तीन गांधीवादियों के साथ एक जीप में बैठा था। वे बेहद कृपालीन और अच्छे इंसान थे, जिन से मैंने बहुत कुछ सीखा है।
हम जीप में अहिंसा पर बहस करते ना रहे थे और ड्राइवर लगातार हार्न बजाने पर तुला हुआ सड़क से बैलों को भगा रहा था। क्या मेरी बात साफ़ हुई?... आप उस जीप में सवारी नहीं कर सकते, बिना बैलों को सड़क से भगाये हुए. वह जीप केवल एक उपकरण नहीं है, वह हिंसा का उपकरण है, हिंसा जो एक बात साफ़ साफ़ करती है—मेरा समय तुम्हारे समय से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है... वह कहती है: उस सड़क पर अपने जीवनकाल में से कुछ मुझे दे दो। एक अर्थशास्त्री कहेगा कि यह ताक़त के तबादले की एक विधि है। इस संदर्भ में ताक़त का आशय है जीवन की अवधि."
"साइकल और बैल आपस में मेल खाते हैं, लेकिन एक कार?... बनारस में मेरी पहली शाम थी—कई वर्ष पहले—क़रीब छह बजा था। बनारस के बीच वाले भाग में एक भी कार नहीं थी. मेरे लिए वह असाधारण आधुनिकीकरण का अनुभव था। मैंने साइकिलों की इतनी सघन भीड़ को हर दिशा में इतनी तीव्र गति से जाते हुए कभी नहीं देखा था और मैंने हिसाब लगाया कि बनारस के लोगों की वास्तविक गतिशीलता की दर मैनहैटन द्वीप (न्यूयार्क) के लोगों की तुलना में तीन गुनी नहीं तो कम से कम दुगुनी जरूर थी।"
मुझे अचानक ध्यान आया। दो दिन पहले ही मैंने 'धर्मयुग' में श्री राजेंद्र अवस्थी की पेरिस यात्रा का सचित्र विवरण पढ़ा था, जिसमें पेरिस को दुनिया का सब से आधुनिक शहर बताया गया था।
"वहां मैंने बाल बियरिंग और हवा के दबाव का सामान्य जीवन से अद्भुत तालमेल देखा, वे समाजधर्मी उपकरण बन गये थे, जिनसे काफ़ी लंबी दूरियों के बीच बहुत कम लागत पर आश्चर्यजनक आपसी पहुंच की जा सकती थी। इसे मैं आधुनिकीकरण कहता हूं। अगली बार जब मैं बनारस गया—कुछ समय बाद—तो मैं एक ख्यातिप्राप्त समाजवादी सिद्धांतशास्त्री की कार में एक जगह से विश्वविद्यालय की तरफ़ जा रहा था। हम लोग कुछ जगहों पर बनारस के बीच से गुज़रे। वह कार में थे, मैं बगल में बैठा था और बेहद असुविधा अनुभव कर रहा था। वह क़तई परेशान नहीं थे। वह यह देखने में बिल्कुल असमर्थ थे कि जिस किसी रास्ते पर उनकी कार पहुंचती, साइकिलों का प्रवाह रुक जाता, क्योंकि साइकिल और कार की आपस में बिल्कुल नहीं पटती।"
मैंने कहा कि आप का आशय क्या यह है कि टेकनोलाजी का विकास समाज द्वारा एक स्तर के बाद रोक दिया जाना चाहिए ?
"बहुत सावधानी से। मैं विश्वास करता हूं कि हमें व्यापक सहमति से वे मूल आयाम तलाशने चाहिए जिन में हम उपकरणों की ताक़त पर भरोसा कर सकते हैं। उदाहरण के लिए परिवहन में गति की सीमा होनी चाहिए। क्यों न लोग आविष्कार करें—तुम्हें तो मालूम ही है कि भारतीय लोग बेमिसाल असाधारणता हासिल कर चुके हैं हर संभव तरह के—क्या कहते हैं उसे? रिक्शा का आविष्कार करने में। कितनी तरह के रिक्शा उन्होंने बनाये हैं—अलग-अलग कामों के लिए लोगों, बीमारों, मशीनों को ढोने के लिए, क्यों न हमारे पास यांत्रिक घिर्री वाले रिक्शा हों?"
