वंदना टेटे
भारतीय दर्शन और साहित्य की परंपरा बहुत प्राचीन है। लगभग तीन हजार साल पुरानी। हालांकि वेदों, पुराणों और महाकाव्यों के सहारे कुछ लोग इस अवधि को और कई हजार साल पीछे ले जाते हैं। परंतु उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्य इसे स्वीकार नहीं करते। क्योंकि भारतीय आलोचना और विमर्श संबंधी प्राचीन एवं तथ्यात्मक स्रोत हमें सबसे पहले जैन और बौद्ध ग्रंथों में ही मिलते हैं। जो मूलतः पाली, प्राकृत अथवा मागधी में रचे गए हैं। इनके बाद ही संस्कृत और अन्य भारतीय भाषाओं का आलोचनात्मक साहित्य प्राप्त होता है। इसलिए पहली बात तो यह है कि संस्कृत के नाट्यशास्त्र से भारत की आलोचनात्मक परंपरा शुरू नहीं होती। वह शुरू होती है जनभाषा मागधी से। महावीर और बुद्ध दोनों के उपदेश की भाषा मागधी थी। भाषा प्राचीनता के सवाल पर बुद्ध ने स्पष्ट कहा है- 'सा मागधी मूल भाषा'। अतः इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत की गैर आदिवासी भाषाओं में प्राकृत मागधी ही सबसे पुरानी भाषा है। आगे चलकर हम पाते हैं कि प्राकृत, जो देश की सबसे प्राचीन जनभापा है, संस्कृत साहित्य में वह एक निम्नतर और अछूत भाषा बन जाती है। दूसरी महत्वपूर्ण बात है, प्राकृत से लेकर संस्कृत, तमिल, बांग्ला आदि भाषाओं की आलोचनात्मक परंपरा में आदिवासी समाज का दर्शन एक सिरे से गायब है। आलोचना की यह स्थापित और वर्चस्ववादी परंपरा हमें आदिवासी भाषाओं की वाचिकता में उपलब्ध समालोचनाओं के बारे में कोई भी जानकारी नहीं देती। और वह इस संदर्भ में कुछ संकेत अथवा सूत्र देती है भी तो वह आदिवासियों को इंसान ही नहीं मानती है। उनका चित्रण असुर, अनास, जंगली, बर्बर, असभ्य आदि रूपों में करती है। इसी तरह वह स्त्रियों और समाज के कारीगरों, श्रमिकों एवं किसानों को भी, जो अब पिछड़े और दलित वर्ग कहे जाते हैं, असभ्य व संस्कार विहीन वर्ग की श्रेणी में रखती है। मतलब यह कि भारतीय भाषाओं में जितना भी और जैसा भी आलोचनात्मक साहित्य उपलब्ध है, वह पूरी तरह से एकपक्षीय है। नस्लीय, लैंगिक, धार्मिक, जातीय और सांप्रदायिक है।
भाषा समाज की अभिव्यक्ति है। भाषाओं का निर्माण समाज करता है। इसलिए जैसा समाज होता है, वैसी ही उसकी भाषा होती है। गैर आदिवासी साहित्य में भाषा के इस विशेप पहलु की जानकारी सबसे पहले संस्कृत के नाटकों में मिलती है। जिसमें भारतीय समाज के वैसे सभी पात्र, जो जात-पात वाली सामाजिक व्यवस्था में नीचे हैं, संस्कृत नहीं बोलते। प्राकृत बोलते हैं। मतलब एक भाषा जो जनभाषा है, जिसे उस समय का समूचा भारतीय समाज बोलता है, संस्कृत के आने से वह नीच लोगों की भाषा बन जाती है। भाषाओं के स्तरीकरण की यही प्रक्रिया हम औपनिवेशिक शासन काल में देखते हैं। जब ब्रिटिश लूटेरों की भाषा अंग्रेजी मुगलों के राज-काज की भाषा फारसी उर्दू को पूरी तरह से अपदस्थ कर देती है। यहां हमें यह ध्यान देना होगा कि संस्कृत भी सत्ता की भापा थी, और फारसी ऊर्दू भी। लेकिन अंग्रेजी राज के पहले की इन भाषाओं ने जहां भारत की देशी जन भाषाओं का पूरी तरह से नकार किया, वहीं अंग्रेजी ने गैर आदिवासी जन भाषाओं सहित आदिवासी भाषाओं को भी संरक्षण दिया। उन्होंने भारत की जन भाषाओं में उपलब्ध ज्ञान-विज्ञान, कला परंपराओं और साहित्य को अंग्रेजी में संकलित और लिपिबद्ध किया। अंग्रेजी भाषा सहित देशी भाषाओं