(वंदे मातरम के शताब्दी समारोह पर बनारस से एक पत्रिका का प्रकाशन हुआ था। साल 1976। यह लेख उसी अंक से साभार चौराहा के लिए दिया जा रहा है। इन दिनों एक बार फिर वंदे मातरम पर जेरे बहस चल रही है। आगे हम कुछ और दुर्लभ लेख भी अपने पाठकों से साझा करेंगे-संपादक चौराहा न्यूज।)
- मौलाना रेजाउल करीम
( बंगाल हिन्दू-मुसलमानों का प्रदेश है, अकेले हिन्दुओं का नहीं। पर आज कल हिन्दू मुसलमान अलग हैं, आपस में सहृदयता नहीं है। बंगाल की भलाई के लिए यह जरूरी है कि हिन्दू-मुसलमानों में एकता हो। जब तक उच्च वर्ग के मुसलमानों में यह भावना रहेगी कि वे दूसरे मुल्क के है, बंगला उनकी भाषा नहीं है, वे न तो बंगला लिखेंगे और न सीखेंगे, सिर्फ उर्दू-फारसी से काम चलायेंगे तब तक एकला स्थापित नहीं होगी, क्योंकि राष्ट्रीय एकता की जड़ में भाषा की एकता होती है।)
बंकिमचन्द्र, बंग दर्शन, पौष 1280 (1874 ई)
यह प्रश्न कई बार उठा है कि क्या ‘वन्दे मातरम’ किसी सम्प्रदाय का गीत है? अनेक घटनाओं की स्मृतियों से आप्लावित यह गीत, जिस गीत ने भारतवासियों के हृदय के तंत्रा-तंत्रा मे मूर्च्छना जगायी है, आज भी जगा रहा है, क्या वह बुतपरस्ती से परिपूर्ण है? क्या वह बुतपरस्तों के लिए देवी-स्तुति का गीत है?
हम लोगों के बीच कुछ ऐसे लोग हैं जो लोग बात बात में बुतपरस्ती का हौवा खड़ा करके साधारण मुसलमानों की दैनिक जीवन धारा को विषाक्त बनाना पसन्द करते हैं। माता-पिता के चरण हाथ से स्पर्श करते हुए भक्ति दिखाना भी तो बुतपरस्ती है। श्रद्धेय व्यक्तियों के सामने सिर झुकाकर भक्ति दिखायी जाय तो वह भी बुतपरस्ती है। सौन्दर्य वृद्धि के लिए कमरे में तस्वीर रखना भी बुतपरस्ती मानी जानी चाहिए। इस प्रकार लोग बात-बात पर बुतपरस्ती या इस्लाम के विपरीत कार्य के लिए डराते हैं। ऐसे लोगों के लिए कौन सा कार्य इस्लामी है और कौन गैर इस्लामी यह बताना कठिन है। इस प्रकार के फतवों के दबाव से ही मुसलमान उलझ जाते हैं। उनकी आजादी की चिन्ताधारा बन्द दरवाजों के कारण अपना विकास नहीं कर पा रही है। पग-पग पर साधारण विषय आकर आजादी से सोचने की उनकी शक्ति को नष्ट कर रहे हैं।
इस प्रकृति के व्यक्ति ‘वन्दे मातरम’ जैसे निर्दोष और सर्वाङ्ग सुन्दर गीत को भी साम्प्रदायिक कहते हैं पर जिनके पास उदार दृष्टि है, उन्हे वन्दे मातरम् गीत को समग्र दृष्टि से देखना चाहिए। वे देखेंगे कि उसमें बुतपरस्ती का दोष कहीं नहीं हैं। हमें यह देखना है कि इस्लाम किसको बुतपरस्ती कहता है और उसकी सीमा कहां है?