बातचीत आरंभ हुए काफ़ी समय हो चुका था, पर मैं अभी तक अपने चुनिंदा सवाल नहीं पूछ सका था। बीच बीच में कभी कमरा साफ़ करने वाली औरत, तो कभी फ़ोन तो कभी विषयांतर का व्यवधान आ जाता था। कमरे के बाहर सुबह की अस्पष्टता साफ़ हो रही थी हालांकि सूरज का कहीं पता न था मेरे दांत निहायत बासी थे, स्नान की सहज ज़रूरत थी पर इलिच इतने ताज़े थे कि मैं स्नान की ख़ातिर बातचीत को संक्षिप्त बनाने के लिए क़तई तैयार न था। उन की दिनचर्या किसी किशोर स्काउट से कम नियमित और चुस्त नहीं है। सात बजे से पहले स्नान करके दिन भर के लिए तैयार हो जाते हैं।नाश्ते में उस दिन उन्होंने थोड़े मट्टे के साथ सूखे फल लिये थे। उन्हीं के शब्दों में वह 'लगभग शाकाहारी' हैं. जिन पुस्तकों ने उन्हें सब से ज्यादा प्रभावित किया है उनमें वेद और रामायण शामिल हैं। युवावस्था में कांट से निपटने में काफ़ी वक़्त लगा टामस एक्विनास और नीत्शे का भी असर पड़ा।
चिकित्सा, शिक्षा, सवारी सभी विषय, जो इवान इलिच ने अब तक उठाये थे, किसी जादुई स्पर्श की मांग कर रहे थे जिस से तमाम तबदीलियां संभव हो जायें। कौन देगा यह स्पर्श ? सरकार ? नहीं, इलिच का उत्तर था कि परिवर्तन ऊपर से नहीं नीचे से आयेगा। पर इसका क्या भरोसा है कि नीचे से आता हुआ परिवर्तन ऊपर से दबाया नहीं जायेगा ?
"देखो, सब लोग अगर आधुनिक, वैज्ञानिक, विवेकशील आदमी की निगाह से देखने लगें—जब उस समृद्ध समाजवादी की कार बनारस की सड़क से गुज़रती है—यह बिल्कुल तय है कि हमें बनारस को एक धमाके से उड़ा देना होगा यदि उसे स्वचालित मशीनों से लैस करना है. यह बिल्कुल अनमेल चीज़ होगी (बनारस की प्रकृति से) कि वहां हर किसी के पास अपनी कार हो या हर कोई बस में घुसा दिया जाये। ऐसी हालत में कोई बनारस में रह नहीं सकेगा। उस कार को देखो और कह दो मैं उसे त्यागता हूं—पर इस शर्त पर कि कोई—यहां तक कि प्रधानमंत्री भी—उस पर सवारी नहीं कर सकता। मुझे याद है वह आख़िरी बातचीत—आख़िरी बातचीत जो किसी के माध्यम से हुई—डान साल्वाडोर में मिस्टर आयेंदे के साथ—जब मैंने कहा कि मैं चाहता हूं कि आप अपने कार्यालय—अपने मोनेदा तक साइकिल से जायें। मैं जानता हं कि आप के गेरिंल्लों— राष्ट्रपति के पीछे चलने वाली पुलिस—को आपत्ति होगी। पर मैं इसे बेहतर समझूंगा कि आप इसलिए मार डाले जायें कि आप साइकिल पर थे, बनिस्पत मेज़ पर मारे जाने के। (मैं सोच नहीं सकता था कि यह होने वाला है) आटो साइकिल पर मरना बेहतर है कार्यालय में मरने से...
बातचीत शुरू हुए काफ़ी देर हो चुकी थी और मैं भयत्रस्त था कि मेरा एकमात्र टेप खत्म न हो जाये। पर उस ने इस तरह साथ न छोड़ा।बातचीत गति और शिक्षा के पड़ावों से होती हुई बार बार समसामयिक राजनीति पर आ जाती। फिर कभी कविता तो कभी धर्म की तरफ़ मुड़ जाती। मैंने पाया कि इलिच ने एक बार भी अपने विरोधियों का ज़िक्र नहीं किया, न ही सामान्यतः उन पर लगाये जाने वाले आरोपों के प्रति उत्तर की मुद्रा अपनायी। क्या वह इन आरोपों से बेख़बर हैं? दो दिन पहले ही मैंने वह लेख पढ़ा था जिस में अमेरिका में शिक्षा के स्तर और ग़रीबों तक उन की पहुंच में कमी के लिए इलिच जैसे लोगों को ज़िम्मेदार ठहराया गया था। दिलचस्प बात यह थी कि उन्हें इस लेख में (टाइम्स एजुकेशनल सप्लिमेंट, नवंबर 05 '76) एक नव मार्क्सवादी पर्चेबाज कहा गया था। जब कि उत्तरी अमेरिका के प्रखर मार्क्सवादी इलिच पर दृष्टिहीन, सुधारवादी भौर सतही होने का आरोप लगाते रहते हैं।मंथली रिव्यू के अक्तूबर '76 अंक में इलिच के अनुभवी विरोधी विसेंट नवारो ने एक बेहद दिलचस्प लेख में कहा है कि इलिच की दिक़्क़त यह है कि वह शत्रु का वास्तविक शिविर नहीं पहचानते। वह नौकरशाही में उलझ कर रह जाते हैं, जब कि वास्तविक दुश्मन पूंजीवादी व्यवस्था है। नवारो के अनुसार इलिच का चिंतन जीवन शैली में परिवर्तन चाहने वाले चिंतनों की तरह अमेरिकी व्यवस्था के दलदल में समा जाने के लिए विवश हैं क्योंकि हर मज़बूत व्यवस्था की तरह अमेरिकी समाज में भी विरोध को काफ़ी हद तक पचाते चले जाने की क्षमता पैदा हो चुकी है।
क्या आप मानते हैं कि व्यक्ति-विशेष अपनी प्रेरणा से काम करता है? या वह उस संरचना के मुताबिक़ काम करता है जिस में वह स्वयं को पाता है ?
