डॉ मोहम्मद जाकिर
बड़कागांव गांव से लगभग 15 किलोमीटर और हजारीबाग शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर घने जंगलों के बीच स्थित इस्को एक दर्शनीय आदिवासी गांव है। उत्तरी करनपुरा घाटी के पूर्वी छोर पर स्थित इस गांव में मेसो-ताम्र पाषाण काल (7000-4000 ईसा पूर्व) की रॉक आर्ट और गुफा मौजूद है। टोनी हर्बर्ट जेसुइट के बताने पर वर्ष 1991 में इतिहासकार एवं पर्यावरण कार्यकर्ता पद्मश्री बुलु इमाम और उनकी पत्नी फिलोमिना इमाम ने इस स्थल को सुर्खियों में लाया था। 26 जनवरी 1992 को श्रीमती फिलोमिना इमाम और दूसरी श्रीमती एलिजाबेथ इमाम को इस्को के चित्रित स्थान पर दो हैंड एक्स मिले थे। इसके बाद बुलु इमाम ने खोवर के सामने चट्टानी स्थान पर एक वार्षिक मेले का आयोजन शुरू किया, जो प्रत्येक वर्ष 26 जनवरी को आयोजित किया जाता है।
इस्को की रॉक आर्ट ने खोला हजारों साल पुराना इतिहास
इस्को नाम "अयास-खो" शब्द का अपभ्रंश माना जाता है, जिसका स्थानीय भाषा में विशेष रूप से अर्थ तांबे की माइंस है। इस्को की पहाड़ियों में तांबे की खान के अवशेष पाए गए हैं। एक बार गांव के एक खेत में तांबे का एक पाइप मिला था, जिसे पटना संग्रहालय ले जाया गया था। पुरातत्व विभाग ने 1992 में चित्रित स्थान के ऊपर पाए गए क्वार्टजाइट हैंड एक्स को भी अपने साथ ले गया। आज गांव में मुंडा समुदाय के लोग निवास करते हैं। उनका मानना है कि वे अपने पूर्वजों के समय से यहां रहते आ रहे हैं।
इस्को में विस्तृत चट्टानी छत के नीचे एक विशाल गुफा है। इस गुफा की चट्टान लगभग 6 एकड़ में फैली हुई है। देखने में यह विशाल मंदिर जैसी गुफा प्रतीत होती है। गुफा की ऊंचाई लगभग 20 से 30 फीट होगी। बताया जाता है कि यह गुफा पांच हजार साल से भी अधिक पुरानी है। गुफा का इस्तेमाल बादाम के राजा किया करते थे। स्थानीय लोगों के मुताबिक, जब राजा की शादी हुई, तब उन्होंने रानी के साथ इसी गुफा के पास सुहागरात मनाई थी। यही वजह बताई जाती है कि गुफा के पास की चट्टानों पर आज भी खोवर कला, जिसे रॉक पेंटिंग कहा जाता है, उकेरी हुई दिखाई देती है। प्राचीन काल में ग्रामीणों द्वारा रॉक पेंट की गई गुफाओं को खोवर कहा जाता था, जिन्हें विवाह कक्ष माना जाता था। गुफा की दीवारों पर हिरण, मेंढक और कछुओं के साथ-साथ कई जंगली जानवरों के चित्र बने हैं। इस गुफा में पत्थरों के औजार भी मिले हैं, जिसमें हैमर, हैंड एक्स, भाले की नोक, छोटे और धारदार चाकू आदि शामिल हैं।
गुफा से लगभग 100 मीटर पहले शैल दीर्घा में चित्र लिपि है। इस चट्टान की लंबाई करीब 500 फीट और ऊंचाई लगभग 26 फीट होगी। इस पर काफी चित्र लिपि अंकित है। इन चित्रों में सूरज, आदमी, खरगोश, नदियां, हिरण आदि के चित्र अंकित हैं। इसके अलावा यहां विभिन्न प्रकार के ज्यामितीय डिजाइन भी बने हुए हैं।
सोहराई और खोवर कला से जुड़ी है इस्को की चित्र परंपरा
यहां पाए गए चित्रों जैसी कला से आदिवासी महिलाएं अपने मिट्टी के घरों को सोहराई और खोवर की दीवार पेंटिंग से सजाती हैं। सोहराई चित्रकला को झारखंड की राज्य कला का दर्जा मिला है। बड़कागांव की इस्को गुफा और रॉक पेंटिंग को संरक्षण की जरूरत है। प्राचीन शैल चित्र और गुफा न केवल पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि झारखंड की आदिवासी कला और सांस्कृतिक परंपरा से भी जुड़े हुए हैं।
संरक्षण के साथ पर्यटन विकास की जरूरत
इस्को गुफा को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। इससे इस क्षेत्र का विकास होगा और बड़ी संख्या में देश-विदेश के पर्यटक यहां आ सकते हैं। पर्यटकों को झारखंड के इतिहास की जानकारी मिलने के साथ स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे।
इस्को घूमने का सही समय
इस्को और आसपास के क्षेत्र में उष्णकटिबंधीय जलवायु है। इस्को घूमने का सबसे अच्छा समय सर्दियों के महीनों के दौरान यानी नवंबर से फरवरी तक है, क्योंकि इस दौरान मौसम ठंडा और सुहावना रहता है।
इस्को कैसे पहुंचें
निकटतम शहर: हजारीबाग, करीब 30 किलोमीटर
निकटतम रेलवे स्टेशन: हजारीबाग रेलवे स्टेशन
निकटतम हवाई अड्डा: बिरसा मुंडा हवाई अड्डा, रांची
कैसे पहुंचें: हजारीबाग शहर से बड़कागांव पहुंचने के बाद इस्को जाया जा सकता है।
परिवहन के साधन: हजारीबाग से इस्को तक निजी कार या बाइक से पहुंचा जा सकता है।
यात्रा के दौरान सावधानी
इस्को जाने के लिए सुरक्षित समय सुबह 6 बजे से शाम 4 बजे के बीच है। यह मुख्य शहर से कुछ दूरी पर स्थित है, इसलिए अकेले जाने से बचें और हमेशा ग्रुप में जाएं। अपने साथ पानी, दवाइयां और जलपान जरूर रखें।
कहां ठहरें
इस्को की यात्रा के दौरान हजारीबाग शहर के होटल और लॉज में ठहरना बेहतर रहेगा। वहां से इस्को की यात्रा करना अपेक्षाकृत सुविधाजन

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