यानी वर्नाकुलर लैंग्वेज में स्कूल खोले। संस्कृत और फारसी उर्दू के सामंती शासन काल के दौर में हमें ऐसे किसी प्रयास की जानकारी नहीं मिलती। उन दिनों सिर्फ गुरुकुल और मदरसे ही होते थे। जिनके शिक्षा का उद्देश्य और पाठ्यक्रम पूरी तरह से धार्मिक था। नालंदा विश्वविद्यालय इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जिसमें स्त्रियों व दलितों को प्रवेश नहीं दिया जाता था। स्पष्ट है कि अंग्रेजों के आने से पहले ज्ञान और आलोचनात्मक परंपरा पूरी तरह से नस्लीय, लैंगिक, धार्मिक, जातीय और सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों पर आधारित थी।
भाषाओं की शब्द संपदा को हम देखें। भारत के सभी गैर आदिवासी भाषाओं में हम वैसे शब्दों की संख्या सबसे ज्यादा पाते हैं जो धर्म से जुड़े हैं। जैसे भगवान शब्द। इस शब्द को हिंदू समाज ने बनाया है। चूंकि हिंदू समाज पुरुष प्रधान समाज है, इसलिए भगवान शब्द सिर्फ पुरुष का अर्थ देता है। गॉड और अल्लाह शब्दों से भी सिर्फ पुरुष का ही बोध होता है। जब हम भगवान, गॉड या अल्लाह बोलते हैं तो हमारे अवचेतन में किसी स्त्री की छवि नहीं उभरती। इसी प्रकार सारे नकारात्मक और खल शब्द 'काला' को लेकर बनाए गए हैं। जैसे कलंकिनी, कलमुंहा, कुलटा, काला जादू, काला बाजार आदि। और हर गैर आदिवासी भाषा में शत-प्रतिशत गालियां केवल स्त्री को लेकर बनाई गई हैं। गैर आदिवासी समाज ने तो विश्वासपात्र और मेहनत करने वाले जानवरों को भी नहीं छोड़ा है। कुत्ता और गदहा को गाली बना दिया है। अब जिस भापा की शब्द संरचना ही नस्लीय, लैंगिक और सांप्रदायिक हो, उसकी आलोचनात्मक परंपरा कैसी होगी? और कितनी विश्वसनीय होगी? विशेषकर तब, जब हम आदिवासी, स्त्री और दलित पर्सपेक्टिव से इस पर विचार करेंगे। क्योंकि हिंदू वेद-पुराण भी आदिवासियों को राक्षस कहते हैं और प्रेमचंद भी अपने गोदान' में हम आदिवासियों को जंगली और असभ्य के रूप में ही चित्रित करते हैं। हमारे माननीय राष्ट्रपति और मुख्यमंत्री भी 'नवरात्रि' या 'दशहरा' पर 'आर्य हिंदू' जनता को सार्वजनिक तौर पर बधाई देते हैं।
गैर आदिवासी दुनिया की ज्ञान और आलोचनात्मक परंपरा जिस विश्वदृष्टिकोण पर खड़ी है, वह मूल रूप से धार्मिक है। सत्यम शिवम सुंदरम। यानी सत्य ईश्वर है और ईश्वर ही सत्य है। ईश्वर के परे सत्य और सुंदर की कल्पना गैर आदिवासी समाज में नहीं है। जबकि हम सभी जानते हैं कि ईश्वर मनुष्य की गढ़ी हुई एक कल्पना है। तो. जो समाज कल्पना को सच मानता हो, उसकी आलोचनात्मक ज्ञान परंपरा कैसी होगी? उसके शब्द भंडार, भाषिक संरचना और शब्द विन्यास किन मूल्यों को अभिव्यक्त करेंगे? हमें इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। तभी हम भारत की आलोचनात्मक ज्ञान परंपरा की वास्तविकता को समझ पाएंगे। यही वजह है कि भारतीय आलोचना आज भी पश्चिमीमुखी है। वेस्ट ओरिएंटेड है। हमारी विमर्श परंपरा प्लेटो-सुकरात, औद्योगिक क्रांति, फ्रांस का रेनेसां, शेक्सपीयर और मार्क्स के बीच ही घूमती रहती है। बुद्ध, गांधी और फूले-पेरियार-अंबेडकर को भी हम इन्हीं की कसौटियों पर कसते और परखते हैं। ठीक उसी तरह, जिस तरह भारतीय इतिहास 'ऋग्वेद' के बिना शुरू नहीं होता।