उसकी जीवन शैली उस संरचना से पूरी तरह प्रभावित होती है जिसमें वह काम करता है, लेकिन वह अपना, स्वयं का, जीवन जीता है. स्वचालित सक्षमता के आवेग को प्रकट करने वाला सामान्य शब्द स्वास्थ्य है 'मेडिकल नेमेसिस' का आधार वाक्य यही है और मैंने इसे जे.पी. नायक द्वारा मेरे लिए किये गये वेद के अनुवाद से लिया है।
व्यक्ति और समाज की पुरानी बहस इलिच के साथ छेड़ने का मक़सद सिर्फ़ यह था कि उन की दार्शनिक पृष्ठभूमि जान सकूं। ऊपर से देखने पर उन के विचारों में किसका पलड़ा भारी है जान लोफ जैसे वातावरणवादी का या नीत्शे जैसे छायावादी का या गीता के कर्मवाद का यह कहना बहुत कठिन है। इलिच के उत्तरों में सब से साफ़ उत्तर मुझे यह प्रतीत हुआ कि "ग़लती सदा व्यक्ति करता है. क्यों न हम ज़िम्मेवारी को अपने कंधों पर ले कर काम शुरू करें."
जैसा कि इलिच ने बताया यह पारंपरिक भारतीय मानस से मिलता जुलता विचार है और मार्क्सवादी ईसाई मानस का उल्टा प्रतीत होता है— "मार्क्सवाद का वह गिरा हुआ रूप जिसे आगे चल कर फ्रायड ने बढ़ाया सदैव किसी दूसरे को दोषी पाता है. निश्चय ही मेरी भाषा, मेरा दृष्टिकोण दूसरों से प्रभावित होता है, लेकिन जब तक मैं जीवित हूँ तब तक मेरी स्वचालिता मुझ से छुड़ायी नहीं जा सकती..
यहां इलिच ने अपने जीवन की एक कहानी सुनायी। उन की शैली, उन की मुद्रा में एक गहरी आत्मीयता थी, जो किसी को भी बरबस खींच सकती थी और जो प्रसंग उनकी कहानी का विषय था वह स्वयं एक मार्मिक किंतु सामान्य सत्य था. सुनते सुनते मेरा ध्यान बरबस इवान इलिच के व्यक्तित्व के उस पक्ष की ओर चला गया जो उन्हें चर्च के एक पादरी के अनुभव से मिला है। दर्द की अनुभूति को जीवन की सहज संवेदना में तबदील कर देना एक मंजे हुए पादरी का ही कौशल हो सकता है। आज इलिच चर्च के प्रबल विरोधी हैं, किंतु चर्च के प्रशिक्षण की छाप उन की शैली, उन के संवाद पर है।
"पिता की ओर से मैं शराब बनाने वाले कुटुंब से आया हूं। मेरे कुटुंबी पूर्वज बहुत कीमती शराब बनाते थे जो पचास वर्ष, सौ वर्ष चल सके। परिवार में एक परंपरा चली आयी है कि जब कोई बच्चा पैदा होता है शराब की सौ बोतलें अलग रख दी जाती हैं जो साल दर साल बेहतर होती चली जाती हैं। जब वह विवाह करे तो कुछ बोतलें खोले, जब उस के यहां पहला बेटा हो तो कुछ और बोतलें खोले.।अंत में एक बोतल बची रहेगी जिस से वह जब मरने को हो तो अपनी रवानगी मना सके। मेरा एक कुटुंबी मेरे पिता का एक भाई, अभी तक जीवित था. मुझे बताया गया है कि पिछले साल मई में एक दिन उसे पीठ में किसी जगह बड़े ज़ोर का दर्द हुआ। उसने अपनी पत्नी को बुलाया और कहा, जात्सा, अब उस बोतल को खोलने का वक़्त आ गया है।' वह एक बहुत अच्छी पत्नी की तरह साथ रही थी और उसकी उम्र पचहत्तर बरस थी। उस शानदार, विशुद्ध शराब के दो गिलास उन्होंने मिलकर पिये। वह सचमुच बहुत बढ़िया शराब थी और तब वह मर गया। इसे ही मैं मंज़िल का स्वास्थ्य कहता हूं।"
(इस महत्वपूर्ण दस्तावेजी बातचीत को मनोज मोहन जी न उपलब्ध कराया है। चौराहा उनके प्रति आभार प्रकट करता है। जब यह बातचीत कृष्ण कुमार ने की थी, उनकी उम्र 30 साल की थी।)

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