इतिहास
प्रथम युग में अरब के कौरेश घोर बुतपरस्त थे। उनकी बुतपरस्ती को दूर करने के लिए अनेक प्रकार के कठोर कानून या नियम बनाने की आवश्यकता हुई थी। वह यों था- कोई मूर्ति या प्रतीक बनाकर उसे ईश्वर या खुदा मानकर पूजा करने की प्रथा उन लोगों ने स्वीकार नहीं की। सिर्फ यही नहीं, किसी सृष्ट-जीव को ईश्वर या खुदा के स्वरूप विशिष्ट मानने की मनाही हो गयी। खुदा के सामने जैसी प्रार्थना की जाती है, सृष्ट-जीव के निकट वैसा नहीं किया जा सकता। वर्तमान स्थिति में यही है इस्लाम की दृष्टि में बुतपरस्ती। खुदा सर्वशक्तिमय है-इस विश्वास को चोट न पहुंचे, तो ऐसा कोई भी काम बुतपरस्ती के अन्तरगत नहीं है।
इसीलिए मुसलमानों ने कभी अर्द्ध चन्द्रांकित पताका के प्रति सम्मान दिखाया। विभिन्न आदर्शों के लिए प्रतिक का उपयोग किया। बुतपरस्त जातियों की अनेक प्रथाओं को वे अपने में अंगीभूत कर चुके हैं। इसके लिए वे कभी मुसलमान-धर्म से बहिष्कृत नहीं हुए।
मुसलमानों के निकट जो लोग आदर के पात्र हैं, मर्यादानुसार उनके सम्मान के लिए कुछ विशेष-विशेष शब्दों के व्यवहार की विधि है। चरमतम भक्ति के पात्र खुदाताला के लिए जिन शब्दों का प्रयोग होता है, सृष्ट-जीवन के प्रति उनका प्रयोग नहीं हो सकता। आराधना योग्य समस्त भाषा केवल ईश्वर के प्रति प्रयुक्त होती है, अन्य किसी के लिए नहीं, किसी के निकट प्रार्थना या उपासना नहीं की जा सकती। जिस हजरत मुहम्मद को मुसलमान अंतिम-उद्धारक मानते हैं, उनके प्रति भी ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाता।
आम तौर पर हिन्दू महापुरुषों को ईश्वर का अवतार मानते हैं, भले ही वह महापुरुष किसी भी देश या सम्प्रदाय का क्यों न हो। इसलिए वे सर्वशक्तिमान ईश्वर और महापुरुषों के प्रति समान शब्दों का प्रयोग करने में नहीं हिचकते। लेकिन मुसलमान सर्वशक्तिमान खुदा के लिए जिन शब्दों का प्रयोग करता है, वह शब्द किसी भी दूसरे के लिए प्रयोग नहीं करता।
मां
इसके बाद एक प्रश्न और उठता है- देश को ‘मां’ कहकर सम्बोधन किया जा सकता है या नहीं? माननीय मौलाना अकरम खां साहब ने ‘वन्दे मातरम’ गीत का विरोध किया है, लेकिन उनकी मुख्य कृति ‘मोस्तापाचरित’ में पृष्ठ 1575 पर जहां अरब देश का भौगोलिक वर्णन है वहां पहले ही लिखा है।
धरियाछे वक्षे मा गो, कार पदलेखा,
हे अरब मानवेर आदि मातृभूमि।
अर्थात कवि ने अरब को ‘मां’ कह कर सम्बोधन किया है।