आदिवासी दर्शन और ज्ञान परंपरा वाचिक है। परंपरागत रूप से हम सृष्टि-प्रकृति के साथ-साथ संपूर्ण जीव-जगत के ध्वनियों तथा इंसान के शब्दों पर एक जैसा विश्वास करते हैं। इसे हमलोग, पढ़े-लिखे आदिवासी लोग 'वाचिकता' कहते हैं। अंग्रेजी में ऑरेचर। ऑरेचर में कहा गया, सुना गया और लिखा जा रहा, सबकुछ शामिल है। गैर आदिवासी दुनिया की तरह हम कहे गए और लिखे गए शब्दों में भेद नहीं करते। ऑरल, फोक लिटरेचर या लोक साहित्य गैर आदिवासी लोगों की भेदपरक काल्पनिक अवधारणा है। जबकि सच्चाई यही है कि कहे या सोचे हुए शब्द ही लिखे जाते हैं। मनुष्य ऐसा कुछ भी नहीं लिख पाता, जिसके लिए शब्द न हों। लिखा हुआ साहित्य बोले गए शब्दों को अविश्वसनीय मानता है। हम आदिवासी इससे सहमत नहीं हैं। हमारे लिए ऑरल विजडम और ट्रेडिशनल नॉलेज ही प्राथमिक है। आदिवासी ऑरेचर इसी की वर्तमान कड़ी है। हम धरती और प्रकृति की मूल परंपराओं से जोड़कर ही अपना वर्तमान और भविष्य देखते हैं। पुरखों का ऑरल विजडम यानी आदिवासियत ही हमारी विश्वदृष्टि है।
आदिवासी पुरखा गीतों, कहानियों और कहावतों वाला ऑरेचर बहुत समृद्ध है। लेकिन इस ऑरेचर में गैरआदिवासी दुनिया और उसके व्यवहार के बारे में बहुत कम कहा गया है। जो भी है वह बस केवल सूत्र रूप में है। आदिवासी आलोचना गैर आदिवासी आलोचनाओं की तरह निंदा नहीं करती। वह बहुत ही विजडम के साथ गैरआदिवासी समाज को बगैर नीचा दिखाए, बिना कोई गाली दिए, उनके जीवनदर्शन की आलोचना करती है।
कुछ उदाहरण रखती हूं। मुंडा आदिवासियों का एक गीत है-
हे पंछी, तुम कितनी चतुराई करोगे?
एक दिन तुमको बझा ही देंगे !
हे पंछी, तुम कितनी सावधानी करोगे? एक
दिन तुमको फंसा ही लेंगे!
हे पंछी, एक दिन बझा लेंगे,
डाड़ी के पानी में ही बझा लेंगे।
हे पंछी, एक दिन फंसा ही लेंगे, झरने के पानी में ही फंसा लेंगे।
कौन हैं ये बाहरी लोग, जो पहले सिर्फ नमक लेकर आए? फिर बस गए। खरीद-बिक्री शुरू की और बिना श्रम किए अधिक से अधिक लाभ कमाने वाली 'बाजार' आधारित अर्थव्यवस्था की शुरुआत की। वह कैसा समाज है और उसका जीवनदर्शन कैसा है? अगले गीत में इसे ही दर्ज किया गया है। इस गीत में पुरखा लोग बताते हैं कि बाहरी समाज एक भिन्न नस्ल, भापा-संस्कृति और दर्शन वाला है।
घोड़े की मदद से कौन खेती करता है?
हल चलाते हुए किसके बाल हिलते हैं?
चलो उसे देखते हैं, चलो उसे पहचानते हैं।
हां, हमने उसे देख लिया। हां, हमने उसे पहचान लिया।
यह आलोचना है। स्वस्थ आलोचना। जिसमें आदिवासी समाज गैर आदिवासी समाज के जीवन मूल्यों को परख रहा है। उसे समझ रहा है। वह देख रहा है कि गैर आदिवासी समाज में श्रम की कोई प्रतिष्ठा नहीं है। श्रम करने वाले लोग, कारीगरी करने वाले लोग, खेती-किसानी करने वाले लोग दिन-रात अपमानित किए जाते हैं। उनकी सामाजिक व्यवस्था में श्रम का अवमूल्यन है। स्त्रियां और दलित जातियां गुलाम हैं। वहां जो वर्ग जितना ज्यादा मेहनत करता है वह उतना ही प्रताड़ित और अपमानित होता है।
हमें ऐसी ही आलोचनात्मक दृष्टि और परंपरा के पुनर्पाठ की जरूरत है। जो आलोचना तो करे, लेकिन किसी समाज, वर्ग और इंसानी समूह के प्रति नस्लीय, धार्मिक और लैंगिक पूर्वाग्रह नहीं रखे। ऑरेचर यानी आदिवासी भापाओं का वाचिक और लिखित साहित्य हमें यही संदेश देता है। वह हमें सभी रंगों के प्रति समान भाव रखने की दृष्टि देता है। सहजीविता, यानी कोएक्जिस्टेंट जिस आलोचना के केंद्र में नहीं होगी, वह इंसानी सभ्यता के लिए आत्मघाती है।
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