उक्त कविता के लेखक मुसलमान हैं और जिन्होंने उद्धृत किया है, वे भी एक विख्यात मौलाना है। देश को ‘मां’ कहना अगर आपत्तिजनक होता तो वे लोग ऐसा कभी भी नहीं लिखते या मौलाना साहब उद्धृत न करते। देश को जब हम ‘मां’ कहते हैं तब रूपक अर्थ में ही कहते है। देश को मां के रूप में सम्बोधन करने का मूल उद्देश्य है- समूचे देशवासियों कीे दृष्टि आकर्षित करना। यहां हम देश को खुदा नहीं कहते। अगर हमारी मां को मां कहकर पुकारने में कोई दोष नहीं होता तो रूपक भाव से देश को मां कहने से भी कोई दोष नहीं हो सकता। देश भक्ति, देश-पूजा, देश-वन्दना, देश-मातृका एक ही प्रकार के विभिन्न शब्द है जो इस्लाम की दृष्टि में पूर्णतयः मर्यादित हैं। लिहाजा ‘वन्दे मातरम’ गीत गाना किसी भी प्रकार न बुतपरस्ती है और न इस्लाम विहित कार्य।
देश को मां कहकर सम्बोधन करने की प्रथा अरबी और फारसी के अनेक कवि तथा लेखकों की रचनाओं में प्राप्य है। अगर इन सभी शब्दों का प्रयोग आपत्तिजनक होता तो बंगला ही क्यों, विश्व की किसी भी भाषा की काव्य-कला अचल हो जाती। अरबी और फारसी साहित्य के अनेक मुसलमान लेखकों ने बुतपरस्ती के भाववाली अनेक कविताएं लिखी हैं। इकबाल, हाफिज, रूमी, उमर खैयाम भी बाकी नहीं बचे हैं। ‘उम्मुलकोरा’ (ग्राम्य जननी) ‘उम्मुल मोमेनीन’ (विश्वासियों की जननी) और ‘उम्मुल केताब’ (ग्रन्थ जननी) आदि शब्द उल्लेखनीय है। ‘वन्दे मातरम’ भी वैसा ही एक शब्द है।
बुतपरस्ती समझ कर जो ‘वन्दे मातरम’ जैसे सर्वांग सुन्दर संगीत को नापसंद करते है, मेरे विचार से उनका उद्देश्य पवित्र नहीं है। वन्दे मातरम् की भाषा तो बहाना मात्र है। असली कारण राजनीतिक है। प्रकृतिस्थ होकर किसी ने भी मामले में गौर नहीं किया क्योंकि इसके लिए उदार दृष्टि, संस्कार-मुक्त--हृदय और अन्य के प्रभाव से मुक्त स्वाधीन चिन्तन-शक्ति की आवश्यकता है।
इस्लाम के किसी आदर्श की दोहाई देकर वे कहते हैं कि ‘वन्दे मातरम’ बुतपरस्त के भाव से परिपूर्ण है। मैं यह पहले ही कह चुका हूं कि इस देश में रहते हुए इस देश की भाषा में कंहने पर शब्दों को साधारण देशी अर्थों में ग्रहण करना पड़ेगा। प्रचलित अर्थ स्वीकार करने पर ‘वन्दे मातरम’ गीत किसी भी एकेश्वरवादी की दृष्टि में आपत्तिजनक नहीं हो सकता।
विश्लेषण
सबसे पहले ‘वन्दे मातरम’ ध्वनि पर विचार किया जाय। इसका अर्थ स्पष्ट है- ‘हे देश माता, मैं तुम्हारी वंदना करता हूं।’ उर्दू के लोगों ने इसका अनुवाद यों किया है- -ऐ मादर, तुझे सलाम करता हूं।’ अर्थात् हे माता, तुझे सलाम करता हूं। इसमें आपत्ति करने लायक तो कुछ भी नहीं है। मुल्क को आजाद करना हमारा लक्ष्य है। इस लक्ष्य के लिए पहला काम है कि देश के प्रति आम लोगों के मन में प्यार उत्पन्न किया जाय। देश को प्यार करने पर उसका सौन्दर्य, महिमा और श्रेष्ठता क्या-क्या है, इसे ध्यान में लाना होगा। बार-बार देश की वंदना करना, उसका अभिवादन करना या सलाम करने को खुद ही मन करने लगेगा। ‘वन्दे मातरम’ ‘इबादत’ या ईश-पूजा का गीत नहीं है। इसमें यह नहीं कहा गया है कि देश, तुम्हें साष्टांग प्रणिपात (सिजदा करता हूं अथवा ईश्वर के निकट जो प्रार्थना की जाती है, देश-माता के निकट उस प्रकार की कोई प्रार्थना भी नहीं की गयी है। वन्दे मातरम् हृदय में ऐसी भावना का उद्रेक करता है जो सभी सम्प्रदायों के हृदय में गहराई तक स्पर्श करती है।
सुजलां सुफलां से आरम्भ कर परवर्ती कई छन्दों के प्रति दृष्टिपात करने पर क्या ज्ञात होता है? ‘वन्दे मातरम’ कहते हुए जिस देश का अभिवादन किया गया, जिस देश की वंदना की गयी है, जिस देश को याद किया गया, इन शब्दों में उसके वाह्य रूपों का वर्णन किया गया है। यही है मेरा देश, जो देश सुजलां सुफलां है, जिस देश का प्रत्येक प्रान्तर मलयानील से सुशीतल है, जिस देश का आकाश मधुर है, बतास मधुर है, जिस देश की भूमि दलदलों से सुशोधित है, हम अपनी उसी भूमि को सलाम करते है, अभिवादन करते हैं, उसकी वंदना करते हैं। हमारा यह पुण्य देश इस तरह सुरक्षित है कि वह दुश्मनों का मुकाबला कर सकता है। वह इस देश की स्वाधीनता को हमेशा अक्षुण्ण रखेगा।
इस प्रकार देश की शक्ति, सौन्दर्य और महिमा के वर्णन में कौन सा दोष देखा जा सकता है, यह मेरी समझ में अभी तक नही आयी। नदी-पानी, पेड़ों के फल, जमीन में उगी घास, चिड़ियो के कलरव आदि में कहां बुतपरस्ती की गंध हैं? वस्तुतः ‘वन्दे मातरम’ गीत के प्रथम दो छन्दों में केवल मातृभूमि की वंदना है। प्रत्येक पंक्ति स्वदेश-प्रेम, उद्दीपन और जीवनी-शक्ति वृद्धि करने लायक उपयोगी शब्दों द्वारा ग्रथित हुई है। इसकी झंकार, अपूर्व शब्द निर्वाचन और अनवद्य सुर किसी भी श्रोता को मुग्ध करेगे, धमनियों में उत्साह और प्रेरणा की अनल उत्पन्न करेंगे।
अगला छन्द
अब अंतिम श्लोकों पर विचार करते हैं। ‘त्वं ही दुर्गा दशा प्रहरणवारिणी’ को हिंदू देवियों दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती की स्तुति समझा गया है। लेकिन इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है। यह हिंदू देवी-देवताओं की स्तुति नहीं है, बल्कि दूसरे शब्दों में कहें तो मूर्तिपूजा पर एक अभिशाप है हिंदू देवी-देवताओं पर एक व्यंग्य है। इस गीत में मातृभूमि को देवी-देवताओं से भी श्रेष्ठ स्थान दिया गया है। हिंदू जिन देवियां भगवान दुर्गा, कमला, सरस्वती आदि की पूजा करती हैं, इस गीत में कहा गया है कि इन सब में सबसे महान देश माता है। मातृभूमि देवी-देवताओं से भी श्रेष्ठ है। देश मेरी दुर्गा है, देश मेरी लक्ष्मी है, देश मेरी सरस्वती है। स्पष्ट शब्दों में, सात करोड़ स्वरों से यह घोषणा की गई है कि ये देवी-देवता मेरे निकट कुछ भी नहीं हैं, देश ही मेरे लिए सब कुछ है, संपूर्ण साधना का सर्वश्रेष्ठ धन है।
‘वन्दे मातरम’ के प्रति मुसलमानों की आपत्ति पूर्णतः अयौक्तिक है। बुतपरस्ती में विश्वास रखने वाले, तैतीस करोड़ देवी देवताओं की पूजा करने वाले हिन्दू अगर इस गीत के प्रति आपत्ति करते तो बात होती। वे कह सकते थे कि क्या हमारे देवी-देवता कुछ नहीं हैं? दुर्गा कुछ नहीं हैं? देश ही सब कुछ है? नहीं ऐसा नहीं हो सकता। देश दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती से अधिक नहीं हो सकता। लेकिन हिन्दुओं ने आपत्ति नहीं की। इस गीत में वे देश-माता को दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती से ऊंचे सिंहासन पर बैठाकर उसकी वंदना करते हैं। यह बात ‘आनन्दमठ’ उपन्यास के नायक महेन्द्र के आचरण से भी समझ में आ जाती है। महेन्द्र के सामने जब इस मां का वर्णन किया गया तब वह चकित रह गया। कहा- यह तो देश है, मां नहीं।
हिन्दुओं के ज्ञान, विश्वास, संस्कार और धार्मिकमतानुसार महेन्द्र ने ठीक प्रश्न किया था। उत्तर में भवानन्द ने कहा- ‘हां, यही मेरी मां है, जन्मभूमि ही मेरी मां है, अन्य देव-देवी, अन्य मां को हम नहीं मानते, हम लोगों का अन्य धर्म नहीं है, जाति नहीं है, एक मात्रा जननी जन्मभूमि ही हम लोगों के लिए सब कुछ है। वास्तव में जो लोग आजादी के लिए सर्वस्व निछावर करते हैं, उनके निकट देश ही सब कुछ है। देश के लिए वे मां मौत को भी चुनौती दे सकते हैं।
‘वन्दे मातरम’ का मूल उद्देश्य बुतपरस्ती की जय कहना नहीं है, बल्कि बुतपरस्तों की देवियों दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती की अपेक्षा देश माता बड़ी हैं, इस गीत में यही बताया गया है।
दुर्गा, कमला और सरस्वती शब्दों से चाैंकने से कहीं काम चलता है? हमें यह देखना होगा कि ये शब्द समूह पूजा के आस्पद भाव मे वर्णित है या नहीं। शब्द प्रयोग के इतिहास का अध्ययन करने पर ज्ञात होगा कि संसार की प्रत्येक भाषा में इस तरह के बुतपरस्ती वाले शब्दों का प्रयोग होता है। यहां तक कि मुसलमान साहित्यिकों ने भी किया है। क्यूपिड को प्रेम का देवता, जौहरा को संगीत की देवी, अजराइल को मौत के फरिश्ते तथा मिकाइल को वर्षा के फरिश्ते के रूप में मुसलमान लेखकों ने स्वीकार किया। क्यूपिड जौहरा, अजराइल, मिकाइल शब्दों के प्रयोग से अगर कोई बुतपरस्त नहीं होता तो दुर्गा, कमला, वाणी शब्दों का उपमा के रूप में प्रयोग करने से बुतपरस्ती नहीं झलकती।
‘वन्दे मातरम’ गीत को समग्र रूप से पढ़ने पर साफ समझ में आ जाता है कि देश-धर्म की श्रेष्ठता को प्रतिपन्न करने के लिए ही उसकी रचना हुई थी। उसका मुख्य उद्देश्य है- आमलोगों में देश-प्रेम जाग्रत करना। वन्दे मातरम् का यह उद्देश्य काफी हद तक सफल हुआ यह बात हम अनायास कह सकते हैं। भवानन्द की तरह आज भारत के हिन्दू मुसलमान, करोड़ों नर-नारी दहाड़ कर कहना सीख गये है ‘हम लोग अन्य मां को नहीं मानते हैं, हम मानते हैं- देश-माता को, देश माता ही हमारे लिए सब है, इनसे बढ़कर अन्य कोई देवता मेरे निकट नहीं है। जब तक मुल्क आजाद नहीं होगा तबतक देश ही मेरा धर्म, देश-सेवा ही मेरी सबसे बड़ी साधना होगी। इसके अलावा अन्य किसी साधना को हम नहीं जानते, नहीं समझते और न मानते हैं। अन्य किसी साधना को हम न मानते हैं, न जानते हैं, और न समझते हैं। ‘वन्दे मातरम’ गीत यही कहता है, यही कहा है और वह भी स्पष्ट तथा द्विधाहीन भाषा में।
वन्दे मातरम् के विरुद्ध फतवा इस्लाम धर्म के अभिज्ञ और कुरान-विशेषज्ञ आलिम फाजिलों ने नहीं कोट-पेंट पहननेवाले साहबी ढंग के बैरिस्टरों तथा राजनीतिकों ने दिया है। इन लोगों को अपने जीवन में कभी मस्जिद के प्रांगण को चरण-रज देने की फुर्सत नहीं मिली है। इस्लाम के साथ जिन लोगों का साक्षात् या परोक्ष रूप से भी कोई सम्बन्ध नहीं है, ऐसे ही लोगों ने ‘वन्दे मातरम’ को बुतपरस्ती कहा है।
खिलाफत युग में मौलाना अकरम खां ने जब मुसलमानों से कांग्रेस का साथ देने को कहा था तब उन्होंने कुरान हदीस को आधार बनाकर ही कहा होगा। उन दिनों ‘वंन्दे मातरम’ गीत गाया जाता रहा, ‘वन्दे मातरम’ ध्वनि से आकाश-बतास विदीर्ण होता रहा। उन्हें कुरान हदीस में उसके विरुद्ध कोई प्रमाण नहीं मिला था। 1906-11 वर्षों के दौरान स्वदेशी आन्दोलन के युग में वे स्वयं ‘वन्दे मातरम’ के भक्त थे। लेकिन मुस्लिम लीग के उद्भव के साथ वे कुरान हदीस को सामने रखकर ‘वन्दे मातरम’ के विरुद्ध हो गये। इसके पूर्व भारत की प्रत्येक सभा में यह गीत गाया जाता था और वन्दे मातरम् ध्वनि भी सर्वत्र की जाती थी। अगर यह गीत इस्लाम विरोधी होता तो खिलाफत-युग में मौलाना आजाद, मौलाना मुहम्मद अली, शौकत अली, जाफर अली, हसरत मोहानी आदि नेता इसके विपरीत जरूर बोलते। जिन सभाओं में यह गीत गाया जाता रहा या ‘वन्दे मातरम’ का नारा लगता रहा, ऐसी सभाओं में ये लोग मौजूद रहते थे और भाषण देते थे तथा बिना प्रति-वाद किये उक्त संगीत के सम्मानार्थ खड़े होते थे। मुसलमान परिपूर्ण ईमान लेकर अल्लाहताला में प्रगाढ़ विश्वास रखते हुए ‘वन्दे मातरम’ संगीत गाते थे। ऐसा करने से उनके ईमान में जरा भी ठेस नहीं पहुंचती।
फारस के अमर कवि हाफिज ने जब अपने अमर ग्रथ में आरम्भ की एक पंक्ति पापात्मा एजिद की कविता से ग्रहण की तो उनके विरुद्ध लोग काफी नाराज हो गये। प्रत्युत्तर में कवि ने कहा था- ‘मोती उठाते समय स्थान का विचार नहीं करना चाहिए।’ हम लोग भी ‘वन्दे मातरम’ के संगीत के बारे में यही बात कह सकते हैं। इस गीत में अन्तर्निहित माधुर्य के कारण ही उसने राष्ट्रीय-संगीत का स्थान ग्रहण किया।
(बंकिम चन्द्र ओ मुसलमान समाज’ नामक पुस्तक के आठवें अध्याय का संक्षेप में अनुवाद पृष्ठ 90 से 102 तक। प्रकाशक- श्री रामगति चटर्जी, 91 बी सिमला स्ट्रीट, कलकत्ता। मूल्य दो रुपया। पुस्तकाकार रूप में प्रकाशन 18 मई 1944।)

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